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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१००८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

(६) सम्पूर्ण अध्यायके तत्त्वको जानना (बीसवों श्लोक)।

जिस अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके ऐसे सुगम उपाय बताये गये हों, उसको 'शास्त्र' कहना उचित ही है।

'मया उक्तम् '—इन पदोंसे भगवान् यह कहते हैं कि सम्पूर्ण भौतिक जगत्का प्रकाशक और अधिष्ठान, समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित, वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य एवं क्षर और अक्षर दोनोंसे उत्तम साक्षात् मुझ पुरुषोत्तमके द्वारा ही यह गुह्यतम शास्त्र अत्यन्त कृपापूर्वक कहा गया है। अपने विषयमें जैसा मैं कह सकता हूँ, वैसा कोई नहीं कह सकता। कारण कि दूसरा पहले (मेरी ही कृपाशक्तिसे) मेरेको जानेगा*, फिर वह मेरे विषयमें कुछ कहेगा, जबकि मेरेमें अनजानपना है ही नहीं।

वास्तवमें स्वयं भगवान्के अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनको पूर्णरूपसे नहीं जान सकता (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)। छठे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से कहा था कि आपके सिवाय दूसरा कोई भी मेरे संशयका छेदन नहीं कर सकता। यहाँ भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि मेरे द्वारा कहे हुए विषयमें किसी प्रकारका संशय रहनेकी सम्भावना ही नहीं है।

'एतद्वबुद्ध्या बुद्धिमानस्याकृतकृत्यश्च भारत '—पूरे अध्यायमें भगवान्ने जो संसारकी वास्तविकता, जीवात्माके स्वरूप और अपने अप्रतिम प्रभाव एवं गोपनीयताका वर्णन किया है, उसका (विशेषरूपसे उन्नीसवें श्लोकका) निर्देश यहाँ 'एतत् ' पदसे किया गया है। इस गुह्यतम शास्त्रको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह ज्ञानवान् अर्थात् ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। उसके लिये कुछ भी

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने इस अध्यायमें अपने-आपको पुरुषोत्तमरूपसे अर्थात् अलौकिक समग्ररूपसे प्रकट किया है, इसलिये इसको 'गुह्यतम शास्त्र' कहा गया है।

मनुष्य कर्मयोगसे कृतकृत्य, ज्ञानयोगसे ज्ञात-ज्ञातव्य और भक्तियोगसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। शरीर मेरा नहीं है, शरीरपर मेरा अधिकार नहीं है तथा शरीरसे मेरा सम्बन्ध नहीं है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। मेरेको कुछ नहीं चाहिये—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। इस श्लोकमें आये 'बुद्धिमान् ' पदमें ज्ञात-ज्ञातव्य होनेका भाव आया है। पूर्वश्लोकमें 'स सर्वविद्वजति मां सर्वभावेन भारत ' पदोंमें प्राप्त-प्राप्तव्य होनेका भाव आया है। प्रस्तुत श्लोकमें आये ' ' पदसे भी अनुक्त समुच्चय अर्थ—प्राप्त-प्राप्तव्य ले सकते हैं। लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक

जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने जाननेयोग्य पुरुषोत्तमको जान लिया।

परमात्मतत्त्वको जाननेसे मनुष्यकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। परमात्मतत्त्वको जाने बिना लौकिक सम्पूर्ण विद्याएँ, भाषाएँ, कलाएँ आदि क्यों न जान ली जायँ, उनसे मूढ़ता नहीं मिटती; क्योंकि लौकिक सब विद्याएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली तथा अपूर्ण हैं। जितनी लौकिक विद्याएँ हैं, सब परमात्मासे ही प्रकट होनेवाली हैं; अतः वे परमात्माको कैसे प्रकाशित कर सकती हैं? इन सब लौकिक विद्याओंसे अनजान होते हुए भी जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।

उन्नीसवें श्लोकमें सब प्रकारसे भजन करनेवाले जिस मोहरहित भक्तको 'सर्ववित् ' कहा गया है, उसीको यहाँ 'बुद्धिमान् ' नामसे कहा गया है।

यहाँ ' ' पदमें पूर्वश्लोकमें आयी बातके फल- (प्राप्त-प्राप्तव्यता-) का अनुकर्षण है। पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान्का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिके समान कोई लाभ नहीं है—'लाभु कि किञ्च ह्री भगति समाना ' (मानस ७। ११२। ४)। अतः जिसने भक्तिको प्राप्त कर लिया, वह प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।

भगवतत्त्वकी यह विलक्षणता है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंमेंसे किसी एककी सिद्धिसे कृतकृत्यता, ज्ञात-ज्ञातव्यता और प्राप्त-प्राप्तव्यता—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये जो भगवतत्त्वको जान लेता है, उसके लिये फिर कुछ जानना, पाना और करना शेष नहीं रहता। उसका मनुष्यजीवन सफल हो जाता है।

  • सोड़ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हिरि कृपां तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (मानस २।१२७।२)

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

१००९

परमात्मा ही प्राप्तव्य है। इस श्लोकसे यह भाव निकलता है कि भक्तको ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंका फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ज्ञात-ज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ और दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘पुरुषोत्तमयोग’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥

इस अध्यायमें कहे हुए विषयको यथार्थरूपसे समझ लेनेपर पुरुषोत्तम-(भगवान्-) के साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘पुरुषोत्तमयोग’ रखा गया है।

पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके दो सौ अट्ठासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ छः है।

(२) ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके सात सौ एक और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ बासठ है। इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, चौथा, पाँचवाँ और पंद्रहवाँ—ये चार श्लोक चौवालीस अक्षरोंके और तीसरा श्लोक पैतालीस

अक्षरोंका है। शेष पंद्रह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच।’

पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, तीसरा और चौथा—ये तीन श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं; और पाँचवाँ तथा पंद्रहवाँ—ये दो श्लोक ‘इन्द्रवज्रा’ छन्दवाले हैं। बचे हुए पंद्रह श्लोकोंमेंसे—सातवें श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’; नवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष दस (१, ६, ८, १०—१४, १६—१७) श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

पन्द्रहवें अध्यायका सार

भगवान्ने सातवें अध्यायमें अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया था—अपरा और परा (७।४-५)। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार—यह आठ प्रकारके भेदोंवाली ‘अपरा प्रकृति’ है और जिसने जगत्को धारण किया हुआ है, वह जीवरूप बनी हुई ‘परा प्रकृति’ है। अपरा और परा—दोनों ईश्वरकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव हैं। अपरा, परा और ईश्वर—इन तीनोंका विस्तारसे वर्णन भगवान् पन्द्रहवें अध्यायमें करते हैं। पन्द्रहवें अध्यायमें पहले संसार-वृक्षके रूपमें ‘अपरा’ का वर्णन करते हैं, फिर सातवें ग्यारहवें श्लोकतक अपने अंश-रूपसे ‘पराका वर्णन करते हैं, फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक अपने प्रभावका वर्णन करते हैं। अन्तमें अपरा, परा और ईश्वर—तीनोंका क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे वर्णन करके अध्यायका उपसंहार करते हैं।

सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी प्रकृति अर्थात् अपनेसे अभिन्न बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। परन्तु पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अपनेको अपरा (क्षर) से अतीत और परा (अक्षर) से उत्तम बताया है। इसका तात्पर्य है कि जबतक साधक अपरा (संसार) और परा (स्वयं)—दोनोंकी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, तबतक भगवान् अपरासे अतीत और परासे उत्तम हैं। परन्तु जब उसकी मान्यतामें अपरा और पराकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, तब अपरा, परा और भगवान्—तीनों एक ही होते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।

पन्द्रहवें अध्यायके मध्यमें अक्षर (जीवात्मा) के वर्णनका तात्पर्य है कि जीवके एक तरफ क्षर (संसार) है और एक तरफ पुरुषोत्तम (परमात्मा) है। जीवका सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोकै’; क्योंकि जैसे

१०१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

परमात्मा चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील हैं, ऐसे ही जीव भी चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील है। शरीरका सम्बन्ध संसारके साथ है—‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि ’; क्योंकि जैसे संसार जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है, ऐसे ही शरीर भी जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है। जीवको परमात्मासे कभी अलग नहीं कर सकते और शरीरको संसारसे कभी अलग नहीं कर सकते।

परमात्मा उसको कहते हैं, जो अभी हो, सबमें हो, सबका हो, सर्वसमर्थ हो, परम दयालु हो और अद्वितीय हो। अभी होनेके कारण उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा नहीं करनी पड़ेगी। सबमें होनेसे वह अपनेमें भी है; अतः उनको ढूँढ़नेके लिये कहीं जाना नहीं पड़ेगा। सबका होनेसे वह अपना भी है; अतः उसमें स्वतः प्रेम होगा। सर्वसमर्थ होनेसे हमें भयभीत होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। परमदयालु होनेसे हमें निराश होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। अद्वितीय होनेसे हमें उसको पहचाननेकी, उसका वर्णन करनेकी जरूरत नहीं रहेगी।

परमात्माकी प्राप्ति न होनेका कारण यही है कि हम उसकी सत्ता और महत्ता स्वीकार नहीं करते और उसको अपना नहीं मानते। अगर हम उसकी सत्ता, महत्ता और अपनेपनको स्वीकार करते तो फिर वह हमें अप्राप्त नहीं लगता। वह हमें स्वतः प्यारा लगता; क्योंकि परमात्माको अपना माननेके सिवाय प्रेम-प्राप्तिका और कोई उपाय है ही नहीं। प्रेम यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि बड़े-बड़े पुण्यकर्मोंसे नहीं मिलता, प्रत्युत भगवान्को अपना माननेसे मिलता है। भगवान्ने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोकैः ’ (१५।७)। इसका तात्पर्य है कि जीव केवल मेरा (भगवान्का) ही अंश है, इसमें अन्य किसीका मिश्रण नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि केवल भगवान्का ही अंश होनेके कारण हमारा सम्बन्ध केवल भगवान्के ही साथ है। जब हम भगवान्के ही अंश हैं, तो फिर प्रकृतिका कार्य शरीर अपना कैसे हुआ? अतः भगवान् ही अपने हैं, दूसरा कोई भी अपना नहीं है। भगवान्का ही अंश होनेके कारण हम भगवान्से अलग नहीं हो सकते, उनको छोड़ नहीं सकते। सर्वसमर्थ भगवान् भी जीवसे अलग नहीं हो सकते, जीवको छोड़ नहीं सकते। अगर भगवान् जीवको छोड़ दें तो जीव एक नया भगवान् हो जायगा अर्थात् भगवान् एक नहीं रहेंगे, प्रत्युत अनेक हो जायेंगे, जो कभी सम्भव नहीं है। जिसको हम छोड़ नहीं सकते, उसके विषयमें यह प्रश्न ही नहीं उठता कि वह कैसा है? अतः भगवान् कैसे हैं, क्या हैं, यह विचार न करके उनमें प्रेम करना चाहिये। जब मनुष्य संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है और जब परमात्माके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब मुक्त होकर भक्त हो जाता है। मनुष्यसे सबसे बड़ी गलती यह होती है कि जो शरीर संसारका है, उसको अपना मान लेता है और जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको भूल जाता है। जब साधक इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि शरीर मेरा नहीं है और मेरे लिये भी नहीं है, तब उसके द्वारा स्वतः संसारकी ‘सेवा’ होती है। जब वह इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि भगवान् मेरे हैं और मेरे लिये हैं, तब उसका स्वतः भगवान्में ‘प्रेम’ होता है। सेवाके बदलेमें साधकको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि संसारकी ही वस्तु संसारको दे दी तो अपना क्या खर्च हुआ? नया उद्योग क्या हुआ? प्रेमके बदलेमें भी उसको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि जो सदासे ही अपना है, उसमें प्रेमसे बढ़कर ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसकी उसको आवश्यकता हो। प्रभु मेरे लिये हैं, इसलिये अपनेको उनके अर्पित करना है, उनसे कुछ लेना नहीं है। उनसे कुछ चाहनेसे हम उनसे अलग हो जायेंगे और अपनेको देनेसे उनसे अभिन्न हो जायेंगे।

सेवासे मुक्ति होती है और प्रेमसे पराभूतिक प्राप्त होती है। मुक्तिसे निरपेक्ष जीवनकी और भक्तिसे सरस जीवनकी प्राप्ति हो जाती है।

