श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
मूल्य-(साधन, योग्यता आदि-) के बदलेमें परमात्माकी प्राप्ति मानी जाय, तो उनसे हमें लाभ भी क्या होगा? क्योंकि उनसे अधिक मूल्यकी वस्तु (साधन आदि) तो हमारे पास पहलेसे है ही!
जैसे सांसारिक पदार्थ कर्मोंसे मिलते हैं, ऐसे परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है। प्रत्येक कर्मकी उत्पत्ति अहंभावसे होती है और परमात्मप्राप्ति अहंभावके मिटनेपर होती है। कारण कि अहंभाव कृति (कर्म) है और परमात्मा कृतिरहित है। कृतिरहित तत्त्वको किसी कृतिसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है—‘नास्त्यकृतः कृतेन।’ (मुण्डको १।२।१२) तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि जड़-पदार्थोंके द्वारा नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है। जबतक मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, देश, काल, वस्तु आदिका आश्रय है, तबतक एक परमात्माका आश्रय नहीं हो सकता। मन, बुद्धि आदिके आश्रयसे परमात्मप्राप्ति होगी—यही साधककी मूल भूल है। अगर जड़ताका आश्रय और विश्वास छूट जाय तथा एकमात्र परमात्माका ही आश्रय और विश्वास हो जाय, तो परमात्मप्राप्तियें देरी नहीं लग सकती।
‘मनः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन् च’—किसी बातकी भूली हुई जानकारीका (किसी कारणसे) पुनः प्राप्त होना ‘स्मृति’ कहलाती है। स्मृति और चिन्तन—दोनोंमें फरक है। नयी बातका ‘चिन्तन’ और पुरानी बातकी ‘स्मृति’ होती है। अतः चिन्तन संसारका और स्मृति परमात्माकी होती है; क्योंकि संसार पहले नहीं था और परमात्मा पहले-(अनादिकाल-) से हैं। स्मृतियें जो शक्ति है, वह चिन्तनमें नहीं है। स्मृतियें कर्तापनका भाव कम रहता है, जबकि चिन्तनमें कर्तापनका भाव अधिक रहता है।
एक स्मृति की जाती है और एक स्मृति होती है। जो स्मृति की जाती है, वह ‘बुद्धि’में और जो होती है, वह ‘स्वयं’में होती है। होनेवाली स्मृति जड़तासे तत्काल सम्बन्ध-विच्छेद करा देती है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि यह (होनेवाली) स्मृति मेरेसे ही होती है।
परमात्माका अंश होते हुए भी जीव भूलसे परमात्मासे विमुख हो जाता है और अपना सम्बन्ध संसारसे मानने लगता है। इस भूलका नाश होनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ, संसारका नहीं’ ऐसा साक्षात् अनुभव हो जाना ही ‘स्मृति’ है (गीता—अठारहवें अध्यायका तिहत्तरवाँ श्लोक)। स्मृतियें कोई नया ज्ञान या अनुभव नहीं होता, प्रत्युत केवल
विस्मृति-(मोह-) का नाश होता है। भगवान्से हमारा वास्तविक सम्बन्ध है। इस वास्तविकताका प्रकट होना ही स्मृतिका प्राप्त होना है।
जीवमें निष्कामभाव (कर्मयोग), स्वरूप-बोध (ज्ञान-योग) और भगवत्प्रेम (भक्तियोग)—तीनों स्वतः विद्यमान हैं। जीवको (अनादिकालसे) इनकी विस्मृति हो गयी है। एक बार इनकी स्मृति हो जानेपर फिर विस्मृति नहीं होती। कारण कि यह स्मृति ‘स्वयं’में जाग्रत् होती है। ‘बुद्धि’में होनेवाली लौकिक स्मृति (बुद्धिके क्षीण होनेपर) नष्ट भी हो सकती है, पर ‘स्वयं’ में होनेवाली स्मृति कभी नष्ट नहीं होती।
किसी विषयकी जानकारीको ‘ज्ञान’ कहते हैं। लौकिक और पारमार्थिक जितना भी ज्ञान है, वह सब ज्ञानस्वरूप परमात्माका आभास-मात्र है। अतः ज्ञानको भगवान् अपनेसे ही होनेवाला बताते हैं। वास्तवमें ज्ञान वही है, जो ‘स्वयं’ से जाना जाय। अनन्त, पूर्ण और नित्य होनेके कारण इस ज्ञानमें कोई सन्देह या भ्रम नहीं होता। यद्यपि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘ज्ञान’ कहलाता है, तथापि सीमित, अल्प (अपूर्ण) तथा परिवर्तनशील होनेके कारण इस ज्ञानमें सन्देह या भ्रम रहता है; जैसे-नेत्रोंसे देखनेपर सूर्य अत्यन्त बड़ा होते हुए भी (आकाशमें) छोटा-सा दीखता है इत्यादि। बुद्धिसे जिस बातको पहले ठीक समझते थे, बुद्धिके विकसित अथवा शुद्ध होनेपर वही बात गलत दीखने लग जाती है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान करण-सापेक्ष और अल्प होता है। अल्प ज्ञान ही ‘अज्ञान’ कहलाता है। इसके विपरीत ‘स्वयं’ का ज्ञान किसी करण-(इन्द्रिय, बुद्धि आदि-) की अपेक्षा नहीं रखता और वह सदा पूर्ण होता है। वास्तवमें इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘स्वयं’ के ज्ञानसे प्रकाशित होते हैं अर्थात् सत्ता पाते हैं।
संशय, भ्रम, विपर्यय (विपरीत भाव), तर्क-वितर्क आदि दोषोंके दूर होनेका नाम ‘अपोहन’ है। भगवान् कहते हैं कि ये (संशय आदि) दोष भी मेरी कृपासे ही दूर होते हैं।
शास्त्रोंकी बातें सत्य हैं या असत्य? भगवान्को किसने देखा है? संसार ही सत्य है इत्यादि संशय और भ्रम भगवान्की कृपासे ही मिटते हैं। सांसारिक पदार्थोंमें अपना हित दीखना, उनकी प्राप्तिमें सुख दीखना, प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले संसारकी सत्ता दीखना आदि विपरीत भाव भी भगवान्की कृपासे ही दूर होते हैं। गीतोपदेशके अन्तमें
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अर्जुन भी भगवान्की कृपासे ही अपने मोहका नाश, स्मृतिकी प्राप्ति और संशयका नाश होना स्वीकार करते हैं (अठारहवें अध्यायका तिहतरवाँ श्लोक)।
‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ —यहाँ ‘सर्वैः’ पद वेद एवं वेदानुकूल सम्पूर्ण शास्त्रोंका वाचक है। सम्पूर्ण शास्त्रोंका एकमात्र तात्पर्य परमात्माका वास्तविक ज्ञान कराने अथवा उनकी प्राप्ति करानेमें ही है।
यहाँ भगवान् यह बात स्पष्ट करते हैं कि वेदोंका वास्तविक तात्पर्य मेरी प्राप्ति करानेमें ही है, सांसारिक भोगोंकी प्राप्ति करानेमें नहीं। श्रुतियोंमें सकामभावका विशेष वर्णन आनेका यह कारण भी है कि संसारमें सकाम मनुष्योंकी संख्या अधिक रहती है। इसलिये श्रुति (सबकी माता होनेसे) उनका भी पालन करती है।
जाननेयोग्य एकमात्र परमात्मा ही हैं, जिनको जान लेनेपर फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। परमात्माको जाने बिना संसारको कितना ही क्यों न जान लें, जानकारी कभी पूरी नहीं होती, सदा अधूरी ही रहती है*। अर्जुनमें भगवान्को जाननेकी विशेष जिज्ञासा थी। इसीलिये भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण वेदों और शास्त्रोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं स्वयं तुम्हारे सामने बैठा हूँ।
‘वेदान्तकृत’ —भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पन्द्रहवाँ और सत्रहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। अतः वे ही वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तको ठीक-ठीक बताकर वेदोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधोंका अच्छी तरह समन्वय कर सकते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि (वेदोंका पूर्ण वास्तविक ज्ञाता होनेके कारण) मैं ही वेदोंके यथार्थ तात्पर्यका निर्णय करनेवाला हूँ।
‘वेदविदेव चाहम्’ —वेदोंके अर्थ, भाव आदिको भगवान् ही यथार्थरूपसे जानते हैं। वेदोंमें कौन-सी बात किस भाव या उद्देश्यसे कही गयी है; वेदोंका यथार्थ तात्पर्य क्या है इत्यादि बातें भगवान् ही पूर्णरूपसे जानते हैं; क्योंकि भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं।
वेदोंमें भिन्न-भिन्न विषय होनेके कारण अच्छे-अच्छे
विद्वान् भी एक निर्णय नहीं कर पाते (गीता—दूसरे अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। इसलिये वेदोंके यथार्थ ज्ञाता भगवान्का आश्रय लेनेसे ही वे वेदोंका तत्त्व जान सकते हैं और ‘श्रुतिविप्रतिपत्ति’ से मुक्त हो सकते हैं।
इस (पंद्रहवें) अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने संसारवृक्षको तत्त्वसे जाननेवाले मनुष्यको ‘वेदवित्’ कहा था। अब इस श्लोकमें भगवान् स्वयंको ‘वेदवित्’ कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि संसारके यथार्थ तत्त्वको जान लेनेवाला महापुरुष भगवान्से अभिन्न हो जाता है। संसारके यथार्थ तत्त्वको जाननेका अभिप्राय है—‘संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और परमात्माकी ही सत्ता है’—इस प्रकार जानते हुए संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़कर अपना सम्बन्ध भगवान्से जोड़ना, संसारका आश्रय छोड़कर भगवान्के आश्रित हो जाना।
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने श्रीमद्भगवद्गीताके चार अध्यायोंमें भिन्न-भिन्न रूपोंसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है—
सातवें अध्यायमें आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक सृष्टिके प्रधान-प्रधान पदार्थोंमें कारणरूपसे सत्रह विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की है।
नवें अध्यायमें सोलहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक क्रिया, भाव, पदार्थ आदिमें कार्य-कारणरूपसे सैतीस विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनेको सर्वव्यापक बताया है।
दसवें अध्यायका तो नाम ही ‘विभूतियोग’ है। इस अध्यायमें चौथे और पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंके भावोंके रूपमें बीस विभूतियोंका और छठे श्लोकमें व्यक्तियोंके रूपमें पचीस विभूतियोंका वर्णन किया है। फिर बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने बयासी प्रधान विभूतियोंका विशेषरूपसे वर्णन किया है।
इस पन्द्रहवें अध्यायमें बारहवें श्लोकसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान्ने अपना प्रभाव बतलानेके लिये तेरह
- सांगोपांगानपि यदि यश्च वेदान्धीयते। वेदवेद्यं न जानीते वेदभावहो हि सः ॥
(महाभारत, शान्ति० ३१८।५०)
‘सांगोपांग वेद पङ्कक भी जो वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ देनेवाला है।’
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[ अध्याय १५ ]
