श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
१०९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
तो सरलता बड़े कामकी चीज है—
कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।
‘नारायन’ ता भक्त की, लगी किनारे नाव॥
इसलिये साधकके शरीर, वाणी और मनके व्यवहारमें कोई बनावटीपन नहीं रहना चाहिये*। उसमें स्वाभाविक सीधापन हो।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्थ्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्तं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥
अहिंसा = अहिंसा, सत्यम् = सत्यभाषण, अक्रोधः = क्रोध न करना, त्यागः = संसारकी कामनाका त्याग, शान्तिः = अन्तःकरणमें राग-
द्वेषजनित हलचलका न होना, अपैशुनम् = चुगली न करना, भूतेषु = प्राणियोंपर दया = दया करना, अलोलुप्तम् = सांसारिक विषयोंमें
न ललचाना, मार्दवम् = अन्तःकरणकी कोमलता, ह्रीः = अकर्तव्य करनेमें लज्जा, अचापलम् = चपलताका अभाव।
व्याख्या —‘अहिंसा’—शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको तथा अनिष्ट न चाहनेको ‘अहिंसा’ कहते हैं। वास्तवमें सर्वथा अहिंसा तब होती है, जब मनुष्य संसारकी तरफसे विमुख होकर परमात्माकी तरफ ही चलता है। उसके द्वारा ‘अहिंसा’ का पालन स्वतः होता है। परन्तु जो रागपूर्वक, भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है; वह कभी सर्वथा अहिंसक नहीं हो सकता। वह अपना पतन तो करता ही है, जिन पदार्थों आदिको वह भोगता है, उनका भी नाश करता है।
जो संसारके सीमित पदार्थोंको व्यक्तिगत (अपने) न होनेपर भी व्यक्तिगत मानकर सुखबुद्धिसे भोगता है, वह हिंसा ही करता है। कारण कि समष्टि संसारसे सेवाके लिये मिले हुए पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिमेंसे किसीको भी अपने भोगके लिये व्यक्तिगत मानना हिंसा ही है। यदि मनुष्य समष्टि संसारसे मिली हुई वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिको संसारकी ही मानकर निर्ममतापूर्वक संसारकी सेवामें लगा दे, तो वह हिंसासे बच सकता है और वही अहिंसक हो सकता है।
जो सुख और भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है, उसको देखकर, जिनको वे भोग-पदार्थ नहीं मिलते—ऐसे अभावग्रस्तोंको दुःख-संताप होता है। यह उनकी हिंसा ही
है; क्योंकि भोगी व्यक्तिमें अपना स्वार्थ और सुख-बुद्धि रहती है तथा दूसरोंके दुःखकी लापरवाही रहती है। परन्तु जो संत-महापुरुष केवल दूसरोंका हित करनेके लिये ही जीवन-निर्वाह करते हैं, उनको देखकर किसीको दुःख हो भी जायगा, तो भी उनको हिंसा नहीं लगेगी; क्योंकि वे भोग-बुद्धिसे जीवन-निर्वाह करते ही नहीं—‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बषम्’ (गीता ४।२१)।
केवल परमात्माकी ओर चलनेवालेके द्वारा हिंसा नहीं होती; क्योंकि वह भोग-बुद्धिसे पदार्थ आदिका सेवन नहीं करता। परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक शरीर, मन, वाणीके द्वारा कभी किसीको दुःख नहीं पहुँचाता। यदि उसकी बाह्य क्रियाओंसे किसीको दुःख होता है, तो यह दुःख उसके खुदके स्वभावसे ही होता है। साधककी तो भीतरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख देनेकी भावना नहीं होनी चाहिये। उसका भाव निरन्तर सबका हित करनेका होना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः।’
साधककी साधनामें कोई बाधा डाल दे, तो उसे उसपर क्रोध नहीं आता और न उसके मनमें उसके अहितकी भावना (हिंसा) ही पैदा होती है। हाँ, परमात्माकी ओर चलनेमें बाधा पड़नेसे उसको दुःख हो सकता है, पर वह दुःख भी सांसारिक दुःखकी तरह नहीं होता। साधकको बाधा लगती है, तो वह भगवान्को पुकारता है कि
- मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम्।।
‘महात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें एक ही बात होती है; परन्तु दुरात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें ही अलग-अलग बातें होती हैं।’
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
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'हे नाथ! मेरी कहीं भूल हुई, जिससे बाधा लग रही है।' ऐसा विचार करके उसे रोना आ सकता है; पर बाधा डालनेवालेके प्रति क्रोध, द्वेष नहीं हो सकता। बाधा लगनेपर साधकमें तत्परता और सावधानी आती है। यदि उसमें बाधा डालनेवालेके प्रति द्वेष होता है, तो जितने अंशमें द्वेष-वृत्ति रहती है, उतने अंशमें तत्परताकी कमी है, अपने साधनका आग्रह है।
साधकमें एक तत्परता होती है और एक आग्रह होता है। तत्परता होनेसे साधनमें रुचि रहती है और आग्रह होनेसे साधनमें राग रहता है। रुचि होनेसे अपने साधनमें कहीं-कहीं कमी है, उसका ज्ञान होता है और उसे दूर करनेकी शक्ति आती है तथा उसे दूर करनेकी चेष्टा भी होती है। परन्तु राग होनेसे साधनमें विघ्न डालनेवालेके साथ द्वेष होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो साधनमें हमारी रुचि कम होनेसे ही दूसरा हमारे साधनमें बाधा डालता है। अगर साधनमें हमारी रुचि कम न हो तो दूसरा हमारे साधनमें बाधा नहीं डालेगा, प्रत्युत यह सोचकर उपेक्षा कर देगा कि यह जिद्दी है, मानेगा नहीं; अतः जैसा चाहे, वैसा करने दो।
जैसे पुण्यसे सुगन्ध स्वतः फैलती है, ऐसे ही साधकसे स्वतः पारमार्थिक परमाणु फैलते हैं और वायुमण्डल शुद्ध होता है। इससे उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक प्राणिमात्रका बड़ा भारी उपकार एवं हित होता रहता है। परन्तु जो अपने दुर्गुण-दुराचारोंके द्वारा वायुमण्डलको अशुद्ध करता रहता है, वह प्राणिमात्रकी हिंसा करनेका अपराधी होता है।
'सत्यम्' —अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे जैसा सुना, देखा, पढ़ा, समझा और निश्चय किया है, उससे न अधिक और न कम—वैसा-का-वैसा प्रिय शब्दोंमें कह देना 'सत्य' है। सत्यस्वरूप परमात्माको पाने और जाननेका एकमात्र उद्देश्य हो जानेपर साधकके द्वारा मन, वाणी और क्रियासे असत्य-व्यवहार नहीं हो सकता। उसके द्वारा सत्य-व्यवहार, सबके हितका व्यवहार ही होता है। जो सत्यको जानना चाहता है, वह सत्यके ही सम्मुख रहता है। इसलिये उसके मन-वाणी-शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं, वे सभी उत्साहपूर्वक सत्यकी ओर चलनेके लिये ही होती हैं।
'अक्रोधः' —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह 'क्रोध' है। पर जबतक अन्तःकरणमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी भावना पैदा नहीं होती, तबतक वह 'क्षोध' है, क्रोध नहीं।
परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे साधन करनेवाला मनुष्य अपना अपकार करनेवालेका भी अनिष्ट नहीं करना चाहता। वह इस बातको समझता है कि अनिष्ट करनेवाला व्यक्ति वास्तवमें हमारा अनिष्ट कभी कर ही नहीं सकता। यह जो हमें दुःख देनेके लिये आया है, यह हमने पहले कोई गलती की है, उसीका फल है। अतः यह हमें शुद्ध कर रहा है, निर्मल कर रहा है। जैसे, डॉक्टर किसी रूग्ण अंगको काटता है, तो उसपर रोगी क्रोध नहीं करता, प्रत्युत उसे अच्छा मानता है, ठीक मानता है। उसके रूग्ण अंगको काटना तो उसे ठीक करनेके लिये ही है। ऐसे ही साधकको कोई अहितकी भावनासे किसी तरहसे दुःख देता है, तो उसमें यह भाव पैदा होता है कि वह मेरेको शुद्ध, निर्मल बनानेमें निमित्त बन रहा है; अतः उसपर क्रोध कैसे? वह तो मेरा उपकार कर रहा है और भविष्यके लिये सावधान कर रहा है कि जो गलती पहले की है, आगे वैसी गलती न करें।
जो लोग साधकका हित करनेवाले हैं, उसकी सेवा करनेवाले हैं, वे तो साधकको सुख पहुँचाकर उसके पुण्योंका नाश करते हैं। पर साधकको उनपर (उसके पुण्योंका नाश करनेके कारण) क्रोध नहीं आता। उनपर साधकको यह विचार आता है कि वे जो मेरी सेवा करते हैं, मेरे अनुकूल आचरण करते हैं, यह तो उनकी सज्जनता है, उनका श्रेष्ठ भाव है। परन्तु पुण्योंका नाश तो तब होता है, जब मैं उनकी सेवासे सुख भोगता हूँ। इस प्रकार साधककी दृष्टि सेवा करनेवालोंकी अच्छाई, शुद्ध नीयतपर ही जाती है। अतः साधकको न तो दुःख देनेवालोंपर क्रोध होता है और न सुख देनेवालोंपर।
'त्यागः' —संसारसे विमुख हो जाना ही असली त्याग है। साधकके जीवनमें बाहरका और भीतरका—दोनोंका ही त्याग होना चाहिये। जैसे, बाहरसे पाप, अन्याय, अत्याचार, दुराचार आदिका और बाहरी सुख-आराम आदिका त्याग भी करना चाहिये, और भीतरसे सांसारिक नाशवान् वस्तुओंकी कामनाका त्याग भी करना चाहिये। इसमें भी बाहरके त्यागकी अपेक्षा भीतरकी कामनाका त्याग श्रेष्ठ है। कामनाका सर्वथा त्याग होनेपर तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)।
साधकके लिये उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंकी कामना ही वास्तवमें सबसे ज्यादा बाधक होती है। अतः कामनाका सर्वथा त्याग करना चाहिये। त्याग कब होता है?
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
जब साधकका उद्देश्य एकमात्र परमात्मप्राप्तिका ही हो जाता है, तब उसकी कामनाएँ दूर होती चली जाती हैं। कारण कि सांसारिक भोग और संग्रह साधकका लक्ष्य नहीं होता। अतः वह सांसारिक भोग और संग्रहकी कामनाका त्याग करते हुए अपने साधनमें आगे बढ़ता रहता है।
‘शान्तिः’—अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना ‘शान्ति’ है; क्योंकि संसारके साथ राग-द्वेष करनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति आती है और उनके न होनेसे अन्तःकरण स्वाभाविक ही शान्त, प्रसन्न रहता है।
अनुकूलतासे पुराने पुण्योंका नाश होता है और उसमें अपना स्वभाव सुधरनेकी अपेक्षा बिगड़नेकी सम्भावना अधिक रहती है। परन्तु प्रतिकूलता आनेपर पापोंका नाश होता है और अपने स्वभावमें भी सुधार होता है। इस बातको समझनेपर प्रतिकूलतामें भी स्वतः शान्ति बनी रहती है।
किसी परिस्थिति आदिको लेकर साधकमें कभी राग-द्वेषका भाव हो भी जाता है तो उसके मनमें अशान्ति पैदा हो जाती है और अशान्ति होते ही वह तुरंत सावधान हो जाता है कि राग-द्वेषपूर्वक कर्म करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इस विचारसे फिर शान्ति आ जाती है और समय पाकर स्थिर हो जाती है।
‘अपैशुनम्’—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना पिशुनता है और इसका सर्वथा अभाव ही ‘अपैशुन’ है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधक कभी किसीकी चुगली नहीं करता। ज्यों-ज्यों उसका साधन आगे बढ़ता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों उसकी दोषदृष्टि और द्वेषवृत्ति मिटकर दूसरोंके प्रति उसका स्वतः ही अच्छा भाव होता चला जाता है। उसके मनमें यह विचार भी नहीं आता कि मैं साधन करनेवाला हूँ और ये दूसरे (साधन न करनेवाले) साधारण मनुष्य हैं, प्रत्युत तत्परतासे साधन होनेपर उसे जैसी अपनी स्थिति (जड़तासे सम्बन्ध न होना) दिखायी देती है, वैसी ही दूसरोंकी स्थिति भी दिखायी देती है कि वास्तवमें उनका भी जड़तासे सम्बन्ध नहीं है, केवल सम्बन्ध माना हुआ है। इस तरह जब उसकी दृष्टिमें किसीका भी जड़तासे सम्बन्ध है ही नहीं, तो वह किसीका
दोष किसीके प्रति क्यों प्रकट करेगा?
भक्तिमार्गवाला सर्वत्र अपने प्रभुको देखता है, ज्ञानमार्गवाला केवल अपने स्वरूपको ही देखता है और कर्मयोगमार्गवाला अपने सेव्यको देखता है। इसलिये साधक किसीकी बुराई, निन्दा, चुगली आदि कर ही कैसे सकता है?