—◆◆◆—

॥ ॐ श्रीप्रमात्मने नमः ॥

अथ षोडशोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान्ने सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें 'दुष्कृतिनो मूढाः आसुरं भावमाश्रिताः मां न प्रपद्यन्ते' (बुरे कर्म करनेवाले तथा आसुरी प्रकृतिको धारण करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरा भजन नहीं करते) पदोंसे आसुरी सम्पत्तिलाँका और सोलहवें श्लोकमें 'सुकृतिनः मां भजन्ते' (पुण्यकर्म लोग मेरा भजन करते हैं) पदोंसे दैवी सम्पत्तिलाँका संकेतरूपसे वर्णन किया। सातवें अध्यायके अन्तिम दो श्लोकोंपर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उन प्रश्नोंके उत्तरमें आठवाँ अध्याय पूरा हुआ।

भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसी विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेके लिये नवें अध्यायका विषय आरम्भ किया। इस नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी 'राक्षसीमासुरी चैव प्रकृतितं मोहिनीं श्रिताः' पदोंसे आसुरी सम्पदावालोंका और तेरहवें श्लोकमें 'दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः मां भजन्ते' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका संक्षेपसे वर्णन करके दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक ज्ञान-विज्ञानका विषय कहा।

दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके बाद भगवान्को दैवी-आसुरी-सम्पदाका विस्तारसे वर्णन करना चाहिये था, पर भगवान्के प्रभावसे प्रभावित होकर अर्जुनने भगवान्की स्तुति की एवं पुनः विभूति कहनेके लिये उनसे प्रार्थना की। विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें अर्जुनसे कहा कि 'तुझे अधिक जाननेसे क्या मतलब? मैं तो सारे संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ।' इसपर उस स्वरूपको (जिसके एक अंशमें सारा संसार स्थित है) देखनेके लिये उत्सुक हुए अर्जुनने ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की।

अर्जुनको अपना विश्वरूप दिखाकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य-भक्तिकी महिमा एवं उसका स्वरूप बताया। इसपर सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें अर्जुनने बारहवें अध्यायके पहले श्लोकमें प्रश्न किया। अतः भगवान्ने बारहवें अध्यायमें सगुण-उपासकोंका वर्णन करके तेरहवें अध्यायसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक निर्गुण-विषयका वर्णन किया। फिर अर्जुनने चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीतके लक्षण, आचरण एवं गुणातीत होनेका उपाय पूछा। उन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवान्ने छब्बीसवें श्लोकमें 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते' पदोंसे अव्यभिचारिणी भक्तिको गुणातीत होनेका उपाय बताया अर्थात् अव्यभिचारसे दैवी सम्पत्तिका और व्यभिचारसे आसुरी सम्पत्तिका संकेत किया। वह अव्यभिचारी भक्ति कैसे प्राप्त हो—यह बतानेके लिये पन्द्रहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।

पंद्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने 'असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा' पदोंसे आसुरी सम्पत्तिके कारणरूप 'संग'-(संसारकी आसक्ति-) का त्याग करके असंगतासे प्रकट होनेवाली दैवी सम्पत्तिकी बात कही। फिर चौथे श्लोकमें 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदोंसे शरणागतिरूप दैवी सम्पत्तिका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो शरण नहीं होते, उन आसुरी सम्पत्तिलाँका संकेत किया। फिर उन्नीसवें श्लोकमें 'स सर्वविदु असम्भूदः मां सर्वभावेन भजति' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका अर्थात् अधिकारियोंका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो भगवान्का भजन नहीं करते, उन आसुरी सम्पदावालोंका अर्थात् अनधिकारियोंका वर्णन किया।

इस प्रकार अर्जुनके अन्य प्रश्नोंके कारण अबतक भगवान्को दैवी और आसुरी सम्पदापर विस्तारसे कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। अब अर्जुनका कोई प्रश्न न रहनेसे भगवान् इस सोलहवें अध्यायमें दैवी और आसुरी सम्पदाका विस्तारसे वर्णन आरम्भ करते हैं।

१०१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

श्रीभगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—

अभयम् | = भयका सर्वथा अभाव, | योगमें दृढ़ स्थिति, | स्वाध्यायः | = स्वाध्याय, ---|---|---|---|--- सत्त्वसंशुद्धिः | = अन्तःकरणकी अत्यन्त शुद्धि, | च | = और | लिये कष्ट सहना ज्ञानयोग- | | दानम् | = सात्त्विक दान, | च | = और व्यवस्थितिः | = ज्ञानके लिये | दमः | = इन्द्रियोंका दमन, | आर्जवम् | = शरीर-मन-वाणीकी सरलता। | | यज्ञः | = यज्ञ, | |

व्याख्या—[पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'जो मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है अर्थात् वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है।' इस प्रकार एकमात्र भगवान्का उद्देश्य होनेपर साधकमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होने लग जाती है। अतः भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें क्रमशः भाव, आचरण और प्रभावको लेकर दैवी-सम्पत्तिका वर्णन करते हैं।]

'अभयम्'—अनिष्टकी आशंकासे मनुष्यके भीतर जो घबरहट होती है, उसका नाम भय है और उस भयके सर्वथा अभावका नाम 'अभय' है।

भय दो रीतिसे होता है—(१) बाहरसे और (२) भीतरसे।

(१) बाहरसे आनेवाला भय—

(क) चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प आदि प्राणियोंसे जो भय होता है, वह बाहरका भय है। यह भय शरीरनाशकी आशंकासे ही होता है। परन्तु जब यह अनुभव हो जाता है कि यह शरीर नाशवान् है और जानेवाला ही है, तो फिर भय नहीं रहता।

बीडी-सिगरेट, अफीम, भाँग, शराब आदिके व्यसनोंको छोड़नेका एवं व्यसनी मित्रोंसे अपनी मित्रता टूटनेका जो भय होता है, वह मनुष्यकी अपनी कायरतासे ही होता है। कायरता छोड़नेसे यह भय नहीं रहता।

(ख) अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्य-पालन करते हुए उसमें भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई काम न हो जाय; हमें विद्या पढ़ानेवाले, अच्छी शिक्षा देनेवाले आचार्य, गुरु, सन्त-महात्मा, माता-पिता आदिके वचनोंकी आज्ञाकी अवहेलना न हो जाय; हमारे द्वारा शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध कोई आचरण न बन जाय—इस प्रकारका भय भी बाहरी भय कहलाता है। परन्तु यह भय वास्तवमें भय नहीं है, प्रत्युत यह तो अभय बनानेवाला भय है। ऐसा भय तो साधकके जीवनमें होना ही चाहिये। ऐसा भय होनेसे ही वह अपने मार्गपर ठीक तरहसे चल सकता है। कहा भी है—

हरि-डर, गुरु-डर, जगत-डर, डर करनी में सार।

रज्जब डर्या सो ऊबर्या, गाफिल खायी मार ॥

(२) भीतरसे पैदा होनेवाला भय—

(क) मनुष्य जब पाप, अन्याय, अत्याचार आदि निषिद्ध आचरण करना चाहता है, तब (उनको करनेकी भावना मनमें आते ही) भीतरसे भय पैदा होता है। मनुष्य निषिद्ध आचरण तभीतक करता है, जबतक उसके मनमें 'मेरा शरीर बना रहे, मेरा मान-सम्मान होता रहे, मेरेको सांसारिक भोग-पदार्थ मिलते रहें', इस प्रकार सांसारिक जड़ वस्तुओंकी प्राप्तिका और उनकी रक्षाका उद्देश्य रहता है'। परन्तु जब मनुष्यका एकमात्र उद्देश्य चिन्मय-तत्त्वको

१-यहाँ दैवी सम्पत्तिमें सबसे पहले 'अभयम्' पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर सर्वभावसे भगवान्का भजन करता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है। भगवान् श्रीराम कहते हैं—

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येत्तद् ब्रतं मम ॥ (वाल्मीकिः ६।१८।३३)

२-भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैत्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।

शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥

(भर्तृहरिवैराग्यशतक)

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०१३

प्राप्त करनेका हो जाता है, तब उसके द्वारा अन्याय, दुराचार छूट जाते हैं और वह सर्वथा अभय हो जाता है। कारण कि उसके लक्ष्य परमात्मत्वमें कभी कभी नहीं आती और वह कभी नष्ट नहीं होता।

(ख) जब मनुष्यके आचरण ठीक नहीं होते और वह अन्याय, अत्याचार आदिमें लगा रहता है, तब उसको भय लगता है। जैसे, रावणसे मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि सभी डरते थे, पर वही रावण जब सीताका हरण करनेके लिये जाता है, तब वह डरता है। ऐसे ही कौरवोंकी ग्यारह अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तो उसका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं हुआ (गीता—पहले अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), पर जब पाण्डवोंकी सात अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तब कौरव-सेनाके हृदय विदीर्ण हो गये (पहले अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह कि अन्याय, अत्याचार करनेवालोंके हृदय कमजोर हो जाते हैं, इसलिये वे भयभीत होते हैं। जब मनुष्य अन्याय आदिको छोड़कर अपने आचरणों एवं भावोंको शुद्ध बनाता है, तब उसका भय मिट जाता है।

(ग) मनुष्य-शरीर प्राप्त करके यह जीव जबतक करनेयोग्यको नहीं करता, जाननेयोग्यको नहीं जानता और पानेयोग्यको नहीं पाता, तबतक वह सर्वथा अभय नहीं हो सकता; उसके जीवनमें भय रहता ही है।

भगवान्की तरफ चलनेवाला साधक भगवान्पर जितना-जितना अधिक विश्वास करता है और उनके आश्रित होता है, उतना-ही-उतना वह अभय होता चला जाता है। उसमें स्वतः यह विचार आता है कि मैं तो परमात्माका अंश हूँ; अतः कभी नष्ट होनेवाला नहीं हूँ, तो फिर भय किस बातका? और संसारके अंश शरीर आदि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, तो फिर भय किस बातका? ऐसा विवेक स्पष्टरूपसे प्रकट होनेपर भय स्वतः नष्ट हो जाता है और साधक सर्वथा अभय हो जाता है।

भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेपर, भगवान्को ही

अपना माननेपर शरीर, कुटुम्ब आदिमें ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे मरनेका भय नहीं रहता और साधक अभय हो जाता है।

‘सत्त्वसंशुद्धिः’—अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धिको सत्त्वसंशुद्धि कहते हैं। सम्यक् शुद्धि क्या है? संसारसे राग रहित होकर भगवान्में अनुराग हो जाना ही अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धि है। जब अपना विचार, भाव, उद्देश्य, लक्ष्य केवल एक परमात्माकी प्राप्तिका हो जाता है, तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कारण कि नाशवान् वस्तुओंकी प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे ही अन्तःकरणमें मल, विक्षेप और आवरण—ये तीन तरहके दोष आते हैं। शास्त्रोंमें मल-दोषको दूर करनेके लिये निष्कामभावसे कर्म (सेवा), विक्षेप-दोषको दूर करनेके लिये उपासना और आवरण-दोषको दूर करनेके लिये ज्ञान बताया है। यह होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबसे बढ़िया उपाय है—अन्तःकरणको अपना न मानना।

साधकको पुराने पापको दूर करनेके लिये या किसी परिस्थितिके वशीभूत होकर किये गये नये पापको दूर करनेके लिये अन्य प्रायश्चित्त करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है। उसको तो चाहिये कि वह जो साधन कर रहा है, उसीमें उत्साह और तत्परतापूर्वक लगा रहे। फिर उसके ज्ञात-अज्ञात सब पाप दूर हो जायेंगे और अन्तःकरण स्वतः शुद्ध हो जायगा।

साधकमें ऐसी एक भावना बन जाती है कि साधन-भजन करना अलग काम है और व्यापार-धंधा आदि करना अलग काम है अर्थात् ये दोनों अलग-अलग विभाग हैं। इसलिये व्यापार आदि व्यवहारमें झूठ-कपट आदि तो करने ही पड़ते हैं—ऐसी जो छूट ली जाती है, उससे अन्तःकरण बहुत ही अशुद्ध होता है। साधनके साथ-साथ जो असामान्य होता रहता है, उससे साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। इसलिये साधकको सदा सावधान रहना चाहिये अर्थात् नया पाप कभी न बने—ऐसी सावधानी सदा-सर्वदा बनी रहनी चाहिये।

‘भोगोंमें रोगका भय, ऊँचे कुलमें गिरनेका भय, धनमें राजाका भय, मानमें दीनताका भय, बलमें शत्रुका भय, रूपमें बुढ़ापेका भय, शास्त्रमें वाद-विवादका भय, गुणमें दुर्जनका भय और शरीरमें मृत्युका भय है। इस प्रकार संसारमें मनुष्योंके लिये सम्पूर्ण वस्तुएँ भयावह हैं, एक वैराग्य ही भयसे रहित है।’