विभूतियोंका वर्णन किया है।
उपर्युक्त चारों अध्यायोंमें भिन्न-भिन्न रूपमें विभूतियोंका वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि साधकको 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९) 'सब कुछ वासुदेव ही है' इस तत्त्वका अनुभव हो जाय। इसीलिये अपनी विभूतियोंका वर्णन करते समय भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकताको ही विशेषरूपसे सिद्ध किया है; जैसे—
'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७)
'मेरेसे बढ़कर इस जगत्का दूसरा कोई भी महान् कारण नहीं है।'
'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)
'सत् और असत्—सब कुछ मैं ही हूँ।'
'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' (१०।८)
'मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मेरेसे ही सब जगत् चैष्टा करता है।'
'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।'
(१०।३९)
'चर और अचर कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो मेरेसे रहित हो अर्थात् चराचर सब प्राणी मेरे ही स्वरूप हैं।'
इसी प्रकार इस पन्द्रहवें अध्यायमें भी अपनी विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं—
'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः' (१५।१५)
'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हूँ।'
तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणी, पदार्थ परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् हो रहे हैं। परमात्मासे अलग किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।
प्रकाशके अभाव-(अन्धकार-)-में कोई वस्तु दिखायी नहीं देती। आँखोंसे किसी वस्तुको देखनेपर पहले प्रकाश दीखता है, उसके बाद वस्तु दीखती है अर्थात् हरेक वस्तु प्रकाशके अन्तर्गत ही दीखती है; किन्तु हमारी दृष्टि प्रकाशपर न जाकर प्रकाशित होनेवाली वस्तुपर जाती है। इसी प्रकार यावन्मात्र वस्तु, क्रिया, भाव आदिका ज्ञान एक विलक्षण और अलुप्त प्रकाश—ज्ञानके अन्तर्गत होता है,
जो सबका प्रकाशक और आधार है। प्रत्येक वस्तुसे पहले ज्ञान (स्वयंप्रकाश परमात्मतत्त्व) रहता है। अतः संसारमें परमात्माको व्याप्त कहनेपर भी वस्तुतः संसार बादमें है और उसका अधिष्ठान परमात्मतत्त्व पहले है अर्थात् पहले परमात्मतत्त्व दीखता है, बादमें संसार। परन्तु संसारमें राग होनेके कारण मनुष्यकी दृष्टि उसके प्रकाशक-(परमात्म-तत्त्व-)-पर नहीं जाती।
परमात्माकी सत्ताके बिना संसारकी कोई सत्ता नहीं है। परन्तु परमात्मसत्ताकी तरफ दृष्टि न रहने तथा सांसारिक प्राणी-पदार्थोंमें राग या सुखासक्ति रहनेके कारण उन प्राणी-पदार्थोंकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता प्रतीत होने लगती है और परमात्माकी वास्तविक सत्ता (जो तत्त्वसे है) नहीं दीखती। यदि संसारमें राग या सुखासक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय, तो तत्त्वसे एक परमात्मसत्ता ही दीखने या अनुभवमें आने लगती है। अतः विभूतियोंके वर्णनका तात्पर्य यही है कि किसी भी प्राणी-पदार्थकी तरफ दृष्टि जानेपर साधकको एकमात्र भगवान्की स्मृति होनी चाहिये अर्थात् उसे प्रत्येक प्राणी-पदार्थमें भगवान्की ही देखना चाहिये (गीता—दसवें अध्यायका इकतालिसवें श्लोक)।
वर्तमानमें समाजकी दशा बड़ी विचित्र है। प्रायः सब लोगोंके अन्तःकरणमें रुप्योंका बहुत ज्यादा महत्त्व हो गया है। रुपये खुद काममें नहीं आते, प्रत्युत उनसे खरीदी गयी वस्तुएँ ही काममें आती हैं; परन्तु लोगोंने रुप्योंके उपयोगको खास महत्त्व न देकर उनकी संख्याकी वृद्धिको ही ज्यादा महत्त्व दे दिया! इसलिये मनुष्यके पास जितने अधिक रुपये होते हैं, वह समाजमें अपनेको उतना ही अधिक बड़ा मान लेता है। इस प्रकार रुप्योंको ही महत्त्व देनेवाला व्यक्ति परमात्माके महत्त्वको समझ ही नहीं सकता। फिर परमात्मप्राप्तिके बिना रहा न जाय—ऐसी लगन उस मनुष्यके भीतर उत्पन्न हो ही कैसे सकती है? जिसके भीतर यह बात बैठी हुई है कि रुप्योंके बिना रहा ही नहीं जा सकता अथवा रुप्योंके बिना काम ही नहीं चल सकता, उसकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि हो
१-इस अध्यायमें वर्णित तेरह विभूतियाँ इस प्रकार हैं—
(१) सूर्यमें स्थित तेज, (२) चन्द्रमें स्थित तेज, (३) अग्निमें स्थित तेज, (४) पृथ्वीकी धारण-शक्ति, (५) चन्द्रकी पोषण-शक्ति, (६) वैश्वानर, (७) हृदयस्थित अन्तर्यामी, (८) स्मृति, (९) ज्ञान, (१०) अपोहन, (११) वेदोद्धार जाननेयोग्य, (१२) वेदान्तका कर्ता और (१३) वेदोंको जाननेवाला।
२-वस्तुतः रुप्योंकी संख्याके आधारपर अपनेको छोट या बड़ा मानना पतनका चिह्न है। रुप्योंकी संख्या केवल अभिमान बढ़ानेके सिवाय और कुछ काम नहीं आती। अभिमान आसुरी सम्पत्तिका मूल है। जितने भी दुर्गुण-दुराचार, पाप हैं, सब अभिमानरूपी वृक्षकी छायामें रहते हैं।
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ही नहीं सकती। वह यह बात समझ ही नहीं सकता कि रूपयोंके बिना भी अच्छी तरह काम चल सकता है।
जिस प्रकार व्यापारीको (एकमात्र धनप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) माल लेने, माल देने आदि व्यापार-सम्बन्धी प्रत्येक क्रियामें धन ही दीखता है, इसी प्रकार परमात्मत्त्वके जिज्ञासुको (एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) प्रत्येक वस्तु, क्रिया आदिमें तत्वरूपसे परमात्मा ही दीखते हैं। उसको ऐसा अनुभव हो जाता है कि परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व है ही नहीं, हो सकता ही नहीं।
मार्मिक बात
अर्जुनने चौदहवें अध्यायमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। गुणोंके संगसे ही जीव संसारमें फँसता है। अतः गुणोंका संग मिटानेके लिये भगवान्ने यहाँ अपने प्रभावका वर्णन किया है। छोटे प्रभावको मिटानेके लिये बड़े
परिशिष्ट भाव— इस अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने जो बात कही थी, उसका उपसंहार इस श्लोकमें करते हैं।
पहलेके तीन श्लोकोंमें भगवान्ने प्रभाव और क्रियारूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है, पर प्रस्तुत श्लोकमें स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोकमें स्वयं भगवान्का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान्का वर्णन नहीं। मूलमें एक ही तत्त्व है, केवल वर्णनमें फर्क है।
पहले 'ममैवांशो जीवलोकै' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् 'अपने' हैं और यहाँ 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' पदोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् 'अपनेमें' हैं। भगवान्को 'अपना' स्वीकार करनेसे उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और 'अपनेमें' स्वीकार करनेसे उनको पानेके लिये दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं रहेगी।
'अपोहनम्' पदका अर्थ है—'अपगत ओहनम्' अर्थात् संशयका निवारण। 'वेदान्त' का अर्थ है—वेदोंका अन्त अर्थात् निष्कर्ष, निचोड़—'उभयोरपि दृष्टोऽन्तः' (गीता २।१६)
भगवान् कहते हैं कि वेद अनेक हैं, पर उन सबमें जाननेयोग्य मैं एक ही हूँ और उन सबको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ।
सम्बन्ध— भगवान्ने इसी अध्यायके पहले श्लोकसे पंद्रहवें श्लोकतक (तीन प्रकरणोंमें) क्रमशः संसार, जीवात्मा और परमात्माका विस्तारसे वर्णन किया। अब उस विषयका उपसंहार करते हुए आगेके दो श्लोकोंमें उन तीनोंका क्रमशः क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे स्पष्ट वर्णन करते हैं।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
| लोके | = इस संसारमें | द्वौ | = दो प्रकारके | क्षरः | = क्षर |
|---|---|---|---|---|---|
| क्षरः | = क्षर (नाशवान्) | एव | = ही | च | = और |
| च | = और | पुरुषौ | = पुरुष हैं। | कूटस्थः | = जीवात्मा |
| अक्षरः | = अक्षर (अविनाशी)— | सर्वाणि | = सम्पूर्ण | अक्षरः | = अक्षर |
| द्वौ | = ये | भूतानि | = प्राणियोंके शरीर | उच्यते | = कहा जाता है। |
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
व्याख्या—‘द्वारविमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ —यहाँ ‘लोके’ पदको सम्पूर्ण संसारका वाचक समझना चाहिये। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘जीवलोकै’ पद भी इसी अर्थमें आया है।
इस जगत्में दो विभाग जाननेमें आते हैं—शरीरादि नाशवान् पदार्थ (जड) और अविनाशी जीवात्मा (चेतन)। जैसे, विचार करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक तो प्रत्यक्ष दीखनेवाला शरीर है और एक उसमें रहनेवाला जीवात्मा है। जीवात्माके रहनेसे ही प्राण कार्य करते हैं और शरीरका संचालन होता है। जीवात्माके साथ प्राणोंके निकलते ही शरीरका संचालन बंद हो जाता है और शरीर सड़ने लगता है। लोग उस शरीरको जला देते हैं। कारण कि महत्त्व नाशवान् शरीरका नहीं, प्रत्युत उसमें रहनेवाले अविनाशी जीवात्माका है।
पंचमहाभूतों—(आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-) से बने हुए शरीरादि जितने पदार्थ हैं, वे सभी जड और नाशवान् हैं। प्राणियोंके (प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाले) स्थूलशरीर स्थूल समष्टि-जगत्के साथ एक हैं; दस इंद्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्त्वोंसे युक्त सूक्ष्मशरीर सूक्ष्म समष्टि-जगत्के साथ एक हैं और कारण-शरीर (स्वभाव, कर्मसंस्कार, अज्ञान) कारण समष्टि-जगत्—(मूल प्रकृति-) के साथ एक हैं। ये सब क्षरणशील
(नाशवान्) होनेके कारण ‘क्षर’ नामसे कहे गये हैं।
