श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
(६) सम्पूर्ण अध्यायके तत्त्वको जानना (बीसवों श्लोक)।
जिस अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके ऐसे सुगम उपाय बताये गये हों, उसको 'शास्त्र' कहना उचित ही है।
'मया उक्तम् '—इन पदोंसे भगवान् यह कहते हैं कि सम्पूर्ण भौतिक जगत्का प्रकाशक और अधिष्ठान, समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित, वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य एवं क्षर और अक्षर दोनोंसे उत्तम साक्षात् मुझ पुरुषोत्तमके द्वारा ही यह गुह्यतम शास्त्र अत्यन्त कृपापूर्वक कहा गया है। अपने विषयमें जैसा मैं कह सकता हूँ, वैसा कोई नहीं कह सकता। कारण कि दूसरा पहले (मेरी ही कृपाशक्तिसे) मेरेको जानेगा*, फिर वह मेरे विषयमें कुछ कहेगा, जबकि मेरेमें अनजानपना है ही नहीं।
वास्तवमें स्वयं भगवान्के अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनको पूर्णरूपसे नहीं जान सकता (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)। छठे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से कहा था कि आपके सिवाय दूसरा कोई भी मेरे संशयका छेदन नहीं कर सकता। यहाँ भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि मेरे द्वारा कहे हुए विषयमें किसी प्रकारका संशय रहनेकी सम्भावना ही नहीं है।
'एतद्वबुद्ध्या बुद्धिमानस्याकृतकृत्यश्च भारत '—पूरे अध्यायमें भगवान्ने जो संसारकी वास्तविकता, जीवात्माके स्वरूप और अपने अप्रतिम प्रभाव एवं गोपनीयताका वर्णन किया है, उसका (विशेषरूपसे उन्नीसवें श्लोकका) निर्देश यहाँ 'एतत् ' पदसे किया गया है। इस गुह्यतम शास्त्रको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह ज्ञानवान् अर्थात् ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। उसके लिये कुछ भी
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने इस अध्यायमें अपने-आपको पुरुषोत्तमरूपसे अर्थात् अलौकिक समग्ररूपसे प्रकट किया है, इसलिये इसको 'गुह्यतम शास्त्र' कहा गया है।
मनुष्य कर्मयोगसे कृतकृत्य, ज्ञानयोगसे ज्ञात-ज्ञातव्य और भक्तियोगसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। शरीर मेरा नहीं है, शरीरपर मेरा अधिकार नहीं है तथा शरीरसे मेरा सम्बन्ध नहीं है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। मेरेको कुछ नहीं चाहिये—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। इस श्लोकमें आये 'बुद्धिमान् ' पदमें ज्ञात-ज्ञातव्य होनेका भाव आया है। पूर्वश्लोकमें 'स सर्वविद्वजति मां सर्वभावेन भारत ' पदोंमें प्राप्त-प्राप्तव्य होनेका भाव आया है। प्रस्तुत श्लोकमें आये 'च ' पदसे भी अनुक्त समुच्चय अर्थ—प्राप्त-प्राप्तव्य ले सकते हैं। लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक
जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने जाननेयोग्य पुरुषोत्तमको जान लिया।
परमात्मतत्त्वको जाननेसे मनुष्यकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। परमात्मतत्त्वको जाने बिना लौकिक सम्पूर्ण विद्याएँ, भाषाएँ, कलाएँ आदि क्यों न जान ली जायँ, उनसे मूढ़ता नहीं मिटती; क्योंकि लौकिक सब विद्याएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली तथा अपूर्ण हैं। जितनी लौकिक विद्याएँ हैं, सब परमात्मासे ही प्रकट होनेवाली हैं; अतः वे परमात्माको कैसे प्रकाशित कर सकती हैं? इन सब लौकिक विद्याओंसे अनजान होते हुए भी जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।
उन्नीसवें श्लोकमें सब प्रकारसे भजन करनेवाले जिस मोहरहित भक्तको 'सर्ववित् ' कहा गया है, उसीको यहाँ 'बुद्धिमान् ' नामसे कहा गया है।
यहाँ 'च ' पदमें पूर्वश्लोकमें आयी बातके फल- (प्राप्त-प्राप्तव्यता-) का अनुकर्षण है। पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान्का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिके समान कोई लाभ नहीं है—'लाभु कि किञ्च ह्री भगति समाना ' (मानस ७। ११२। ४)। अतः जिसने भक्तिको प्राप्त कर लिया, वह प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।
भगवतत्त्वकी यह विलक्षणता है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंमेंसे किसी एककी सिद्धिसे कृतकृत्यता, ज्ञात-ज्ञातव्यता और प्राप्त-प्राप्तव्यता—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये जो भगवतत्त्वको जान लेता है, उसके लिये फिर कुछ जानना, पाना और करना शेष नहीं रहता। उसका मनुष्यजीवन सफल हो जाता है।
- सोड़ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हिरि कृपां तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (मानस २।१२७।२)