श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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परमात्मा ही प्राप्तव्य है। इस श्लोकसे यह भाव निकलता है कि भक्तको ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंका फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ज्ञात-ज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ और दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘पुरुषोत्तमयोग’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
इस अध्यायमें कहे हुए विषयको यथार्थरूपसे समझ लेनेपर पुरुषोत्तम-(भगवान्-) के साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘पुरुषोत्तमयोग’ रखा गया है।
पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके दो सौ अट्ठासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ छः है।
(२) ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके सात सौ एक और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ बासठ है। इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, चौथा, पाँचवाँ और पंद्रहवाँ—ये चार श्लोक चौवालीस अक्षरोंके और तीसरा श्लोक पैतालीस
अक्षरोंका है। शेष पंद्रह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच।’
पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, तीसरा और चौथा—ये तीन श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं; और पाँचवाँ तथा पंद्रहवाँ—ये दो श्लोक ‘इन्द्रवज्रा’ छन्दवाले हैं। बचे हुए पंद्रह श्लोकोंमेंसे—सातवें श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’; नवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष दस (१, ६, ८, १०—१४, १६—१७) श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
पन्द्रहवें अध्यायका सार
भगवान्ने सातवें अध्यायमें अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया था—अपरा और परा (७।४-५)। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार—यह आठ प्रकारके भेदोंवाली ‘अपरा प्रकृति’ है और जिसने जगत्को धारण किया हुआ है, वह जीवरूप बनी हुई ‘परा प्रकृति’ है। अपरा और परा—दोनों ईश्वरकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव हैं। अपरा, परा और ईश्वर—इन तीनोंका विस्तारसे वर्णन भगवान् पन्द्रहवें अध्यायमें करते हैं। पन्द्रहवें अध्यायमें पहले संसार-वृक्षके रूपमें ‘अपरा’ का वर्णन करते हैं, फिर सातवें ग्यारहवें श्लोकतक अपने अंश-रूपसे ‘पराका वर्णन करते हैं, फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक अपने प्रभावका वर्णन करते हैं। अन्तमें अपरा, परा और ईश्वर—तीनोंका क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे वर्णन करके अध्यायका उपसंहार करते हैं।
सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी प्रकृति अर्थात् अपनेसे अभिन्न बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। परन्तु पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अपनेको अपरा (क्षर) से अतीत और परा (अक्षर) से उत्तम बताया है। इसका तात्पर्य है कि जबतक साधक अपरा (संसार) और परा (स्वयं)—दोनोंकी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, तबतक भगवान् अपरासे अतीत और परासे उत्तम हैं। परन्तु जब उसकी मान्यतामें अपरा और पराकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, तब अपरा, परा और भगवान्—तीनों एक ही होते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।
पन्द्रहवें अध्यायके मध्यमें अक्षर (जीवात्मा) के वर्णनका तात्पर्य है कि जीवके एक तरफ क्षर (संसार) है और एक तरफ पुरुषोत्तम (परमात्मा) है। जीवका सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोकै’; क्योंकि जैसे