वास्तवमें ‘व्यष्टि’ नामसे कोई वस्तु है ही नहीं; केवल समष्टि-संसारके थोड़े अंशकी वस्तुको अपनी माननेके कारण उसको व्यष्टि कह देते हैं। संसारके साथ शरीर आदि वस्तुओंकी भिन्नता केवल (राग-ममता आदिके कारण) मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। मात्र पदार्थ और क्रियाएँ प्रकृतिकी ही हैं। इसलिये स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरकी समस्त क्रियाएँ क्रमशः स्थूल, सूक्ष्म और कारण समष्टि-संसारके हितके लिये ही करनी हैं, अपने लिये नहीं।
जिस तत्त्वका कभी विनाश नहीं होता और जो सदा निर्विकार रहता है, उस जीवात्माका वाचक यहाँ ‘अक्षरः’ पद है। प्रकृति जड है और जीवात्मा (चेतन परमात्माका अंश होनेसे) चेतन है।
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने जिसका छेदन करनेके लिये कहा था, उस संसारको यहाँ ‘क्षरः’ पदसे और सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना अंश बताया था, उस जीवात्माको यहाँ ‘अक्षरः’ पदसे कहा गया है।
यहाँ आये क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—ये तीनों ही शब्द गीतामें तीनों लिंगोंमें आये हैं। इससे यह समझना चाहिये कि प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा न तो स्त्री हैं, न पुरुष हैं और न नपुंसक ही हैं। वास्तवमें लिंग भी शब्दकी
१-पदार्थों और क्रियाओंको संसारका मानना ‘कर्मयोग’, प्रकृतिका मानना ‘ज्ञानयोग’ और भगवान्का मानना ‘भक्तियोग’ है। इनको चाहे जिसका मानें, पर ये अपने नहीं हैं—यह तो मानना ही पड़ेगा।
२-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—इन तीनोंका एक साथ वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे इस प्रकार हुआ है।
| अध्याय-श्लोक | क्षर | अक्षर | पुरुषोत्तम |
|---|---|---|---|
| ७।४—६ | अपरा प्रकृति | परा प्रकृति | अहम् |
| ८।३-४ | अधिभूतः कर्म | अध्यात्मः अधिदैव | ब्रह्मः, अधियज्ञ |
| १३।१-२ | क्षेत्र | क्षेत्रज्ञ | माम् |
| १४।३-४ | महद्ब्रह्मः, योनि | गर्भः, बीज | अहम्, पिता |
३-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तीनों लिंगोंमें मिलता है। उदाहरणार्थ—
(१) क्षर—क्षरः (१५।१६)—पुँल्लिंग अपरा (७।५)—स्त्रीलिंग महद्ब्रह्म (१४।३-४)—नपुंसकलिंग
(२) अक्षर—जीवभूतः (१५।७)—पुँल्लिंग जीवभूताम् (७।५)—स्त्रीलिंग अध्यात्मम् (८।३)—नपुंसकलिंग
(३) पुरुषोत्तम—भर्ता (१।१८)—पुँल्लिंग गतिः (१।१८)—स्त्रीलिंग शरणम् (१।१८)—नपुंसकलिंग
श्लोक १७]
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दृष्टिसे है, तत्त्वसे कोई लिंग नहीं है।
क्षर और अक्षर—दोनोंसे उत्तम 'पुरुषोत्तम' नामकी सिद्धिके लिये यहाँ भगवान्ने क्षर और अक्षर—दोनोंको 'पुरुष' नामसे कहा है।
'क्षरः सर्वाणि भूतानि'—इसी अध्यायके आरम्भमें जिस संसारवृक्षका स्वरूप बताकर उसका छेदन करनेकी प्रेरणा की गयी थी, उसी संसारवृक्षको यहाँ 'क्षर' नामसे कहा गया है।
यहाँ 'भूतानि' पद प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंका ही वाचक समझना चाहिये। कारण कि यहाँ भूतोंको नाशवान् बताया गया है। प्राणियोंके शरीर ही नाशवान् होते हैं, प्राणी स्वयं नहीं। अतः यहाँ 'भूतानि' पद जड़ शरीरोंके लिये ही आया है।
'कूटस्थोऽक्षर उच्यते'—इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना सनातन अंश बताया है, उसी जीवात्माको यहाँ 'अक्षर' नामसे कहा गया है।
जीवात्मा चाहे जितने शरीर धारण करे, चाहे जितने
परिशिष्ट भाव—पहले छठे श्लोकमें और फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान्ने 'अलौकिक तत्त्वका वर्णन किया कि स्वतन्त्र सत्ता अलौकिककी ही है, लौकिककी नहीं, लौकिककी सत्ता अलौकिकसे ही है। अलौकिकसे ही लौकिक प्रकाशित होता है। लौकिकमें जो प्रभाव देखनेमें आता है, वह सब अलौकिकका ही है। अब सोलहवें श्लोकमें भगवान् 'लोक' शब्दसे 'लौकिक तत्त्व' का वर्णन करते हैं।
जगत् (क्षर) तथा जीव (अक्षर)—दोनों 'लौकिक' हैं—'द्वारिमी पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च' और भगवान् इन दोनोंसे विलक्षण अर्थात् 'अलौकिक' हैं—'उत्तमः पुरुषस्तव्यः' (गीता १५।१७)। कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दो योगमार्ग भी 'लौकिक' हैं—'लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा ..... ' (गीता ३।३)। क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; परन्तु भक्तियोग 'अलौकिक' है, जो भगवान्को लेकर चलता है। सातवें अध्यायमें वर्णित 'अपरा प्रकृति' को यहाँ 'क्षर' नामसे और 'परा' प्रकृति' को यहाँ 'अक्षर' नामसे कहा गया है।
उत्तमः पुरुषस्तव्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
| उत्तमः | = उत्तम | यः | = जो | ईश्वरः | = ईश्वर |
|---|---|---|---|---|---|
| पुरुषः | = पुरुष | परमात्मा | = 'परमात्मा'— | लोकत्रयम् | = तीनों लोकोंमें |
| तु | = तो | इति | = इस नामसे | आविश्य | = प्रविष्ट होकर (सबका) |
| अन्यः | = अन्य (विलक्षण) | उदाहृतः | = कहा गया है। (वही) | बिभर्ति | = भरण-पोषण करता है। |
| ही है, | अव्ययः | = अविनाशी |
व्याख्या—'उत्तमः पुरुषस्तव्यः'—पूर्वश्लोकमें क्षर और भगवान् यह बताते हैं कि उन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य अक्षर दो प्रकारके पुरुषोंका वर्णन करनेके बाद अब ही है*।
- (१) द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गृहे।
क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ५।१)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
यहाँ ‘अन्यः’ पद परमात्माको अविनाशी अक्षर- (जीवात्मा-) से भिन्न बतानेके लिये नहीं, प्रत्युत उससे विलक्षण बतानेके लिये आया है। इसीलिये भगवान्ने आगे अठारहवें श्लोकमें अपनेको नाशवान् क्षरसे ‘अतीत’ और अविनाशी अक्षरसे ‘उत्तम’ बताया है। परमात्माका अंश होते हुए भी जीवात्माकी दृष्टि या खिंचाव नाशवान् क्षरकी ओर हो रहा है। इसीलिये यहाँ भगवान्को उससे विलक्षण बताया गया है।
‘परमात्मेत्युदाहृतः’—उस उत्तम पुरुषको ही ‘परमात्मा’ नामसे कहा जाता है। ‘परमात्मा’ शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। इस श्लोकमें ‘परमात्मा’ और ‘ईश्वर’—दोनों शब्द आये हैं, जिसका तात्पर्य है कि निर्गुण और सगुण सब एक पुरुषोत्तम ही हैं।
‘यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः’—वह उत्तम पुरुष (परमात्मा) तीनों लोकोंमें अर्थात् सर्वत्र समानरूपसे नित्य व्याप्त है।
यहाँ ‘विभर्ति’ पदका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंका भरण-पोषण करते हैं, पर जीवात्मा संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण भूलसे सांसारिक व्यक्तियों आदिको अपना मानकर उनके भरण-पोषणादिका भार अपने ऊपर ले लेता है। इससे वह व्यर्थ ही दुःख पाता रहता है।
भगवान्को ‘अव्ययः’ कहनेका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करते रहनेपर भी भगवान्का कोई
व्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् उनमें किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती। वे सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं।
‘ईश्वरः’ शब्द सगुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—शासन करनेवाला।
मार्मिक बात
यद्यपि माता-पिता बालकका पालन-पोषण किया करते हैं, तथापि बालकको इस बातका ज्ञान नहीं होता कि मेरा पालन-पोषण कौन करता है, कैसे करता है और किसलिये करता है? इसी तरह यद्यपि भगवान् मात्र प्राणियोंका पालन-पोषण करते हैं, तथापि अज्ञानी मनुष्यको (भगवान्पर दृष्टि न रहनेसे) इस बातका पता ही नहीं लगता कि मेरा पालन-पोषण कौन करता है। भगवान्का शरणागत भक्त ही इस बातको ठीक तरहसे जानता है कि एक भगवान् ही सबका सम्यक् प्रकारसे पालन-पोषण कर रहे हैं।
पालन-पोषण करनेमें भगवान् किसीके साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते। वे भक्त-अभक्त, पापी-पुण्यात्मा, आस्तिक-नास्तिक आदि सभीका समानरूपसे पालन-पोषण करते हैं। प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि भगवान्द्वारा रचित सृष्टिमें सूर्य सबको समानरूपसे प्रकाश देता है, पृथ्वी सबको समानरूपसे धारण करती है, वैश्वानर-अग्नि सबके अन्नको समानरूपसे पचाती है, वायु सबको (श्वास लेनेके लिये) समानरूपसे प्राप्त होती है, अन्न-जल सबको समानरूपसे तृप्त करते हैं, इत्यादि।
‘जिस ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, छिपे हुए, असौम और परम अक्षर परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों स्थित हैं, वही ब्रह्म है। विनाशशील जड़वर्ग तो अविद्या नामसे कहा गया है और अविनाशी जीवात्मा विद्या नामसे। जो इन विद्या और अविद्या दोनोंपर शासन करता है, वह परमेश्वर इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है।’
(२) क्षर प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतरोपनिषद् १।१०)
‘प्रकृति तो विनाशशील है और इसे भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों-(क्षर और अक्षर-) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’
१-भरण-पोषणकी बात भक्तिमार्गमें ही आ सकती है, ज्ञानमार्गमें नहीं। कारण कि भक्तिमार्गमें जीव और परमात्मामें भिन्नता मानी जाती है। इसलिये इस प्रकरणको भक्तिका ही मानना चाहिये।
२-अयमुत्तमोऽयमधमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा। श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे॥
अन्तःस्वभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः। खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति॥
(प्रबोधसुधाकर २५२-२५३)
‘किसीपर कृपा करते समय भगवान् ऐसा विचार नहीं करते कि यह जाति, रूप, धन और आयुसे उत्तम है या अधम? स्तुत्य है या निन्द?’
‘यह अन्तरात्मा-रूपी महामेघ आन्तरिक भावोंका ही भोक्ता है। मेघ क्या वर्षाके समय इस बातका विचार करता है कि यह खदिर (खैर) है अथवा चम्पक (चम्पा)?’