‘दया भूतेषु’—दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावनाको ‘दया’ कहते हैं। भगवान्की, संत-महात्माओंकी, साधकोंकी और साधारण मनुष्योंकी दया अलग-अलग होती है—
(१) भगवान्की दया—भगवान्की दया सभीको शुद्ध करनेके लिये होती है। भक्तलोग इस दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना ‘कृपा’ है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना ‘दया’ है।
(२) संत-महात्माओंकी दया—संत-महात्मालोग दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)। पर वास्तवमें उनके भीतर न दूसरोंके दुःखसे दुःख होता है और न अपने दुःखसे ही दुःख होता है। कारण कि तत्त्वमें न सुख है, न दुःख। जैसे समुद्रके ऊपर लहरें उठती दीखती हैं, पर समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं होती, भीतरसे समुद्र शान्त (सम) रहता है, ऐसे ही व्यवहारमें सन्त दुःखी होते हुए दीखते हैं, पर उनके भीतर न सुख है, न दुःख। तात्पर्य है कि वास्तवमें वे दुःखी नहीं होते, प्रत्युत उनके द्वारा दूसरेका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होती है। अपनेपर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर वे उसमें भगवान्की कृपाको देखते हैं, पर दूसरोंपर दुःख आनेपर उन्हें सुखी करनेके लिये वे उनके दुःखको स्वयं अपनेपर ले लेते हैं। जैसे, इन्द्रने क्रोधपूर्वक बिना अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया था, पर जब इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये उनकी हड्डियाँ माँगीं, तब दधीचिने सहर्ष प्राण छोड़कर उन्हें अपनी हड्डियाँ दे दीं। इस प्रकार संत-महापुरुष दूसरेके दुःखको सह नहीं सकते, प्रत्युत उन्हें सुख पहुँचानेके लिये अपनी सुख-सामग्री और प्राणतक दे देते हैं, चाहे दूसरा उनका अहित करनेवाला ही क्यों न हो!* इसलिये संत-
- कर्णस्वचं शिबिर्यासं जीवं जीमूतवाहनः। ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम्॥
‘कर्णने अपनी त्वचा, शिबिने अपना मांस, दधीचिने अपनी हड्डियाँ और जीमूतवाहने अपना जीवन (शरीर) दे दिया। सच है, महात्माओंके लिये (परहितके लिये) कुछ भी अदेय नहीं है।’
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
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महात्माओंकी दया विशेष शुद्ध, निर्मल होती है।
(३) साधकोंकी दया —साधक अपने मनमें दूसरोंका दुःख दूर करनेकी भावना रखता है और उसके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा भी करता है। दूसरोंको दुःखी देखकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है; क्योंकि वह अपनी ही तरह दूसरोंके दुःखको भी समझता है। इसलिये उसका यह भाव रहता है कि सब सुखी कैसे हों? सबका भला कैसे हो? सबका उद्धार कैसे हो? सबका हित कैसे हो? अपनी ओरसे वह ऐसी ही चेष्टा करता है; परन्तु मैं सबका हित करता हूँ, सबके हितकी चेष्टा करता हूँ—इन बातोंको लेकर उसके मनमें अभिमान नहीं होता। कारण कि दूसरोंका दुःख दूर करनेका सहज स्वभाव बन जानेसे उसे अपने इस आचरणमें कोई विशेषता नहीं दीखती। इसलिये उसको अभिमान नहीं होता।
जो प्राणी भगवान्की ओर नहीं चलते, दुर्गुण-दुराचारोंमें रत रहते हैं, दूसरोंका अपराध करते हैं और अपना पतन करते हैं—ऐसे मनुष्योंपर साधकको क्रोध न आकर दया आती है। इसलिये वह हरदम ऐसी चेष्टा करता रहता है कि ये लोग दुर्गुण-दुराचारोंसे ऊपर कैसे उठें? इनका भला कैसे हो? कभी-कभी वह उनके दोषोंको दूर करनेमें अपनेको निर्बल मानकर भगवान्से प्रार्थना करता है कि 'हे नाथ! ये लोग इन दोषोंसे छूट जायँ और आपके भक्त बन जायँ।'
(४) साधारण मनुष्योंकी दया —साधारण मनुष्यकी दयामें थोड़ी मलिनता रहती है। वह किसी जीवके हितकी चेष्टा करता है, तो यह सोचता है कि 'मैं कितना दयालु हूँ। मैंने इस जीवको सुख पहुँचाया, तो मैं कितना अच्छा हूँ। हरेक आदमी मेरे-जैसा दयालु नहीं है, कोई-कोई ही होता है, इत्यादि।' इस प्रकार लोग मुझे अच्छा समझेंगे, मेरा आदर करेंगे आदि बातोंको लेकर, अपनेमें महत्त्वबुद्धि रखकर जो दया की जाती है, उसमें दयाका अंश तो अच्छा है, पर साथमें उपर्युक्त मलिनताएँ रहनेसे उस दयामें अशुद्धि आ जाती है।
इनसे भी साधारण दर्जेके मनुष्य दया तो करते हैं, पर उनकी दया ममतावाले व्यक्तियोंपर ही होती है। जैसे, ये हमारे परिवारके हैं, हमारे मत और सिद्धान्तको माननेवाले हैं, तो उनका दुःख दूर करनेकी इच्छासे उन्हें सुख-आराम
देनेका प्रयत्न करते हैं। यह दया ममता और पक्षपातयुक्त होनेसे अधिक अशुद्ध है।
इनसे भी घटिया दर्जेके वे मनुष्य हैं, जो केवल अपने सुख और स्वार्थकी पूर्तिके लिये ही दूसरोंके प्रति दयाका बर्ताव करते हैं।
'अलोलुप्तवम् '—इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध होनेसे अथवा दूसरोंको भोग भोगते हुए देखनेसे मनका (भोग भोगनेके लिये) ललचा उठनेका नाम 'लोलुप्ता' है और उसके सर्वथा अभावका नाम 'अलोलुप्त' है।
अलोलुप्ताके उपाय —(१) साधकके लिये विशेष सावधानीकी बात है कि वह अपनी इन्द्रियोंसे भोगोंका सम्बन्ध न रखे और मनमें कभी भी ऐसा भाव, ऐसा अभिमान न आने दे कि मेरा इन्द्रियोंपर अधिकार है अर्थात् इन्द्रियाँ मेरे वशमें हैं; अतः मेरा क्या बिगड़ सकता है?
(२) 'मैं हृदयसे परमात्माकी प्राप्ति चाहता हूँ, अगर कभी हृदयमें विषय-लोलुप्ता हो गयी, तो मेरा पतन हो जायगा और मैं परमात्मासे विमुख हो जाऊँगा।'—इस प्रकार साधक खूब सावधान रहे और कहीं अचानक विचलित होनेका अवसर आ जाय, तो 'हे नाथ! बचाओ; हे नाथ! बचाओ' ऐसे सच्चे हृदयसे भगवान्को पुकारे।
(३) स्त्री-पुरुषोंकी तथा जन्तुओंकी कामविषयक चेष्टा न देखे। यदि दीख जाय, तो ऐसा विचार करे कि 'यह तो बिलकुल चौरासी लाख योनियोंका रास्ता है। यह चीज तो मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, राक्षस-असुर, भूत-प्रेत आदि मात्र जीवोंमें भी है। पर मैं तो चौरासी लाख योनियों अर्थात् जन्म-मरणसे ऊँचा उठना चाहता हूँ। मैं जन्म-मरणके मार्गका पथिक नहीं हूँ। मेरेको तो जन्म-मरणादि दुःखोंका अत्यन्त अभाव करके परमात्माकी प्राप्ति करना है।' इस भावको बड़ी सावधानीके साथ जाग्रत् रखे और जहाँतक बने, ऐसी काम-चेष्टा न देखे।
'मार्दवम् '—बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना 'मार्दव' है*।
साधकके हृदयमें सबके प्रति कोमलताका भाव रहता है। उसके प्रति कोई कठोरता एवं अहितका बर्ताव भी करता है, तो भी उसकी कोमलतामें अन्तर नहीं आता। यदि साधक कभी किसी बातको लेकर किसीको कठोर जवाब
- शरीरकी प्रधानताको लेकर 'आर्जव' और अन्तःकरणकी प्रधानताको लेकर 'मार्दव' कहा जाता है—यही इन दोनोंमें अन्तर है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
भी दे दे, तो वह कठोर जवाब भी उसके हितकी दृष्टिसे ही देता है। पर पीछे उसके मनमें यह विचार आता है कि मैंने उसके प्रति कठोरताका व्यवहार क्यों किया ? मैं प्रेमसे या अन्य किसी उपायसे भी समझा सकता था—इस प्रकारके भाव आनेसे कठोरता मिटती रहती है और कोमलता बढ़ती रहती है।
यद्यपि साधकोंके भावोंमें और वाणीमें कोमलता रहती है, तथापि उनकी भिन्न-भिन्न प्रकृति होनेसे सबकी वाणीमें एक समान कोमलता नहीं होती। परन्तु हृदयमें साधकोंका सबके प्रति कोमल भाव रहता है। ऐसे ही कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आदिका साधन करनेवालोंके स्वभावमें विभिन्नता होनेसे उनके बर्ताव सबके प्रति भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः उनके आचरणोंमें एक-जैसी कोमलता नहीं दीखती, पर भीतरमें बड़ी भारी कोमलता रहती है।
‘ह्रीः’—शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम करनेमें जो एक संकोच होता है, उसका नाम ‘ह्रीः’ (लज्जा) है। साधकको साधन-विरुद्ध क्रिया करनेमें लज्जा आती है। वह लज्जा केवल लोगोंके देखनेसे ही नहीं आती, प्रत्युत उसके मनमें अपने-आप ही यह विचार आता है कि ‘राम-राम, मैं ऐसी क्रिया कैसे कर सकता हूँ? क्योंकि मैं तो परमात्माकी तरफ चलनेवाला (साधक) हूँ। लोग भी मुझे परमात्माकी तरफ चलनेवाला समझते हैं।
अतः ऐसी साधन-विरुद्ध क्रियाओंको मैं एकात्ममें अथवा लोगोंके सामने कैसे कर सकता हूँ?’—इस लज्जाके कारण साधक बुरे कर्मोंसे बच जाता है एवं उसके आचरण ठीक होते चले जाते हैं। जब साधक अपनी अहंता बदल देता है कि मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भक्त हूँ, तब उसे अपनी अहंताके विरुद्ध क्रिया करनेमें स्वाभाविक ही लज्जा आती है। इसलिये पारमार्थिक उद्देश्य रखनेवाले प्रत्येक साधकको अपनी अहंता ‘मैं साधक हूँ, मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भगवद्भक्त हूँ’—इस प्रकारसे यथार्थचि बदल लेनी चाहिये, जिससे वह साधन-विरोधी कर्मोंसे बचकर अपने उद्देश्यको जल्दी प्राप्त कर सकता है।
‘अचापलम्’—कोई भी कार्य करनेमें चपलताका अर्थात् उतावलापनका न होना ‘अचापल’ है। चपलता (चंचलता) होनेसे काम जल्दी होता है, ऐसी बात नहीं है। सात्त्विक मनुष्य सब काम धैर्यपूर्वक करता है; अतः उसका काम सुचारुरूपसे और ठीक समयपर हो जाता है। जब कार्य ठीक हो जाता है, तब उसके अन्तःकरणमें हलचल, चिन्ता नहीं होती। चपलता न होनेसे कार्यमें दीर्घसूत्रताका दोष भी नहीं आता, प्रत्युत कार्यमें तत्परता आती है, जिससे सब काम सुचारुरूपसे होते हैं। अपने कर्तव्य-कर्मोंको करनेके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा न होनेसे उसका चित्त विशिप्त और चंचल नहीं होता (गीता—अठारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
| तेजः | = तेज (प्रभाव), | (और) | सम्पदम् | = सम्पदाको |
|---|---|---|---|---|
| क्षमा | = क्षमा, | नातिमानिता | = मानको न चाहना, | अभिजातस्य |
| धृतिः | = धैर्य, | भारत | = हे भरतवंशी अर्जुन ! | मनुष्यके |
| शौचम् | = शरीरकी शुद्धि, | (ये सभी) | (लक्षण) | |
| अद्रोहः | = वैरभावका न होना | दैवीम् | = दैवी | भवन्ति |
व्याख्या—‘तेजः’—महापुरुषोंका संग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सदुगुण-सदाचारोंमें लग जाते हैं। महापुरुषोंकी उस शक्तिको ही यहाँ ‘तेज’ कहा है। ऐसे तो क्रांथी आदमीको देखकर भी लोगोंको उसके स्वभावके विरुद्ध काम करनेमें भय लगता है; परन्तु यह क्रोधरूप दोषका तेज है।
साधकमें दैवी-सम्पत्तिके गुण प्रकट होनेसे उसको देखकर दूसरे लोगोंके भीतर स्वाभाविक ही सौम्यभाव आते हैं अर्थात् उस साधकके सामने दूसरे लोग दुराचार करनेमें लज्जित होते हैं, हिचकते हैं और अनायास ही सद्भावपूर्वक सदाचार करने लग जाते हैं। यही उन दैवी-सम्पत्तिवालोंका तेज (प्रभाव) है।
‘क्षमा’—बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराधको सह लेना और उसको माफ कर देना 'क्षमा' है। यह क्षमा मोह-ममता, भय और स्वार्थको लेकर भी की जाती है; जैसे—पुत्रके अपराध कर देनेपर पिता उसे क्षमा कर देता है, तो यह क्षमा मोह-ममताको लेकर होनेसे शुद्ध नहीं है। इसी प्रकार किसी बलवान् एवं क्रूर व्यक्तिके द्वारा हमारा अपराध किये जानेपर हम भयवश उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा भयको लेकर है। हमारी धन-सम्पत्तिकी जाँच-पड़ताल करनेके लिये इन्स्पेक्टर आता है, तो वह हमें धमकाता है, अनुचित भी बोलता है और उसका ठहरना हमें बुरा भी लगता है तो भी स्वार्थ-हानिके भयसे हम उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा स्वार्थको लेकर है। पर ऐसी क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो वही है, जिसमें 'हमारा अनिष्ट करनेवालेको यहाँ और परलोकमें भी किसी प्रकारका दण्ड न मिले'—ऐसा भाव रहता है।
क्षमा माँगना भी दो रीतिसे होता है—
(१) हमने किसीका अपकार किया, तो उसका दण्ड हमें न मिले—इस भयसे भी क्षमा माँगी जाती है; परन्तु इस क्षमामें स्वार्थका भाव रहनेसे यह ऊँचे दर्जेंकी क्षमा नहीं है।
(२) हमसे किसीका अपराध हुआ, तो अब यहाँसे आगे उग्रभ्रर ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा—इस भावसे जो क्षमा माँगी जाती है, वह अपने सुधारको दृष्टिको लेकर होती है और ऐसी क्षमा माँगनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है।
