श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
मूल्य-(साधन, योग्यता आदि-) के बदलेमें परमात्माकी प्राप्ति मानी जाय, तो उनसे हमें लाभ भी क्या होगा? क्योंकि उनसे अधिक मूल्यकी वस्तु (साधन आदि) तो हमारे पास पहलेसे है ही!
जैसे सांसारिक पदार्थ कर्मोंसे मिलते हैं, ऐसे परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है। प्रत्येक कर्मकी उत्पत्ति अहंभावसे होती है और परमात्मप्राप्ति अहंभावके मिटनेपर होती है। कारण कि अहंभाव कृति (कर्म) है और परमात्मा कृतिरहित है। कृतिरहित तत्त्वको किसी कृतिसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है—‘नास्त्यकृतः कृतेन।’ (मुण्डको १।२।१२) तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि जड़-पदार्थोंके द्वारा नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है। जबतक मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, देश, काल, वस्तु आदिका आश्रय है, तबतक एक परमात्माका आश्रय नहीं हो सकता। मन, बुद्धि आदिके आश्रयसे परमात्मप्राप्ति होगी—यही साधककी मूल भूल है। अगर जड़ताका आश्रय और विश्वास छूट जाय तथा एकमात्र परमात्माका ही आश्रय और विश्वास हो जाय, तो परमात्मप्राप्तियें देरी नहीं लग सकती।
‘मनः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन् च’—किसी बातकी भूली हुई जानकारीका (किसी कारणसे) पुनः प्राप्त होना ‘स्मृति’ कहलाती है। स्मृति और चिन्तन—दोनोंमें फरक है। नयी बातका ‘चिन्तन’ और पुरानी बातकी ‘स्मृति’ होती है। अतः चिन्तन संसारका और स्मृति परमात्माकी होती है; क्योंकि संसार पहले नहीं था और परमात्मा पहले-(अनादिकाल-) से हैं। स्मृतियें जो शक्ति है, वह चिन्तनमें नहीं है। स्मृतियें कर्तापनका भाव कम रहता है, जबकि चिन्तनमें कर्तापनका भाव अधिक रहता है।
एक स्मृति की जाती है और एक स्मृति होती है। जो स्मृति की जाती है, वह ‘बुद्धि’में और जो होती है, वह ‘स्वयं’में होती है। होनेवाली स्मृति जड़तासे तत्काल सम्बन्ध-विच्छेद करा देती है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि यह (होनेवाली) स्मृति मेरेसे ही होती है।
परमात्माका अंश होते हुए भी जीव भूलसे परमात्मासे विमुख हो जाता है और अपना सम्बन्ध संसारसे मानने लगता है। इस भूलका नाश होनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ, संसारका नहीं’ ऐसा साक्षात् अनुभव हो जाना ही ‘स्मृति’ है (गीता—अठारहवें अध्यायका तिहत्तरवाँ श्लोक)। स्मृतियें कोई नया ज्ञान या अनुभव नहीं होता, प्रत्युत केवल
विस्मृति-(मोह-) का नाश होता है। भगवान्से हमारा वास्तविक सम्बन्ध है। इस वास्तविकताका प्रकट होना ही स्मृतिका प्राप्त होना है।
जीवमें निष्कामभाव (कर्मयोग), स्वरूप-बोध (ज्ञान-योग) और भगवत्प्रेम (भक्तियोग)—तीनों स्वतः विद्यमान हैं। जीवको (अनादिकालसे) इनकी विस्मृति हो गयी है। एक बार इनकी स्मृति हो जानेपर फिर विस्मृति नहीं होती। कारण कि यह स्मृति ‘स्वयं’में जाग्रत् होती है। ‘बुद्धि’में होनेवाली लौकिक स्मृति (बुद्धिके क्षीण होनेपर) नष्ट भी हो सकती है, पर ‘स्वयं’ में होनेवाली स्मृति कभी नष्ट नहीं होती।
किसी विषयकी जानकारीको ‘ज्ञान’ कहते हैं। लौकिक और पारमार्थिक जितना भी ज्ञान है, वह सब ज्ञानस्वरूप परमात्माका आभास-मात्र है। अतः ज्ञानको भगवान् अपनेसे ही होनेवाला बताते हैं। वास्तवमें ज्ञान वही है, जो ‘स्वयं’ से जाना जाय। अनन्त, पूर्ण और नित्य होनेके कारण इस ज्ञानमें कोई सन्देह या भ्रम नहीं होता। यद्यपि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘ज्ञान’ कहलाता है, तथापि सीमित, अल्प (अपूर्ण) तथा परिवर्तनशील होनेके कारण इस ज्ञानमें सन्देह या भ्रम रहता है; जैसे-नेत्रोंसे देखनेपर सूर्य अत्यन्त बड़ा होते हुए भी (आकाशमें) छोटा-सा दीखता है इत्यादि। बुद्धिसे जिस बातको पहले ठीक समझते थे, बुद्धिके विकसित अथवा शुद्ध होनेपर वही बात गलत दीखने लग जाती है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान करण-सापेक्ष और अल्प होता है। अल्प ज्ञान ही ‘अज्ञान’ कहलाता है। इसके विपरीत ‘स्वयं’ का ज्ञान किसी करण-(इन्द्रिय, बुद्धि आदि-) की अपेक्षा नहीं रखता और वह सदा पूर्ण होता है। वास्तवमें इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘स्वयं’ के ज्ञानसे प्रकाशित होते हैं अर्थात् सत्ता पाते हैं।
संशय, भ्रम, विपर्यय (विपरीत भाव), तर्क-वितर्क आदि दोषोंके दूर होनेका नाम ‘अपोहन’ है। भगवान् कहते हैं कि ये (संशय आदि) दोष भी मेरी कृपासे ही दूर होते हैं।
शास्त्रोंकी बातें सत्य हैं या असत्य? भगवान्को किसने देखा है? संसार ही सत्य है इत्यादि संशय और भ्रम भगवान्की कृपासे ही मिटते हैं। सांसारिक पदार्थोंमें अपना हित दीखना, उनकी प्राप्तिमें सुख दीखना, प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले संसारकी सत्ता दीखना आदि विपरीत भाव भी भगवान्की कृपासे ही दूर होते हैं। गीतोपदेशके अन्तमें