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
१००३
परिशिष्ट भाव —पुरुषोत्तमको 'अन्य' कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं। अतः परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं। परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं। 'अन्य' का खुलासा भगवान्ने आगेके श्लोकमें किया है।
'यो लोकत्रयमाविश्य'' —इन पदोंमें बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतकका भाव आ गया है। मनुष्यका कर्तव्य तो मनुष्यलोकमें है, पर भगवान्का कर्तव्य तीनों लोकोंमें है। वास्तवमें भगवान्का अपना कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी वे केवल जीवोंके हितके लिये कर्तव्य करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका बाईसवाँ, तेईसवाँ और चौबीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित उत्तम पुरुषके साथ अपनी एकता बताकर अब साकाररूपसे प्रकट भगवान् श्रीकृष्ण अपना अत्यन्त गोपनीय रहस्य प्रकट करते हैं।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
| यस्मात् | = कारण कि | अक्षरात् | = अक्षरसे | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | अपि | = भी | वेदे | = वेदमें |
| क्षरम् | = क्षरसे | उत्तमः | = उत्तम हूँ, | पुरुषोत्तमः | = 'पुरुषोत्तम' (नामसे) |
| अतीतः | = अतीत हूँ | अतः | = इसलिये | प्रथितः | = प्रसिद्ध |
| च | = और | लोके | = लोकमें | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' —इन पदोंमें भगवान्का यह भाव है कि क्षर (प्रकृति) प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मैं नित्य-निरन्तर निर्विकाररूपसे ज्यों-का-त्यों रहनेवाला हूँ। इसलिये मैं क्षरसे सर्वथा अतीत हूँ।
शरीरसे पर (व्यापक, श्रेष्ठ, प्रकाशक, सबल, सूक्ष्म) इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंसे पर मन है और मनसे पर बुद्धि है (गीता—तीसरे अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार एक-दूसरेसे पर होते हुए भी शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि एक ही जातिके, जड़ हैं। परन्तु परमात्मतत्त्व इनसे भी अत्यन्त पर है; क्योंकि वह जड़ नहीं है, प्रत्युत चेतन है।
'अक्षरादपि चोत्तमः' —यद्यपि परमात्माका अंश होनेके कारण जीवात्मा-(अक्षर-) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है, तथापि यहाँ भगवान् अपनेको जीवात्मासे भी उत्तम बताते हैं। इसके कारण ये हैं—(१) परमात्माका अंश होनेपर भी जीवात्मा क्षर-(जड़ प्रकृति-) के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाता है, जबकि परमात्मा (प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण) कभी मोहित नहीं होते (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। (२) परमात्मा प्रकृतिको अपने अधीन करके लोकमें
आते, अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका छठा श्लोक), जबकि जीवात्मा प्रकृतिके वशमें होकर लोकमें आता है (गीता—आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। (३) परमात्मा सदैव निलिप्त रहते हैं, (गीता—चौथे अध्यायका चौदहवाँ और नवें अध्यायका नवाँ श्लोक), जबकि जीवात्माको निलिप्त होनेके लिये साधन करना पड़ता है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ और सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।
भगवान्द्वारा अपनेको क्षरसे 'अतीत' और अक्षरसे 'उत्तम' बतानेसे यह भाव भी प्रकट होता है कि क्षर और अक्षर—दोनोंमें भिन्नता है। यदि उन दोनोंमें भिन्नता न होती, तो भगवान् अपनेको या तो उन दोनोंसे ही अतीत बताते या दोनोंसे ही उत्तम बताते। अतः यह सिद्ध होता है कि जैसे भगवान् क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हैं, ऐसे ही अक्षर भी क्षरसे अतीत और उत्तम है।
'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः' —यहाँ 'लोके' पदका अर्थ है—पुराण, स्मृति आदि शास्त्र। शास्त्रोंमें भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।
शुद्ध ज्ञानका नाम 'वेद' है, जो अनादि है। वही ज्ञान आनुपूर्वीरूपसे ऋक्, यजुः आदि वेदोंके रूपसे प्रकट हुआ है। वेदोंमें भी भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।
१००४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षर और अक्षर—दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है। वह उत्तम पुरुष कौन है—इसको बताते हुए भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि वह उत्तम पुरुष—‘पुरुषोत्तम ’ में ही हूँ।
विशेष बात
(१) भौतिक सृष्टिमात्र ‘क्षर’ (नाशवान्) है और परमात्माका सनातन अंश जीवात्मा ‘अक्षर’ (अविनाशी) है। क्षरसे अतीत और उत्तम होनेपर भी अक्षरने क्षरसे अपना सम्बन्ध मान लिया—इससे बढ़कर और कोई दोष, भूल या गलती है ही नहीं। क्षरके साथ यह सम्बन्ध केवल माना हुआ है, वास्तवमें एक क्षण भी रहनेवाला नहीं है। जैसे बाल्यावस्थासे अबतक शरीर बिल्कुल बदल गया, फिर भी हम कहते हैं कि ‘मैं वही हूँ।’ यह भी हम नहीं बता सकते कि अमुक दिन बाल्यावस्था खत्म हुई और युवावस्था शुरू हुई। कारण कि नदीके प्रवाहकी तरह शरीर निरन्तर ही बहता रहता है, जब कि अक्षर (जीवात्मा) नदीमें स्थित शिला-(चट्टान-) की तरह सदा अचल और असंग रहता है। यदि अक्षर भी क्षरकी तरह निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् होता तो इसकी आफत मिट जाती। परन्तु स्वयं (अक्षर) अपरिवर्तनशील और अविनाशी होते हुए भी निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् क्षरको पकड़ लेता है—उसको अपना मान लेता है। होता यह है कि अक्षर क्षरको छोड़ता नहीं और क्षर एक क्षण भी ठहरता नहीं। इस आफतको मिटानेका सुगम उपाय है—क्षर-(शरीरादि-) को क्षर-(संसार-) की ही सेवामें लगा दिया जाय—उसको संसाररूपी वाटिकाकी खाद बना दी जाय।
मनुष्यको शरीरादि नाशवान् पदार्थ अधिकार करने अथवा अपना माननेके लिये नहीं मिले हैं, प्रत्युत सेवा करनेके लिये ही मिले हैं। इन पदार्थोंके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेकी ही मनुष्यपर जिम्मेवारी है, अपना माननेकी
बिल्कुल जिम्मेवारी नहीं।
(२) पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने पहले क्षर—संसार-वृक्षका वर्णन किया। फिर उसका छेदन करके परम पुरुष परमात्माके शरण होने अर्थात् संसारसे अपनापन हटाकर एकमात्र परमात्माको अपना माननेकी प्रेरणा की। फिर अक्षर—जीवात्माको अपना सनातन अंश बताते हुए उसके स्वरूपका वर्णन किया। उसके बाद भगवान्ने (बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक) अपने प्रभावका वर्णन करते हुए बताया कि सूर्य, चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है; मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे चराचर सब प्राणियोंको धारण करता हूँ; मैं ही अमृतमय चन्द्रके रूपसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंको पुष्ट करता हूँ; वैश्वानर अग्निके रूपमें मैं ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके द्वारा खाये हुए अन्नको पचाता हूँ; मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्गामीरूपसे विद्यमान हूँ; मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (भ्रम, संशय आदि दोषोंका नाश) होता है; वेदादि सब शास्त्रोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ; और वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तका निर्णय करनेवाला तथा वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार अपना प्रभाव प्रकट करनेके बाद इस श्लोकमें भगवान् यह गुह्यतम रहस्य प्रकट करते हैं कि जिसका यह सब प्रभाव है, वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) ‘पुरुषोत्तम ’ में (साक्षात् साकाररूपसे प्रकट श्रीकृष्ण) ही हूँ।
भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनपर बहुत विशेष कृपा करके ही अपने रहस्यकी बात अपने मुखसे प्रकट की है; जैसे—कोई पिता अपने पुत्रके सामने अपनी गुप्त सम्पत्ति प्रकट कर दे अथवा कोई आदमी किसी भूल-भटके मनुष्यको अपना परिचय दे दे कि जिसके लिये तू भटक रहा है, वह मैं ही हूँ और तेरे सामने बैठता हूँ!
परिशिष्ट भाव —अपनी अलौकिकताकी तरफ दृष्टि करानेके लिये यहाँ भगवान्ने ‘यस्मात् ’ पद दिया है।
‘अक्षरादपि चोत्तमः ’—‘अक्षर’ शब्द जीवात्माके लिये भी आता है और ब्रह्मके लिये भी—‘अक्षरं ब्रह्म परमम् ’ (गीता ८।३)। यह शब्द सब जगह चेतनका वाचक ही आता है, जड़का वाचक कहीं नहीं आता।
क्षर और अक्षरकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, पर परमात्माकी स्वतन्त्र सत्ता है। क्षर और अक्षर दोनों परमात्मामें ही रहते हैं। परन्तु अक्षर अर्थात् जीव क्षरके साथ सम्बन्ध जोड़कर उसके अधीन हो जाता है—‘यदेदं धार्यते जगत् ’ (गीता ७।५)। परमात्मा स्वतः असंग रहते हैं, वे क्षरके अधीन नहीं होते—‘यस्मात्क्षरमतीतोऽहम् ’। इसलिये परमात्मा अक्षर (जीव) से भी उत्तम हैं। अगर जीव जगत्के साथ सम्बन्ध न जोड़कर उसके स्वामी परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़े तो वह परमात्मासे अभिन्न (आत्मीय) हो जायगा—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम् ’ (गीता ७।१८)।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१००५
मुक्तिमें तो अक्षर (स्वरूप)में स्थिति होती है, पर भक्तिमें अक्षरसे भी उत्तम पुरुषोत्तमकी प्राप्ति होती है। स्वरूप अंश है, पुरुषोत्तम अंशी है।
सम्बन्ध—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही थी और जिसको प्राप्त करानेके लिये इस पन्द्रहवें अध्यायमें संसार, जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन किया गया, उसका अब आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ॥ ११ ॥
भारत | = हे भारतवंशी अर्जुन! | माम् | = मुझे | सर्वभावेन | = सब प्रकारसे ---|---|---|---|---|--- एवम् | = इस प्रकार | पुरुषोत्तमम् | = पुरुषोत्तम | माम् | = मेरा ही यः | = जो | जानाति | = जानता है, | भजति | = भजन करता है। असम्मूढः | = मोहरहित मनुष्य | सः | = वह | | | | सर्ववित् | = सर्वज्ञ | |
व्याख्या—‘यो मामेवमसम्मूढः’ —जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश है। अतः अपने अंशी परमात्माके वास्तविक सम्बन्ध-(जो सदासे ही है-) का अनुभव करना ही उसका असम्मूढ (मोहसे रहित) होना है।
संसार या परमात्माको तत्त्वसे जाननेमें मोह (मूढ़ता) ही बाधक है। किसी वस्तुकी वास्तविकताका ज्ञान तभी हो सकता है, जब उस वस्तुसे राग या द्वेषपूर्वक माना गया कोई सम्बन्ध न हो। नाशवान् पदार्थसे राग-द्वेषपूर्वक सम्बन्ध मानना ही मोह है।
संसारको तत्त्वसे जानते ही परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जानते ही संसारसे अपनी भिन्नताका अनुभव हो जाता है। तात्पर्य है कि संसारको तत्त्वसे जाननेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जाननेसे परमात्मासे वास्तविक सम्बन्धका अनुभव हो जाता है।
संसारसे अपना सम्बन्ध मानना ही भक्तिमें व्यभिचार-दोष है। इस व्यभिचार-दोषसे सर्वथा रहित होनेमें ही उपर्युक्त पदोंका भाव समझना चाहिये।
‘जानाति पुरुषोत्तमम्’ —जिसकी मूढ़ता सर्वथा नष्ट हो गयी है, वही मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जानता है। क्षरसे सर्वथा अतीत पुरुषोत्तम-(परमपुरुष परमात्मा-) को ही सर्वोपरि मानकर उनके सम्मुख हो जाना, केवल
उन्हींको अपना मान लेना ही भगवान्को यथार्थरूपसे ‘पुरुषोत्तम’ जानना है।
संसारमें जो कुछ भी प्रभाव देखने-सुननेमें आता है, वह सब एक भगवान्-(पुरुषोत्तम-) का ही है—ऐसा मान लेनेसे संसारका खिंचाव सर्वथा मिट जाता है। यदि संसारका थोड़ा-सा भी खिंचाव रहता है, तो यही समझना चाहिये कि अभी भगवान्को दृढ़तासे माना ही नहीं।
‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत’ —जो भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है और इस विषयमें जिसके अन्तःकरणमें कोई विकल्प, भ्रम या संशय नहीं रहता, उस मनुष्यके लिये जाननेयोग्य कोई तत्त्व शेष नहीं रहता। इसलिये भगवान् उसको ‘सर्ववित्’ कहते हैं*।
भगवान्को जाननेवाला व्यक्ति कितना ही कम पढ़ा-लिखा क्यों न हो, वह सब कुछ जाननेवाला है; क्योंकि उसने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया। उसको और कुछ भी जानना शेष नहीं है।
जो मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है, उस ‘सर्ववित्’ मनुष्यकी पहचान यह है कि वह सब प्रकारसे स्वतः भगवान्का ही भजन करता है।
जब मनुष्य भगवान्को ‘क्षरसे अतीत’ जान लेता है, तब उसका मन (राग) क्षर-(संसार-) से हटकर भगवान्में लग जाता है और जब वह भगवान्को ‘अक्षरसे
- तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ (प्रश्नोपनिषद् ४।११)
‘हे सोम्य! उस अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है। वह सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है।’
१००६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
उत्तम' जान लेता है, तब उसकी बुद्धि (श्रद्धा) भगवान्में लग जाती है*। फिर उसकी प्रत्येक वृत्ति और क्रियासे स्वतः भगवान्का भजन होता है। इस प्रकार सब प्रकारसे भगवान्का भजन करना ही 'अव्यभिचारिणी भक्ति' है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सांसारिक पदार्थोंसे जबतक मनुष्य रागपूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह सब प्रकारसे भगवान्का भजन नहीं कर सकता। कारण कि जहाँ राग होता है, वृत्ति स्वतः वहीं जाती है।
'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—इस वास्तविकताको दृढ़तापूर्वक मान लेनेसे स्वतः सब प्रकारसे भगवान्का भजन होता है। फिर भक्तकी मात्र क्रियाएँ (सोना, जागना, बोलना, चलना, खाना-पीना
आदि) भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होती हैं, अपने लिये नहीं।
ज्ञानमार्गमें 'जानना' और भक्तिमार्गमें 'मानना' मुख्य होता है। जिस बातमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो, उसे दृढ़तापूर्वक 'मानना' ही भक्तिमार्गमें 'जानना' है। भगवान्को सर्वोपरि मान लेनेके बाद भक्त सब प्रकारसे भगवान्का ही भजन करता है (गीता—दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)।
भगवान्को 'पुरुषोत्तम' (सर्वोपरि) माननेसे भी मनुष्य 'सर्ववित्' हो जाता है, फिर सब प्रकारसे भगवान्का भजन करते हुए भगवान्को 'पुरुषोत्तम' जान जाय—इसमें तो कहना ही क्या है!