तात्पर्य यह है कि ये सांसारिक वस्तुएँ कहीं नष्ट न हो जायें—इसका मनुष्यको सदा भय रहता है, इसलिये वह अभय नहीं हो पाता।

१-उद्देश्य तो पहलेसे ही बना हुआ है। उसके बाद हमें मनुष्य-शरीर मिला है। अतः उद्देश्यको केवल पहचानना है, बनाना नहीं है।

२-राम मेरे तो मैं मरूँ, नहीं तो मेरे बलाय। अविनाशी का बालका, मेरे न मारा जाय।

१०१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

साधक भूलसे किये हुए दुष्कर्मोंके अनुसार अपनेको दोषी मान लेता है और अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिको भी दोषी मान लेता है, जिससे उसका अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। उस अशुद्धिको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह भूलसे किये हुए दुष्कर्मको पुनः कभी न करनेका दृढ़ व्रत ले ले तथा अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिके अपराधको क्षमा माँगें बिना ही क्षमा कर दे और भगवान्से प्रार्थना करे कि 'हे नाथ! मेरा जो कुछ बुरा हुआ है, वह तो मेरे दुष्कर्मोंका ही फल है। वह बेचारा तो मुफ्तमें ही ऐसा कर बैठा है। उसका इसमें कोई दोष नहीं है। आप उसे क्षमा कर दें।' ऐसा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।

'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः' —ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना अर्थात् परमात्मतत्त्वका जो ज्ञान (बोध) है, वह चाहे सगुणका हो या निर्गुणका, उस ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना आवश्यक है। योगका अर्थ है—सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें, मान-अपमानमें, निन्दा-स्तुतिमें, रोग-नीरोगतामें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि न होकर निर्विकार रहना।

'दानम्' —लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वितर्ण कर देना 'दान' है। दान कई तरहके होते हैं; जैसे भूमिदान, गोदान, स्वर्णदान, अन्नदान, वस्त्रदान आदि। इन सबमें अन्नदान प्रधान है। परन्तु इससे भी अभयदान प्रधान (श्रेष्ठ) है। उस अभयदानके दो भेद होते हैं—

(१) संसारकी आफतसे, विघ्नोंसे, परिस्थितियोंसे भयभीत हुएको अपनी शक्ति, सामर्थ्यके अनुसार भयरहित करना, उसे आश्वासन देना, उसकी सहायता करना। यह अभयदान उसके शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको लेकर होता है।

(२) संसारमें फँसे हुए व्यक्तिको जन्म-मरणसे रहित करनेके लिये भगवान्की कथा आदि सुनाना। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको एवं उनके भावोंको सरल भाषामें छपवाकर सस्ते दामोंमें लोगोंको देना अथवा कोई समझना चाहे तो उसको समझाना, जिससे उसका कल्याण हो जाय। ऐसे दानसे भगवान् बहुत राजी होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गसठवाँ-उनहत्तरवाँ श्लोक); क्योंकि भगवान् ही सबमें परिपूर्ण हैं। अतः जितने अधिक जीवोंका कल्याण होता है, उतने ही अधिक भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ अभयदान है। इसमें भी भगवत्-सम्बन्धी बातें दूसरोंको सुनाते समय साधक वक्ताको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता न माने, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपा माने कि भगवान् ही श्रोताओंके रूपमें आकर मेरा समय सार्थक कर रहे हैं।

ऊपर जितने दान बताये हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़कर साधक ऐसा माने कि अपने पास वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्ने दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मुझे निमित्त बनाकर दी है। अतः भगवत्प्रतीत्यर्थ आवश्यकतानुसार जिस-किसीको जो कुछ दिया जाय, वह सब उसीका समझकर उसे देना 'दान' है।

'दमः' —इन्द्रियोंको पूरी तरह वशमें करनेका नाम 'दम' है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों, अन्तःकरण और शरीरसे कोई भी प्रवृत्ति शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये। शास्त्रविहित प्रवृत्ति भी अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही होनी चाहिये। इस प्रकारकी प्रवृत्तिसे इन्द्रियलोलुपता, आसक्ति और पराधीनता नहीं रहती एवं शरीर और इन्द्रियोंके बर्ताव शुद्ध, निर्मल होते हैं।

साधकका उद्देश्य इन्द्रियोंके दमनका होनेसे अकर्तव्यमें तो उसकी प्रवृत्ति होती ही नहीं और कर्तव्यमें स्वाभाविक

१-न गोप्रदानं न महीप्रदानं न चान्द्रदानं हि तथा प्रधानम्। यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं सर्वप्रदानेष्वभयप्रदानम्॥

(पंचतन्त्र, मित्रभेद ३१३)

'गोदान, भूमिदान और अन्नदान भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अभयदान है। विद्वान्लोग अभयदानको सब दानोंसे श्रेष्ठ कहते हैं।'

२-तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्पषापहम्। श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥

(श्रीमद्भा० १०। ३१। १)

'हे प्रभो! आपका कथामृत संसारमें जो संतप्त प्राणी हैं, उनको जीवन देनेवाला, शान्ति देनेवाला है, अच्छे-अच्छे महापुरुष भी उसका हृदयसे वर्णन करते हैं, वह सम्पूर्ण पापोंका अर्थात् भगवद्विमुखताका नाश करनेवाला है, कानोंमें पड़ते ही सब तरहसे मंगल-ही-मंगल देनेवाला है, संत-महापुरुषोंके द्वारा उसका विस्तारसे वर्णन किया गया है। ऐसे कथामृतका पृथ्वीपर जो कथन करते हैं, वे संसारको बहुत विशेषतासे दान देनेवाले हैं अर्थात् संसारका सबसे अधिक उपकार, हित करनेवाले हैं।'

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०१५

प्रवृत्ति होती है, तो उसमें स्वार्थ, अभिमान, आसक्ति, कामना आदि दोष नहीं रहते। यदि कभी किसी कार्यमें स्वार्थभाव आ भी जाता है, तो वह उसका दमन करता चला जाता है, जिससे अशुद्धि मिटती जाती है और शुद्धि होती चली जाती है और आगे चलकर उसका दम अर्थात् इन्द्रिय-संयम सिद्ध हो जाता है।

‘यज्ञः’—‘यज्ञ’ शब्दका अर्थ आहुति देना होता है। अतः अपने वर्णाश्रमके अनुसार होम, बलिवेश्वदेव आदि करना ‘यज्ञ’ है। इसके सिवाय गीताकी दृष्टिसे अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिक अनुसार जिस-किसी समय जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितकी भावनासे या भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। इसके अतिरिक्त जीविका-सम्बन्धी व्यापार, खेती आदि तथा शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी खाना-पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना, देना-लेना आदि सभी क्रियाएँ भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। ऐसे ही माता-पिता, आचार्य, गुरुजन आदिकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको मन, वाणी, तन और धनसे सुख पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना और गौ, ब्राह्मण, देवता, परमात्मा आदिका पूजन करना, सत्कार करना—ये सभी ‘यज्ञ’ हैं।

‘स्वाध्यायः’— अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठन-पाठनका नाम ‘स्वाध्याय’ है। वास्तवमें तो ‘स्वस्य अध्यायः (अध्ययनम्) स्वाध्यायः’ के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही ‘स्वाध्याय’ है। इसमें भी साधकको न तो अपनी वृत्तियोंसे अपनी स्थितिकी कसौटी लगानी है और न वृत्तियोंके अधीन अपनी स्थिति ही माननी है। कारण कि वृत्तियाँ तो हरदम आती-जाती रहती हैं, बदलती रहती हैं। तो फिर स्वाभाविक यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी वृत्तियोंको शुद्ध न करें? वास्तवमें तो साधकका कर्तव्य वृत्तियोंको शुद्ध करनेका ही होना चाहिये और वह शुद्धि अन्तःकरण तथा उसकी वृत्तियोंको अपना न माननेसे बहुत जल्दी हो जाती है; क्योंकि उनको अपना मानना ही मूल अशुद्धि है। साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे अपना स्वरूप

कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं। केवल वृत्तियोंके अशुद्ध होनेसे ही उसका यथार्थ अनुभव नहीं होता।

‘तपः’— भूख-प्यास, सरदी-गरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूख-प्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवन-निर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना ही ‘तप’ है; * क्योंकि इस तपमें पहले किये गये पापोंका नाश होता है और सहनेवालेमें सहनेकी एक नयी शक्ति, एक नया बल आता है।

साधकको सावधान रहना चाहिये कि वह उस तपोबलका प्रयोग दूसरोंको वरदान देनेमें, शाप देने या अनिष्ट करनेमें तथा अपनी इच्छापूर्ति करनेमें न लगाये, प्रत्युत उस बलको अपने साधनमें जो बाधाएँ आती हैं, उनको प्रसन्नतासे सहनेकी शक्ति बढ़ानेमें ही लगाये।

साधक जब साधन करता है, तब वह साधनमें कई तरहसे विघ्न मानता है। वह समझता है कि मुझे एकान्त मिले तो मैं साधन कर सकता हूँ, वायुमण्डल अच्छा हो तो साधन कर सकता हूँ इत्यादि। इन सब अनुकूलताओंकी चाहना न करना अर्थात् उनके अधीन न होना भी ‘तप’ है। साधकको अपना साधन परिस्थितियोंके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बना लेना चाहिये। साधकको अपनी चेष्टा तो एकान्तमें साधन करनेकी करनी चाहिये, पर एकान्त न मिले तो मिली हुई परिस्थितिको भगवान्की भेजी हुई समझकर विशेष उत्साहसे प्रसन्नतापूर्वक साधनमें प्रवृत्त होना चाहिये।

‘आर्जवम्’— सरलता, सीधेपनको ‘आर्जव’ कहते हैं। यह सरलता साधकका विशेष गुण है। यदि साधक यह चाहता है कि दूसरे लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा व्यवहार ठीक नहीं होगा तो लोग मुझे बढिया नहीं मानेंगे, इसलिये मुझे सरलतासे रहना चाहिये, तो यह एक प्रकारका कपट ही है। इससे साधकमें बनावटीपन आता है, जब कि साधकमें सीधा, सरल भाव होना चाहिये। सीधा, सरल होनेके कारण लोग उसको मूर्ख, बेसमझ कह सकते हैं, पर उससे साधककी कोई हानि नहीं है। अपने उद्धारके लिये

  • आगते स्वागतं कुर्याद् गच्छन्तं न निवारयेत्। यथाप्राप्तं सहेतस्व सा तपस्योत्तमोत्तमा ॥ (बोधसार)

‘प्रारब्धवश परिस्थितिरूपसे जो कुछ आ जाय, उसका स्वागत करे, जानेवालेको रोके नहीं और जो जैसे प्राप्त हो, उसे वैसे ही सहन करे, यही उत्तम-से-उत्तम तप है।’

१०९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

तो सरलता बड़े कामकी चीज है—

कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।

‘नारायन’ ता भक्त की, लगी किनारे नाव॥

इसलिये साधकके शरीर, वाणी और मनके व्यवहारमें कोई बनावटीपन नहीं रहना चाहिये*। उसमें स्वाभाविक सीधापन हो।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्थ्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्वलोलुप्तं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥

अहिंसा = अहिंसा, सत्यम् = सत्यभाषण, अक्रोधः = क्रोध न करना, त्यागः = संसारकी कामनाका त्याग, शान्तिः = अन्तःकरणमें राग-

द्वेषजनित हलचलका न होना, अपैशुनम् = चुगली न करना, भूतेषु = प्राणियोंपर दया = दया करना, अलोलुप्तम् = सांसारिक विषयोंमें

न ललचाना, मार्दवम् = अन्तःकरणकी कोमलता, ह्रीः = अकर्तव्य करनेमें लज्जा, अचापलम् = चपलताका अभाव।

व्याख्या —‘अहिंसा’—शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको तथा अनिष्ट न चाहनेको ‘अहिंसा’ कहते हैं। वास्तवमें सर्वथा अहिंसा तब होती है, जब मनुष्य संसारकी तरफसे विमुख होकर परमात्माकी तरफ ही चलता है। उसके द्वारा ‘अहिंसा’ का पालन स्वतः होता है। परन्तु जो रागपूर्वक, भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है; वह कभी सर्वथा अहिंसक नहीं हो सकता। वह अपना पतन तो करता ही है, जिन पदार्थों आदिको वह भोगता है, उनका भी नाश करता है।

