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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1008

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

१००७

व्याख्या—‘अनघ’—अर्जुनको निष्पाप इसलिये कहा गया है कि वे दोष-दृष्टि-(असूया-) से रहित थे। दोष-दृष्टि करना पाप है। इससे अन्तःकरण अशुद्ध होता है। जो दोष-दृष्टिसे रहित होता है, वही भक्तिका पात्र होता है।

गोपनीय बात दोष-दृष्टिसे रहित मनुष्यके सामने ही कही जाती है*। यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय बात कह दी जाय, तो उस मनुष्यपर उस बातका उलटा असर पड़ता है अर्थात् वह उस गोपनीय बातका उलटा अर्थ लगाकर वक्तमें भी दोष देखने लगता है कि यह आत्मशलाधी है; दूसरोंको मोहित करनेके लिये कहता है इत्यादि। इससे दोष-दृष्टिवाले मनुष्यकी बहुत हानि होती है।

दोष-दृष्टि होनेमें खास कारण है—अभिमान। मनुष्यमें जिस बातका अभिमान हो, उस बातकी उसमें कमी होती है। उस कमीको वह दूसरोंमें देखने लगता है। अपनेमें अच्छाईका अभिमान होनेसे दूसरोंमें बुराई दीखती है; और दूसरोंमें बुराई देखनेसे ही अपनेमें अच्छाईका अभिमान आता है।

यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने भगवान् अपनेको सर्वोपरि ‘पुरुषोत्तम’ कहें, तो उसको विश्वास नहीं होगा, उलटे वह यह सोचेगा कि भगवान् आत्मशलाधी (अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले) हैं—

‘निज अग्यान राम पर धरहीं।’ (मानस ७।७३।५)

भगवान्के प्रति दोष-दृष्टि होनेसे उसकी बहुत हानि होती है। इसलिये भगवान् और संतजन दोष-दृष्टिवाले अश्रद्धालु मनुष्यके सामने गोपनीय बातें प्रकट नहीं करते (गीता—अठारहवें अध्यायका सङ्गठवाँ श्लोक)। वास्तवमें देखा जाय तो दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय (रहस्ययुक्त) बातें मुखसे निकलती ही नहीं!

अर्जुनके लिये ‘अनघ’ सम्बोधन देनेमें यह भाव भी हो सकता है कि इस अध्यायमें भगवान्ने जो परमगोपनीय प्रभाव बताया है, वह अर्जुन-जैसे दोष-दृष्टिसे रहित सरल पुरुषके सम्मुख ही प्रकट किया जा सकता है।

‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्’—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें अत्यभिचारिणी भक्तिकी बात कहनेके बाद भगवान्ने पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकसे उन्नीसवें

श्लोकतक जिस (क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमके) विषयका वर्णन किया है, उस विषयकी पूर्णता और लक्ष्यका निर्देश यहाँ ‘इति इदम्’ पदोंसे किया गया है।

इस अध्यायमें पहले भगवान्ने क्षर (संसार) और अक्षर-(जीवात्मा-) का वर्णन करके अपना अप्रतिम प्रभाव (बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक) प्रकट किया। फिर भगवान्ने यह गोपनीय बात प्रकट की कि जिसका यह सब प्रभाव है, वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) ‘पुरुषोत्तम’ मैं ही हूँ।

नाटकमें स्वाँग धारण किये हुए मनुष्यकी तरह भगवान् इस पृथ्वीपर मनुष्यका स्वाँग धारण करके अवतरित होते हैं और ऐसा बताव करते हैं कि अज्ञानी मनुष्य उनको नहीं जान पाते (गीता—सातवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। स्वाँगमें अपना वास्तविक परिचय नहीं दिया जाता, गुप्त रखा जाता है। परन्तु भगवान्ने इस अध्यायमें (अठारहवें श्लोकमें) अपना वास्तविक परिचय देकर अत्यन्त गोपनीय बात प्रकट कर दी कि मैं ही पुरुषोत्तम हूँ। इसलिये इस अध्यायको ‘गुह्यतम’ कहा गया है।

‘शास्त्र’ में प्रायः संसार, जीवात्मा और परमात्माका वर्णन आता है। इन तीनोंका ही वर्णन पंद्रहवें अध्यायमें हुआ है, इसलिये इस अध्यायको ‘शास्त्र’ भी कहा गया है।

सर्वशास्त्रमयी गीतामें केवल इसी अध्यायको ‘शास्त्र’ की उपाधि मिली है। इसमें ‘पुरुषोत्तम’ का वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायको ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है। इस गुह्यतम शास्त्रमें भगवान्ने अपनी प्रापतिके छः उपायोंका वर्णन किया है—

(१) संसारको तत्त्वसे जानना (पहला श्लोक)।

(२) संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करके एक भगवान्के शरण होना (तीसरा-चौथा श्लोक)।

(३) अपनेमें स्थित परमात्मतत्त्वको जानना (ग्यारहवाँ श्लोक)।

(४) वेदाध्ययनके द्वारा तत्त्वको जानना (पन्द्रहवाँ श्लोक)।

(५) भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सब प्रकारसे उनका भजन करना (उन्नीसवाँ श्लोक)।

  • नवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको दोष-दृष्टिसे रहित कहते हुए ही गुह्यतम ज्ञान बतानेकी प्रतिज्ञा की थी—‘इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूययै।’ इस पंद्रहवें अध्यायमें तो नवें अध्यायसे भी अधिक गोपनीय विषय बताया गया है। अतः यहाँ ‘अनघ’का तात्पर्य ‘अनसूया’ मानना उचित ही है।