परिशिष्ट भाव—'यो मामेवमसम्भूदो जानाति पुरुषोत्तमम्'—'जो भगवान्को जानता है, वही वास्तवमें 'असम्भूद' है (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। परन्तु जो भगवान्को नहीं जानता, वह 'मूढ़' है—'अवजानन्ति मां मूढाः' (गीता ९।११)।
'स सर्वविदुर्भवति मां सर्वभावेन भारत'—क्षर और अक्षर दोनों ही समग्र भगवान्के अंग हैं; अतः इनको जाननेवाला मनुष्य सर्ववित् (सर्वज्ञ) नहीं होता। जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम पुरुषोत्तमको जानता है, वही मनुष्य 'सर्ववित्' अर्थात् समग्रको जाननेवाला है। ऐसा सर्ववित् भक्त सब प्रकारसे भगवान्में ही लगा रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१); क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय दूसरा कोई होता ही नहीं।
गीतामें 'सर्ववित्' शब्द केवल भक्तके लिये ही आया है। भक्त समग्रको अर्थात् लौकिक और अलौकिक दोनोंको जानता है, इसलिये वह सर्ववित् होता है। लौकिकके अन्तर्गत अलौकिक नहीं आ सकता, पर अलौकिकके अन्तर्गत लौकिक भी आ जाता है। अतः निर्गुण तत्त्व (अक्षर) को जाननेवाला ब्रह्मज्ञानी सर्ववित् नहीं होता, प्रत्युत समग्र भगवान्को जाननेवाला भक्त सर्ववित् होता है।
सम्बन्ध—'अरुन्धती-दर्शन-न्याय'-(स्थूलसे क्रमशः सूक्ष्मकी ओर जाने-) के अनुसार भगवान्ने इस अध्यायमें पहले 'क्षर' और फिर 'अक्षर' का विवेचन करनेके बाद अन्तमें 'पुरुषोत्तम' का वर्णन किया—अपने पुरुषोत्तमत्वको सिद्ध किया। ऐसा वर्णन करनेका तात्पर्य और प्रयोजन क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
इति गृह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतदबुद्ध्वा बुद्धिमानस्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
| अनघ | = हे निष्पाप | मया | = मेरे द्वारा | बुद्धिमान् | = ज्ञानवान् |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | उक्तम् | = कहा गया है। | (ज्ञात-ज्ञातव्य) | ||
| इति | = इस प्रकार | भारत | = हे भरतवंशी | च | = (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) |
| इदम् | = यह | अर्जुन! | और | ||
| गृह्यतमम् | = अत्यन्त गोपनीय | एतत् | = इसको | कृतकृत्यः | = कृतकृत्य |
| शास्त्रम् | = शास्त्र | बुद्ध्वा | = जानकर (मनुष्य) | स्यात् | = हो जाता है। |
- किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बातपर मन रागपूर्वक तथा बुद्धि श्रद्धापूर्वक लगती है।
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
१००७
व्याख्या—‘अनघ’—अर्जुनको निष्पाप इसलिये कहा गया है कि वे दोष-दृष्टि-(असूया-) से रहित थे। दोष-दृष्टि करना पाप है। इससे अन्तःकरण अशुद्ध होता है। जो दोष-दृष्टिसे रहित होता है, वही भक्तिका पात्र होता है।
गोपनीय बात दोष-दृष्टिसे रहित मनुष्यके सामने ही कही जाती है*। यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय बात कह दी जाय, तो उस मनुष्यपर उस बातका उलटा असर पड़ता है अर्थात् वह उस गोपनीय बातका उलटा अर्थ लगाकर वक्तमें भी दोष देखने लगता है कि यह आत्मशलाधी है; दूसरोंको मोहित करनेके लिये कहता है इत्यादि। इससे दोष-दृष्टिवाले मनुष्यकी बहुत हानि होती है।
दोष-दृष्टि होनेमें खास कारण है—अभिमान। मनुष्यमें जिस बातका अभिमान हो, उस बातकी उसमें कमी होती है। उस कमीको वह दूसरोंमें देखने लगता है। अपनेमें अच्छाईका अभिमान होनेसे दूसरोंमें बुराई दीखती है; और दूसरोंमें बुराई देखनेसे ही अपनेमें अच्छाईका अभिमान आता है।
यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने भगवान् अपनेको सर्वोपरि ‘पुरुषोत्तम’ कहें, तो उसको विश्वास नहीं होगा, उलटे वह यह सोचेगा कि भगवान् आत्मशलाधी (अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले) हैं—
‘निज अग्यान राम पर धरहीं।’ (मानस ७।७३।५)
भगवान्के प्रति दोष-दृष्टि होनेसे उसकी बहुत हानि होती है। इसलिये भगवान् और संतजन दोष-दृष्टिवाले अश्रद्धालु मनुष्यके सामने गोपनीय बातें प्रकट नहीं करते (गीता—अठारहवें अध्यायका सङ्गठवाँ श्लोक)। वास्तवमें देखा जाय तो दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय (रहस्ययुक्त) बातें मुखसे निकलती ही नहीं!
अर्जुनके लिये ‘अनघ’ सम्बोधन देनेमें यह भाव भी हो सकता है कि इस अध्यायमें भगवान्ने जो परमगोपनीय प्रभाव बताया है, वह अर्जुन-जैसे दोष-दृष्टिसे रहित सरल पुरुषके सम्मुख ही प्रकट किया जा सकता है।
‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्’—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें अत्यभिचारिणी भक्तिकी बात कहनेके बाद भगवान्ने पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकसे उन्नीसवें
श्लोकतक जिस (क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमके) विषयका वर्णन किया है, उस विषयकी पूर्णता और लक्ष्यका निर्देश यहाँ ‘इति इदम्’ पदोंसे किया गया है।
इस अध्यायमें पहले भगवान्ने क्षर (संसार) और अक्षर-(जीवात्मा-) का वर्णन करके अपना अप्रतिम प्रभाव (बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक) प्रकट किया। फिर भगवान्ने यह गोपनीय बात प्रकट की कि जिसका यह सब प्रभाव है, वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) ‘पुरुषोत्तम’ मैं ही हूँ।
नाटकमें स्वाँग धारण किये हुए मनुष्यकी तरह भगवान् इस पृथ्वीपर मनुष्यका स्वाँग धारण करके अवतरित होते हैं और ऐसा बताव करते हैं कि अज्ञानी मनुष्य उनको नहीं जान पाते (गीता—सातवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। स्वाँगमें अपना वास्तविक परिचय नहीं दिया जाता, गुप्त रखा जाता है। परन्तु भगवान्ने इस अध्यायमें (अठारहवें श्लोकमें) अपना वास्तविक परिचय देकर अत्यन्त गोपनीय बात प्रकट कर दी कि मैं ही पुरुषोत्तम हूँ। इसलिये इस अध्यायको ‘गुह्यतम’ कहा गया है।
‘शास्त्र’ में प्रायः संसार, जीवात्मा और परमात्माका वर्णन आता है। इन तीनोंका ही वर्णन पंद्रहवें अध्यायमें हुआ है, इसलिये इस अध्यायको ‘शास्त्र’ भी कहा गया है।
सर्वशास्त्रमयी गीतामें केवल इसी अध्यायको ‘शास्त्र’ की उपाधि मिली है। इसमें ‘पुरुषोत्तम’ का वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायको ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है। इस गुह्यतम शास्त्रमें भगवान्ने अपनी प्रापतिके छः उपायोंका वर्णन किया है—
(१) संसारको तत्त्वसे जानना (पहला श्लोक)।
(२) संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करके एक भगवान्के शरण होना (तीसरा-चौथा श्लोक)।
(३) अपनेमें स्थित परमात्मतत्त्वको जानना (ग्यारहवाँ श्लोक)।
(४) वेदाध्ययनके द्वारा तत्त्वको जानना (पन्द्रहवाँ श्लोक)।
(५) भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सब प्रकारसे उनका भजन करना (उन्नीसवाँ श्लोक)।
- नवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको दोष-दृष्टिसे रहित कहते हुए ही गुह्यतम ज्ञान बतानेकी प्रतिज्ञा की थी—‘इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूययै।’ इस पंद्रहवें अध्यायमें तो नवें अध्यायसे भी अधिक गोपनीय विषय बताया गया है। अतः यहाँ ‘अनघ’का तात्पर्य ‘अनसूया’ मानना उचित ही है।
१००८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
(६) सम्पूर्ण अध्यायके तत्त्वको जानना (बीसवों श्लोक)।
जिस अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके ऐसे सुगम उपाय बताये गये हों, उसको 'शास्त्र' कहना उचित ही है।
'मया उक्तम् '—इन पदोंसे भगवान् यह कहते हैं कि सम्पूर्ण भौतिक जगत्का प्रकाशक और अधिष्ठान, समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित, वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य एवं क्षर और अक्षर दोनोंसे उत्तम साक्षात् मुझ पुरुषोत्तमके द्वारा ही यह गुह्यतम शास्त्र अत्यन्त कृपापूर्वक कहा गया है। अपने विषयमें जैसा मैं कह सकता हूँ, वैसा कोई नहीं कह सकता। कारण कि दूसरा पहले (मेरी ही कृपाशक्तिसे) मेरेको जानेगा*, फिर वह मेरे विषयमें कुछ कहेगा, जबकि मेरेमें अनजानपना है ही नहीं।
वास्तवमें स्वयं भगवान्के अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनको पूर्णरूपसे नहीं जान सकता (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)। छठे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से कहा था कि आपके सिवाय दूसरा कोई भी मेरे संशयका छेदन नहीं कर सकता। यहाँ भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि मेरे द्वारा कहे हुए विषयमें किसी प्रकारका संशय रहनेकी सम्भावना ही नहीं है।
'एतद्वबुद्ध्या बुद्धिमानस्याकृतकृत्यश्च भारत '—पूरे अध्यायमें भगवान्ने जो संसारकी वास्तविकता, जीवात्माके स्वरूप और अपने अप्रतिम प्रभाव एवं गोपनीयताका वर्णन किया है, उसका (विशेषरूपसे उन्नीसवें श्लोकका) निर्देश यहाँ 'एतत् ' पदसे किया गया है। इस गुह्यतम शास्त्रको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह ज्ञानवान् अर्थात् ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। उसके लिये कुछ भी
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने इस अध्यायमें अपने-आपको पुरुषोत्तमरूपसे अर्थात् अलौकिक समग्ररूपसे प्रकट किया है, इसलिये इसको 'गुह्यतम शास्त्र' कहा गया है।
मनुष्य कर्मयोगसे कृतकृत्य, ज्ञानयोगसे ज्ञात-ज्ञातव्य और भक्तियोगसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। शरीर मेरा नहीं है, शरीरपर मेरा अधिकार नहीं है तथा शरीरसे मेरा सम्बन्ध नहीं है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। मेरेको कुछ नहीं चाहिये—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। इस श्लोकमें आये 'बुद्धिमान् ' पदमें ज्ञात-ज्ञातव्य होनेका भाव आया है। पूर्वश्लोकमें 'स सर्वविद्वजति मां सर्वभावेन भारत ' पदोंमें प्राप्त-प्राप्तव्य होनेका भाव आया है। प्रस्तुत श्लोकमें आये 'च ' पदसे भी अनुक्त समुच्चय अर्थ—प्राप्त-प्राप्तव्य ले सकते हैं। लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक
जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने जाननेयोग्य पुरुषोत्तमको जान लिया।
परमात्मतत्त्वको जाननेसे मनुष्यकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। परमात्मतत्त्वको जाने बिना लौकिक सम्पूर्ण विद्याएँ, भाषाएँ, कलाएँ आदि क्यों न जान ली जायँ, उनसे मूढ़ता नहीं मिटती; क्योंकि लौकिक सब विद्याएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली तथा अपूर्ण हैं। जितनी लौकिक विद्याएँ हैं, सब परमात्मासे ही प्रकट होनेवाली हैं; अतः वे परमात्माको कैसे प्रकाशित कर सकती हैं? इन सब लौकिक विद्याओंसे अनजान होते हुए भी जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।