मनुष्य क्षमाको अपनेमें लाना चाहे तो कौन-सा उपाय करे? यदि मनुष्य अपने लिये किसीसे किसी प्रकारके सुखकी आशा न रखे और अपना अपकार करनेवालेका बुरा न चाहे, तो उसमें क्षमाभाव प्रकट हो जाता है।
'धृति:—'किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका
नाम 'धृति' (धैर्य) है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैत्तिरीयश्लोक)।
वृत्तियाँ सात्त्विक होती हैं तो धैर्य ठीक रहता है और वृत्तियाँ राजसी-तामसी होती हैं तो धैर्य वैसा नहीं रहता। जैसे बद्दीनारायणके रास्तेपर चलनेवालेके लिये कभी गरमी, चढ़ाई आदि प्रतिकूलताएँ आती हैं और कभी ठण्डक, उतराई आदि अनुकूलताएँ आती हैं, पर चलनेवालेको उन प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओंको देखकर ठहरना नहीं है, प्रत्युत 'हमें तो बद्दीनारायण पहुँचना है'—इस उद्देश्यसे धैर्य और तत्परतापूर्वक चलते रहना है। ऐसे ही साधकको अच्छी-मन्दी वृत्तियाँ और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंकी ओर देखना ही नहीं चाहिये। इनमें उसे धीरज धारण करना चाहिये; क्योंकि जो अपना उद्देश्य सिद्ध करना चाहता है, वह मार्गमें आनेवाले सुख और दुःखको नहीं देखता—
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥
(भर्तृहरिनीतिशतक)
'शौचम्'—बाह्यशुद्धि एवं अन्तःशुद्धिका नाम 'शौच' है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखनेवाला साधक बाह्यशुद्धिका भी खयाल रखता है; क्योंकि बाह्यशुद्धि रखनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि स्वतः होती है और अन्तःकरण शुद्ध होनेपर बाह्य-अशुद्धि उसको सुहाती नहीं। इस विषयपर पतंजलि महाराजने कहा है—
शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।
(योगदर्शन २।४०)
'शौचसे साधककी अपने शरीरमें घृणा अर्थात् अपवित्र-बुद्धि और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा होती है।'
तात्पर्य यह है कि अपने शरीरको शुद्ध रखनेसे शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होता है। शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होनेसे 'सम्पूर्ण शरीर इसी तरहके हैं'—इसका बोध होता है। इस बोधसे दूसरे शरीरोंके प्रति जो आकर्षण होता है, उसका अभाव हो जाता है अर्थात् दूसरे शरीरोंसे सुख
१-क्षमा और अक्रोधमें क्या अन्तर है? क्षमामें जिसने अपराध किया है, उसपर विशेषतासे यह दृष्टि रहती है कि उसको कभी किसी प्रकारका दण्ड न हो और अक्रोधमें अपनी तरफ दृष्टि रहती है कि हमारेमें क्रोध न हो, जलन न हो, किसी प्रकारकी हलचल न हो। यद्यपि क्षमाके अन्तर्गत अक्रोध भी आ जाता है, तथापि क्षमाशील कह देनेपर उसके लिये क्रोधरहित कहनेकी आवश्यकता नहीं है, जब कि क्रोधरहित कहनेपर यह क्षमाशील है, ऐसा कहनेकी आवश्यकता रह जाती है। अतः ये दोनों गुण (क्षमा और अक्रोध) भिन्न-भिन्न हैं।
२-यहाँ 'शौचम्' पदसे बाह्यशुद्धि ही लेनी चाहिये; क्योंकि अन्तःशुद्धि 'सत्त्वसंशुद्धिः' पदसे इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आ चुकी है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
लेनेकी इच्छा मिट जाती है।
बाह्यशुद्धि चार प्रकारसे होती है—(१) शारीरिक, (२) वाचिक, (३) कौटुम्बिक और (४) आर्थिक।
(१) शारीरिक शुद्धि —प्रमाद, आलस्य, आरामतलबी, स्वाद-शौकीनी आदिसे शरीर अशुद्ध हो जाता है और इनके विपरीत कार्य-तत्परता, पुरुषार्थ, उद्योग, सादगी आदि रखते हुए आवश्यक कार्य करनेपर शरीर शुद्ध हो जाता है। ऐसे ही जल, मृत्तिका आदिसे भी शारीरिक शुद्धि होती है।
(२) वाचिक शुद्धि —झूठ बोलने, कड़ुआ बोलने, वृथा बकवाद करने, निन्दा करने, चुगली करने आदिसे वाणी अशुद्ध हो जाती है। इन दोषोंसे रहित होकर सत्य, प्रिय एवं हितकारक आवश्यक वचन बोलना (जिससे दूसरोंकी पारमार्थिक उन्नति होती हो और देश, ग्राम, मोहल्ले, परिवार, कुटुम्ब आदिका हित होता हो) और अनावश्यक बात न करना—यह वाणीकी शुद्धि है।
(३) कौटुम्बिक शुद्धि —अपने बाल-बच्चोंको अच्छी शिक्षा देना; जिससे उनका हित हो, वही आचरण करना; कुटुम्बियोंका हमपर जो न्याययुक्त अधिकार है, उसको अपनी शक्तिके अनुसार पूरा करना; कुटुम्बियोंमें किसीका पक्षपात न करके सबका समानरूपसे हित करना—यह कौटुम्बिक शुद्धि है।
(४) आर्थिक शुद्धि —न्याययुक्त, सत्यतापूर्वक, दूसरोंके हितका बर्ताव करते हुए जिस धनका उपार्जन किया गया है, उसको यथाशक्ति, अरक्षित, अभावग्रस्त, दरिद्री, रोगी, अकालपीडित, भूखे आदि आवश्यकतावालोंको देनेसे एवं गौ, स्त्री, ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगानेसे द्रव्यकी शुद्धि होती है।
त्यागी-वैरागी-तपस्वी सन्त-महापुरुषोंकी सेवामें लगानेसे एवं सदृग्रन्थोंको सरल भाषामें छपवाकर कम मूल्यमें देनेसे तथा उनका लोगोंमें प्रचार करनेसे धनकी महान् शुद्धि हो जाती है।
परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर अपनी (स्वयंकी) शुद्धि हो जाती है। स्वयंकी शुद्धि होनेपर शरीर, वाणी, कुटुम्ब, धन आदि सभी शुद्ध एवं पवित्र होने लगते हैं। शरीर आदिके शुद्ध हो जानेसे वहाँका स्थान, वायुमण्डल आदि भी शुद्ध हो जाते हैं। बाह्यशुद्धि और पवित्रताका खयाल रखनेसे शरीरकी वास्तविकता अनुभवमें आ जाती
है, जिससे शरीरसे अहंता-ममता छोड़नेमें सहायता मिलती है। इस प्रकार यह साधन भी परमात्मप्राप्तिमें निमित्त बनता है।
‘अद्वोहः’ —‘बिना कारण अनिष्ट करनेवालेके प्रति भी अन्तःकरणमें बदला लेनेकी भावनाका न होना ‘अद्वोहः’ है। साधारण व्यक्तिका कोई अनिष्ट करता है, तो उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति द्वेषकी एक गॉठ बँध जाती है कि मौका पड़नेपर मैं इसका बदला ले ही लूँगा; किन्तु जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, उस साधकका कोई कितना ही अनिष्ट क्यों न करे, उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति बदला लेनेकी भावना ही पैदा नहीं होती। कारण कि कर्म-योगका साधक सबके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करता है, ज्ञानयोगका साधक सबको अपना स्वरूप समझता है और भक्तियोगका साधक सबमें अपने इष्ट भगवान्को समझता है। अतः वह किसीके प्रति कैसे द्वोह कर सकता है।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥
(मानस ७। ११२ ख)
‘नातिमानिता’ —एक ‘मानिता’ होती है और एक ‘अतिमानिता’ होती है। सामान्य व्यक्तियोंसे मान चाहना ‘मानिता’ है और जिनसे हमने शिक्षा प्राप्त की, जिनका आदर्श ग्रहण किया और ग्रहण करना चाहते हैं, उनसे भी अपना मान, आदर-सत्कार चाहना ‘अतिमानिता’ है। इन मानिता और अतिमानिताका न होना ‘नातिमानिता’ है—स्थूल दृष्टिसे ‘मानिता’ के दो भेद होते हैं—
(१) सांसारिक मानिता —धन, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, अधिकार, पद, वर्ण, आश्रम आदिको लेकर दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें एक श्रेष्ठताका भाव होता है कि ‘मैं साधारण मनुष्योंकी तरह थोड़े ही हूँ, मेरा कितने लोग आदर-सत्कार करते हैं! वे आदर करते हैं तो यह ठीक ही है; क्योंकि मैं आदर पानेयोग्य ही हूँ’—इस प्रकार अपने प्रति जो मान्यता होती है, वह सांसारिक मानिता कहलाती है।
(२) पारमार्थिक मानिता —प्रारम्भिक साधनकालमें जब अपनेमें कुछ दैवी-सम्पत्ति प्रकट होने लगती है, तब साधकको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता दीखती है। साथ ही दूसरे लोग भी उसे परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक मानकर उसका विशेष आदर करते हैं और साथ-ही-साथ ‘ये साधन करनेवाले हैं, अच्छे सज्जन
- क्रोध और द्वोह—दोनोंमें अन्तर है। अपना अनिष्ट करनेवालेके प्रति तत्काल जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है; और क्रोधका जो भीतरी भाव बैठता है अर्थात् मौका मिलनेपर उसका अनिष्ट करनेकी जो वैरभावना बैठती है, उसका नाम ‘द्वोह’ है।
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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हैँ’—ऐसी प्रशंसा भी करते हैं। इससे साधकको अपने विशेषता मालूम देती है, पर वास्तवमें यह विशेषता अपने साधनमें कमी होनेके कारण ही दीखती है। यह विशेषता दीखना पारमार्थिक मानिता है।
जबतक अपनेमें व्यक्तित्व (एकदेशीयता, परिछिन्नता) रहता है, तभीतक अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दिखायी दिया करती है। परन्तु ज्यों-ज्यों व्यक्तित्व मिटता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों साधकका दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषताका भाव मिटता चला जाता है। अन्तमें इन सभी मानिताओंका अभाव होकर साधकमें दैवी-सम्पत्तिका गुण ‘नातिमानिता’ प्रकट हो जाती है।
दैवी-सम्पत्तिके जितने सदगुण-सदाचार हैं, उनको पूर्णतया जाग्रत् करनेका उद्देश्य तो साधकका होना ही चाहिये। हाँ, प्रकृति-(स्वभाव-) की भिन्नतासे किसीमें किसी गुणकी कमी, तो किसीमें किसी गुणकी कमी रह सकती है। परन्तु वह कमी साधकके मनमें खटकती रहती है और वह प्रभुका आश्रय लेकर अपने साधनको तत्परतासे करते रहता है; अतः भगवत्कृपासे वह कमी मिटती जाती है। कमी ज्यों-ज्यों मिटती जाती है, त्यों-त्यों उत्साह और उस कमीके उत्तरोत्तर मिटनेकी सम्भावना भी बढ़ती जाती है। इससे दुर्गुण-दुराचार सर्वथा नष्ट होकर सदगुण-सदाचार अर्थात् दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है।
‘भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत’—भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये सभी दैवी-सम्पत्तिका प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं।
परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर ये दैवी-सम्पत्तिके लक्षण साधकमें स्वाभाविक ही आने लगते हैं। कुछ लक्षण पूर्वजन्मोंके संस्कारोंसे भी जाग्रत् होते हैं। परन्तु साधक इन गुणोंको अपने नहीं मानता और न उनको अपने पुरुषार्थसे उपाजित ही मानता है, प्रत्युत गुणोंके आनेमें वह भगवान्की ही कृपा मानता है। कभी खयाल करनेपर साधकके मनमें ऐसा विचार होता है कि मेरेमें पहले तो ऐसी वृत्तियाँ नहीं थीं, ऐसे सदगुण नहीं थे, फिर ये कहाँसे आ गये? तो ये सब भगवान्की कृपासे ही आये हैं—ऐसा अनुभव होनेसे उस साधकको दैवी-सम्पत्तिका अभिमान नहीं आता।
साधकको दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपने नहीं मानना
चाहिये; क्योंकि यह देव—परमात्माकी सम्पत्ति है, व्यक्तिगत (अपनी) किसीकी नहीं है। यदि व्यक्तिगत होती, तो यह अपनेमें ही रहती, किसी अन्य व्यक्तिकी नहीं रहती। इसको व्यक्तिगत माननेसे ही अभिमान आता है। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मुख्य लक्षण है। अभिमानकी छायामें ही आसुरी-सम्पत्तिके सभी अवगुण रहते हैं। यदि दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति (अभिमान) पैदा हो जाय, तो फिर आसुरी-सम्पत्ति कभी मिटेगी ही नहीं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति कभी पैदा नहीं होती, प्रत्युत दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके साथ-साथ आसुरी-सम्पत्तिके जो अवगुण रहते हैं, उनसे ही गुणोंका अभिमान पैदा होता है अर्थात् साधनके साथ कुछ-कुछ असामर्थ्य रहनेसे ही अभिमान आदि दोष पैदा होते हैं। जैसे, किसीको सत्य बोलनेका अभिमान होता है, तो उसके मूलमें वह सत्यके साथ-साथ असत्य भी बोलता है, जिसके कारण सत्यका अभिमान आता है। तात्पर्य यह है कि दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपना माननेसे एवं गुणोंके साथ अवगुण रहनेसे ही अभिमान आता है। सर्वथा गुण आनेपर गुणोंका अभिमान हो ही नहीं सकता।
यहाँ दैवी-सम्पत्ति कहनेका तात्पर्य है कि यह भगवान्की सम्पत्ति है। अतः भगवान्का सम्बन्ध होनेसे, उनका आश्रय लेनेसे शरणागत भक्तमें यह स्वाभाविक ही आती है। जैसे शबरीके प्रसंगमें रामजीने कहा है— नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
..... नव महुँ एकउ जिन्हें के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ सोइ अतिसय प्रिय भाभिनि मोरै। सकल प्रकार भगति दूढ़ तोरै॥
(मानस ३। ३५-३६)