जो संसारके सीमित पदार्थोंको व्यक्तिगत (अपने) न होनेपर भी व्यक्तिगत मानकर सुखबुद्धिसे भोगता है, वह हिंसा ही करता है। कारण कि समष्टि संसारसे सेवाके लिये मिले हुए पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिमेंसे किसीको भी अपने भोगके लिये व्यक्तिगत मानना हिंसा ही है। यदि मनुष्य समष्टि संसारसे मिली हुई वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिको संसारकी ही मानकर निर्ममतापूर्वक संसारकी सेवामें लगा दे, तो वह हिंसासे बच सकता है और वही अहिंसक हो सकता है।

जो सुख और भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है, उसको देखकर, जिनको वे भोग-पदार्थ नहीं मिलते—ऐसे अभावग्रस्तोंको दुःख-संताप होता है। यह उनकी हिंसा ही

है; क्योंकि भोगी व्यक्तिमें अपना स्वार्थ और सुख-बुद्धि रहती है तथा दूसरोंके दुःखकी लापरवाही रहती है। परन्तु जो संत-महापुरुष केवल दूसरोंका हित करनेके लिये ही जीवन-निर्वाह करते हैं, उनको देखकर किसीको दुःख हो भी जायगा, तो भी उनको हिंसा नहीं लगेगी; क्योंकि वे भोग-बुद्धिसे जीवन-निर्वाह करते ही नहीं—‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बषम्’ (गीता ४।२१)।

केवल परमात्माकी ओर चलनेवालेके द्वारा हिंसा नहीं होती; क्योंकि वह भोग-बुद्धिसे पदार्थ आदिका सेवन नहीं करता। परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक शरीर, मन, वाणीके द्वारा कभी किसीको दुःख नहीं पहुँचाता। यदि उसकी बाह्य क्रियाओंसे किसीको दुःख होता है, तो यह दुःख उसके खुदके स्वभावसे ही होता है। साधककी तो भीतरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख देनेकी भावना नहीं होनी चाहिये। उसका भाव निरन्तर सबका हित करनेका होना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः।’

साधककी साधनामें कोई बाधा डाल दे, तो उसे उसपर क्रोध नहीं आता और न उसके मनमें उसके अहितकी भावना (हिंसा) ही पैदा होती है। हाँ, परमात्माकी ओर चलनेमें बाधा पड़नेसे उसको दुःख हो सकता है, पर वह दुःख भी सांसारिक दुःखकी तरह नहीं होता। साधकको बाधा लगती है, तो वह भगवान्को पुकारता है कि

  • मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम्।।

‘महात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें एक ही बात होती है; परन्तु दुरात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें ही अलग-अलग बातें होती हैं।’

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०१७

'हे नाथ! मेरी कहीं भूल हुई, जिससे बाधा लग रही है।' ऐसा विचार करके उसे रोना आ सकता है; पर बाधा डालनेवालेके प्रति क्रोध, द्वेष नहीं हो सकता। बाधा लगनेपर साधकमें तत्परता और सावधानी आती है। यदि उसमें बाधा डालनेवालेके प्रति द्वेष होता है, तो जितने अंशमें द्वेष-वृत्ति रहती है, उतने अंशमें तत्परताकी कमी है, अपने साधनका आग्रह है।

साधकमें एक तत्परता होती है और एक आग्रह होता है। तत्परता होनेसे साधनमें रुचि रहती है और आग्रह होनेसे साधनमें राग रहता है। रुचि होनेसे अपने साधनमें कहीं-कहीं कमी है, उसका ज्ञान होता है और उसे दूर करनेकी शक्ति आती है तथा उसे दूर करनेकी चेष्टा भी होती है। परन्तु राग होनेसे साधनमें विघ्न डालनेवालेके साथ द्वेष होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो साधनमें हमारी रुचि कम होनेसे ही दूसरा हमारे साधनमें बाधा डालता है। अगर साधनमें हमारी रुचि कम न हो तो दूसरा हमारे साधनमें बाधा नहीं डालेगा, प्रत्युत यह सोचकर उपेक्षा कर देगा कि यह जिद्दी है, मानेगा नहीं; अतः जैसा चाहे, वैसा करने दो।

जैसे पुण्यसे सुगन्ध स्वतः फैलती है, ऐसे ही साधकसे स्वतः पारमार्थिक परमाणु फैलते हैं और वायुमण्डल शुद्ध होता है। इससे उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक प्राणिमात्रका बड़ा भारी उपकार एवं हित होता रहता है। परन्तु जो अपने दुर्गुण-दुराचारोंके द्वारा वायुमण्डलको अशुद्ध करता रहता है, वह प्राणिमात्रकी हिंसा करनेका अपराधी होता है।

'सत्यम्' —अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे जैसा सुना, देखा, पढ़ा, समझा और निश्चय किया है, उससे न अधिक और न कम—वैसा-का-वैसा प्रिय शब्दोंमें कह देना 'सत्य' है। सत्यस्वरूप परमात्माको पाने और जाननेका एकमात्र उद्देश्य हो जानेपर साधकके द्वारा मन, वाणी और क्रियासे असत्य-व्यवहार नहीं हो सकता। उसके द्वारा सत्य-व्यवहार, सबके हितका व्यवहार ही होता है। जो सत्यको जानना चाहता है, वह सत्यके ही सम्मुख रहता है। इसलिये उसके मन-वाणी-शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं, वे सभी उत्साहपूर्वक सत्यकी ओर चलनेके लिये ही होती हैं।

'अक्रोधः' —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह 'क्रोध' है। पर जबतक अन्तःकरणमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी भावना पैदा नहीं होती, तबतक वह 'क्षोध' है, क्रोध नहीं।

परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे साधन करनेवाला मनुष्य अपना अपकार करनेवालेका भी अनिष्ट नहीं करना चाहता। वह इस बातको समझता है कि अनिष्ट करनेवाला व्यक्ति वास्तवमें हमारा अनिष्ट कभी कर ही नहीं सकता। यह जो हमें दुःख देनेके लिये आया है, यह हमने पहले कोई गलती की है, उसीका फल है। अतः यह हमें शुद्ध कर रहा है, निर्मल कर रहा है। जैसे, डॉक्टर किसी रूग्ण अंगको काटता है, तो उसपर रोगी क्रोध नहीं करता, प्रत्युत उसे अच्छा मानता है, ठीक मानता है। उसके रूग्ण अंगको काटना तो उसे ठीक करनेके लिये ही है। ऐसे ही साधकको कोई अहितकी भावनासे किसी तरहसे दुःख देता है, तो उसमें यह भाव पैदा होता है कि वह मेरेको शुद्ध, निर्मल बनानेमें निमित्त बन रहा है; अतः उसपर क्रोध कैसे? वह तो मेरा उपकार कर रहा है और भविष्यके लिये सावधान कर रहा है कि जो गलती पहले की है, आगे वैसी गलती न करें।

जो लोग साधकका हित करनेवाले हैं, उसकी सेवा करनेवाले हैं, वे तो साधकको सुख पहुँचाकर उसके पुण्योंका नाश करते हैं। पर साधकको उनपर (उसके पुण्योंका नाश करनेके कारण) क्रोध नहीं आता। उनपर साधकको यह विचार आता है कि वे जो मेरी सेवा करते हैं, मेरे अनुकूल आचरण करते हैं, यह तो उनकी सज्जनता है, उनका श्रेष्ठ भाव है। परन्तु पुण्योंका नाश तो तब होता है, जब मैं उनकी सेवासे सुख भोगता हूँ। इस प्रकार साधककी दृष्टि सेवा करनेवालोंकी अच्छाई, शुद्ध नीयतपर ही जाती है। अतः साधकको न तो दुःख देनेवालोंपर क्रोध होता है और न सुख देनेवालोंपर।

'त्यागः' —संसारसे विमुख हो जाना ही असली त्याग है। साधकके जीवनमें बाहरका और भीतरका—दोनोंका ही त्याग होना चाहिये। जैसे, बाहरसे पाप, अन्याय, अत्याचार, दुराचार आदिका और बाहरी सुख-आराम आदिका त्याग भी करना चाहिये, और भीतरसे सांसारिक नाशवान् वस्तुओंकी कामनाका त्याग भी करना चाहिये। इसमें भी बाहरके त्यागकी अपेक्षा भीतरकी कामनाका त्याग श्रेष्ठ है। कामनाका सर्वथा त्याग होनेपर तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)।

साधकके लिये उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंकी कामना ही वास्तवमें सबसे ज्यादा बाधक होती है। अतः कामनाका सर्वथा त्याग करना चाहिये। त्याग कब होता है?

१०१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

जब साधकका उद्देश्य एकमात्र परमात्मप्राप्तिका ही हो जाता है, तब उसकी कामनाएँ दूर होती चली जाती हैं। कारण कि सांसारिक भोग और संग्रह साधकका लक्ष्य नहीं होता। अतः वह सांसारिक भोग और संग्रहकी कामनाका त्याग करते हुए अपने साधनमें आगे बढ़ता रहता है।

‘शान्तिः’—अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना ‘शान्ति’ है; क्योंकि संसारके साथ राग-द्वेष करनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति आती है और उनके न होनेसे अन्तःकरण स्वाभाविक ही शान्त, प्रसन्न रहता है।

अनुकूलतासे पुराने पुण्योंका नाश होता है और उसमें अपना स्वभाव सुधरनेकी अपेक्षा बिगड़नेकी सम्भावना अधिक रहती है। परन्तु प्रतिकूलता आनेपर पापोंका नाश होता है और अपने स्वभावमें भी सुधार होता है। इस बातको समझनेपर प्रतिकूलतामें भी स्वतः शान्ति बनी रहती है।

किसी परिस्थिति आदिको लेकर साधकमें कभी राग-द्वेषका भाव हो भी जाता है तो उसके मनमें अशान्ति पैदा हो जाती है और अशान्ति होते ही वह तुरंत सावधान हो जाता है कि राग-द्वेषपूर्वक कर्म करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इस विचारसे फिर शान्ति आ जाती है और समय पाकर स्थिर हो जाती है।

‘अपैशुनम्’—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना पिशुनता है और इसका सर्वथा अभाव ही ‘अपैशुन’ है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधक कभी किसीकी चुगली नहीं करता। ज्यों-ज्यों उसका साधन आगे बढ़ता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों उसकी दोषदृष्टि और द्वेषवृत्ति मिटकर दूसरोंके प्रति उसका स्वतः ही अच्छा भाव होता चला जाता है। उसके मनमें यह विचार भी नहीं आता कि मैं साधन करनेवाला हूँ और ये दूसरे (साधन न करनेवाले) साधारण मनुष्य हैं, प्रत्युत तत्परतासे साधन होनेपर उसे जैसी अपनी स्थिति (जड़तासे सम्बन्ध न होना) दिखायी देती है, वैसी ही दूसरोंकी स्थिति भी दिखायी देती है कि वास्तवमें उनका भी जड़तासे सम्बन्ध नहीं है, केवल सम्बन्ध माना हुआ है। इस तरह जब उसकी दृष्टिमें किसीका भी जड़तासे सम्बन्ध है ही नहीं, तो वह किसीका

दोष किसीके प्रति क्यों प्रकट करेगा?

भक्तिमार्गवाला सर्वत्र अपने प्रभुको देखता है, ज्ञानमार्गवाला केवल अपने स्वरूपको ही देखता है और कर्मयोगमार्गवाला अपने सेव्यको देखता है। इसलिये साधक किसीकी बुराई, निन्दा, चुगली आदि कर ही कैसे सकता है?