उन्नीसवें श्लोकमें सब प्रकारसे भजन करनेवाले जिस मोहरहित भक्तको 'सर्ववित् ' कहा गया है, उसीको यहाँ 'बुद्धिमान् ' नामसे कहा गया है।
यहाँ 'च ' पदमें पूर्वश्लोकमें आयी बातके फल- (प्राप्त-प्राप्तव्यता-) का अनुकर्षण है। पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान्का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिके समान कोई लाभ नहीं है—'लाभु कि किञ्च ह्री भगति समाना ' (मानस ७। ११२। ४)। अतः जिसने भक्तिको प्राप्त कर लिया, वह प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।
भगवतत्त्वकी यह विलक्षणता है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंमेंसे किसी एककी सिद्धिसे कृतकृत्यता, ज्ञात-ज्ञातव्यता और प्राप्त-प्राप्तव्यता—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये जो भगवतत्त्वको जान लेता है, उसके लिये फिर कुछ जानना, पाना और करना शेष नहीं रहता। उसका मनुष्यजीवन सफल हो जाता है।
- सोड़ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हिरि कृपां तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (मानस २।१२७।२)
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
१००९
परमात्मा ही प्राप्तव्य है। इस श्लोकसे यह भाव निकलता है कि भक्तको ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंका फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ज्ञात-ज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ और दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘पुरुषोत्तमयोग’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
इस अध्यायमें कहे हुए विषयको यथार्थरूपसे समझ लेनेपर पुरुषोत्तम-(भगवान्-) के साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘पुरुषोत्तमयोग’ रखा गया है।
पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके दो सौ अट्ठासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ छः है।
(२) ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके सात सौ एक और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ बासठ है। इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, चौथा, पाँचवाँ और पंद्रहवाँ—ये चार श्लोक चौवालीस अक्षरोंके और तीसरा श्लोक पैतालीस
अक्षरोंका है। शेष पंद्रह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच।’
पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, तीसरा और चौथा—ये तीन श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं; और पाँचवाँ तथा पंद्रहवाँ—ये दो श्लोक ‘इन्द्रवज्रा’ छन्दवाले हैं। बचे हुए पंद्रह श्लोकोंमेंसे—सातवें श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’; नवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष दस (१, ६, ८, १०—१४, १६—१७) श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
पन्द्रहवें अध्यायका सार
भगवान्ने सातवें अध्यायमें अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया था—अपरा और परा (७।४-५)। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार—यह आठ प्रकारके भेदोंवाली ‘अपरा प्रकृति’ है और जिसने जगत्को धारण किया हुआ है, वह जीवरूप बनी हुई ‘परा प्रकृति’ है। अपरा और परा—दोनों ईश्वरकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव हैं। अपरा, परा और ईश्वर—इन तीनोंका विस्तारसे वर्णन भगवान् पन्द्रहवें अध्यायमें करते हैं। पन्द्रहवें अध्यायमें पहले संसार-वृक्षके रूपमें ‘अपरा’ का वर्णन करते हैं, फिर सातवें ग्यारहवें श्लोकतक अपने अंश-रूपसे ‘पराका वर्णन करते हैं, फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक अपने प्रभावका वर्णन करते हैं। अन्तमें अपरा, परा और ईश्वर—तीनोंका क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे वर्णन करके अध्यायका उपसंहार करते हैं।
सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी प्रकृति अर्थात् अपनेसे अभिन्न बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। परन्तु पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अपनेको अपरा (क्षर) से अतीत और परा (अक्षर) से उत्तम बताया है। इसका तात्पर्य है कि जबतक साधक अपरा (संसार) और परा (स्वयं)—दोनोंकी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, तबतक भगवान् अपरासे अतीत और परासे उत्तम हैं। परन्तु जब उसकी मान्यतामें अपरा और पराकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, तब अपरा, परा और भगवान्—तीनों एक ही होते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।
पन्द्रहवें अध्यायके मध्यमें अक्षर (जीवात्मा) के वर्णनका तात्पर्य है कि जीवके एक तरफ क्षर (संसार) है और एक तरफ पुरुषोत्तम (परमात्मा) है। जीवका सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोकै’; क्योंकि जैसे
१०१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परमात्मा चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील हैं, ऐसे ही जीव भी चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील है। शरीरका सम्बन्ध संसारके साथ है—‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि ’; क्योंकि जैसे संसार जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है, ऐसे ही शरीर भी जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है। जीवको परमात्मासे कभी अलग नहीं कर सकते और शरीरको संसारसे कभी अलग नहीं कर सकते।
परमात्मा उसको कहते हैं, जो अभी हो, सबमें हो, सबका हो, सर्वसमर्थ हो, परम दयालु हो और अद्वितीय हो। अभी होनेके कारण उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा नहीं करनी पड़ेगी। सबमें होनेसे वह अपनेमें भी है; अतः उनको ढूँढ़नेके लिये कहीं जाना नहीं पड़ेगा। सबका होनेसे वह अपना भी है; अतः उसमें स्वतः प्रेम होगा। सर्वसमर्थ होनेसे हमें भयभीत होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। परमदयालु होनेसे हमें निराश होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। अद्वितीय होनेसे हमें उसको पहचाननेकी, उसका वर्णन करनेकी जरूरत नहीं रहेगी।
परमात्माकी प्राप्ति न होनेका कारण यही है कि हम उसकी सत्ता और महत्ता स्वीकार नहीं करते और उसको अपना नहीं मानते। अगर हम उसकी सत्ता, महत्ता और अपनेपनको स्वीकार करते तो फिर वह हमें अप्राप्त नहीं लगता। वह हमें स्वतः प्यारा लगता; क्योंकि परमात्माको अपना माननेके सिवाय प्रेम-प्राप्तिका और कोई उपाय है ही नहीं। प्रेम यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि बड़े-बड़े पुण्यकर्मोंसे नहीं मिलता, प्रत्युत भगवान्को अपना माननेसे मिलता है। भगवान्ने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोकैः ’ (१५।७)। इसका तात्पर्य है कि जीव केवल मेरा (भगवान्का) ही अंश है, इसमें अन्य किसीका मिश्रण नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि केवल भगवान्का ही अंश होनेके कारण हमारा सम्बन्ध केवल भगवान्के ही साथ है। जब हम भगवान्के ही अंश हैं, तो फिर प्रकृतिका कार्य शरीर अपना कैसे हुआ? अतः भगवान् ही अपने हैं, दूसरा कोई भी अपना नहीं है। भगवान्का ही अंश होनेके कारण हम भगवान्से अलग नहीं हो सकते, उनको छोड़ नहीं सकते। सर्वसमर्थ भगवान् भी जीवसे अलग नहीं हो सकते, जीवको छोड़ नहीं सकते। अगर भगवान् जीवको छोड़ दें तो जीव एक नया भगवान् हो जायगा अर्थात् भगवान् एक नहीं रहेंगे, प्रत्युत अनेक हो जायेंगे, जो कभी सम्भव नहीं है। जिसको हम छोड़ नहीं सकते, उसके विषयमें यह प्रश्न ही नहीं उठता कि वह कैसा है? अतः भगवान् कैसे हैं, क्या हैं, यह विचार न करके उनमें प्रेम करना चाहिये। जब मनुष्य संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है और जब परमात्माके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब मुक्त होकर भक्त हो जाता है। मनुष्यसे सबसे बड़ी गलती यह होती है कि जो शरीर संसारका है, उसको अपना मान लेता है और जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको भूल जाता है। जब साधक इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि शरीर मेरा नहीं है और मेरे लिये भी नहीं है, तब उसके द्वारा स्वतः संसारकी ‘सेवा’ होती है। जब वह इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि भगवान् मेरे हैं और मेरे लिये हैं, तब उसका स्वतः भगवान्में ‘प्रेम’ होता है। सेवाके बदलेमें साधकको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि संसारकी ही वस्तु संसारको दे दी तो अपना क्या खर्च हुआ? नया उद्योग क्या हुआ? प्रेमके बदलेमें भी उसको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि जो सदासे ही अपना है, उसमें प्रेमसे बढ़कर ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसकी उसको आवश्यकता हो। प्रभु मेरे लिये हैं, इसलिये अपनेको उनके अर्पित करना है, उनसे कुछ लेना नहीं है। उनसे कुछ चाहनेसे हम उनसे अलग हो जायेंगे और अपनेको देनेसे उनसे अभिन्न हो जायेंगे।
सेवासे मुक्ति होती है और प्रेमसे पराभूतिक प्राप्त होती है। मुक्तिसे निरपेक्ष जीवनकी और भक्तिसे सरस जीवनकी प्राप्ति हो जाती है।
—◆◆◆—
॥ ॐ श्रीप्रमात्मने नमः ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें 'दुष्कृतिनो मूढाः आसुरं भावमाश्रिताः मां न प्रपद्यन्ते' (बुरे कर्म करनेवाले तथा आसुरी प्रकृतिको धारण करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरा भजन नहीं करते) पदोंसे आसुरी सम्पत्तिलाँका और सोलहवें श्लोकमें 'सुकृतिनः मां भजन्ते' (पुण्यकर्म लोग मेरा भजन करते हैं) पदोंसे दैवी सम्पत्तिलाँका संकेतरूपसे वर्णन किया। सातवें अध्यायके अन्तिम दो श्लोकोंपर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उन प्रश्नोंके उत्तरमें आठवाँ अध्याय पूरा हुआ।
भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसी विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेके लिये नवें अध्यायका विषय आरम्भ किया। इस नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी 'राक्षसीमासुरी चैव प्रकृतितं मोहिनीं श्रिताः' पदोंसे आसुरी सम्पदावालोंका और तेरहवें श्लोकमें 'दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः मां भजन्ते' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका संक्षेपसे वर्णन करके दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक ज्ञान-विज्ञानका विषय कहा।
दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके बाद भगवान्को दैवी-आसुरी-सम्पदाका विस्तारसे वर्णन करना चाहिये था, पर भगवान्के प्रभावसे प्रभावित होकर अर्जुनने भगवान्की स्तुति की एवं पुनः विभूति कहनेके लिये उनसे प्रार्थना की। विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें अर्जुनसे कहा कि 'तुझे अधिक जाननेसे क्या मतलब? मैं तो सारे संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ।' इसपर उस स्वरूपको (जिसके एक अंशमें सारा संसार स्थित है) देखनेके लिये उत्सुक हुए अर्जुनने ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की।
अर्जुनको अपना विश्वरूप दिखाकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य-भक्तिकी महिमा एवं उसका स्वरूप बताया। इसपर सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें अर्जुनने बारहवें अध्यायके पहले श्लोकमें प्रश्न किया। अतः भगवान्ने बारहवें अध्यायमें सगुण-उपासकोंका वर्णन करके तेरहवें अध्यायसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक निर्गुण-विषयका वर्णन किया। फिर अर्जुनने चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीतके लक्षण, आचरण एवं गुणातीत होनेका उपाय पूछा। उन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवान्ने छब्बीसवें श्लोकमें 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते' पदोंसे अव्यभिचारिणी भक्तिको गुणातीत होनेका उपाय बताया अर्थात् अव्यभिचारसे दैवी सम्पत्तिका और व्यभिचारसे आसुरी सम्पत्तिका संकेत किया। वह अव्यभिचारी भक्ति कैसे प्राप्त हो—यह बतानेके लिये पन्द्रहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।
पंद्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने 'असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा' पदोंसे आसुरी सम्पत्तिके कारणरूप 'संग'-(संसारकी आसक्ति-) का त्याग करके असंगतासे प्रकट होनेवाली दैवी सम्पत्तिकी बात कही। फिर चौथे श्लोकमें 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदोंसे शरणागतिरूप दैवी सम्पत्तिका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो शरण नहीं होते, उन आसुरी सम्पत्तिलाँका संकेत किया। फिर उन्नीसवें श्लोकमें 'स सर्वविदु असम्भूदः मां सर्वभावेन भजति' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका अर्थात् अधिकारियोंका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो भगवान्का भजन नहीं करते, उन आसुरी सम्पदावालोंका अर्थात् अनधिकारियोंका वर्णन किया।
इस प्रकार अर्जुनके अन्य प्रश्नोंके कारण अबतक भगवान्को दैवी और आसुरी सम्पदापर विस्तारसे कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। अब अर्जुनका कोई प्रश्न न रहनेसे भगवान् इस सोलहवें अध्यायमें दैवी और आसुरी सम्पदाका विस्तारसे वर्णन आरम्भ करते हैं।
१०१२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
अभयम् | = भयका सर्वथा अभाव, | योगमें दृढ़ स्थिति, | स्वाध्यायः | = स्वाध्याय, ---|---|---|---|--- सत्त्वसंशुद्धिः | = अन्तःकरणकी अत्यन्त शुद्धि, | च | = और | लिये कष्ट सहना ज्ञानयोग- | | दानम् | = सात्त्विक दान, | च | = और व्यवस्थितिः | = ज्ञानके लिये | दमः | = इन्द्रियोंका दमन, | आर्जवम् | = शरीर-मन-वाणीकी सरलता। | | यज्ञः | = यज्ञ, | |
व्याख्या—[पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'जो मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है अर्थात् वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है।' इस प्रकार एकमात्र भगवान्का उद्देश्य होनेपर साधकमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होने लग जाती है। अतः भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें क्रमशः भाव, आचरण और प्रभावको लेकर दैवी-सम्पत्तिका वर्णन करते हैं।]
'अभयम्'—अनिष्टकी आशंकासे मनुष्यके भीतर जो घबरहट होती है, उसका नाम भय है और उस भयके सर्वथा अभावका नाम 'अभय' है।
भय दो रीतिसे होता है—(१) बाहरसे और (२) भीतरसे।
(१) बाहरसे आनेवाला भय—
(क) चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प आदि प्राणियोंसे जो भय होता है, वह बाहरका भय है। यह भय शरीरनाशकी आशंकासे ही होता है। परन्तु जब यह अनुभव हो जाता है कि यह शरीर नाशवान् है और जानेवाला ही है, तो फिर भय नहीं रहता।
बीडी-सिगरेट, अफीम, भाँग, शराब आदिके व्यसनोंको छोड़नेका एवं व्यसनी मित्रोंसे अपनी मित्रता टूटनेका जो भय होता है, वह मनुष्यकी अपनी कायरतासे ही होता है। कायरता छोड़नेसे यह भय नहीं रहता।
(ख) अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्य-पालन करते हुए उसमें भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई काम न हो जाय; हमें विद्या पढ़ानेवाले, अच्छी शिक्षा देनेवाले आचार्य, गुरु, सन्त-महात्मा, माता-पिता आदिके वचनोंकी आज्ञाकी अवहेलना न हो जाय; हमारे द्वारा शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध कोई आचरण न बन जाय—इस प्रकारका भय भी बाहरी भय कहलाता है। परन्तु यह भय वास्तवमें भय नहीं है, प्रत्युत यह तो अभय बनानेवाला भय है। ऐसा भय तो साधकके जीवनमें होना ही चाहिये। ऐसा भय होनेसे ही वह अपने मार्गपर ठीक तरहसे चल सकता है। कहा भी है—
हरि-डर, गुरु-डर, जगत-डर, डर करनी में सार।
रज्जब डर्या सो ऊबर्या, गाफिल खायी मार ॥
(२) भीतरसे पैदा होनेवाला भय—
(क) मनुष्य जब पाप, अन्याय, अत्याचार आदि निषिद्ध आचरण करना चाहता है, तब (उनको करनेकी भावना मनमें आते ही) भीतरसे भय पैदा होता है। मनुष्य निषिद्ध आचरण तभीतक करता है, जबतक उसके मनमें 'मेरा शरीर बना रहे, मेरा मान-सम्मान होता रहे, मेरेको सांसारिक भोग-पदार्थ मिलते रहें', इस प्रकार सांसारिक जड़ वस्तुओंकी प्राप्तिका और उनकी रक्षाका उद्देश्य रहता है'। परन्तु जब मनुष्यका एकमात्र उद्देश्य चिन्मय-तत्त्वको
१-यहाँ दैवी सम्पत्तिमें सबसे पहले 'अभयम्' पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर सर्वभावसे भगवान्का भजन करता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है। भगवान् श्रीराम कहते हैं—
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येत्तद् ब्रतं मम ॥ (वाल्मीकिः ६।१८।३३)
२-भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैत्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।
शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥
(भर्तृहरिवैराग्यशतक)
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१३
प्राप्त करनेका हो जाता है, तब उसके द्वारा अन्याय, दुराचार छूट जाते हैं और वह सर्वथा अभय हो जाता है। कारण कि उसके लक्ष्य परमात्मत्वमें कभी कभी नहीं आती और वह कभी नष्ट नहीं होता।
(ख) जब मनुष्यके आचरण ठीक नहीं होते और वह अन्याय, अत्याचार आदिमें लगा रहता है, तब उसको भय लगता है। जैसे, रावणसे मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि सभी डरते थे, पर वही रावण जब सीताका हरण करनेके लिये जाता है, तब वह डरता है। ऐसे ही कौरवोंकी ग्यारह अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तो उसका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं हुआ (गीता—पहले अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), पर जब पाण्डवोंकी सात अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तब कौरव-सेनाके हृदय विदीर्ण हो गये (पहले अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह कि अन्याय, अत्याचार करनेवालोंके हृदय कमजोर हो जाते हैं, इसलिये वे भयभीत होते हैं। जब मनुष्य अन्याय आदिको छोड़कर अपने आचरणों एवं भावोंको शुद्ध बनाता है, तब उसका भय मिट जाता है।
(ग) मनुष्य-शरीर प्राप्त करके यह जीव जबतक करनेयोग्यको नहीं करता, जाननेयोग्यको नहीं जानता और पानेयोग्यको नहीं पाता, तबतक वह सर्वथा अभय नहीं हो सकता; उसके जीवनमें भय रहता ही है।
भगवान्की तरफ चलनेवाला साधक भगवान्पर जितना-जितना अधिक विश्वास करता है और उनके आश्रित होता है, उतना-ही-उतना वह अभय होता चला जाता है। उसमें स्वतः यह विचार आता है कि मैं तो परमात्माका अंश हूँ; अतः कभी नष्ट होनेवाला नहीं हूँ, तो फिर भय किस बातका? और संसारके अंश शरीर आदि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, तो फिर भय किस बातका? ऐसा विवेक स्पष्टरूपसे प्रकट होनेपर भय स्वतः नष्ट हो जाता है और साधक सर्वथा अभय हो जाता है।
भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेपर, भगवान्को ही
अपना माननेपर शरीर, कुटुम्ब आदिमें ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे मरनेका भय नहीं रहता और साधक अभय हो जाता है।
‘सत्त्वसंशुद्धिः’—अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धिको सत्त्वसंशुद्धि कहते हैं। सम्यक् शुद्धि क्या है? संसारसे राग रहित होकर भगवान्में अनुराग हो जाना ही अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धि है। जब अपना विचार, भाव, उद्देश्य, लक्ष्य केवल एक परमात्माकी प्राप्तिका हो जाता है, तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कारण कि नाशवान् वस्तुओंकी प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे ही अन्तःकरणमें मल, विक्षेप और आवरण—ये तीन तरहके दोष आते हैं। शास्त्रोंमें मल-दोषको दूर करनेके लिये निष्कामभावसे कर्म (सेवा), विक्षेप-दोषको दूर करनेके लिये उपासना और आवरण-दोषको दूर करनेके लिये ज्ञान बताया है। यह होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबसे बढ़िया उपाय है—अन्तःकरणको अपना न मानना।
साधकको पुराने पापको दूर करनेके लिये या किसी परिस्थितिके वशीभूत होकर किये गये नये पापको दूर करनेके लिये अन्य प्रायश्चित्त करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है। उसको तो चाहिये कि वह जो साधन कर रहा है, उसीमें उत्साह और तत्परतापूर्वक लगा रहे। फिर उसके ज्ञात-अज्ञात सब पाप दूर हो जायेंगे और अन्तःकरण स्वतः शुद्ध हो जायगा।
साधकमें ऐसी एक भावना बन जाती है कि साधन-भजन करना अलग काम है और व्यापार-धंधा आदि करना अलग काम है अर्थात् ये दोनों अलग-अलग विभाग हैं। इसलिये व्यापार आदि व्यवहारमें झूठ-कपट आदि तो करने ही पड़ते हैं—ऐसी जो छूट ली जाती है, उससे अन्तःकरण बहुत ही अशुद्ध होता है। साधनके साथ-साथ जो असामान्य होता रहता है, उससे साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। इसलिये साधकको सदा सावधान रहना चाहिये अर्थात् नया पाप कभी न बने—ऐसी सावधानी सदा-सर्वदा बनी रहनी चाहिये।
