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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 994

श्लोक १४ ] * साधक-संजीवनी * १९३

पूर्वश्लोकमें करनेके बाद अब भगवान् इस श्लोकमें

चन्द्रमाकी पोषण-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं कि

चन्द्रमाके माध्यमसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंमें ही पुष्ट

करता हूँ।

है। उपर्युक्त पदोंमें विशेषरूपसे 'सोम:' पद देनेका अभिप्राय

यह है कि चन्द्रमामें प्रकाशके साथ-साथ अमृत-वर्षाकी

शक्ति भी है। वह अमृत पहले चन्द्रलोकसे चन्द्रमण्डलमें

आता है और फिर चन्द्रमण्डलसे भूमण्डलपर आता है।

चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पोषक और कृष्णपक्षमें शोषक

होता है। शुक्लपक्षमें रसमय चन्द्रमाकी मधुर किरणोंसे

अमृत-वर्षा होनेके कारण ही लता-वृक्षादि पुष्ट होते हैं

और फलते-फूलते हैं। माताके उदरमें स्थित शिशु भी

शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होता है।

यहाँ 'औषधी:' पदके अन्तर्गत गेहूँ, चना आदि सब

प्रकारके अन्न समझने चाहिये। चन्द्रमाके द्वारा पुष्ट हुए

अन्नका भोजन करनेसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी आदि समस्त

प्राणी पुष्टि प्राप्त करते हैं। ओषधियों, वनस्पतियोंमें

शरीरको पुष्ट करनेकी जो शक्ति है, वह चन्द्रमासे आती

है। चन्द्रमाकी वह पोषण-शक्ति भी उसकी अपनी न

होकर भगवान्की ही है। भगवान् ही चन्द्रमाको निमित्त

बनाकर सबका पोषण करते हैं।

यहाँ 'सोम:' पद चन्द्रलोकका वाचक है, चन्द्रमण्डलका

नहीं। नेत्रोंसे हमें जो दीखता है, वह चन्द्रमण्डल है।

चन्द्रमण्डलसे भी ऊपर (आँखोंसे न दीखनेवाला) चन्द्रलोक

परिशिष्ट भाव - पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान्की अपरा प्रकृति है (गीता-सातवें अध्यायका चौथा

श्लोक)। अतः इसके धारक, उत्पादक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्की शक्ति

होनेसे अपरा प्रकृति भगवान्से अभिन्न है।

यहाँ 'सोम' शब्द चन्द्रलोकका वाचक है, जो सूर्यसे भी ऊपर हैं।

सम्बन्ध - समष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् जिस शक्तिसे व्यष्टि-जगत्में क्रियाएँ हो रही

हैं, उस व्यष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥ १४॥

प्राणिनाम् = प्राणियोंके

देहम् = शरीरमें

आश्रितः = रहनेवाला

अहम् = मैं

प्राणापान- = प्राण-अपानसे

समायुक्तः = युक्त

वैश्वानरः = वैश्वानर (जठराग्नि)

भूत्वा = होकर

चतुर्विधम् = चार प्रकारके

अन्नम् = अन्नको

पचामि = पचाता हूँ।

व्याख्या - 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देह-

माश्रितः' - बारहवें श्लोकमें अग्निकी प्रकाशन-शक्तिमें

अपने प्रभावका वर्णन करनेके बाद भगवान् इस श्लोकमें

वैश्वानररूप अग्निकी पाचन-शक्तिमें अपने प्रभावका

वर्णन करते हैं। तात्पर्य यह है कि अग्निके दोनों ही

कार्य (प्रकाश करना और पचाना) भगवान्की ही शक्तिसे

होते हैं।

रूपसे उन प्राणियोंके शरीरमें रहते हैं। मनुष्योंकी तरह

लता, वृक्ष आदि स्थावर और पशु, पक्षी आदि जंगम

प्राणियोंमें भी वैश्वानरकी पाचन-शक्ति काम करती है।

लता, वृक्ष आदि जो खाद्य, जल ग्रहण करते हैं, पाचन-

शक्तिके द्वारा उसका पाचन होनेके फलस्वरूप ही उन

लता-वृक्षादिकी वृद्धि होती है।

प्राणियोंके शरीरको पुष्ट करने तथा उनके प्राणोंकी

रक्षा करनेके लिये भगवान् ही वैश्वानर-(जठराग्नि-) के

'प्राणापानसमायुक्तः' - शरीरमें प्राण, अपान, समान,

उदान और व्यान-ये पाँच प्रधान वायु एवं नाग, कूर्म,

कृकर, देवदत्त और धनंजय-ये पाँच उपप्रधान वायु रहती

१-न विदुः सोम ते माया ये च नक्षत्रयोनयः। त्वादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपस्थितः॥

(पद्मपुराण, सृष्टि० ४१। १२८)

२-'अयमनिवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते।' (बृहदारण्यक० ५।९।१)

'जो यह पुरुषके भीतर अग्नि है, यह वैश्वानर है, जिससे यह अन्न जो भक्षण किया जाता है, पचाया जाता है।'