‘दया भूतेषु’—दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावनाको ‘दया’ कहते हैं। भगवान्की, संत-महात्माओंकी, साधकोंकी और साधारण मनुष्योंकी दया अलग-अलग होती है—

(१) भगवान्की दया—भगवान्की दया सभीको शुद्ध करनेके लिये होती है। भक्तलोग इस दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना ‘कृपा’ है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना ‘दया’ है।

(२) संत-महात्माओंकी दया—संत-महात्मालोग दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)। पर वास्तवमें उनके भीतर न दूसरोंके दुःखसे दुःख होता है और न अपने दुःखसे ही दुःख होता है। कारण कि तत्त्वमें न सुख है, न दुःख। जैसे समुद्रके ऊपर लहरें उठती दीखती हैं, पर समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं होती, भीतरसे समुद्र शान्त (सम) रहता है, ऐसे ही व्यवहारमें सन्त दुःखी होते हुए दीखते हैं, पर उनके भीतर न सुख है, न दुःख। तात्पर्य है कि वास्तवमें वे दुःखी नहीं होते, प्रत्युत उनके द्वारा दूसरेका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होती है। अपनेपर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर वे उसमें भगवान्की कृपाको देखते हैं, पर दूसरोंपर दुःख आनेपर उन्हें सुखी करनेके लिये वे उनके दुःखको स्वयं अपनेपर ले लेते हैं। जैसे, इन्द्रने क्रोधपूर्वक बिना अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया था, पर जब इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये उनकी हड्डियाँ माँगीं, तब दधीचिने सहर्ष प्राण छोड़कर उन्हें अपनी हड्डियाँ दे दीं। इस प्रकार संत-महापुरुष दूसरेके दुःखको सह नहीं सकते, प्रत्युत उन्हें सुख पहुँचानेके लिये अपनी सुख-सामग्री और प्राणतक दे देते हैं, चाहे दूसरा उनका अहित करनेवाला ही क्यों न हो!* इसलिये संत-

  • कर्णस्वचं शिबिर्यासं जीवं जीमूतवाहनः। ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम्॥

‘कर्णने अपनी त्वचा, शिबिने अपना मांस, दधीचिने अपनी हड्डियाँ और जीमूतवाहने अपना जीवन (शरीर) दे दिया। सच है, महात्माओंके लिये (परहितके लिये) कुछ भी अदेय नहीं है।’

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०१९

महात्माओंकी दया विशेष शुद्ध, निर्मल होती है।

(३) साधकोंकी दया —साधक अपने मनमें दूसरोंका दुःख दूर करनेकी भावना रखता है और उसके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा भी करता है। दूसरोंको दुःखी देखकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है; क्योंकि वह अपनी ही तरह दूसरोंके दुःखको भी समझता है। इसलिये उसका यह भाव रहता है कि सब सुखी कैसे हों? सबका भला कैसे हो? सबका उद्धार कैसे हो? सबका हित कैसे हो? अपनी ओरसे वह ऐसी ही चेष्टा करता है; परन्तु मैं सबका हित करता हूँ, सबके हितकी चेष्टा करता हूँ—इन बातोंको लेकर उसके मनमें अभिमान नहीं होता। कारण कि दूसरोंका दुःख दूर करनेका सहज स्वभाव बन जानेसे उसे अपने इस आचरणमें कोई विशेषता नहीं दीखती। इसलिये उसको अभिमान नहीं होता।

जो प्राणी भगवान्की ओर नहीं चलते, दुर्गुण-दुराचारोंमें रत रहते हैं, दूसरोंका अपराध करते हैं और अपना पतन करते हैं—ऐसे मनुष्योंपर साधकको क्रोध न आकर दया आती है। इसलिये वह हरदम ऐसी चेष्टा करता रहता है कि ये लोग दुर्गुण-दुराचारोंसे ऊपर कैसे उठें? इनका भला कैसे हो? कभी-कभी वह उनके दोषोंको दूर करनेमें अपनेको निर्बल मानकर भगवान्से प्रार्थना करता है कि 'हे नाथ! ये लोग इन दोषोंसे छूट जायँ और आपके भक्त बन जायँ।'

(४) साधारण मनुष्योंकी दया —साधारण मनुष्यकी दयामें थोड़ी मलिनता रहती है। वह किसी जीवके हितकी चेष्टा करता है, तो यह सोचता है कि 'मैं कितना दयालु हूँ। मैंने इस जीवको सुख पहुँचाया, तो मैं कितना अच्छा हूँ। हरेक आदमी मेरे-जैसा दयालु नहीं है, कोई-कोई ही होता है, इत्यादि।' इस प्रकार लोग मुझे अच्छा समझेंगे, मेरा आदर करेंगे आदि बातोंको लेकर, अपनेमें महत्त्वबुद्धि रखकर जो दया की जाती है, उसमें दयाका अंश तो अच्छा है, पर साथमें उपर्युक्त मलिनताएँ रहनेसे उस दयामें अशुद्धि आ जाती है।

इनसे भी साधारण दर्जेके मनुष्य दया तो करते हैं, पर उनकी दया ममतावाले व्यक्तियोंपर ही होती है। जैसे, ये हमारे परिवारके हैं, हमारे मत और सिद्धान्तको माननेवाले हैं, तो उनका दुःख दूर करनेकी इच्छासे उन्हें सुख-आराम

देनेका प्रयत्न करते हैं। यह दया ममता और पक्षपातयुक्त होनेसे अधिक अशुद्ध है।

इनसे भी घटिया दर्जेके वे मनुष्य हैं, जो केवल अपने सुख और स्वार्थकी पूर्तिके लिये ही दूसरोंके प्रति दयाका बर्ताव करते हैं।

'अलोलुप्तवम् '—इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध होनेसे अथवा दूसरोंको भोग भोगते हुए देखनेसे मनका (भोग भोगनेके लिये) ललचा उठनेका नाम 'लोलुप्ता' है और उसके सर्वथा अभावका नाम 'अलोलुप्त' है।

अलोलुप्ताके उपाय —(१) साधकके लिये विशेष सावधानीकी बात है कि वह अपनी इन्द्रियोंसे भोगोंका सम्बन्ध न रखे और मनमें कभी भी ऐसा भाव, ऐसा अभिमान न आने दे कि मेरा इन्द्रियोंपर अधिकार है अर्थात् इन्द्रियाँ मेरे वशमें हैं; अतः मेरा क्या बिगड़ सकता है?

(२) 'मैं हृदयसे परमात्माकी प्राप्ति चाहता हूँ, अगर कभी हृदयमें विषय-लोलुप्ता हो गयी, तो मेरा पतन हो जायगा और मैं परमात्मासे विमुख हो जाऊँगा।'—इस प्रकार साधक खूब सावधान रहे और कहीं अचानक विचलित होनेका अवसर आ जाय, तो 'हे नाथ! बचाओ; हे नाथ! बचाओ' ऐसे सच्चे हृदयसे भगवान्को पुकारे।

(३) स्त्री-पुरुषोंकी तथा जन्तुओंकी कामविषयक चेष्टा न देखे। यदि दीख जाय, तो ऐसा विचार करे कि 'यह तो बिलकुल चौरासी लाख योनियोंका रास्ता है। यह चीज तो मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, राक्षस-असुर, भूत-प्रेत आदि मात्र जीवोंमें भी है। पर मैं तो चौरासी लाख योनियों अर्थात् जन्म-मरणसे ऊँचा उठना चाहता हूँ। मैं जन्म-मरणके मार्गका पथिक नहीं हूँ। मेरेको तो जन्म-मरणादि दुःखोंका अत्यन्त अभाव करके परमात्माकी प्राप्ति करना है।' इस भावको बड़ी सावधानीके साथ जाग्रत् रखे और जहाँतक बने, ऐसी काम-चेष्टा न देखे।

'मार्दवम् '—बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना 'मार्दव' है*।

साधकके हृदयमें सबके प्रति कोमलताका भाव रहता है। उसके प्रति कोई कठोरता एवं अहितका बर्ताव भी करता है, तो भी उसकी कोमलतामें अन्तर नहीं आता। यदि साधक कभी किसी बातको लेकर किसीको कठोर जवाब

  • शरीरकी प्रधानताको लेकर 'आर्जव' और अन्तःकरणकी प्रधानताको लेकर 'मार्दव' कहा जाता है—यही इन दोनोंमें अन्तर है।

१०२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

भी दे दे, तो वह कठोर जवाब भी उसके हितकी दृष्टिसे ही देता है। पर पीछे उसके मनमें यह विचार आता है कि मैंने उसके प्रति कठोरताका व्यवहार क्यों किया ? मैं प्रेमसे या अन्य किसी उपायसे भी समझा सकता था—इस प्रकारके भाव आनेसे कठोरता मिटती रहती है और कोमलता बढ़ती रहती है।

यद्यपि साधकोंके भावोंमें और वाणीमें कोमलता रहती है, तथापि उनकी भिन्न-भिन्न प्रकृति होनेसे सबकी वाणीमें एक समान कोमलता नहीं होती। परन्तु हृदयमें साधकोंका सबके प्रति कोमल भाव रहता है। ऐसे ही कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आदिका साधन करनेवालोंके स्वभावमें विभिन्नता होनेसे उनके बर्ताव सबके प्रति भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः उनके आचरणोंमें एक-जैसी कोमलता नहीं दीखती, पर भीतरमें बड़ी भारी कोमलता रहती है।

‘ह्रीः’—शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम करनेमें जो एक संकोच होता है, उसका नाम ‘ह्रीः’ (लज्जा) है। साधकको साधन-विरुद्ध क्रिया करनेमें लज्जा आती है। वह लज्जा केवल लोगोंके देखनेसे ही नहीं आती, प्रत्युत उसके मनमें अपने-आप ही यह विचार आता है कि ‘राम-राम, मैं ऐसी क्रिया कैसे कर सकता हूँ? क्योंकि मैं तो परमात्माकी तरफ चलनेवाला (साधक) हूँ। लोग भी मुझे परमात्माकी तरफ चलनेवाला समझते हैं।

अतः ऐसी साधन-विरुद्ध क्रियाओंको मैं एकात्ममें अथवा लोगोंके सामने कैसे कर सकता हूँ?’—इस लज्जाके कारण साधक बुरे कर्मोंसे बच जाता है एवं उसके आचरण ठीक होते चले जाते हैं। जब साधक अपनी अहंता बदल देता है कि मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भक्त हूँ, तब उसे अपनी अहंताके विरुद्ध क्रिया करनेमें स्वाभाविक ही लज्जा आती है। इसलिये पारमार्थिक उद्देश्य रखनेवाले प्रत्येक साधकको अपनी अहंता ‘मैं साधक हूँ, मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भगवद्भक्त हूँ’—इस प्रकारसे यथार्थचि बदल लेनी चाहिये, जिससे वह साधन-विरोधी कर्मोंसे बचकर अपने उद्देश्यको जल्दी प्राप्त कर सकता है।

‘अचापलम्’—कोई भी कार्य करनेमें चपलताका अर्थात् उतावलापनका न होना ‘अचापल’ है। चपलता (चंचलता) होनेसे काम जल्दी होता है, ऐसी बात नहीं है। सात्त्विक मनुष्य सब काम धैर्यपूर्वक करता है; अतः उसका काम सुचारुरूपसे और ठीक समयपर हो जाता है। जब कार्य ठीक हो जाता है, तब उसके अन्तःकरणमें हलचल, चिन्ता नहीं होती। चपलता न होनेसे कार्यमें दीर्घसूत्रताका दोष भी नहीं आता, प्रत्युत कार्यमें तत्परता आती है, जिससे सब काम सुचारुरूपसे होते हैं। अपने कर्तव्य-कर्मोंको करनेके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा न होनेसे उसका चित्त विशिप्त और चंचल नहीं होता (गीता—अठारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥

तेजः= तेज (प्रभाव),(और)सम्पदम्= सम्पदाको
क्षमा= क्षमा,नातिमानिता= मानको न चाहना,अभिजातस्य
धृतिः= धैर्य,भारत= हे भरतवंशी अर्जुन !मनुष्यके
शौचम्= शरीरकी शुद्धि,(ये सभी)(लक्षण)
अद्रोहः= वैरभावका न होनादैवीम्= दैवीभवन्ति

व्याख्या—‘तेजः’—महापुरुषोंका संग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सदुगुण-सदाचारोंमें लग जाते हैं। महापुरुषोंकी उस शक्तिको ही यहाँ ‘तेज’ कहा है। ऐसे तो क्रांथी आदमीको देखकर भी लोगोंको उसके स्वभावके विरुद्ध काम करनेमें भय लगता है; परन्तु यह क्रोधरूप दोषका तेज है।

साधकमें दैवी-सम्पत्तिके गुण प्रकट होनेसे उसको देखकर दूसरे लोगोंके भीतर स्वाभाविक ही सौम्यभाव आते हैं अर्थात् उस साधकके सामने दूसरे लोग दुराचार करनेमें लज्जित होते हैं, हिचकते हैं और अनायास ही सद्भावपूर्वक सदाचार करने लग जाते हैं। यही उन दैवी-सम्पत्तिवालोंका तेज (प्रभाव) है।

