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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्री मद्भगवद्गीता

पूछनेपर वायुदेवने कहा कि मैं 'मातरिश्वा' नामसे प्रसिद्ध वायुदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको उड़ा सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने भी एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको उड़ा दो। वायुदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं उड़ा सका। वह लज्जित होकर देवताओंके पास लौट आया और बोला कि मैं उस यक्षको नहीं जान सका। तब देवताओंने इन्द्रको उस यक्षका परिचय जाननेके लिये भेजा। परन्तु इन्द्रके वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया और उस जगह हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयीं। इन्द्रके पूछनेपर उमादेवीने कहा कि स्वयं परमात्मा ही तुमलोगोंका अभिमान दूर करनेके लिये यक्षरूपसे प्रकट हुए थे। तात्पर्य यह है कि सृष्टिमें जो भी बलवत्ता, विशेषता, विलक्षणता देखनेमें आती है, वह सब परमात्मासे ही आयी हुई है (गीता- दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध-दृश्य (दिखनेवाले) पदार्थोंमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् आगेके श्लोकमें जिस शक्तिसे समष्टि-जगत्में क्रियाएँ हो रही हैं, उस समष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव प्रकट करते हैं।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। पुष्पामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: ॥ १३ ॥

अहम् = मैं, च = ही, गाम् = पृथ्वीमें, आविश्य = प्रविष्ट होकर, ओजसा = अपनी शक्तिसे, भूतानि = समस्त प्राणियोंको, धारयामि = धारण करता हूँ, च = और (मैं ही), रसात्मक: = रसस्वरूप, सोम: = चन्द्रमा, भूत्वा = होकर, सर्वा: = समस्त, औषधी: = ओषधियों (वनस्पतियों)-को, पुष्पामि = पुष्ट करता हूँ।

व्याख्या-'गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा'-भगवान् ही पृथ्वीमें प्रवेश करके उसपर स्थित सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंको धारण करते हैं। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमें जो धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह पृथ्वीकी अपनी न होकर भगवान्की ही हैं। वैज्ञानिक भी इस बातको स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीकी अपेक्षा जलका स्तर ऊँचा है और पृथ्वीपर जलका भाग स्थलकी अपेक्षा बहुत अधिक है। ऐसा होनेपर भी पृथ्वी जलमग्न नहीं होती-यह भगवान्की धारण-शक्तिका ही प्रभाव है। पृथ्वीके उपलक्षणसे यह समझना चाहिये कि पृथ्वीके सिवाय जहाँ भी धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह सब भगवान्की ही है। पृथ्वीमें अन्नादि ओषधियोंको उत्पन्न करनेकी (उत्पादिका) शक्ति एवं गुरुत्वाकर्षण-शक्ति भी भगवान्की ही समझनी चाहिये। 'पुष्पामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:'-चन्द्रमामें दो शक्तियाँ हैं-प्रकाशिका-शक्ति और पोषण-शक्ति। प्रकाशिका शक्तिमें अपने प्रभावका वर्णन

१-(१) द्यौ: सचन्द्रार्कनक्षत्र खं दिशो भूर्महोदधि: । वासुदेवस्य वीर्येण विधुतानि महात्मन: ॥ (महाभारत, अनु० १४९। १३४) 'स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर-ये सब भगवान् वासुदेवकी शक्तिसे धारण किये हुए हैं।' (२) पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय: ॥ (शङ्कराचार्यकृत कृष्णाष्टकम्) 'पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीका नियमन करते हैं, परन्तु पृथ्वी जिनको नहीं जानती; 'य: पृथिव्यां तिष्ठन् पृथ्वीं यमयति यं पृथ्वी न वेद' आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलस्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बताता है, वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों।' २-पृथ्वीपर जलका कुल भाग लगभग इकहत्तर प्रतिशत और स्थलका कुल भाग लगभग उनतीस प्रतिशत माना जाता है।

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