मनुष्य-देवता, भूत-पिशाच, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबमें अपनी-अपनी योनिके अनुसार मिले हुए शरीरोंके रूण एवं जीर्ण हो जानेपर भी ‘मैं जीता रहूँ, मेरे प्राण बने रहें’—यह इच्छा बनी रहती है*। इस इच्छाका होना ही आसुरी-सम्पत्ति है।
त्यागी-वैरागी साधकमें भी प्राणोंके बने रहनेकी इच्छा रहती है; परन्तु उसमें प्राणपोषण-बुद्धि, इन्द्रिय-लोलुपता नहीं रहती; क्योंकि उसका उद्देश्य परमात्मा होता है, न कि शरीर और संसार।
- यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् जीविताशा बलीयसी ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।१४।५३)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
जब साधक भक्तका भगवान्में प्रेम हो जाता है, तब उसको भगवान् प्राणोंसे भी प्यारे लगते हैं। प्राणोंका मोह न रहनेसे उसके प्राणोंका आधार केवल भगवान् हो जाते हैं। इसलिये वह भगवान्को 'प्राणनाथ! प्राणेश्वर! प्राणप्रिय!' आदि सम्बोधनोंसे पुकारता है। भगवान्का वियोग न सहनेसे उसके प्राण भी छूट सकते हैं। कारण कि मनुष्य जिस वस्तुको प्राणोंसे भी बढ़कर मान लेता है, उसके लिये यदि प्राणोंका त्याग करना पड़े तो वह सहर्ष प्राणोंका त्याग कर देता है; जैसे—पतिव्रता स्त्री पतिको प्राणोंसे भी बढ़कर (प्राणनाथ) मानती है, तो उसका प्राण, शरीर,
वस्तु, व्यक्ति आदिमें मोह नहीं रहता। इसीलिये पतिके मरनेपर वह उसके वियोगमें प्रसन्नतापूर्वक सती हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि जब केवल भगवान्में अनन्य प्रेम हो जाता है, तो फिर प्राणोंका मोह नहीं रहता। प्राणोंका मोह न रहनेसे आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है और दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है। इसी बातका संकेत गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने इस प्रकार किया है—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस ७। ४१। ३)
सम्बन्ध—अबतक एक परमात्माका ही उद्देश्य रखनेवालोंकी दैवी-सम्पत्ति बतायी; परन्तु सांसारिक भोग भोगना और संग्रह करना ही जिनका उद्देश्य है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंकी कौन-सी सम्पत्ति होती है—इसे अब आगेके श्लोकमें बताते हैं।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | क्रोधः | = क्रोध करना | एव | = भी—(ये सभी) |
|---|---|---|---|---|---|
| दम्भः | = दम्भ करना, | च | = तथा | आसुरीम् | = आसुरी |
| दर्पः | = घमण्ड करना | पारुष्यम् | = कठोरता रखना | सम्पदम् | = सम्पदाको |
| च | = और | च | = और | अभिजातस्य | = प्राप्त हुए मनुष्यके |
| अभिमानः | = अभिमान करना, | अज्ञानम् | = अविवेकका होना | (लक्षण) हैं। |
व्याख्या—'दम्भः'—मान, बड़ाई, पूजा, ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये, अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम 'दम्भ' है। यह दम्भ दो प्रकारसे होता है—
(१) सद्गुण-सदाचारोंको लेकर—अपनेको धर्मात्मा, साधक, विद्वान्, गुणवान् आदि प्रकट करना अर्थात् अपनेमें वैसा आचरण न होनेपर भी अपनेमें श्रेष्ठ गुणोंको लेकर वैसा आचरण दिखाना, थोड़ा होनेपर भी ज्यादा दिखाना, भोगी होनेपर भी अपनेको योगी दिखाना आदि दिखावटी भावों और क्रियाओंका होना—यह सद्गुण-सदाचारोंको लेकर 'दम्भ' है।
(२) दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर—जिसका आचरण, खान-पान स्वाभाविक अशुद्ध नहीं है, ऐसा व्यक्ति भी जिनके आचरण, खान-पान अशुद्ध हैं—ऐसे दुर्गुण-दुराचारी लोगोंमें जाकर उनको राजी करके अपनी इज्जत जमानेके लिये, मान-आदर आदि प्राप्त करनेके लिये, अपने मनमें बुरा लगनेपर भी वैसा आचरण, खान-पान
कर बैठता है—यह दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर 'दम्भ' है। तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य प्राण, शरीर, धन, सम्पत्ति, आदर, महिमा आदिको प्रधानता देने लगता है, तब उसमें दम्भ आ जाता है।
'दर्पः'—घमण्डका नाम 'दर्प' है। धन-वैभव, जमीन-जायदाद, मकान-परिवार आदि ममतावाली चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़प्पनका अनुभव होता है, वह 'दर्प' है। जैसे—मेरे पास इतना धन है; मेरा इतना बड़ा परिवार है; मेरा इतना राज्य है; मेरे पास इतनी जमीन-जायदाद है; मेरे पीछे इतने आदमी हैं; मेरी आवाजके पीछे इतने आदमी बोलते हैं; मेरे पक्षमें बहुत आदमी हैं; धन-सम्पत्ति-वैभवमें मेरी बराबरी कौन कर सकता है? मेरे पास ऐसे-ऐसे पद हैं, अधिकार हैं; संसारमें मेरा कितना यश, प्रतिष्ठा हो रही है! मेरे बहुत अनुयायी हैं; मेरा सम्प्रदाय कितना ऊँचा है! मेरे गुरुजी कितने प्रभावशाली हैं! आदि-आदि।
'अभिमानः'—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर अपनेमें जो
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
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बड़पनका अनुभव होता है, उसका नाम 'अभिमान' है। जैसे—मैं जाति-पाँतमें कुलीन हूँ; मैं वर्ण-आश्रममें ऊँचा हूँ; हमारी जातिमें हमारी प्रधानता है; गाँवभरमें हमारी बात चलती है अर्थात् हम जो कह दूँगे, उसको सभी मानेंगे; हम जिसको सहरा देंगे, उस आदमीसे विरुद्ध चलनेमें सभी लोग भयभीत होंगे और हम जिसके विरोधी होंगे, उसका साथ देनेमें भी सभी लोग भयभीत होंगे; राजदरबारमें भी हमारा आदर है, इसलिये हम जो कह दूँगे, उसे कोई टालेगा नहीं; हम न्याय-अन्याय जो कुछ भी करेंगे, उसको कोई टाल नहीं सकता, उसका कोई विरोध नहीं कर सकता; मैं बड़ा विद्वान् हूँ, मैं अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंको जानता हूँ, इसलिये सारे संसारको उथल-पुथल कर सकता हूँ, आदि-आदि।
‘क्रोधः’ —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है।
मनुष्यके स्वभावके विपरीत कोई काम करता है तो उसका अनिष्ट करनेके लिये अन्तःकरणमें उत्तेजना होकर जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह क्रोध है। क्रोध और शोभमें अन्तर है। बच्चा उद्दण्डता करता है, कहना नहीं मानता, तो माता-पिता उत्तेजनामें आकर उसको ताड़ना करते हैं—यह उनका ‘शोभ’ (हृदयकी हलचल) है, क्रोध नहीं। कारण कि उनमें बच्चेका अनिष्ट करनेकी भावना होती ही नहीं, प्रत्युत बच्चेके हितकी भावना होती है। परंतु यदि उत्तेजनामें आकर दूसरेका अनिष्ट, अहित करके उसे दुःख देनेमें सुखका अनुभव होता है, तो यह ‘क्रोध’ है। आसुरी प्रकृतिवालोंमें यही क्रोध होता है।
क्रोधके वशीभूत होकर मनुष्य न करनेयोग्य काम भी कर बैठता है, जिसके फलस्वरूप स्वयं उसको पश्चाताप करना पड़ता है। क्रोधी व्यक्ति उत्तेजनामें आकर दूसरोंका अपकार तो करता है, पर क्रोधसे स्वयं उसका अपकार कम नहीं होता; क्योंकि अपना अनिष्ट किये बिना क्रोधी व्यक्ति दूसरेका अनिष्ट कर ही नहीं सकता। इसमें भी एक मर्मकी
बात है कि क्रोधी व्यक्ति जिसका अनिष्ट करता है, उसका किन्हीं दुष्कर्मोंका जो फल भोगरूपसे आनेवाला है, वही होता है अर्थात् उसका कोई नया अनिष्ट नहीं हो सकता; परंतु क्रोधी व्यक्तिका दूसरेका अनिष्ट करनेकी भावनासे और अनिष्ट करनेसे नया पाप-संग्रह हो जायगा तथा उसका स्वभाव भी बिगड़ जायगा। यह स्वभाव उसे नरकोंमें ले जानेका हेतु बन जायगा और वह जिस योनिमें जायगा, वही उसे दुःख देगा।
क्रोध स्वयंको ही जलाता है। क्रोधी व्यक्तिकी संसारमें अच्छी ख्याति नहीं होती, प्रत्युत निन्दा ही होती है। खास अपने घरके आदमी भी क्रोधसे डरते हैं। इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्रोधको नरकोंका दरवाजा बताया है। जब मनुष्यके स्वार्थ और अभिमानमें बाधा पड़ती है, तब क्रोध पैदा होता है। फिर क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिविश्रम, स्मृतिविश्रमसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे मनुष्यका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।
‘पारुष्यम्’ —कठोरताका नाम ‘पारुष्य’ है। यह कई प्रकारका होता है; जैसे—शरीरसे अकड़कर चलना, टेढ़े चलना—यह शारीरिक पारुष्य है। नेत्रोंसे टेढ़ा-टेढ़ा देखना—यह नेत्रोंका पारुष्य है। वाणीसे कठोर बोलना, जिससे दूसरे भयभीत हो जायें—यह वाणीका पारुष्य है। दूसरोंपर आफत, संकट, दुःख आनेपर भी उनकी सहायता न करके राजी होना आदि जो कठोर भाव होते हैं, यह हृदयका पारुष्य है।
जो शरीर और प्राणोंके साथ एक हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंको यदि दूसरोंकी क्रिया, वाणी बुरी लगती है, तो उसके बदलेमें वे उनको कठोर वचन सुनाते हैं, दुःख देते हैं और स्वयं राजी होकर कहते हैं कि ‘आपने देखा कि नहीं? मैंने उसके साथ ऐसा कड़ा व्यवहार किया कि उसके दाँत खुट्टे कर दिये! अब वह मेरे साथ बोल सकता है क्या?’ यह सब व्यवहारका पारुष्य है।
स्वार्थबुद्धिकी अधिकता रहनेके कारण मनुष्य अपना
१-जहाँ अभिमान और दर्प—दोनोंमेंसे कोई एक आता है, वहाँ अभिमानके ही अन्तर्गत दर्प और दर्पके ही अन्तर्गत अभिमान आ जाता है। परन्तु जहाँ ये दोनों एक साथ स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ दोनोंमें थोड़ा अन्तर हो जाता है। ‘ममता’ की चीजोंको लेकर ‘दर्प’ और ‘अहंता’ की चीजोंको लेकर ‘अभिमान’ कहा जाता है अर्थात् बाहरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘दर्प’ है और विद्या, बुद्धि आदि भीतरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘अभिमान’ है।
२-क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां देहस्थितो देहविनाशनाय। यथास्थितः काष्ठगोते हि वहिनः स एव वहिन्दर्हते शरीरम्॥ ‘क्रोध ही मनुष्यका प्रथम शत्रु है, जो देहमें स्थित होकर देहका ही विनाश करता है। जैसे लकड़ीमें स्थित अग्नि लकड़ीको ही जलाती है, ऐसे ही देहमें स्थित क्रोधरूपी अग्नि देहको ही जलाती है।’
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
मतलब सिद्ध करनेके लिये, अपनी क्रियाओंसे दूसरोंको कष्ट होगा, उनपर कोई आफत आयेगी—इन बातोंपर विचार ही नहीं कर सकता। हृदयमें कठोर भाव होनेसे वह केवल अपना मतलब देखता है और उसके मन, वाणी, शरीर, बर्ताव आदि सब जगह कठोरता रहती है। स्वार्थभावकी बहुत ज्यादा वृत्ति बढ़ती है, तो वह हिंसा आदि भी कर बैठता है, जिससे उसके स्वभावमें स्वाभाविक ही क्रूरता आ जाती है। क्रूरता आनेपर हृदयमें सौम्यता बिलकुल नहीं रहती। सौम्यता न रहनेसे उसके बर्तावमें, लेन-देनमें स्वाभाविक ही कठोरता रहती है। इसलिये वह केवल दूसरोंसे रुपये ऐंठने, दूसरोंको दुःख देने आदिमें लगा रहता है। इनके परिणाममें मुझे सुख होगा या दुःख—इसका वह विचार ही नहीं कर सकता।
‘अज्ञानम्’ —यहाँ ‘अज्ञान’ नाम अविवेकका है। अविवेकी पुरुषोंको सत्-असत्, सार-असार, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका बोध नहीं होता। कारण कि उनकी दृष्टि नाशवान् पदार्थोंके भोग और संग्रहपर ही लगी रहती है। इसलिये (परिणामपर दृष्टि न रहनेसे) वे यह सोच ही नहीं सकते कि ये नाशवान् पदार्थ कबतक हमारे साथ रहेंगे और हम कबतक इनके साथ रहेंगे। पशुओंकी तरह केवल प्राणपोषणमें ही लगे रहनेके कारण वे क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है—इन बातोंको नहीं जान सकते और न जानना ही चाहते हैं।
वे तात्कालिक संयोगजन्य सुखको ही सुख मानते हैं और शरीर तथा इन्द्रियोंके प्रतिकूल संयोगको ही दुःख मानते हैं। इसलिये वे उद्योग तो सुखके लिये ही करते हैं, पर परिणाममें उनको पहलेसे भी अधिक दुःख मिलता है। फिर भी उनको चेत नहीं होता कि इसका हमारे लिये नतीजा क्या होगा? वे तो मान-बड़ाई, सुख-आराम, धन-सम्पत्ति आदिके प्रलोभनमें आकर न करनेलायक काम भी करने लग जाते हैं, जिनका नतीजा उनके लिये तथा दुनियाके लिये भी बड़ा अहितकारक होता है।
१-कर्मणिारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च। पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३।१८) राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंसे बँधे हुए पुरुष तो सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये कर्म करते रहते हैं। परन्तु जो पुरुष मायासे तरना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उसके कर्मोंका फल किस प्रकार उलटा होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख दूर होनेके बदले उनका दुःख बढ़ता जाता है!