‘क्षमा’—बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२१

देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराधको सह लेना और उसको माफ कर देना 'क्षमा' है। यह क्षमा मोह-ममता, भय और स्वार्थको लेकर भी की जाती है; जैसे—पुत्रके अपराध कर देनेपर पिता उसे क्षमा कर देता है, तो यह क्षमा मोह-ममताको लेकर होनेसे शुद्ध नहीं है। इसी प्रकार किसी बलवान् एवं क्रूर व्यक्तिके द्वारा हमारा अपराध किये जानेपर हम भयवश उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा भयको लेकर है। हमारी धन-सम्पत्तिकी जाँच-पड़ताल करनेके लिये इन्स्पेक्टर आता है, तो वह हमें धमकाता है, अनुचित भी बोलता है और उसका ठहरना हमें बुरा भी लगता है तो भी स्वार्थ-हानिके भयसे हम उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा स्वार्थको लेकर है। पर ऐसी क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो वही है, जिसमें 'हमारा अनिष्ट करनेवालेको यहाँ और परलोकमें भी किसी प्रकारका दण्ड न मिले'—ऐसा भाव रहता है।

क्षमा माँगना भी दो रीतिसे होता है—

(१) हमने किसीका अपकार किया, तो उसका दण्ड हमें न मिले—इस भयसे भी क्षमा माँगी जाती है; परन्तु इस क्षमामें स्वार्थका भाव रहनेसे यह ऊँचे दर्जेंकी क्षमा नहीं है।

(२) हमसे किसीका अपराध हुआ, तो अब यहाँसे आगे उग्रभ्रर ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा—इस भावसे जो क्षमा माँगी जाती है, वह अपने सुधारको दृष्टिको लेकर होती है और ऐसी क्षमा माँगनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है।

मनुष्य क्षमाको अपनेमें लाना चाहे तो कौन-सा उपाय करे? यदि मनुष्य अपने लिये किसीसे किसी प्रकारके सुखकी आशा न रखे और अपना अपकार करनेवालेका बुरा न चाहे, तो उसमें क्षमाभाव प्रकट हो जाता है।

'धृति:—'किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका

नाम 'धृति' (धैर्य) है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैत्तिरीयश्लोक)।

वृत्तियाँ सात्त्विक होती हैं तो धैर्य ठीक रहता है और वृत्तियाँ राजसी-तामसी होती हैं तो धैर्य वैसा नहीं रहता। जैसे बद्दीनारायणके रास्तेपर चलनेवालेके लिये कभी गरमी, चढ़ाई आदि प्रतिकूलताएँ आती हैं और कभी ठण्डक, उतराई आदि अनुकूलताएँ आती हैं, पर चलनेवालेको उन प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओंको देखकर ठहरना नहीं है, प्रत्युत 'हमें तो बद्दीनारायण पहुँचना है'—इस उद्देश्यसे धैर्य और तत्परतापूर्वक चलते रहना है। ऐसे ही साधकको अच्छी-मन्दी वृत्तियाँ और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंकी ओर देखना ही नहीं चाहिये। इनमें उसे धीरज धारण करना चाहिये; क्योंकि जो अपना उद्देश्य सिद्ध करना चाहता है, वह मार्गमें आनेवाले सुख और दुःखको नहीं देखता—

मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥

(भर्तृहरिनीतिशतक)

'शौचम्'—बाह्यशुद्धि एवं अन्तःशुद्धिका नाम 'शौच' है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखनेवाला साधक बाह्यशुद्धिका भी खयाल रखता है; क्योंकि बाह्यशुद्धि रखनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि स्वतः होती है और अन्तःकरण शुद्ध होनेपर बाह्य-अशुद्धि उसको सुहाती नहीं। इस विषयपर पतंजलि महाराजने कहा है—

शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।

(योगदर्शन २।४०)

'शौचसे साधककी अपने शरीरमें घृणा अर्थात् अपवित्र-बुद्धि और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा होती है।'

तात्पर्य यह है कि अपने शरीरको शुद्ध रखनेसे शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होता है। शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होनेसे 'सम्पूर्ण शरीर इसी तरहके हैं'—इसका बोध होता है। इस बोधसे दूसरे शरीरोंके प्रति जो आकर्षण होता है, उसका अभाव हो जाता है अर्थात् दूसरे शरीरोंसे सुख

१-क्षमा और अक्रोधमें क्या अन्तर है? क्षमामें जिसने अपराध किया है, उसपर विशेषतासे यह दृष्टि रहती है कि उसको कभी किसी प्रकारका दण्ड न हो और अक्रोधमें अपनी तरफ दृष्टि रहती है कि हमारेमें क्रोध न हो, जलन न हो, किसी प्रकारकी हलचल न हो। यद्यपि क्षमाके अन्तर्गत अक्रोध भी आ जाता है, तथापि क्षमाशील कह देनेपर उसके लिये क्रोधरहित कहनेकी आवश्यकता नहीं है, जब कि क्रोधरहित कहनेपर यह क्षमाशील है, ऐसा कहनेकी आवश्यकता रह जाती है। अतः ये दोनों गुण (क्षमा और अक्रोध) भिन्न-भिन्न हैं।

२-यहाँ 'शौचम्' पदसे बाह्यशुद्धि ही लेनी चाहिये; क्योंकि अन्तःशुद्धि 'सत्त्वसंशुद्धिः' पदसे इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आ चुकी है।

१०२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

लेनेकी इच्छा मिट जाती है।

बाह्यशुद्धि चार प्रकारसे होती है—(१) शारीरिक, (२) वाचिक, (३) कौटुम्बिक और (४) आर्थिक।

(१) शारीरिक शुद्धि —प्रमाद, आलस्य, आरामतलबी, स्वाद-शौकीनी आदिसे शरीर अशुद्ध हो जाता है और इनके विपरीत कार्य-तत्परता, पुरुषार्थ, उद्योग, सादगी आदि रखते हुए आवश्यक कार्य करनेपर शरीर शुद्ध हो जाता है। ऐसे ही जल, मृत्तिका आदिसे भी शारीरिक शुद्धि होती है।

(२) वाचिक शुद्धि —झूठ बोलने, कड़ुआ बोलने, वृथा बकवाद करने, निन्दा करने, चुगली करने आदिसे वाणी अशुद्ध हो जाती है। इन दोषोंसे रहित होकर सत्य, प्रिय एवं हितकारक आवश्यक वचन बोलना (जिससे दूसरोंकी पारमार्थिक उन्नति होती हो और देश, ग्राम, मोहल्ले, परिवार, कुटुम्ब आदिका हित होता हो) और अनावश्यक बात न करना—यह वाणीकी शुद्धि है।

(३) कौटुम्बिक शुद्धि —अपने बाल-बच्चोंको अच्छी शिक्षा देना; जिससे उनका हित हो, वही आचरण करना; कुटुम्बियोंका हमपर जो न्याययुक्त अधिकार है, उसको अपनी शक्तिके अनुसार पूरा करना; कुटुम्बियोंमें किसीका पक्षपात न करके सबका समानरूपसे हित करना—यह कौटुम्बिक शुद्धि है।

(४) आर्थिक शुद्धि —न्याययुक्त, सत्यतापूर्वक, दूसरोंके हितका बर्ताव करते हुए जिस धनका उपार्जन किया गया है, उसको यथाशक्ति, अरक्षित, अभावग्रस्त, दरिद्री, रोगी, अकालपीडित, भूखे आदि आवश्यकतावालोंको देनेसे एवं गौ, स्त्री, ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगानेसे द्रव्यकी शुद्धि होती है।

त्यागी-वैरागी-तपस्वी सन्त-महापुरुषोंकी सेवामें लगानेसे एवं सदृग्रन्थोंको सरल भाषामें छपवाकर कम मूल्यमें देनेसे तथा उनका लोगोंमें प्रचार करनेसे धनकी महान् शुद्धि हो जाती है।

परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर अपनी (स्वयंकी) शुद्धि हो जाती है। स्वयंकी शुद्धि होनेपर शरीर, वाणी, कुटुम्ब, धन आदि सभी शुद्ध एवं पवित्र होने लगते हैं। शरीर आदिके शुद्ध हो जानेसे वहाँका स्थान, वायुमण्डल आदि भी शुद्ध हो जाते हैं। बाह्यशुद्धि और पवित्रताका खयाल रखनेसे शरीरकी वास्तविकता अनुभवमें आ जाती

है, जिससे शरीरसे अहंता-ममता छोड़नेमें सहायता मिलती है। इस प्रकार यह साधन भी परमात्मप्राप्तिमें निमित्त बनता है।

‘अद्वोहः’ —‘बिना कारण अनिष्ट करनेवालेके प्रति भी अन्तःकरणमें बदला लेनेकी भावनाका न होना ‘अद्वोहः’ है। साधारण व्यक्तिका कोई अनिष्ट करता है, तो उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति द्वेषकी एक गॉठ बँध जाती है कि मौका पड़नेपर मैं इसका बदला ले ही लूँगा; किन्तु जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, उस साधकका कोई कितना ही अनिष्ट क्यों न करे, उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति बदला लेनेकी भावना ही पैदा नहीं होती। कारण कि कर्म-योगका साधक सबके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करता है, ज्ञानयोगका साधक सबको अपना स्वरूप समझता है और भक्तियोगका साधक सबमें अपने इष्ट भगवान्को समझता है। अतः वह किसीके प्रति कैसे द्वोह कर सकता है।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥

(मानस ७। ११२ ख)

‘नातिमानिता’ —एक ‘मानिता’ होती है और एक ‘अतिमानिता’ होती है। सामान्य व्यक्तियोंसे मान चाहना ‘मानिता’ है और जिनसे हमने शिक्षा प्राप्त की, जिनका आदर्श ग्रहण किया और ग्रहण करना चाहते हैं, उनसे भी अपना मान, आदर-सत्कार चाहना ‘अतिमानिता’ है। इन मानिता और अतिमानिताका न होना ‘नातिमानिता’ है—स्थूल दृष्टिसे ‘मानिता’ के दो भेद होते हैं—

(१) सांसारिक मानिता —धन, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, अधिकार, पद, वर्ण, आश्रम आदिको लेकर दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें एक श्रेष्ठताका भाव होता है कि ‘मैं साधारण मनुष्योंकी तरह थोड़े ही हूँ, मेरा कितने लोग आदर-सत्कार करते हैं! वे आदर करते हैं तो यह ठीक ही है; क्योंकि मैं आदर पानेयोग्य ही हूँ’—इस प्रकार अपने प्रति जो मान्यता होती है, वह सांसारिक मानिता कहलाती है।

(२) पारमार्थिक मानिता —प्रारम्भिक साधनकालमें जब अपनेमें कुछ दैवी-सम्पत्ति प्रकट होने लगती है, तब साधकको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता दीखती है। साथ ही दूसरे लोग भी उसे परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक मानकर उसका विशेष आदर करते हैं और साथ-ही-साथ ‘ये साधन करनेवाले हैं, अच्छे सज्जन

  • क्रोध और द्वोह—दोनोंमें अन्तर है। अपना अनिष्ट करनेवालेके प्रति तत्काल जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है; और क्रोधका जो भीतरी भाव बैठता है अर्थात् मौका मिलनेपर उसका अनिष्ट करनेकी जो वैरभावना बैठती है, उसका नाम ‘द्वोह’ है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२३

हैँ’—ऐसी प्रशंसा भी करते हैं। इससे साधकको अपने विशेषता मालूम देती है, पर वास्तवमें यह विशेषता अपने साधनमें कमी होनेके कारण ही दीखती है। यह विशेषता दीखना पारमार्थिक मानिता है।

जबतक अपनेमें व्यक्तित्व (एकदेशीयता, परिछिन्नता) रहता है, तभीतक अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दिखायी दिया करती है। परन्तु ज्यों-ज्यों व्यक्तित्व मिटता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों साधकका दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषताका भाव मिटता चला जाता है। अन्तमें इन सभी मानिताओंका अभाव होकर साधकमें दैवी-सम्पत्तिका गुण ‘नातिमानिता’ प्रकट हो जाती है।

दैवी-सम्पत्तिके जितने सदगुण-सदाचार हैं, उनको पूर्णतया जाग्रत् करनेका उद्देश्य तो साधकका होना ही चाहिये। हाँ, प्रकृति-(स्वभाव-) की भिन्नतासे किसीमें किसी गुणकी कमी, तो किसीमें किसी गुणकी कमी रह सकती है। परन्तु वह कमी साधकके मनमें खटकती रहती है और वह प्रभुका आश्रय लेकर अपने साधनको तत्परतासे करते रहता है; अतः भगवत्कृपासे वह कमी मिटती जाती है। कमी ज्यों-ज्यों मिटती जाती है, त्यों-त्यों उत्साह और उस कमीके उत्तरोत्तर मिटनेकी सम्भावना भी बढ़ती जाती है। इससे दुर्गुण-दुराचार सर्वथा नष्ट होकर सदगुण-सदाचार अर्थात् दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है।

‘भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत’—भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये सभी दैवी-सम्पत्तिका प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं।

परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर ये दैवी-सम्पत्तिके लक्षण साधकमें स्वाभाविक ही आने लगते हैं। कुछ लक्षण पूर्वजन्मोंके संस्कारोंसे भी जाग्रत् होते हैं। परन्तु साधक इन गुणोंको अपने नहीं मानता और न उनको अपने पुरुषार्थसे उपाजित ही मानता है, प्रत्युत गुणोंके आनेमें वह भगवान्की ही कृपा मानता है। कभी खयाल करनेपर साधकके मनमें ऐसा विचार होता है कि मेरेमें पहले तो ऐसी वृत्तियाँ नहीं थीं, ऐसे सदगुण नहीं थे, फिर ये कहाँसे आ गये? तो ये सब भगवान्की कृपासे ही आये हैं—ऐसा अनुभव होनेसे उस साधकको दैवी-सम्पत्तिका अभिमान नहीं आता।

साधकको दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपने नहीं मानना

चाहिये; क्योंकि यह देव—परमात्माकी सम्पत्ति है, व्यक्तिगत (अपनी) किसीकी नहीं है। यदि व्यक्तिगत होती, तो यह अपनेमें ही रहती, किसी अन्य व्यक्तिकी नहीं रहती। इसको व्यक्तिगत माननेसे ही अभिमान आता है। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मुख्य लक्षण है। अभिमानकी छायामें ही आसुरी-सम्पत्तिके सभी अवगुण रहते हैं। यदि दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति (अभिमान) पैदा हो जाय, तो फिर आसुरी-सम्पत्ति कभी मिटेगी ही नहीं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति कभी पैदा नहीं होती, प्रत्युत दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके साथ-साथ आसुरी-सम्पत्तिके जो अवगुण रहते हैं, उनसे ही गुणोंका अभिमान पैदा होता है अर्थात् साधनके साथ कुछ-कुछ असामर्थ्य रहनेसे ही अभिमान आदि दोष पैदा होते हैं। जैसे, किसीको सत्य बोलनेका अभिमान होता है, तो उसके मूलमें वह सत्यके साथ-साथ असत्य भी बोलता है, जिसके कारण सत्यका अभिमान आता है। तात्पर्य यह है कि दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपना माननेसे एवं गुणोंके साथ अवगुण रहनेसे ही अभिमान आता है। सर्वथा गुण आनेपर गुणोंका अभिमान हो ही नहीं सकता।

यहाँ दैवी-सम्पत्ति कहनेका तात्पर्य है कि यह भगवान्की सम्पत्ति है। अतः भगवान्का सम्बन्ध होनेसे, उनका आश्रय लेनेसे शरणागत भक्तमें यह स्वाभाविक ही आती है। जैसे शबरीके प्रसंगमें रामजीने कहा है— नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

..... नव महुँ एकउ जिन्हें के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ सोइ अतिसय प्रिय भाभिनि मोरै। सकल प्रकार भगति दूढ़ तोरै॥

(मानस ३। ३५-३६)

मनुष्य-देवता, भूत-पिशाच, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबमें अपनी-अपनी योनिके अनुसार मिले हुए शरीरोंके रूण एवं जीर्ण हो जानेपर भी ‘मैं जीता रहूँ, मेरे प्राण बने रहें’—यह इच्छा बनी रहती है*। इस इच्छाका होना ही आसुरी-सम्पत्ति है।

त्यागी-वैरागी साधकमें भी प्राणोंके बने रहनेकी इच्छा रहती है; परन्तु उसमें प्राणपोषण-बुद्धि, इन्द्रिय-लोलुपता नहीं रहती; क्योंकि उसका उद्देश्य परमात्मा होता है, न कि शरीर और संसार।

  • यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् जीविताशा बलीयसी ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।१४।५३)

१०२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

जब साधक भक्तका भगवान्में प्रेम हो जाता है, तब उसको भगवान् प्राणोंसे भी प्यारे लगते हैं। प्राणोंका मोह न रहनेसे उसके प्राणोंका आधार केवल भगवान् हो जाते हैं। इसलिये वह भगवान्को 'प्राणनाथ! प्राणेश्वर! प्राणप्रिय!' आदि सम्बोधनोंसे पुकारता है। भगवान्का वियोग न सहनेसे उसके प्राण भी छूट सकते हैं। कारण कि मनुष्य जिस वस्तुको प्राणोंसे भी बढ़कर मान लेता है, उसके लिये यदि प्राणोंका त्याग करना पड़े तो वह सहर्ष प्राणोंका त्याग कर देता है; जैसे—पतिव्रता स्त्री पतिको प्राणोंसे भी बढ़कर (प्राणनाथ) मानती है, तो उसका प्राण, शरीर,

वस्तु, व्यक्ति आदिमें मोह नहीं रहता। इसीलिये पतिके मरनेपर वह उसके वियोगमें प्रसन्नतापूर्वक सती हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि जब केवल भगवान्में अनन्य प्रेम हो जाता है, तो फिर प्राणोंका मोह नहीं रहता। प्राणोंका मोह न रहनेसे आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है और दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है। इसी बातका संकेत गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने इस प्रकार किया है—

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

(मानस ७। ४१। ३)

सम्बन्ध—अबतक एक परमात्माका ही उद्देश्य रखनेवालोंकी दैवी-सम्पत्ति बतायी; परन्तु सांसारिक भोग भोगना और संग्रह करना ही जिनका उद्देश्य है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंकी कौन-सी सम्पत्ति होती है—इसे अब आगेके श्लोकमें बताते हैं।

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!क्रोधः= क्रोध करनाएव= भी—(ये सभी)
दम्भः= दम्भ करना,= तथाआसुरीम्= आसुरी
दर्पः= घमण्ड करनापारुष्यम्= कठोरता रखनासम्पदम्= सम्पदाको
= और= औरअभिजातस्य= प्राप्त हुए मनुष्यके
अभिमानः= अभिमान करना,अज्ञानम्= अविवेकका होना(लक्षण) हैं।

व्याख्या—'दम्भः'—मान, बड़ाई, पूजा, ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये, अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम 'दम्भ' है। यह दम्भ दो प्रकारसे होता है—

(१) सद्गुण-सदाचारोंको लेकर—अपनेको धर्मात्मा, साधक, विद्वान्, गुणवान् आदि प्रकट करना अर्थात् अपनेमें वैसा आचरण न होनेपर भी अपनेमें श्रेष्ठ गुणोंको लेकर वैसा आचरण दिखाना, थोड़ा होनेपर भी ज्यादा दिखाना, भोगी होनेपर भी अपनेको योगी दिखाना आदि दिखावटी भावों और क्रियाओंका होना—यह सद्गुण-सदाचारोंको लेकर 'दम्भ' है।

(२) दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर—जिसका आचरण, खान-पान स्वाभाविक अशुद्ध नहीं है, ऐसा व्यक्ति भी जिनके आचरण, खान-पान अशुद्ध हैं—ऐसे दुर्गुण-दुराचारी लोगोंमें जाकर उनको राजी करके अपनी इज्जत जमानेके लिये, मान-आदर आदि प्राप्त करनेके लिये, अपने मनमें बुरा लगनेपर भी वैसा आचरण, खान-पान

कर बैठता है—यह दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर 'दम्भ' है। तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य प्राण, शरीर, धन, सम्पत्ति, आदर, महिमा आदिको प्रधानता देने लगता है, तब उसमें दम्भ आ जाता है।

'दर्पः'—घमण्डका नाम 'दर्प' है। धन-वैभव, जमीन-जायदाद, मकान-परिवार आदि ममतावाली चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़प्पनका अनुभव होता है, वह 'दर्प' है। जैसे—मेरे पास इतना धन है; मेरा इतना बड़ा परिवार है; मेरा इतना राज्य है; मेरे पास इतनी जमीन-जायदाद है; मेरे पीछे इतने आदमी हैं; मेरी आवाजके पीछे इतने आदमी बोलते हैं; मेरे पक्षमें बहुत आदमी हैं; धन-सम्पत्ति-वैभवमें मेरी बराबरी कौन कर सकता है? मेरे पास ऐसे-ऐसे पद हैं, अधिकार हैं; संसारमें मेरा कितना यश, प्रतिष्ठा हो रही है! मेरे बहुत अनुयायी हैं; मेरा सम्प्रदाय कितना ऊँचा है! मेरे गुरुजी कितने प्रभावशाली हैं! आदि-आदि।

'अभिमानः'—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर अपनेमें जो

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२५

बड़पनका अनुभव होता है, उसका नाम 'अभिमान' है। जैसे—मैं जाति-पाँतमें कुलीन हूँ; मैं वर्ण-आश्रममें ऊँचा हूँ; हमारी जातिमें हमारी प्रधानता है; गाँवभरमें हमारी बात चलती है अर्थात् हम जो कह दूँगे, उसको सभी मानेंगे; हम जिसको सहरा देंगे, उस आदमीसे विरुद्ध चलनेमें सभी लोग भयभीत होंगे और हम जिसके विरोधी होंगे, उसका साथ देनेमें भी सभी लोग भयभीत होंगे; राजदरबारमें भी हमारा आदर है, इसलिये हम जो कह दूँगे, उसे कोई टालेगा नहीं; हम न्याय-अन्याय जो कुछ भी करेंगे, उसको कोई टाल नहीं सकता, उसका कोई विरोध नहीं कर सकता; मैं बड़ा विद्वान् हूँ, मैं अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंको जानता हूँ, इसलिये सारे संसारको उथल-पुथल कर सकता हूँ, आदि-आदि।

‘क्रोधः’ —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है।

मनुष्यके स्वभावके विपरीत कोई काम करता है तो उसका अनिष्ट करनेके लिये अन्तःकरणमें उत्तेजना होकर जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह क्रोध है। क्रोध और शोभमें अन्तर है। बच्चा उद्दण्डता करता है, कहना नहीं मानता, तो माता-पिता उत्तेजनामें आकर उसको ताड़ना करते हैं—यह उनका ‘शोभ’ (हृदयकी हलचल) है, क्रोध नहीं। कारण कि उनमें बच्चेका अनिष्ट करनेकी भावना होती ही नहीं, प्रत्युत बच्चेके हितकी भावना होती है। परंतु यदि उत्तेजनामें आकर दूसरेका अनिष्ट, अहित करके उसे दुःख देनेमें सुखका अनुभव होता है, तो यह ‘क्रोध’ है। आसुरी प्रकृतिवालोंमें यही क्रोध होता है।

क्रोधके वशीभूत होकर मनुष्य न करनेयोग्य काम भी कर बैठता है, जिसके फलस्वरूप स्वयं उसको पश्चाताप करना पड़ता है। क्रोधी व्यक्ति उत्तेजनामें आकर दूसरोंका अपकार तो करता है, पर क्रोधसे स्वयं उसका अपकार कम नहीं होता; क्योंकि अपना अनिष्ट किये बिना क्रोधी व्यक्ति दूसरेका अनिष्ट कर ही नहीं सकता। इसमें भी एक मर्मकी

बात है कि क्रोधी व्यक्ति जिसका अनिष्ट करता है, उसका किन्हीं दुष्कर्मोंका जो फल भोगरूपसे आनेवाला है, वही होता है अर्थात् उसका कोई नया अनिष्ट नहीं हो सकता; परंतु क्रोधी व्यक्तिका दूसरेका अनिष्ट करनेकी भावनासे और अनिष्ट करनेसे नया पाप-संग्रह हो जायगा तथा उसका स्वभाव भी बिगड़ जायगा। यह स्वभाव उसे नरकोंमें ले जानेका हेतु बन जायगा और वह जिस योनिमें जायगा, वही उसे दुःख देगा।

क्रोध स्वयंको ही जलाता है। क्रोधी व्यक्तिकी संसारमें अच्छी ख्याति नहीं होती, प्रत्युत निन्दा ही होती है। खास अपने घरके आदमी भी क्रोधसे डरते हैं। इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्रोधको नरकोंका दरवाजा बताया है। जब मनुष्यके स्वार्थ और अभिमानमें बाधा पड़ती है, तब क्रोध पैदा होता है। फिर क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिविश्रम, स्मृतिविश्रमसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे मनुष्यका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।

‘पारुष्यम्’ —कठोरताका नाम ‘पारुष्य’ है। यह कई प्रकारका होता है; जैसे—शरीरसे अकड़कर चलना, टेढ़े चलना—यह शारीरिक पारुष्य है। नेत्रोंसे टेढ़ा-टेढ़ा देखना—यह नेत्रोंका पारुष्य है। वाणीसे कठोर बोलना, जिससे दूसरे भयभीत हो जायें—यह वाणीका पारुष्य है। दूसरोंपर आफत, संकट, दुःख आनेपर भी उनकी सहायता न करके राजी होना आदि जो कठोर भाव होते हैं, यह हृदयका पारुष्य है।

