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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

है*। इस श्लोकमें भगवान् दो प्रधान वायु—प्राण और अपानका ही वर्णन करते हैं; क्योंकि ये दोनों वायु जटराग्निको प्रदीप्त करती हैं। जटराग्निसे पचे हुए भोजनके सूक्ष्म अंश या रसको शरीरके प्रत्येक अंगमें पहुँचानेका सूक्ष्म कार्य भी मुख्यतः प्राण और अपान वायुका ही है।

‘पचाम्यन्तं चतुर्विधम्’ —प्राणी चार प्रकारके अन्नका भोजन करते हैं—

(१) भोज्य —जो अन्न दाँतोसे चबाकर खाया जाता है; जैसे—रोटी, पुआ आदि।

(२) पेय —जो अन्न निगला जाता है; जैसे खिचड़ी, हलवा, दूध, रस आदि।

(३) चोष्य —दाँतोसे दबाकर जिस खाद्य पदार्थका रस चूसा जाता है और बचे हुए असार भागको थूक दिया जाता है; जैसे—ऊख, आम आदि। वृक्षादि स्थावर योनियों इसी प्रकारसे अन्नको ग्रहण करती हैं।

(४) लेह्य —जो अन्न जिह्वासे चाटा जाता है; जैसे—चटनी, शहद आदि।

अन्नके उपर्युक्त चार प्रकारोंमें भी एक-एकके अनेक भेद हैं। भगवान् कहते हैं कि उन चारों प्रकारके अन्नोंको वैश्वानर-(जटराग्नि-) रूपसे मैं ही पचाता हूँ। अन्नका ऐसा कोई अंश नहीं है, जो मेरी शक्तिके बिना पच सके।

परिशिष्ट भाव —पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करना, चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियोंका पोषण करना, फिर उनको खानेवाले प्राणियोंके भीतर जटराग्नि होकर खाने हुए अन्नको पचना आदि सम्पूर्ण कार्य भगवान्की ही शक्तिसे होते हैं। परन्तु मनुष्य उन कार्योंको अपने द्वारा किया जानेवाला मानकर मुफ्तमें ही अभिमान कर लेता है—‘अहं करोमीति वृथाभिमानः’; जैसे बैलगाड़ीके नीचे छायामें चलनेवाला कुत्ता समझता है कि बैलगाड़ी मैं ही चलाता हूँ!

सम्बन्ध—पीछेके तीन श्लोकोंमें अपनी प्रभावयुक्त विभूतियोंका वर्णन करके अब उस विषयका उपसंहार करते हुए भगवान् सब प्रकारसे जाननेयोग्य तत्त्व स्वयंको बताते हैं।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टा मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्देविवेदव चाहम् ॥ १५ ॥

अहम्= मैंज्ञानम्= ज्ञानएव= ही
= ही= औरवेद्यः= जाननेयोग्य हूँ।
सर्वस्य= सम्पूर्ण प्राणियोंकेअपोहनम्= अपोहन ( संशय आदि दोषोंका नाश )वेदान्तकृत्= वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला
हृदि= हृदयमेंहोता है।= और
सन्निविष्टः= स्थित हूँसर्वैः= सम्पूर्णवेदवित्= वेदोंको जाननेवाला
= तथावेदैः= वेदोंके द्वाराएव= भी
मत्तः= मुझसे ( ही )अहम्= मैंअहम्= मैं ( ही हूँ )।
स्मृतिः= स्मृति,
  • इन दसों प्राणवायुके भिन्न-भिन्न कार्य इस प्रकार हैं—

( १ ) प्राण—इसका निवास-स्थान हृदय है। इसके कार्य हैं—श्वासको बाहर निकालना, खाने हुए अन्नको पचना इत्यादि।

( २ ) अपान—इसका निवास-स्थान गुदा है। इसके कार्य हैं—श्वासको भीतर ले जाना, मल-मूत्रको बाहर निकालना, गर्भको बाहर निकालना इत्यादि।

( ३ ) समान—इसका निवास-स्थान नाभि है। इसका कार्य है—पचे हुए भोजनके रसको सब अंगोंमें बाँटना।

( ४ ) उदान—इसका निवास-स्थान कण्ठ है। जब भोजन करते हैं, तब उसके गाढ़े भाग और जल-भागको यह अलग-अलग करता है। सूक्ष्मशरीरको स्थूलशरीरसे बाहर निकालना तथा उसे दूसरे शरीर या लोकमें ले जाना भी इसीका कार्य है।

( ५ ) व्यान—इसका निवास-स्थान सम्पूर्ण शरीर है। इसका कार्य है—शरीर तथा उसके अंगोंको सिकोड़ना या फैलाना।

( ६ ) नाग—इसका कार्य है—डकार लेना।