श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या—‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’* —पीछेके श्लोकोंमें अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि मैं स्वयं सब प्राणियोंके हृदयमें विद्यमान हूँ। यद्यपि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी स्थानोंमें भगवान् विद्यमान हैं, तथापि हृदयमें वे विशेषरूपसे विद्यमान हैं।
हृदय शरीरका प्रधान अंग है। सब प्रकारके भाव हृदयमें ही होते हैं। समस्त कर्मोंमें भाव ही प्रधान होता है। भावकी शुद्धिसे समस्त पदार्थ, क्रिया आदिकी शुद्धि हो जाती है। अतः महत्त्व भावका ही है, वस्तु, व्यक्ति, कर्म आदिका नहीं। वह भाव हृदयमें होनेसे हृदयकी बहुत महत्ता है। हृदय सत्त्वगुणका कार्य है, इसलिये भी भगवान् हृदयमें विशेषरूपसे रहते हैं।
भगवान् कहते हैं कि मैं प्रत्येक मनुष्यके अत्यन्त नजदीक उसके हृदयमें रहता हूँ; अतः किसी भी साधकको (मेरेसे दूरी अथवा वियोगका अनुभव करते हुए भी) मेरी प्राप्तिसे निराश नहीं होना चाहिये। इसलिये पापी-पुण्यात्मा, मूर्ख-पण्डित, निर्धन-धनवान्, रोगी-नौरोग आदि कोई भी स्त्री-पुरुष किसी भी जाति, वर्ण, सम्प्रदाय, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिमें क्यों न हो, भगवत्प्राप्तिका वह पूरा अधिकारी है। आवश्यकता केवल भगवत्प्राप्तिकी ऐसी तीव्र अभिलाषा, लगन, व्याकुलताकी है, जिसमें भगवत्प्राप्तिके बिना रहा न जाय।
परमात्मा सर्वव्यापी अर्थात् सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी हृदयमें प्राप्त होते हैं। जैसे गायके सम्पूर्ण शरीरमें दूध व्याप्त होनेपर भी वह उसके स्तनोंसे ही प्राप्त होता है अथवा पृथ्वीमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही प्राप्त होता है, ऐसे ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि, पृथ्वी, वैश्वानर आदि सबमें व्याप्त होनेपर भी
परमात्मा ‘हृदय’ में प्राप्त होते हैं। (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ और अठारहवें अध्यायका इकसठवाँ श्लोक)।
परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात
हृदयमें निरन्तर स्थित रहनेके कारण परमात्मा वास्तवमें मनुष्यमात्रको प्राप्त है; परन्तु जडता-(संसार-) से माने हुए सम्बन्धके कारण जडताकी तरफ ही दृष्टि रहनेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं अर्थात् उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो रहा है। जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही सर्वत्र विद्यमान (नित्यप्राप्त) परमात्मतत्त्व स्वतः अनुभवमें आ जाता है।
परमात्मप्राप्तिके लिये जो सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन किया जाता है, उसमें जडता-(असत्-)का आश्रय रहता ही है। कारण है कि जडता-(स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर-) का आश्रय लिये बिना इनका होना सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें इनकी सार्थकता जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करानेमें ही है। जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद तभी होगा, जब ये (सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन) केवल संसारके हितके लिये ही किये जायँ, अपने लिये नहीं।
किसी विशेष साधन, गुण, योग्यता, लक्षण आदिके बदलेमें परमात्मप्राप्ति होगी—यह बिलकुल गलत धारणा है। किसी मूल्यके बदलेमें जो वस्तु प्राप्त होती है, वह उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है—यह सिद्धान्त है। अतः यदि किसी विशेष साधन, योग्यता आदिके द्वारा ही परमात्म-प्राप्तिका होना माना जाय, तो परमात्मा उस साधन, योग्यता आदिसे कम मूल्यके (कमजोर) ही सिद्ध होते हैं, जबकि परमात्मा किसीसे कम मूल्यके नहीं हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका तैंतालीसवाँ श्लोक)। इसलिये वे किसी साधन आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। इसके सिवाय अगर किसी
(७) कूर्म—इसका कार्य है—नेत्रोंको खोलना और बंद करना।
(८) कूकर—इसका कार्य है—छँकना।
(९) देवदत्त—इसका कार्य है—जम्हाई लेना।
(१०) धनंजय—यह मृत्युके बाद भी शरीरमें रहता है, जिससे मृतशरीर फूल जाया करता है। वास्तवमें एक ही प्राणवायुके भिन्न-भिन्न कार्योंके अनुसार उपर्युक्त भेद माने गये हैं।
- द्वा सुपुर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्व्यन्मनश्चनन्यो अभिचाकशीति॥
(मुण्डक० ३।१।१; श्वेताश्वतर० ४।६)
‘सदा साथ रहनेवाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा एवं परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है; किन्तु दूसरा (परमात्मा) उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।’