जो शरीर और प्राणोंके साथ एक हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंको यदि दूसरोंकी क्रिया, वाणी बुरी लगती है, तो उसके बदलेमें वे उनको कठोर वचन सुनाते हैं, दुःख देते हैं और स्वयं राजी होकर कहते हैं कि ‘आपने देखा कि नहीं? मैंने उसके साथ ऐसा कड़ा व्यवहार किया कि उसके दाँत खुट्टे कर दिये! अब वह मेरे साथ बोल सकता है क्या?’ यह सब व्यवहारका पारुष्य है।

स्वार्थबुद्धिकी अधिकता रहनेके कारण मनुष्य अपना

१-जहाँ अभिमान और दर्प—दोनोंमेंसे कोई एक आता है, वहाँ अभिमानके ही अन्तर्गत दर्प और दर्पके ही अन्तर्गत अभिमान आ जाता है। परन्तु जहाँ ये दोनों एक साथ स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ दोनोंमें थोड़ा अन्तर हो जाता है। ‘ममता’ की चीजोंको लेकर ‘दर्प’ और ‘अहंता’ की चीजोंको लेकर ‘अभिमान’ कहा जाता है अर्थात् बाहरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘दर्प’ है और विद्या, बुद्धि आदि भीतरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘अभिमान’ है।

२-क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां देहस्थितो देहविनाशनाय। यथास्थितः काष्ठगोते हि वहिनः स एव वहिन्दर्हते शरीरम्॥ ‘क्रोध ही मनुष्यका प्रथम शत्रु है, जो देहमें स्थित होकर देहका ही विनाश करता है। जैसे लकड़ीमें स्थित अग्नि लकड़ीको ही जलाती है, ऐसे ही देहमें स्थित क्रोधरूपी अग्नि देहको ही जलाती है।’

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

मतलब सिद्ध करनेके लिये, अपनी क्रियाओंसे दूसरोंको कष्ट होगा, उनपर कोई आफत आयेगी—इन बातोंपर विचार ही नहीं कर सकता। हृदयमें कठोर भाव होनेसे वह केवल अपना मतलब देखता है और उसके मन, वाणी, शरीर, बर्ताव आदि सब जगह कठोरता रहती है। स्वार्थभावकी बहुत ज्यादा वृत्ति बढ़ती है, तो वह हिंसा आदि भी कर बैठता है, जिससे उसके स्वभावमें स्वाभाविक ही क्रूरता आ जाती है। क्रूरता आनेपर हृदयमें सौम्यता बिलकुल नहीं रहती। सौम्यता न रहनेसे उसके बर्तावमें, लेन-देनमें स्वाभाविक ही कठोरता रहती है। इसलिये वह केवल दूसरोंसे रुपये ऐंठने, दूसरोंको दुःख देने आदिमें लगा रहता है। इनके परिणाममें मुझे सुख होगा या दुःख—इसका वह विचार ही नहीं कर सकता।

‘अज्ञानम्’ —यहाँ ‘अज्ञान’ नाम अविवेकका है। अविवेकी पुरुषोंको सत्-असत्, सार-असार, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका बोध नहीं होता। कारण कि उनकी दृष्टि नाशवान् पदार्थोंके भोग और संग्रहपर ही लगी रहती है। इसलिये (परिणामपर दृष्टि न रहनेसे) वे यह सोच ही नहीं सकते कि ये नाशवान् पदार्थ कबतक हमारे साथ रहेंगे और हम कबतक इनके साथ रहेंगे। पशुओंकी तरह केवल प्राणपोषणमें ही लगे रहनेके कारण वे क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है—इन बातोंको नहीं जान सकते और न जानना ही चाहते हैं।

वे तात्कालिक संयोगजन्य सुखको ही सुख मानते हैं और शरीर तथा इन्द्रियोंके प्रतिकूल संयोगको ही दुःख मानते हैं। इसलिये वे उद्योग तो सुखके लिये ही करते हैं, पर परिणाममें उनको पहलेसे भी अधिक दुःख मिलता है। फिर भी उनको चेत नहीं होता कि इसका हमारे लिये नतीजा क्या होगा? वे तो मान-बड़ाई, सुख-आराम, धन-सम्पत्ति आदिके प्रलोभनमें आकर न करनेलायक काम भी करने लग जाते हैं, जिनका नतीजा उनके लिये तथा दुनियाके लिये भी बड़ा अहितकारक होता है।

१-कर्मणिारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च। पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३।१८) राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंसे बँधे हुए पुरुष तो सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये कर्म करते रहते हैं। परन्तु जो पुरुष मायासे तरना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उसके कर्मोंका फल किस प्रकार उलटा होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख दूर होनेके बदले उनका दुःख बढ़ता जाता है!

२-यहाँ ‘आसुरी’ शब्दमें देवताओंका विरोधवाचक ‘नञ्’ समास नहीं है, प्रत्युत ‘असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुरः’ के अनुसार जो मनुष्य केवल इन्द्रियों और प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे हुए हैं अर्थात् जो केवल संयोगजन्य सुखमें ही आसक्त हैं, उन मनुष्योंका वाचक यहाँ ‘असुर’ शब्द है। तात्पर्य यह है कि जिनका उद्देश्य परमात्माको प्राप्त करना नहीं है और जो शरीर धारण करके केवल भोग भोगना चाहते हैं, वे असुर हैं। उन असुरोंकी सम्पत्तिका नाम ‘आसुरी-सम्पत्ति’ है।

‘अभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्’ —हे पार्थ! ये सब आसुरी सम्पत्ति’ को प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। मरणधर्मा शरीरके साथ एकता मानकर ‘मैं कभी मरूँ नहीं; सदा जीता रहूँ और सुख भोगता रहूँ’—ऐसी इच्छावाले मनुष्यके अन्तःकरणमें ये लक्षण होते हैं।

अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कोई भी साधारण प्राणी प्रकृतिके गुणोंके सम्बन्धसे सर्वथा रहित नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध लेकर ही पैदा होता है। प्रकृतिके साथ सम्बन्धका तात्पर्य है—प्रकृतिके कार्य शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध (तादात्म्य) और पदार्थोंमें ममता, आसक्ति तथा कामनाका होना। शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध ही आसुरी-सम्पत्तिका मूलभूत लक्षण है। जिसका प्रकृतिके साथ मुख्यतासे सम्बन्ध है, उसीके लिये यहाँ कहा गया है कि वह आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त हुआ है।

प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जीवका अपना माना हुआ है। अतः वह जब चाहे इस सम्बन्धका त्याग कर सकता है। कारण कि जीव (आत्मा) चेतन तथा निर्विकार है और प्रकृति जड़ तथा प्रतिक्षण परिवर्तनशील है, इसलिये चेतनका जड़से सम्बन्ध वास्तवमें है नहीं, केवल मान रखा है। इस सम्बन्धको छोड़ते ही आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है। इस प्रकार मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्तिको मिटानेकी पूरी योग्यता है। तात्पर्य है कि आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त होते हुए भी वह प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके आसुरी-सम्पत्तिको मिटा सकता है।

प्राणोंमें मनुष्यका ज्यों-ज्यों मोह होता जाता है, त्यों-ही-त्यों आसुरी-सम्पत्ति अधिक बढ़ती जाती है। आसुरी-सम्पत्तिके अत्यधिक बढ़नेपर मनुष्य अपने प्राणोंको रखनेके लिये और सुख भोगनेके लिये दूसरोंका नुकसान भी कर देता है। इतना ही नहीं, दूसरोंकी हत्या कर देनेमें भी वह नहीं हिचकता।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२७

मनुष्य जब अस्थायीको स्थायी मान लेता है, तब आसुरी-सम्पत्तिके दुर्गुण-दुराचारोंके समूह-के-समूह उसमें आ जाते हैं। तात्पर्य है कि असत्का संग होनेसे असत्

आचरण, असत् भाव और दुर्गुण बिना बुलाये तथा बिना उद्योग किये अपने-आप आते हैं, जो मनुष्यको परमात्मासे विमुख करके अधोगतिमें ले जानेवाले हैं।

सम्बन्ध—अब भगवान् दैवी और आसुरी—दोनों प्रकारकी सम्पत्तियोंका फल बताते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायसुरी मता।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥

दैवी= दैवीनिबन्धाय= बन्धनके लियेअभिजातः= प्राप्त हुए
सम्पत्= सम्पत्तिमता= मानी गयी है।असि= हो,
विमोक्षाय= मुक्तिके लियेपाण्डव= हे पाण्डव!(इसलिये तुम)
(और)(तुम)मा, शुचः= शोक
आसुरी= आसुरीदैवीम्= दैवी(चिन्ता)
सम्पत्तिसम्पदम्= सम्पत्तिकोमत करो।

व्याख्या—‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’—मेरेको भगवान्की तरफ ही चलना है—यह भाव साधकमें जितना स्पष्टरूपसे आ जाता है, उतना ही वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है। भगवान्के सम्मुख होनेसे उसमें संसारसे विमुखता आ जाती है। संसारसे विमुखता आ जानेसे आसुरी-सम्पत्तिके जितने दुर्गुण-दुराचार हैं, वे कम होने लगते हैं और दैवी-सम्पत्तिके जितने सदुगुण-सदाचार हैं, वे प्रकट होने लगते हैं। इससे साधककी भगवान्में और भगवान्के नाम, रूप, लीला, गुण, चरित्र आदिमें रुचि हो जाती है।

इसमें विशेषतासे ध्यान देनेकी बात है कि साधकका उद्देश्य जितना दृढ़ होगा, उतना ही उसका परमात्माके साथ जो अनादिकालका सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा और संसारके साथ जो माना हुआ सम्बन्ध है, वह मिट जायगा। मिट क्या जायगा, वह तो प्रतिक्षण मिट ही रहा है! वास्तवमें प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है नहीं। केवल इस जीवने सम्बन्ध मान लिया है। इस माने हुए सम्बन्धकी सद्भावनापर अर्थात् ‘शरीर ही मैं हूँ और शरीर ही मेरा है’—इस सद्भावनापर ही संसार टिका हुआ है। इस सद्भावनाके मिटते ही संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जायगा और दैवी-सम्पत्तिके सम्पूर्ण गुण प्रकट हो जायेंगे, जो कि मुक्तिके हेतु हैं। दैवी-सम्पत्ति केवल अपने लिये ही नहीं है, प्रत्युत मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये है। जैसे गृहस्थमें छोटे,

बड़े, बूढ़े आदि अनेक सदस्य होते हैं, पर सबका पालन-पोषण करनेके लिये गृहस्वामी (घरका मुखिया) स्वयं उद्योग करता है, ऐसे ही संसारमात्रका उद्धार करनेके लिये भगवान्ने मनुष्यको बनाया है। वह मनुष्य और तो क्या, भगवान्की दी हुई विलक्षण शक्तिके द्वारा भगवान्के सम्मुख होकर, भगवान्की सेवा करके उन्हें भी अपने वशमें कर सकता है। ऐसा विचित्र अधिकार उसे दिया है! अतः मनुष्य उस अधिकारके अनुसार यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग आदि जितना साधन-समुदाय है, उसका अनुष्ठान केवल अनन्त ब्रह्माण्डोंके अनन्त जीवोंके कल्याणके लिये ही करे और दृढ़तासे यह संकल्प रखते हुए प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मात्र जीवोंका कल्याण हो, मात्र जीव जीवनमुक्त हो जायें, मात्र जीव आपके अनन्य प्रेमी भक्त बन जायें; पर हे नाथ! यह होगा केवल आपकी कृपासे ही। मैं तो केवल प्रार्थना कर सकता हूँ और वह भी आपकी दी हुई सद्बुद्धिके द्वारा ही!’ ऐसा भाव रखते हुए अपनी कहलानेवाली शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन-सम्पत्ति आदि सभी चीजोंको मात्र दुनियाके कल्याणके लिये भगवान्के अर्पण कर दे*। ऐसा करनेसे अपनी कहलानेवाली चीजोंकी तो संसारके साथ और अपनी भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध एकता प्रकट हो जायगी। इसे भगवान्ने ‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’ पदोंसे कहा है।

  • मात्र जीवोंके कल्याणका जो भाव है, वह भाव भी भगवान्की ही दी हुई विभूति (दैवी-सम्पत्ति) है, अपना नहीं है। अपने तो केवल भगवान् ही हैं।