२-यहाँ ‘आसुरी’ शब्दमें देवताओंका विरोधवाचक ‘नञ्’ समास नहीं है, प्रत्युत ‘असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुरः’ के अनुसार जो मनुष्य केवल इन्द्रियों और प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे हुए हैं अर्थात् जो केवल संयोगजन्य सुखमें ही आसक्त हैं, उन मनुष्योंका वाचक यहाँ ‘असुर’ शब्द है। तात्पर्य यह है कि जिनका उद्देश्य परमात्माको प्राप्त करना नहीं है और जो शरीर धारण करके केवल भोग भोगना चाहते हैं, वे असुर हैं। उन असुरोंकी सम्पत्तिका नाम ‘आसुरी-सम्पत्ति’ है।
‘अभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्’ —हे पार्थ! ये सब आसुरी सम्पत्ति’ को प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। मरणधर्मा शरीरके साथ एकता मानकर ‘मैं कभी मरूँ नहीं; सदा जीता रहूँ और सुख भोगता रहूँ’—ऐसी इच्छावाले मनुष्यके अन्तःकरणमें ये लक्षण होते हैं।
अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कोई भी साधारण प्राणी प्रकृतिके गुणोंके सम्बन्धसे सर्वथा रहित नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध लेकर ही पैदा होता है। प्रकृतिके साथ सम्बन्धका तात्पर्य है—प्रकृतिके कार्य शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध (तादात्म्य) और पदार्थोंमें ममता, आसक्ति तथा कामनाका होना। शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध ही आसुरी-सम्पत्तिका मूलभूत लक्षण है। जिसका प्रकृतिके साथ मुख्यतासे सम्बन्ध है, उसीके लिये यहाँ कहा गया है कि वह आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त हुआ है।
प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जीवका अपना माना हुआ है। अतः वह जब चाहे इस सम्बन्धका त्याग कर सकता है। कारण कि जीव (आत्मा) चेतन तथा निर्विकार है और प्रकृति जड़ तथा प्रतिक्षण परिवर्तनशील है, इसलिये चेतनका जड़से सम्बन्ध वास्तवमें है नहीं, केवल मान रखा है। इस सम्बन्धको छोड़ते ही आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है। इस प्रकार मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्तिको मिटानेकी पूरी योग्यता है। तात्पर्य है कि आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त होते हुए भी वह प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके आसुरी-सम्पत्तिको मिटा सकता है।
प्राणोंमें मनुष्यका ज्यों-ज्यों मोह होता जाता है, त्यों-ही-त्यों आसुरी-सम्पत्ति अधिक बढ़ती जाती है। आसुरी-सम्पत्तिके अत्यधिक बढ़नेपर मनुष्य अपने प्राणोंको रखनेके लिये और सुख भोगनेके लिये दूसरोंका नुकसान भी कर देता है। इतना ही नहीं, दूसरोंकी हत्या कर देनेमें भी वह नहीं हिचकता।
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१०२७
मनुष्य जब अस्थायीको स्थायी मान लेता है, तब आसुरी-सम्पत्तिके दुर्गुण-दुराचारोंके समूह-के-समूह उसमें आ जाते हैं। तात्पर्य है कि असत्का संग होनेसे असत्
आचरण, असत् भाव और दुर्गुण बिना बुलाये तथा बिना उद्योग किये अपने-आप आते हैं, जो मनुष्यको परमात्मासे विमुख करके अधोगतिमें ले जानेवाले हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् दैवी और आसुरी—दोनों प्रकारकी सम्पत्तियोंका फल बताते हैं।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायसुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥
| दैवी | = दैवी | निबन्धाय | = बन्धनके लिये | अभिजातः | = प्राप्त हुए |
|---|---|---|---|---|---|
| सम्पत् | = सम्पत्ति | मता | = मानी गयी है। | असि | = हो, |
| विमोक्षाय | = मुक्तिके लिये | पाण्डव | = हे पाण्डव! | (इसलिये तुम) | |
| (और) | (तुम) | मा, शुचः | = शोक | ||
| आसुरी | = आसुरी | दैवीम् | = दैवी | (चिन्ता) | |
| सम्पत्ति | सम्पदम् | = सम्पत्तिको | मत करो। |
व्याख्या—‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’—मेरेको भगवान्की तरफ ही चलना है—यह भाव साधकमें जितना स्पष्टरूपसे आ जाता है, उतना ही वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है। भगवान्के सम्मुख होनेसे उसमें संसारसे विमुखता आ जाती है। संसारसे विमुखता आ जानेसे आसुरी-सम्पत्तिके जितने दुर्गुण-दुराचार हैं, वे कम होने लगते हैं और दैवी-सम्पत्तिके जितने सदुगुण-सदाचार हैं, वे प्रकट होने लगते हैं। इससे साधककी भगवान्में और भगवान्के नाम, रूप, लीला, गुण, चरित्र आदिमें रुचि हो जाती है।
इसमें विशेषतासे ध्यान देनेकी बात है कि साधकका उद्देश्य जितना दृढ़ होगा, उतना ही उसका परमात्माके साथ जो अनादिकालका सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा और संसारके साथ जो माना हुआ सम्बन्ध है, वह मिट जायगा। मिट क्या जायगा, वह तो प्रतिक्षण मिट ही रहा है! वास्तवमें प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है नहीं। केवल इस जीवने सम्बन्ध मान लिया है। इस माने हुए सम्बन्धकी सद्भावनापर अर्थात् ‘शरीर ही मैं हूँ और शरीर ही मेरा है’—इस सद्भावनापर ही संसार टिका हुआ है। इस सद्भावनाके मिटते ही संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जायगा और दैवी-सम्पत्तिके सम्पूर्ण गुण प्रकट हो जायेंगे, जो कि मुक्तिके हेतु हैं। दैवी-सम्पत्ति केवल अपने लिये ही नहीं है, प्रत्युत मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये है। जैसे गृहस्थमें छोटे,
बड़े, बूढ़े आदि अनेक सदस्य होते हैं, पर सबका पालन-पोषण करनेके लिये गृहस्वामी (घरका मुखिया) स्वयं उद्योग करता है, ऐसे ही संसारमात्रका उद्धार करनेके लिये भगवान्ने मनुष्यको बनाया है। वह मनुष्य और तो क्या, भगवान्की दी हुई विलक्षण शक्तिके द्वारा भगवान्के सम्मुख होकर, भगवान्की सेवा करके उन्हें भी अपने वशमें कर सकता है। ऐसा विचित्र अधिकार उसे दिया है! अतः मनुष्य उस अधिकारके अनुसार यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग आदि जितना साधन-समुदाय है, उसका अनुष्ठान केवल अनन्त ब्रह्माण्डोंके अनन्त जीवोंके कल्याणके लिये ही करे और दृढ़तासे यह संकल्प रखते हुए प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मात्र जीवोंका कल्याण हो, मात्र जीव जीवनमुक्त हो जायें, मात्र जीव आपके अनन्य प्रेमी भक्त बन जायें; पर हे नाथ! यह होगा केवल आपकी कृपासे ही। मैं तो केवल प्रार्थना कर सकता हूँ और वह भी आपकी दी हुई सद्बुद्धिके द्वारा ही!’ ऐसा भाव रखते हुए अपनी कहलानेवाली शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन-सम्पत्ति आदि सभी चीजोंको मात्र दुनियाके कल्याणके लिये भगवान्के अर्पण कर दे*। ऐसा करनेसे अपनी कहलानेवाली चीजोंकी तो संसारके साथ और अपनी भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध एकता प्रकट हो जायगी। इसे भगवान्ने ‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’ पदोंसे कहा है।
- मात्र जीवोंके कल्याणका जो भाव है, वह भाव भी भगवान्की ही दी हुई विभूति (दैवी-सम्पत्ति) है, अपना नहीं है। अपने तो केवल भगवान् ही हैं।
१०२८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
‘निबन्धायासुरी मता’—जो जन्म-मरणको देनेवाली है, वह सब आसुरी-सम्पत्ति है।
जबतक मनुष्यकी अहंताका परिवर्तन नहीं होता, तबतक अच्छे-अच्छे गुण धारण करनेपर वे निरर्थक तो नहीं जाते, पर उनसे उसकी मुक्ति हो जायगी—ऐसी बात नहीं है। तात्पर्य यह है कि जबतक ‘मेरा शरीर बना रहे, मेरेको सुख-आराम मिलता रहे’ इस प्रकारके विचार अहंतामें बैठे रहेंगे, तबतक ऊपरसे भरे हुए दैवी-सम्पत्तिके गुण मुक्तिदायक नहीं होंगे। हाँ, यह बात तो हो सकती है कि वे गुण उसको शुभ फल देनेवाले हो जायेंगे, ऊँचे लोक देनेवाले हो जायेंगे, पर मुक्ति नहीं देंगे।
जैसे बीजको मिट्टीमें मिला देनेपर मिट्टी, जल, हवा, धूप—ये सभी उस बीजको ही पुष्ट करते हैं; आकाश भी उसे अवकाश देता है; बीजसे उसी जातिका वृक्ष पैदा होता है और उस वृक्षमें उसी जातिके फल लगते हैं। ऐसे ही अहंता-(मैं-पन-) में संसारके संस्काररूपी बीज रखते हुए जिस शुभ-कर्मको करेंगे, वह शुभ-कर्म उन बीजोंको ही पुष्ट करेगा और उन बीजोंके अनुसार ही फल देगा। तात्पर्य यह है कि सकाम मनुष्यकी अहंताके भीतर संसारके जो संस्कार पड़े हैं, उन संस्कारोंके अनुसार उसकी सकाम साधनामें अणिमा, गरिमा आदि सिद्धियाँ आयेंगी। उसमें और कुछ विशेषता भी आयेगी, तो वह ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाकर वहाँके ऊँचे-ऊँचे भोग प्राप्त कर सकता है, पर उसकी मुक्ति नहीं होगी (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
अब प्रश्न यह होता है कि मनुष्य मुक्तिके लिये क्या करे? उत्तर यह है कि जैसे बीजको भून दिया जाय या उबाल दिया जाय, तो वह बीज अंकुर नहीं देगा*। उस बीजको बोया जाय तो पृथ्वी उसको अपने साथ मिला लेगी। फिर यह पता ही नहीं चलेगा कि बीज था या नहीं! ऐसे ही मनुष्यका जब दृढ़ निश्चय हो जायगा कि मुझे केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है, तो संसारके सब बीज (संस्कार) अहंतामेंसे नष्ट हो जायेंगे।
शरीर-प्राणोंमें एक प्रकारकी आसक्ति होती है कि मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ, मेरेको मान-बड़ाई मिलती रहे, मैं भोग भोगता रहूँ, आदि। इस प्रकार जो व्यक्तित्वको रखकर चलते हैं, उनमें अच्छे गुण आनेपर भी आसक्तिके कारण उनकी मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि ऊँच-नीच
योनियोंमें जन्म लेनेका कारण प्रकृतिका सम्बन्ध ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि जिसने प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध जोड़ा हुआ है, वह शुभ-कर्म करके ब्रह्मलोकतक भी चला जाय तो भी वह बन्धनमें ही रहेगा।
मार्मिक बात
भगवान्ने इस अध्यायमें आसुरी-सम्पदाके तीन फल बताये हैं, जिनमेंसे इस श्लोकमें ‘निबन्धायासुरी मता’ पदोंसे बन्धनरूप सामान्य फल बताया है। दूसरे अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकोंमें वर्णित और नवें अध्यायके बीसवें-इक्कीसवें श्लोकोंमें वर्णित सकाम उपासक भी इसीमें आ जाते हैं। जिनका उद्देश्य केवल भोग भोगना और संग्रह करना है, ऐसे मनुष्योंकी बहुत शाखाओंवाली अनन्त बुद्धियाँ होती हैं अर्थात् उनकी कामनाओंका कोई अन्त नहीं होता। जो कामनाओंमें तन्मय हैं और कर्मफलके प्रशंसक वेदवाक्योंमें ही प्रीति रखते हैं, वे वैदिक यज्ञादिको विधि-विधानसे करते हैं, पर कामनाओंके कारण उनको जन्म-मरणरूप बन्धन होता है (गीता—दूसरे अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)। ऐसे ही जो यहाँके भोगोंको न चाहकर स्वर्गके दिव्य भोगोंकी कामनासे शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं, वे यज्ञके फलस्वरूप (स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप नष्ट होनेसे) स्वर्गमें जाकर दिव्य भोग भोगते हैं। जब उनके (स्वर्ग देनेवाले) पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब वे वहाँसे लौटकर आवागमनको प्राप्त हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक)।
