श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
तो सरलता बड़े कामकी चीज है—
कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।
‘नारायन’ ता भक्त की, लगी किनारे नाव॥
इसलिये साधकके शरीर, वाणी और मनके व्यवहारमें कोई बनावटीपन नहीं रहना चाहिये*। उसमें स्वाभाविक सीधापन हो।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्थ्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्तं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥
अहिंसा = अहिंसा, सत्यम् = सत्यभाषण, अक्रोधः = क्रोध न करना, त्यागः = संसारकी कामनाका त्याग, शान्तिः = अन्तःकरणमें राग-
द्वेषजनित हलचलका न होना, अपैशुनम् = चुगली न करना, भूतेषु = प्राणियोंपर दया = दया करना, अलोलुप्तम् = सांसारिक विषयोंमें
न ललचाना, मार्दवम् = अन्तःकरणकी कोमलता, ह्रीः = अकर्तव्य करनेमें लज्जा, अचापलम् = चपलताका अभाव।
व्याख्या —‘अहिंसा’—शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको तथा अनिष्ट न चाहनेको ‘अहिंसा’ कहते हैं। वास्तवमें सर्वथा अहिंसा तब होती है, जब मनुष्य संसारकी तरफसे विमुख होकर परमात्माकी तरफ ही चलता है। उसके द्वारा ‘अहिंसा’ का पालन स्वतः होता है। परन्तु जो रागपूर्वक, भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है; वह कभी सर्वथा अहिंसक नहीं हो सकता। वह अपना पतन तो करता ही है, जिन पदार्थों आदिको वह भोगता है, उनका भी नाश करता है।
जो संसारके सीमित पदार्थोंको व्यक्तिगत (अपने) न होनेपर भी व्यक्तिगत मानकर सुखबुद्धिसे भोगता है, वह हिंसा ही करता है। कारण कि समष्टि संसारसे सेवाके लिये मिले हुए पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिमेंसे किसीको भी अपने भोगके लिये व्यक्तिगत मानना हिंसा ही है। यदि मनुष्य समष्टि संसारसे मिली हुई वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिको संसारकी ही मानकर निर्ममतापूर्वक संसारकी सेवामें लगा दे, तो वह हिंसासे बच सकता है और वही अहिंसक हो सकता है।
जो सुख और भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है, उसको देखकर, जिनको वे भोग-पदार्थ नहीं मिलते—ऐसे अभावग्रस्तोंको दुःख-संताप होता है। यह उनकी हिंसा ही
है; क्योंकि भोगी व्यक्तिमें अपना स्वार्थ और सुख-बुद्धि रहती है तथा दूसरोंके दुःखकी लापरवाही रहती है। परन्तु जो संत-महापुरुष केवल दूसरोंका हित करनेके लिये ही जीवन-निर्वाह करते हैं, उनको देखकर किसीको दुःख हो भी जायगा, तो भी उनको हिंसा नहीं लगेगी; क्योंकि वे भोग-बुद्धिसे जीवन-निर्वाह करते ही नहीं—‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बषम्’ (गीता ४।२१)।
केवल परमात्माकी ओर चलनेवालेके द्वारा हिंसा नहीं होती; क्योंकि वह भोग-बुद्धिसे पदार्थ आदिका सेवन नहीं करता। परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक शरीर, मन, वाणीके द्वारा कभी किसीको दुःख नहीं पहुँचाता। यदि उसकी बाह्य क्रियाओंसे किसीको दुःख होता है, तो यह दुःख उसके खुदके स्वभावसे ही होता है। साधककी तो भीतरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख देनेकी भावना नहीं होनी चाहिये। उसका भाव निरन्तर सबका हित करनेका होना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः।’
साधककी साधनामें कोई बाधा डाल दे, तो उसे उसपर क्रोध नहीं आता और न उसके मनमें उसके अहितकी भावना (हिंसा) ही पैदा होती है। हाँ, परमात्माकी ओर चलनेमें बाधा पड़नेसे उसको दुःख हो सकता है, पर वह दुःख भी सांसारिक दुःखकी तरह नहीं होता। साधकको बाधा लगती है, तो वह भगवान्को पुकारता है कि
- मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम्।।
‘महात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें एक ही बात होती है; परन्तु दुरात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें ही अलग-अलग बातें होती हैं।’