‘भोगोंमें रोगका भय, ऊँचे कुलमें गिरनेका भय, धनमें राजाका भय, मानमें दीनताका भय, बलमें शत्रुका भय, रूपमें बुढ़ापेका भय, शास्त्रमें वाद-विवादका भय, गुणमें दुर्जनका भय और शरीरमें मृत्युका भय है। इस प्रकार संसारमें मनुष्योंके लिये सम्पूर्ण वस्तुएँ भयावह हैं, एक वैराग्य ही भयसे रहित है।’
तात्पर्य यह है कि ये सांसारिक वस्तुएँ कहीं नष्ट न हो जायें—इसका मनुष्यको सदा भय रहता है, इसलिये वह अभय नहीं हो पाता।
१-उद्देश्य तो पहलेसे ही बना हुआ है। उसके बाद हमें मनुष्य-शरीर मिला है। अतः उद्देश्यको केवल पहचानना है, बनाना नहीं है।
२-राम मेरे तो मैं मरूँ, नहीं तो मेरे बलाय। अविनाशी का बालका, मेरे न मारा जाय।
१०१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
साधक भूलसे किये हुए दुष्कर्मोंके अनुसार अपनेको दोषी मान लेता है और अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिको भी दोषी मान लेता है, जिससे उसका अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। उस अशुद्धिको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह भूलसे किये हुए दुष्कर्मको पुनः कभी न करनेका दृढ़ व्रत ले ले तथा अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिके अपराधको क्षमा माँगें बिना ही क्षमा कर दे और भगवान्से प्रार्थना करे कि 'हे नाथ! मेरा जो कुछ बुरा हुआ है, वह तो मेरे दुष्कर्मोंका ही फल है। वह बेचारा तो मुफ्तमें ही ऐसा कर बैठा है। उसका इसमें कोई दोष नहीं है। आप उसे क्षमा कर दें।' ऐसा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।
'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः' —ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना अर्थात् परमात्मतत्त्वका जो ज्ञान (बोध) है, वह चाहे सगुणका हो या निर्गुणका, उस ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना आवश्यक है। योगका अर्थ है—सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें, मान-अपमानमें, निन्दा-स्तुतिमें, रोग-नीरोगतामें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि न होकर निर्विकार रहना।
'दानम्' —लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वितर्ण कर देना 'दान' है। दान कई तरहके होते हैं; जैसे भूमिदान, गोदान, स्वर्णदान, अन्नदान, वस्त्रदान आदि। इन सबमें अन्नदान प्रधान है। परन्तु इससे भी अभयदान प्रधान (श्रेष्ठ) है। उस अभयदानके दो भेद होते हैं—
(१) संसारकी आफतसे, विघ्नोंसे, परिस्थितियोंसे भयभीत हुएको अपनी शक्ति, सामर्थ्यके अनुसार भयरहित करना, उसे आश्वासन देना, उसकी सहायता करना। यह अभयदान उसके शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको लेकर होता है।
(२) संसारमें फँसे हुए व्यक्तिको जन्म-मरणसे रहित करनेके लिये भगवान्की कथा आदि सुनाना। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको एवं उनके भावोंको सरल भाषामें छपवाकर सस्ते दामोंमें लोगोंको देना अथवा कोई समझना चाहे तो उसको समझाना, जिससे उसका कल्याण हो जाय। ऐसे दानसे भगवान् बहुत राजी होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गसठवाँ-उनहत्तरवाँ श्लोक); क्योंकि भगवान् ही सबमें परिपूर्ण हैं। अतः जितने अधिक जीवोंका कल्याण होता है, उतने ही अधिक भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ अभयदान है। इसमें भी भगवत्-सम्बन्धी बातें दूसरोंको सुनाते समय साधक वक्ताको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता न माने, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपा माने कि भगवान् ही श्रोताओंके रूपमें आकर मेरा समय सार्थक कर रहे हैं।
ऊपर जितने दान बताये हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़कर साधक ऐसा माने कि अपने पास वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्ने दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मुझे निमित्त बनाकर दी है। अतः भगवत्प्रतीत्यर्थ आवश्यकतानुसार जिस-किसीको जो कुछ दिया जाय, वह सब उसीका समझकर उसे देना 'दान' है।
'दमः' —इन्द्रियोंको पूरी तरह वशमें करनेका नाम 'दम' है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों, अन्तःकरण और शरीरसे कोई भी प्रवृत्ति शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये। शास्त्रविहित प्रवृत्ति भी अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही होनी चाहिये। इस प्रकारकी प्रवृत्तिसे इन्द्रियलोलुपता, आसक्ति और पराधीनता नहीं रहती एवं शरीर और इन्द्रियोंके बर्ताव शुद्ध, निर्मल होते हैं।
साधकका उद्देश्य इन्द्रियोंके दमनका होनेसे अकर्तव्यमें तो उसकी प्रवृत्ति होती ही नहीं और कर्तव्यमें स्वाभाविक
१-न गोप्रदानं न महीप्रदानं न चान्द्रदानं हि तथा प्रधानम्। यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं सर्वप्रदानेष्वभयप्रदानम्॥
(पंचतन्त्र, मित्रभेद ३१३)
'गोदान, भूमिदान और अन्नदान भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अभयदान है। विद्वान्लोग अभयदानको सब दानोंसे श्रेष्ठ कहते हैं।'
२-तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्पषापहम्। श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
(श्रीमद्भा० १०। ३१। १)
'हे प्रभो! आपका कथामृत संसारमें जो संतप्त प्राणी हैं, उनको जीवन देनेवाला, शान्ति देनेवाला है, अच्छे-अच्छे महापुरुष भी उसका हृदयसे वर्णन करते हैं, वह सम्पूर्ण पापोंका अर्थात् भगवद्विमुखताका नाश करनेवाला है, कानोंमें पड़ते ही सब तरहसे मंगल-ही-मंगल देनेवाला है, संत-महापुरुषोंके द्वारा उसका विस्तारसे वर्णन किया गया है। ऐसे कथामृतका पृथ्वीपर जो कथन करते हैं, वे संसारको बहुत विशेषतासे दान देनेवाले हैं अर्थात् संसारका सबसे अधिक उपकार, हित करनेवाले हैं।'
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रवृत्ति होती है, तो उसमें स्वार्थ, अभिमान, आसक्ति, कामना आदि दोष नहीं रहते। यदि कभी किसी कार्यमें स्वार्थभाव आ भी जाता है, तो वह उसका दमन करता चला जाता है, जिससे अशुद्धि मिटती जाती है और शुद्धि होती चली जाती है और आगे चलकर उसका दम अर्थात् इन्द्रिय-संयम सिद्ध हो जाता है।
‘यज्ञः’—‘यज्ञ’ शब्दका अर्थ आहुति देना होता है। अतः अपने वर्णाश्रमके अनुसार होम, बलिवेश्वदेव आदि करना ‘यज्ञ’ है। इसके सिवाय गीताकी दृष्टिसे अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिक अनुसार जिस-किसी समय जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितकी भावनासे या भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। इसके अतिरिक्त जीविका-सम्बन्धी व्यापार, खेती आदि तथा शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी खाना-पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना, देना-लेना आदि सभी क्रियाएँ भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। ऐसे ही माता-पिता, आचार्य, गुरुजन आदिकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको मन, वाणी, तन और धनसे सुख पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना और गौ, ब्राह्मण, देवता, परमात्मा आदिका पूजन करना, सत्कार करना—ये सभी ‘यज्ञ’ हैं।
‘स्वाध्यायः’— अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठन-पाठनका नाम ‘स्वाध्याय’ है। वास्तवमें तो ‘स्वस्य अध्यायः (अध्ययनम्) स्वाध्यायः’ के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही ‘स्वाध्याय’ है। इसमें भी साधकको न तो अपनी वृत्तियोंसे अपनी स्थितिकी कसौटी लगानी है और न वृत्तियोंके अधीन अपनी स्थिति ही माननी है। कारण कि वृत्तियाँ तो हरदम आती-जाती रहती हैं, बदलती रहती हैं। तो फिर स्वाभाविक यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी वृत्तियोंको शुद्ध न करें? वास्तवमें तो साधकका कर्तव्य वृत्तियोंको शुद्ध करनेका ही होना चाहिये और वह शुद्धि अन्तःकरण तथा उसकी वृत्तियोंको अपना न माननेसे बहुत जल्दी हो जाती है; क्योंकि उनको अपना मानना ही मूल अशुद्धि है। साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे अपना स्वरूप
कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं। केवल वृत्तियोंके अशुद्ध होनेसे ही उसका यथार्थ अनुभव नहीं होता।
‘तपः’— भूख-प्यास, सरदी-गरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूख-प्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवन-निर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना ही ‘तप’ है; * क्योंकि इस तपमें पहले किये गये पापोंका नाश होता है और सहनेवालेमें सहनेकी एक नयी शक्ति, एक नया बल आता है।
साधकको सावधान रहना चाहिये कि वह उस तपोबलका प्रयोग दूसरोंको वरदान देनेमें, शाप देने या अनिष्ट करनेमें तथा अपनी इच्छापूर्ति करनेमें न लगाये, प्रत्युत उस बलको अपने साधनमें जो बाधाएँ आती हैं, उनको प्रसन्नतासे सहनेकी शक्ति बढ़ानेमें ही लगाये।
साधक जब साधन करता है, तब वह साधनमें कई तरहसे विघ्न मानता है। वह समझता है कि मुझे एकान्त मिले तो मैं साधन कर सकता हूँ, वायुमण्डल अच्छा हो तो साधन कर सकता हूँ इत्यादि। इन सब अनुकूलताओंकी चाहना न करना अर्थात् उनके अधीन न होना भी ‘तप’ है। साधकको अपना साधन परिस्थितियोंके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बना लेना चाहिये। साधकको अपनी चेष्टा तो एकान्तमें साधन करनेकी करनी चाहिये, पर एकान्त न मिले तो मिली हुई परिस्थितिको भगवान्की भेजी हुई समझकर विशेष उत्साहसे प्रसन्नतापूर्वक साधनमें प्रवृत्त होना चाहिये।
‘आर्जवम्’— सरलता, सीधेपनको ‘आर्जव’ कहते हैं। यह सरलता साधकका विशेष गुण है। यदि साधक यह चाहता है कि दूसरे लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा व्यवहार ठीक नहीं होगा तो लोग मुझे बढिया नहीं मानेंगे, इसलिये मुझे सरलतासे रहना चाहिये, तो यह एक प्रकारका कपट ही है। इससे साधकमें बनावटीपन आता है, जब कि साधकमें सीधा, सरल भाव होना चाहिये। सीधा, सरल होनेके कारण लोग उसको मूर्ख, बेसमझ कह सकते हैं, पर उससे साधककी कोई हानि नहीं है। अपने उद्धारके लिये
- आगते स्वागतं कुर्याद् गच्छन्तं न निवारयेत्। यथाप्राप्तं सहेतस्व सा तपस्योत्तमोत्तमा ॥ (बोधसार)
‘प्रारब्धवश परिस्थितिरूपसे जो कुछ आ जाय, उसका स्वागत करे, जानेवालेको रोके नहीं और जो जैसे प्राप्त हो, उसे वैसे ही सहन करे, यही उत्तम-से-उत्तम तप है।’