अब यहाँ शंका यह होती है कि जिस कृष्णमार्ग (गीता—आठवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)—से उपर्युक्त सकाम पुरुष जाते हैं, उसी मार्गसे योगभ्रष्ट पुरुष (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक) भी जाते हैं; अतः दोनोंका मार्ग एक होनेसे और दोनों पुनरावर्ती होनेसे सकाम पुरुषोंके समान योगभ्रष्ट पुरुषोंको भी ‘निबन्धायासुरी मता’ वाला बन्धन होना चाहिये। इसका समाधान यह है कि योगभ्रष्टोंको यह बन्धन नहीं होता। कारण कि पूर्व-(मनुष्यजन्ममें की हुई) साधनामें उनका उद्देश्य अपने कल्याणका रहा है और अन्त समयमें वासना, बेहोशी, पीड़ा आदिके कारण उनको विघ्नरूपसे स्वर्गादिमें जाना पड़ता है। अतः इन योगभ्रष्टोंके इस मार्गसे जानेके
- भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (श्रीमद्भा० १०। २२। २६)
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१०२९
कारण ही (गीता—आठवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें) सकाम पुरुषोंके लिये भी 'योगी' पद आया है, अन्यथा सकाम पुरुष योगी कहे ही नहीं जा सकते।
आसुरी-सम्पत्तिका दूसरा फल है—'पतन्ति नरकेऽशुचौ' (गीता १६।१६)। जो कामनाके वशीभूत होकर पाप, अन्याय, दुराचार आदि करते हैं, उनको फलस्वरूप स्थानविशेष नरकोंकी प्राप्ति होती है।
आसुरी-सम्पत्तिका तीसरा फल है—'आसुरीष्वेव योनिषु', 'ततो यान्यधर्मा गतिम्' (गीता १६।१९-२०)। जिनके भीतर दुर्गुण-दुर्भाव रहते हैं और कभी-कभी उनसे प्रेरित होकर वे दुराचार भी कर बैठते हैं, उनको दुर्गुण-दुर्भावके अनुसार पहले तो आसुरी योनिकी प्राप्ति और फिर दुराचारके अनुसार अधम गति-(नरकों-) की प्राप्ति बतायी गयी है।
'मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव'—केवल अविनाशी परमात्माको चाहनेवालेकी दैवी-सम्पत्ति होती है, जिससे मुक्ति होती है और विनाशी संसारके भोग तथा संग्रहको चाहनेवालेकी आसुरी-सम्पत्ति होती है, जिससे बन्धन होता है—इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें कहीं यह शंका पैदा न हो जाय कि मुझे तो अपनेमें दैवी-सम्पत्ति दीखती ही नहीं! इसलिये भगवान् कहते हैं कि 'भैया अर्जुन! तुम दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुए हो; अतः शोक-संदेह मत करो।'
दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हो जानेपर साधकके द्वारा कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोगका साधन स्वाभाविक ही होता है। कर्तव्य-पालनसे कर्मयोगीके और ज्ञानगिनसे ज्ञानयोगीके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ और सैंतीसवाँ श्लोक); परंतु भक्तियोगीके सभी पाप भगवान् नष्ट करते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक) और संसारसे उसका उद्धार करते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।
'मा शुचः'—*—तीसरे श्लोकमें 'भारत', चौथे श्लोकमें 'पार्थ' और इस पाँचवें श्लोकमें 'पाण्डव'—इन तीन सम्बोधनोंका प्रयोग करके भगवान् अर्जुनको उत्साह दिलाते हैं कि 'भारत! तुम्हारा वंश बड़ा श्रेष्ठ है; पार्थ! तुम उस माता-(पृथा-) के पुत्र हो, जो वैरभाव रखनेवालोंकी भी सेवा करनेवाली है; पाण्डव! तुम बड़े धर्मात्मा और श्रेष्ठ पिता-(पाण्डु-) के पुत्र हो'। तात्पर्य
है कि वंश, माता और पिता—इन तीनों ही दृष्टियोंसे तुम श्रेष्ठ हो; अतः तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति भी स्वाभाविक है। इसलिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
गीतामें दो बार 'मा शुचः' पद आये हैं—एक यहाँ और दूसरा अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें। इन पदोंका दो बार प्रयोग करके भगवान् अर्जुनको समझाते हैं कि तुझे साधन और सिद्धि—दोनोंके ही विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। साधनके विषयमें यहाँ यह आश्वासन दिया कि तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुआ है और सिद्धिके विषय (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)—में यह आश्वासन दिया कि मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तात्पर्य यह है कि साधकको अपने साधनमें जो कमियाँ दीखती हैं, उनको तो वह दूर करता रहता है, पर कमियोंके कारण उसके अन्तःकरणमें नम्रताके साथ एक निराशा-सी रहती है कि मेरेमें अच्छे गुण कहाँ हैं, जिससे साध्यकी प्राप्ति हो! साधककी इस निराशाको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको साधकमात्रका प्रतिनिधि बनाकर उसे यह आश्वासन देते हैं कि तुम साधन और साध्यके विषयमें चिन्ता-शोक मत करो, निराश मत होओ।
दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुषोंका यह स्वभाव होता है कि उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल कोई भी परिस्थिति, घटना आये, उनकी दृष्टि हमेशा अपने कल्याणकी तरफ ही रहती है। युद्धके मौकेपर जब भगवान् अर्जुनका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा किया, तब उन सेनाओंमें खड़े अपने कुटुम्बियोंको देखकर अर्जुनमें कौटुम्बिक स्नेहरूपी मोह पैदा हो गया और वे करुणा तथा शोकसे व्याकुल होकर युद्धरूप कर्तव्यसे हटने लगे। उन्हें विचार हुआ कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे मुझे पाप ही लगेगा, जिससे मेरे कल्याणमें बाधा लगेगी। इन्हें मारनेसे हमें नाशवान् राज्य और सुखकी प्राप्ति तो हो जायगी, पर उससे श्रेय-(कल्याण-) की प्राप्ति रुक जायगी। इस प्रकार अर्जुनमें कुटुम्बका मोह और पाप-(अन्याय, अधर्म-) का भय—दोनों एक साथ आ जाते हैं। उनमें जो कुटुम्बका मोह है, वह आसुरी-सम्पत्ति है और पापके कारण अपने कल्याणमें बाधा लग जानेका जो भय है, वह दैवी-सम्पत्ति है।
इसमें भी एक खास बात है। अर्जुन कहते हैं कि हमने जो युद्ध करनेका निश्चय कर लिया है, यह भी एक महान् पाप है—'अहो बत महत्यापं कर्तुं व्यवसिता वयम्'
- यहाँ 'मा शुचः' क्रिया दिवादिगणकी 'शुचिर् पूतीभावै' धातुके लुङ् लकारका रूप है।
१०३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
(१।४५)। वे युद्ध-क्षेत्रमें भी भगवान्से बार-बार अपने कल्याणकी बात पूछते हैं—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं बृहि तन्मे’ (२।७); ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमानुयायम्’ (३।२); ‘यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे बृहि सुनिश्चितम्’ (५।१)। यह उनमें दैवी-सम्पत्ति होनेके कारण ही है। इसके विपरीत जिनमें आसुरी-सम्पत्ति है, ऐसे दुर्गंधन आदिमें राज्य और धनका इतना लोभ है कि वे कुटुम्बके नाशसे होनेवाले पापकी तरफ देखते ही नहीं (पहले अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अर्जुनमें दैवी-सम्पत्ति आरम्भसे ही थी। मोहरूप आसुरी-सम्पत्ति तो उनमें आगन्तुक रूपसे आयी थी, जो आगे चलकर भगवान्की कृपासे नष्ट हो गयी—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रासादामयाच्युत’ (१८।७३)। इसलिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि ‘भैया अर्जुन! तू चिन्ता मत कर; क्योंकि तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है।’
अर्जुनको अपनेमें दैवी-सम्पत्ति नहीं दीखती, इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति प्रकट है। कारण कि जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको अपनेमें अच्छे गुण नहीं दीखते और अवगुण उनमें रहते नहीं। अपनेमें गुण न दीखनेका कारण यह है कि उनकी गुणोंके साथ अभिन्नता होती है। जैसे आँखमें लगा हुआ अंजन आँखको नहीं दीखता; क्योंकि वह आँखके साथ एक हो जाता है, ऐसे ही दैवी-सम्पत्तिके साथ अभिन्नता होनेपर गुण नहीं दीखते। जबतक अपनेमें गुण दीखते हैं, तबतक गुणोंके साथ एकता नहीं हुई है। गुण तभी दीखते हैं, जब वे अपनेसे कुछ दूर होते हैं। अतः भगवान् अर्जुनको आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वाभाविक है, भले ही वह तुम्हें न दीखे; इसलिये तुम चिन्ता मत करो।
मार्मिक बात
भगवान्ने कृपा करके मानवशरीर दिया है, तो उसकी सफलताके लिये अपने भावों और आचरणोंका विशेष ध्यान रखना चाहिये। कारण कि शरीरका कुछ पता नहीं कि कब प्राण चले जायें। ऐसी अवस्थामें जल्दी-से-जल्दी अपना उद्धार करनेके लिये दैवी-सम्पत्तिका आश्रय और
आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है।
दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द परमात्माका वाचक है और उनकी सम्पत्ति ‘दैवी-सम्पत्ति’ कहलाती है—‘देवस्येयं दैवी’। परमात्माका ही अंश होनेसे जीवमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक है। जब जीव अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर जड़ प्रकृतिके सम्मुख हो जाता है अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील शरीरादि पदार्थोंका संग (तादात्म्य) कर लेता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है। कारण कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, द्वेष आदि जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे सब-के-सब नाशवान्के संगसे ही पैदा होते हैं। जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंका वाचक ‘असुर’ शब्द है—‘असुरा प्राणेषु रमन्ते इति असुराः’। इसलिये ‘मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ’—यह इच्छा आसुरी-सम्पत्तिका खास लक्षण है।
दैवी और आसुरी-सम्पत्ति सब प्राणियोंमें पायी जाती है (गीता—सोलहवें अध्यायका छठा श्लोक)। ऐसा कोई भी साधारण प्राणी नहीं है, जिसमें ये दोनों सम्पत्तियाँ न पायी जाती हों। हाँ, इसमें जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तो आसुरी-सम्पत्तिसे सर्वथा रहित हो जाते हैं*, पर दैवी-सम्पत्तिसे रहित कभी कोई हो ही नहीं सकता। कारण कि जीव ‘देव’ अर्थात् परमात्माका सनातन अंश है। परमात्माका अंश होनेसे इसमें दैवी-सम्पत्ति रहती ही है। आसुरी-सम्पत्तिकी मुख्यता होनेसे दैवी-सम्पत्ति दब-सी जाती है, मिटती नहीं; क्योंकि सत्-वस्तु कभी मिट नहीं सकती। इसलिये कोई भी मनुष्य सर्वथा दुर्गुणी-दुराचारी नहीं हो सकता, सर्वथा निर्दयी नहीं हो सकता, सर्वथा असत्यवादी नहीं हो सकता, सर्वथा व्यभिचारी नहीं हो सकता। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे किसी भी व्यक्तिमें सर्वथा हो ही नहीं सकते। कोई भी, कभी भी, कितना ही दुर्गुणी-दुराचारी क्यों न हो, उसके साथ आंशिक सदगुण-सदाचार रहेंगे ही। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होनेपर आसुरी-सम्पत्ति मिट जाती है; क्योंकि दैवी-सम्पत्ति परमात्माकी होनेसे अविनाशी है और आसुरी-सम्पत्ति संसारकी होनेसे नाशवान् है।
- जीवनमुक्त महापुरुष नाशवान्से असंग होकर अविनाशी परमात्मामें स्थित हो जाते हैं। इसलिये उनमें जीनेकी आशा और मरनेका भय नहीं रहता। सत्स्वरूप परमात्मामें स्थित होनेसे उनमें सदगुण-सदाचार स्वतः-स्वाभाविक रहते हैं। वे सिद्ध महापुरुष तो दैवी-सम्पत्तिसे ऊपर उठे रहते हैं। अतः उनमें दैवी-सम्पत्तिके गुण स्वाभाविक होते हैं, जो साधकोंके लिये आदर्श होते हैं।
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३१
सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माका अंश होनेसे 'मैं सदा जीता रहूँ अर्थात् कभी मरूँ नहीं; मैं सब कुछ जान लूँ अर्थात् कभी अज्ञानी न रहूँ; मैं सर्वदा सुखी रहूँ अर्थात् कभी दुःखी न होऊँ'—इस तरह सत्-चित्-आनन्दकी इच्छा प्राणिमात्रमें रहती है। पर उससे गलती यह होती है कि 'मैं रहूँ तो शरीरसहित रहूँ; मैं जानकार बर्नूँ तो बुद्धिको लेकर जानकार बर्नूँ; मैं सुख लूँ तो इन्द्रियों और शरीरको लेकर सुख लूँ'—इस तरह इन इच्छाओंको नाशवान् संसारसे ही पूरी करना चाहता है। इस प्रकार प्राणोंका मोह होनेसे आसुरी-सम्पत्ति रहती ही है*। इसमें एक मार्मिक बात है कि प्राणीमें नित्य-निरन्तर रहनेकी इच्छा होती है, तो यह नित्य-निरन्तर रह सकता है और मैं मरूँ नहीं, यह इच्छा होती है, तो यह मरता नहीं। जीता रहना अच्छा लगता है, तो जीते रहना इसका स्वाभाविक है और मरनेसे भय लगता है, तो मरना इसका स्वाभाविक नहीं है। ऐसे ही अज्ञान बुरा लगता है, तो अज्ञान इसका साथी नहीं है। दुःख बुरा लगता है, तो दुःख इसका साथी नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि इसका स्वरूप 'सत्' है। 'असत्' इसका स्वरूप नहीं है। सत्-स्वरूप होकर भी यह असत्को क्यों चाहता है? कारण कि इसने नष्ट होनेवाले असत् शरीरादिको 'मैं' तथा 'मेरा' मान लिया है और उनमें आसक्त हो गया है। तात्पर्य यह कि असत्को स्वीकार करनेसे स्वयं सत् होते हुए भी सत्की इच्छा होती है; जड़ताको स्वीकार करनेसे स्वयं ज्ञानस्वरूप होते हुए भी ज्ञानकी इच्छा होती है; दुःखरूप संसारको स्वीकार करनेसे स्वयं सुखस्वरूप होते हुए भी सुखकी इच्छा होती है। पर उसकी पूर्ति भी असत्-जड़-दुःखरूप संसारके द्वारा ही करना चाहता है। तादात्म्यके कारण यह शरीरको ही रखना चाहता है, बुद्धिसे ही ज्ञानी बनना चाहता है, शरीरसे ही श्रेष्ठ और सुखी बनना चाहता है, अपने नाम और रूपको ही स्थायी रखना चाहता है। अपने नामको तो मरनेके बाद भी स्थायी रखना चाहता है, इस प्रकार असत्के संगसे आसुरी-सम्पत्ति आती है। ऐसे ही असत्के संगका त्याग करनेसे आसुरी-सम्पत्ति नष्ट हो जाती है और दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है।
जब सत्संग, स्वाध्याय आदिके द्वारा मनुष्यमें परमात्मप्राप्ति
- देहाभिमानमें 'मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ' इस प्रकार प्राणोंका मोह रहता है। इसलिये देहाभिमानसे आसुरी-सम्पत्ति पैदा होती है। अतः गीतामें 'देहबद्धः' (१२।५), 'देहिन्मत्' (३।४०; १४।५,७) आदि पदोंसे जिन देहाभिमानियोंकी बात आयी है, उन्हें आसुरी-सम्पत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये।
करनेका विचार होता है, तब वह इसके लिये दैवी-सम्पत्तिको धारण करना चाहता है। दैवी-सम्पत्तिको वह कर्तव्यरूपसे उपाजित करता है कि मुझे सत्य बोलना है, मुझे अहिंसक बनना है, मुझे दयालु बनना है, आदि-आदि। इस प्रकार जितने भी दैवी-सम्पत्तिके गुण हैं, उन गुणोंको वह अपने बलसे उपाजित करना चाहता है। यह सिद्धान्त है कि कर्तव्यरूपसे प्राप्त की हुई और अपने बल-(पुरुषार्थ- ) से उपाजित की हुई चीज स्वाभाविक नहीं होती, प्रत्युत कृत्रिम होती है। इसके अलावा अपने पुरुषार्थसे उपाजित माननेके कारण अभिमान आता है कि मैं बड़ा सत्यभाषी हूँ, मैं बड़ा अच्छा आदमी हूँ, आदि। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, सब-के-सब अभिमानकी छायामें रहते हैं और अभिमानसे ही पुष्ट होते हैं। इसलिये अपने उद्योगसे किया हुआ जितना भी साधन होता है, उस साधनमें अहंकार ज्यों-का-त्यों रहता है और अहंकारमें आसुरी-सम्पत्ति रहती है। अतः जबतक वह दैवी-सम्पत्तिके लिये उद्योग करता रहता है, तबतक आसुरी-सम्पत्ति छूटती नहीं। अन्तमें वह हार मान लेता है अथवा उसका उत्साह कम हो जाता है, उसका प्रयत्न मंद हो जाता है और मान लेता है कि यह मेरे वशकी बात नहीं है। साधककी ऐसी दशा क्यों होती है? कारण कि उसने अभीतक यह जाना नहीं कि आसुरी-सम्पत्ति मेरेमें कैसे आयी? आसुरी-सम्पत्तिका कारण है—नाशवान्का संग। इसका संग जबतक रहेगा, तबतक आसुरी-सम्पत्ति रहेगी ही। वह नाशवान्के संगको नहीं छोड़ता, तो आसुरी-सम्पत्ति उसे नहीं छोड़ती अर्थात् 'आसुरी-सम्पत्ति' से वह सर्वथा रहित नहीं हो सकता। इसलिये यदि वह दैवी-सम्पत्तिको लाना चाहे, तो नाशवान् जड़के संगका त्याग कर दे। नाशवान्के संगका त्याग करनेपर दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होगी; क्योंकि परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी सम्पत्ति उसमें स्वतःसिद्ध है, कर्तव्यरूपसे उपाजित नहीं करनी है।
इसमें एक और मार्मिक बात है। दैवी-सम्पत्तिके गुण स्वतः-स्वाभाविक रहते हैं। इन्हें कोई छोड़ नहीं सकता। इसका पता कैसे लगे? जैसे कोई विचार करे कि मैं सत्य ही बोलूँगा तो वह उग्रभर सत्य बोल सकता है। परन्तु कोई विचार करे कि मैं झूठ ही बोलूँगा, तो वह आठ पहर
१०३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
भी झूठ नहीं बोल सकता। सत्य ही बोलनेका विचार होनेपर वह दुःख भोग सकता है, पर झूठ बोलनेके लिये बाध्य नहीं हो सकता। परन्तु झूठ ही बोलूँगा—ऐसा विचार होनेपर तो खाना-पीना, बोलना-चलनातक उसके लिये मुश्किल हो जायगा। भूख लगी हो और झूठ बोले कि भूख नहीं है, तो जीना मुश्किल हो जायगा। यदि वह ऐसी प्रतिज्ञा कर ले कि झूठ बोलनेसे बेशक मर जाऊँ, पर झूठ ही बोलूँगा, तो यह प्रतिज्ञा सत्य हो जायगी। अतः या तो प्रतिज्ञा भंग होनेसे सत्य आ जायगा या प्रतिज्ञा सत्य हो जायगी। सत्य कभी छूटेगा नहीं; क्योंकि सत्य मनुष्यमात्रमें स्वाभाविक है। इस तरह दैवी-सम्पत्तिके जितने भी गुण हैं, सबके विषयमें ऐसी ही बात है। वे तो नित्य रहनेवाले और स्वाभाविक हैं। केवल नाशवान्के संगका त्याग करना है। नाशवान्का संग अनित्य और अस्वाभाविक है।
आसुरी-सम्पत्ति आगन्तुक है। दुर्गुण-दुराचार बिलकुल ही आगन्तुक हैं। कोई आदमी प्रसन्न रहता है, तो लोग ऐसा नहीं कहते कि तुम प्रसन्न क्यों रहते हो? पर कोई आदमी दुःखी रहता है, तब कहते हैं कि दुःखी क्यों रहते हो? क्योंकि प्रसन्नता स्वाभाविक है और दुःख अस्वाभाविक (आगन्तुक) है। इसलिये अच्छे आचरण करनेवालेको कोई नहीं कहता कि तुम अच्छे आचरण क्यों करते हो? पर बुरे आचरणवालेको सब कहते हैं कि तुम बुरे आचरण क्यों करते हो? अतः सदुर्गुण-सदाचार स्वतः रहते हैं और दुर्गुण-दुराचार संगसे आते हैं, इसलिये आगन्तुक हैं।
अर्जुनमें दैवी-सम्पत्ति विशेषतासे थी। जब उनमें कायरता आ गयी, तब भगवान्ने आश्चर्यसे कहा कि तेरेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी (दूसरे अध्यायका दूसरा-तीसरा श्लोक)? तात्पर्य यह है कि अर्जुनमें यह दोष स्वाभाविक नहीं, आगन्तुक है। पहले उनमें यह दोष था नहीं। अर्जुन आगे कहते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो, ऐसी बात कहिये (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरेका दूसरा और पाँचवेंका पहला श्लोक)। युद्धके प्रसंगमें भी अर्जुनमें 'मेरा कल्याण हो जाय' यह इच्छा है। तो इससे प्रतीत होता है कि अर्जुनके स्वभावमें पहलेसे ही दैवी-सम्पत्ति थी, नहीं तो उर्वशी-जैसी अप्सराको एकदम दुकरा देना कोई मामूली आदमीकी बात नहीं थी। वे अर्जुन विचार करते हैं कि मेरेको दैवी-सम्पत्ति प्राप्त है कि नहीं? मैं उसका अधिकारी हूँ कि नहीं? अतः उसे आश्वासन देते हुए भगवान् कहते हैं कि तू शोक मत कर;
तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है—'मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव' (१६।५)।
सत् (चेतन) और असत्-(जड-) के तादात्म्यसे 'अहम्'-भाव पैदा होता है। मनुष्य शुभ या अशुभ, कोई भी काम करता है, तो अपने अहंकारको लेकर करता है। जब वह परमात्माकी तरफ चलता है, तब उसके अहंभावमें सत्-अंशकी मुख्यता होती है और जब संसारकी तरफ चलता है, तब उसके अहंभावमें नाशवान् असत्-अंशकी मुख्यता होती है। सत्-अंशकी मुख्यता होनेसे वह दैवी-सम्पत्तिका अधिकारी कहा जाता है और असत्-अंशकी मुख्यता होनेसे वह उसका अनधिकारी कहा जाता है। असत्-अंशको मिटानेके लिये ही मानवशरीर मिला है। अतः मनुष्य निर्बल नहीं है, पराधीन नहीं है, प्रत्युत यह सर्वथा सबल है, स्वाधीन है। नाशवान्, असत्-अंश तो सबका मिटता ही रहता है, पर वह उससे अपना सम्बन्ध बनाये रखता है। यह भूल होती है। नाशवान्से सम्बन्ध बनाये रखनेके कारण आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा अभाव नहीं होता।
अहंभाव नाशवान्, असत्के सम्बन्धसे ही होता है। असत्का सम्बन्ध मिटते ही अहंभाव मिट जाता है। प्रकृतिके अंशको पकड़नेसे ही अहंभाव है। अहम्में जड-चेतन दोनों हैं। तादात्म्य होनेसे पुरुष-(चेतन-) ने जडके साथ अपनेको एक मान लिया। भोगपदार्थोंकी सब इच्छाएँ असत्-अंशमें ही रहती हैं। परन्तु सुख-दुःखके भोक्तानपनमें पुरुष हेतु बनता है—'पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरच्यते' (१३।२०)। वास्तवमें हेतु है नहीं; क्योंकि वह प्रकृतिस्थ होनेसे ही भोक्ता बनता है—'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते' (१३।२१)। अतः सुख-दुःखरूप जो विकार होता है, वह मुख्यतासे जड-अंशमें ही होता है। परन्तु तादात्म्य होनेसे उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है कि मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ। जैसे विवाह होनेपर स्त्रीकी जो आवश्यकता होती है, वह अपनी आवश्यकता कहलाती है। पुरुष जो गहने आदि खरीदता है, वह स्त्रीके सम्बन्धसे ही (स्त्रीके लिये) खरीदता है, नहीं तो उसे अपने लिये गहने आदिकी आवश्यकता नहीं है। ऐसे ही जड-अंशके सम्बन्धसे ही चेतनमें जडकी इच्छा और जडका भोग होता है। जडका भोग जड-अंशमें ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेसे भोगका परिणाम केवल जडमें नहीं हो सकता अर्थात्
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३३
सुख-दुःखका भोक्ता केवल जड-अंश नहीं बन सकता। परिणामका ज्ञाता चेतन ही भोक्ता बनता है। जितनी क्रियाएँ होती हैं, सब प्रकृतिमें होती हैं (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), पर तादात्म्यके कारण चेतन उन्हें अपनेमें मान लेता है कि मैं कर्ता हूँ। तादात्म्यमें चेतन (परमात्मा)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और जड-(संसार- ) की इच्छामें जडकी मुख्यता रहती है। जब चेतनकी मुख्यता रहती है, तब दैवी-सम्पत्ति आती है और जब जडकी मुख्यता रहती है, तब आसुरी-सम्पत्ति आती है। जडसे तादात्म्य रहनेपर भी सत्, चित् और आनन्दकी इच्छा चेतनमें ही रहती है। संसारकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है, जो इन तीन (सदा रहना, सब कुछ जानना और सदा सुखी रहना) इच्छाओंमें सम्मिलित न हो। इससे गलती यह होती है कि इन इच्छाओंकी पूर्ति जड-(संसार- ) के द्वारा करना चाहता है।
जडको और आसुरी-सम्पत्तिको स्वयं-(चेतन- ) ने स्वीकार किया है। जडमें यह ताकत नहीं है कि वह स्वयंके साथ स्थिर रह जाय। जडमें तो हरदम परिवर्तन होता रहता है। चेतन उसको न पकड़े, तो वह अपने-आप छूट जायगा। कारण कि चेतनमें कभी विकार नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। पर असत् प्रकृति नित्य-निरन्तर, हरदम बदलती रहती है। वह कभी एकरूप रह ही नहीं सकती। चेतनने प्रकृतिके साथ सम्बन्ध स्वीकार कर लिया। उस सम्बन्धकी सत्ता यह 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे स्वीकार कर लेता है। अतः जडका सम्बन्ध और उससे पैदा होनेवाली आसुरी-सम्पत्ति आगन्तुक है। यदि यह स्वयंमें होती, तो इसका कभी नाश नहीं होता; क्योंकि स्वयंका कभी नाश नहीं होता और आसुरी-सम्पत्तिके त्यागकी बात ही नहीं होती। अनित्य होनेपर भी चेतनके सम्बन्धसे यह नित्य दीखने लगती है। अविनाशीके सम्बन्धसे विनाशी भी अविनाशीकी तरह दीखने लगता है। इसलिये जिस मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्ति होती है, वह आसुरी-सम्पत्तिका त्याग कर सकता है और कल्याणका आचरण करके परमात्माको प्राप्त हो सकता है (सोलहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
परमात्माके सम्मुख होते ही आसुरी-सम्पत्ति मिटने
लगती है—
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस ५। ४४। ११)
कारण कि 'जन्म कोटि अघ' प्रकृतिसे सम्बन्ध स्वीकार करनेसे ही हुए हैं। प्रकृतिको स्वीकार न करें, तो फिर कैसे जन्म-मरण होगा? जन्म-मरणमें कारण प्रकृतिसे सम्बन्ध ही है—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु' (गीता १३। २१)। परन्तु जीवात्मा प्रकृतिकी क्रियाको अपनेमें मान लेता है और प्रकृतिके कार्य शरीरमें मैं-मेरापन कर लेता है, जिससे जन्मता-मरता रहता है। वास्तवमें यह कर्ता भी नहीं है और लिप्त भी नहीं है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (१३। ३१)। इस वास्तविकताका अनुभव करना ही 'कर्ममें अकर्म' तथा 'अकर्ममें कर्म' देखना है। इन दोनों बातोंका अभिप्राय यह है कि कर्म करते हुए भी यह सर्वथा निलिप्त तथा अकर्ता है और निलिप्त तथा अकर्ता रहते हुए ही यह कर्म करता है अर्थात् कर्म करते समय और कर्म न करते समय यह (आत्मा) नित्य-निरन्तर निलिप्त तथा अकर्ता रहता है। इस वास्तविकताका अनुभव करनेवाला ही मनुष्योंमें बुद्धिमान् है (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। जिसमें कर्तापनका भाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लिप्तता नहीं है अर्थात् कोई भी कामना नहीं है, वह यदि सब प्राणियोंको मार दे, तो भी पाप नहीं लगता (अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। अर्जुनने पूछा कि मनुष्य किससे प्रेरित होकर पाप करता है? तो भगवान्ने कहा—कामनासे (तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)। कामनाके कारण ही सब पाप होते हैं। शरीरके तादात्म्यसे भोग और संग्रहकी कामना होती है*। अतः जडका संग (महत्त्व) ही सम्पूर्ण पापोंका—आसुरी-सम्पत्तिका कारण है। जडका संग न हो, तो दैवी-सम्पत्ति स्वतःसिद्ध है।
अर्जुन साधकमात्रके प्रतिनिधि है। इसलिये अर्जुनके निमित्तसे भगवान् साधकमात्रको आश्वासन देते हैं कि चिन्ता मत करो; अपनेमें आसुरी-सम्पत्ति दीख जाय, तो घबराओ मत; क्योंकि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक विद्यमान है—
- कोई भी मनुष्य अपनेको दोषी बनाना पसंद नहीं करता; क्योंकि इस लोकमें दोषीका अपमान, तिरस्कार और निन्दा होती है तथा परलोकमें चौरासी लाख योनियाँ तथा नरक भोगने पड़ते हैं। परन्तु मनुष्य नाशवान् जडके संगसे पैदा हुई कामनाके वशीभूत होकर न करनेलायक शास्त्र-निषिद्ध क्रिया कर बैठता है। अतः उस क्रियाका परिणाम कर्ता ( मनुष्य )-की रुचिके ( मैं निर्दोष रहूँ—इसके ) अनुसार नहीं होता और कर्ता—( अपनी रुचिके विरुद्ध ) दोषी तथा पापी बन जाता है।
१०३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।
(१६।५)
तात्पर्य यह हुआ कि साधकको पारमार्थिक उन्नतिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेसे मनुष्यमात्रमें परमात्माकी सम्पत्ति (दैवी-सम्पत्ति) रहती ही है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है।
परिशिष्ट भाव— जीवके एक ओर भगवान् हैं और एक ओर संसार है। जब वह भगवान्की ओर चलता है, तब उसमें दैवी-सम्पत्ति आती है और जब वह संसारकी ओर चलता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आती है। दैवी-सम्पत्तिमें आस्तिक भाव रहता है और आसुरी-सम्पत्तिमें नास्तिक भाव रहता है। यद्यपि मुक्तिके सभी साधन (कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि) दैवी-सम्पत्तिके अन्तर्गत आ जाते हैं—‘दैवी-सम्पद्भिर्मोक्षाय ’, तथापि दैवी-सम्पत्तिमें मुख्यता भक्तिकी ही है। इसीलिये भगवान्ने भक्तिके प्रकरणमें कहा है—
महत्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिव्यव्यम्॥
(गीता १।१३)
‘हे पृथानन्दन! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महत्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।’
आगे भी भगवान्ने कहा है—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय— ’ (१६।२०)। भक्तिके अन्तर्गत मुक्तिके सभी साधन आ जाते हैं। जिनको अपने प्राणोंसे प्यार होता है, वे प्राणपोषणपरायण मनुष्य आसुरी-सम्पत्तिवाले होते हैं। परन्तु जो भगवान्को अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्यार मानते हैं, वे दैवी-सम्पत्तिवाले होते हैं।
दूसरोंके सुखके लिये कर्म करना अथवा दूसरोंका सुख चाहना ‘चेतनता’ है और अपने सुखके लिये कर्म करना अथवा अपना सुख चाहना ‘जड़ता’ है। भजन-ध्यान भी अपने सुखके लिये, शरीरके आराम, मान-आदरके लिये करना जड़ता है। चेतनताकी मुख्यतासे दैवी-सम्पत्ति आती है और जड़ताकी मुख्यतासे आसुरी-सम्पत्ति आती है।
मूल दोष एक ही है, जिससे सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति पैदा होती है और मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण दैवी-सम्पत्ति प्रकट होती है। मूल दोष है—शरीर तथा संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उससे सम्बन्ध जोड़ना। मूल गुण है—भगवान्की सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उनसे सम्बन्ध जोड़ना। यह मूल दोष और मूल गुण ही स्थानभेदसे अनेक रूपोंमें दीखता है।
जबतक गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तभीतक गुणोंकी महत्ता दीखती है और उनका अभिमान होता है। कोई भी अवगुण न रहे तो अभिमान नहीं होता। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मूल है। अभिमानके कारण मनुष्यको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता दीखने लगती है—यह आसुरी-सम्पत्ति है। अभिमान होनेके कारण दैवी-सम्पत्ति भी आसुरी-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाली बन जाती है। जब गुणोंके साथ अवगुण नहीं रहते, तब गुणोंकी महत्ता नहीं दीखती और उनका अभिमान नहीं होता। गुणोंकी महत्ता न दीखनेसे साधककी दृष्टि अपने गुणोंकी तरफ नहीं जाती, जिससे वह घबरा जाता है*। अपने गुणोंकी तरफ दृष्टि न जानेसे ही अर्जुन घबरा जाते हैं कि मेरेमें दैवी-सम्पत्ति है ही नहीं! ऐसी दशामें उनकी चिन्ताको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—‘मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।
- एक बार एक साधु बड़े व्याकुल होकर बोले कि गीतामें मेरी श्रद्धा नहीं है, मेरी क्या दशा होगी! क्योंकि भगवान्ने कहा है—‘अञ्जश्चाश्रद्धानञ्च संशयात्मा विनश्यति’ (४।४०)। मैंने कहा कि श्रद्धा न करनेवालेका नाश हो जाता है—यह बात लिखी किसमें है? वे बोले—गीतामें। मैंने कहा कि गीतामें लिखी बातसे आपको घबराहट हुई तो यह गीतापर श्रद्धा नहीं तो क्या है? यह बात सुनते ही वे प्रसन्न हो गये!
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३५
सम्बन्ध—सम्पूर्ण प्राणियोंमें चेतन और जड़—दोनों अंश रहते हैं। उनमेंसे कई प्राणियोंका जड़तासे विमुख होकर चेतन-(परमात्मा-) की ओर मुख्यतासे लक्ष्य रहता है और कई प्राणियोंका चेतनसे विमुख होकर जड़ता-(भोग और संग्रह-) की ओर मुख्यतासे लक्ष्य रहता है। इस प्रकार चेतन और जड़की मुख्यताको लेकर प्राणियोंके दो भेद हो जाते हैं, जिनको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
द्वौ भूतसर्गौं लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥६॥
| अस्मिन् | = इस | दैवः | = दैवी | प्रोक्तः | = कह दिया, |
|---|---|---|---|---|---|
| लोके | = लोकमें | च | = और | (अब) | |
| द्वौ | = दो तरहके | आसुरः | = आसुरी। | पार्थ | = हे पार्थ! (तुम) |
| एव | = ही | दैवः | = दैवीको तो | मे | = मुझसे |
| भूतसर्गौं | = प्राणियोंकी | (मैंने) | आसुरम् | = आसुरीको (विस्तारसे) | |
| सृष्टि है— | विस्तरशः | = विस्तारसे | शृणु | = सुनो। |
व्याख्या— ‘द्वौ भूतसर्गौं लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च’—आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये उसका उपक्रम करते हुए भगवान् कहते हैं कि इस लोकमें प्राणिसमुदाय दो तरहका है—दैव और आसुर। तात्पर्य यह है कि प्राणिमात्रमें परमात्मा और प्रकृति—दोनोंका अंश है। (गीता—दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ और अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। परमात्माका अंश चेतन है और प्रकृतिका अंश जड़ है। वह चेतन अंश जब परिवर्तनशील जड़-अंशके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है और जब वह जड़ प्रकृतिसे विमुख होकर केवल परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें दैवी-सम्पत्ति जाग्रत् हो जाती है।
‘देव’ नाम परमात्माका है। परमात्माकी प्राप्तिके लिये जितने भी सदगुण-सदाचार आदि साधन हैं, वे सब दैवी-सम्पदा हैं। जैसे भगवान् नित्य हैं, ऐसे ही उनकी साधन-सम्पत्ति भी नित्य है। भगवान्ने परमात्माप्राप्तिके साधनको ‘अव्यय’ अर्थात् अविनाशी कहा है—‘इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्’ (गीता ४।१)।
‘द्वौ भूतसर्गौं’ में ‘भूत’ शब्दसे मनुष्य, देवता, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता आदि सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी लिये जा सकते हैं। परन्तु आसुर स्वभावका त्याग करनेकी विवेकशक्ति मुख्य-रूपसे मनुष्यशरीरमें ही है। इसलिये मनुष्यको आसुर स्वभावका सर्वथा त्याग करना चाहिये। उसका त्याग होते ही दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है।
मनुष्यमें दैवी और आसुरी—दोनों सम्पत्तियाँ रहती हैं—
सुमति कुमति सब के उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
(मानस ५।४०।३)
क्रूर-से-क्रूर कसाईमें भी दया रहती है, चोर-से-चोरमें भी साहूकारी रहती है। इसी तरह दैवी-सम्पत्तिसे रहित कोई हो ही नहीं सकता; क्योंकि जीवमात्र परमात्माका अंश है। उसमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक है और आसुरी-सम्पत्ति अपनी बनायी हुई है। सच्चे हृदयसे परमात्माकी तरफ चलनेवाले साधकोंको आसुरी-सम्पत्ति निरन्तर खटकती है, बुरी लगती है और उसको दूर करनेका वे प्रयत्न भी करते हैं। परन्तु जो लोग भजन-स्मरणके साथ आसुरी-सम्पत्तिका भी पोषण करते रहते हैं अर्थात् कुछ भजन-स्मरण, नित्यकर्म आदि भी कर लेते हैं और सांसारिक भोग तथा संग्रहमें भी सुख लेते हैं और उसे आवश्यक समझते हैं, वे वास्तवमें साधक नहीं कहे जा सकते। कारण कि कुछ दैव स्वभाव और कुछ आसुर स्वभाव तो नीच-से-नीच प्राणीमें भी स्वाभाविक रहता है।
एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि अहंताके अनुरूप प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्तिके अनुसार अहंताकी दृढ़ता होती है। जिसकी अहंतामें ‘मैं सत्यवादी हूँ’ ऐसा भाव होगा, वह सत्य बोलेगा और सत्य बोलनेसे उसकी सत्यनिष्ठा दृढ़ हो जायगी। फिर वह कभी असत्य नहीं बोल सकेगा। परन्तु जिसकी अहंतामें ‘मैं संसारी हूँ और संसारेके भोग भोगना और संग्रह करना मेरा काम है’ ऐसे भाव होंगे, उसको झूठ-कपट करते देरी नहीं लगेगी। झूठ-कपट करनेसे उसकी अहंतामें ये भाव दृढ़ हो जाते हैं कि ‘बिना