सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 992, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 992

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१११

‘ईश्वर सबके पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है।’

सम्पूर्ण भौतिक जगत्में सूर्यके समान प्रत्यक्ष प्रभावशाली पदार्थ कोई नहीं है। चन्द्र, अग्नि, तारे, विद्युत् आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, वे सभी सूर्यसे ही प्रकाश पाते हैं। भगवान्से मिले हुए तेजके कारण जब सूर्य इतना विलक्षण और प्रभावशाली है, तब स्वयं भगवान् कितने विलक्षण और प्रभावशाली होंगे! ऐसा विचार करनेपर स्वतः भगवान्को तरफ आकर्षण होता है।

सूर्य ‘नेत्रों’का अधिष्ठातु-देवता है। अतः नेत्रोंमें जो प्रकाश (देखनेकी शक्ति) है वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।

‘यच्चन्द्रमसि’—जैसे सूर्यमें स्थित प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति—दोनों ही भगवान्से प्राप्त (आगत) हैं, ऐसे ही चन्द्रमाकी प्रकाशिका शक्ति और पोषण शक्ति—दोनों (सूर्यद्वारा प्राप्त होनेपर भी परम्परासे) भगवत्प्रदत्त ही हैं। जैसे भगवान्का तेज ‘आदित्यगत’ है, ऐसे ही उनका तेज ‘चन्द्रगत’ भी समझना चाहिये। चन्द्रमामें प्रकाशके साथ शीतलता, मधुरता, पोषणता आदि जो भी गुण हैं, वह सब भगवान्का ही प्रभाव है।

यहाँ चन्द्रमाको तारे, नक्षत्र आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।

चन्द्रमा ‘मन’ का अधिष्ठातु-देवता है। अतः मनमें जो प्रकाश (मनन करनेकी शक्ति) है, वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।

‘यच्चान्नी’—जैसे भगवान्का तेज ‘आदित्यगत’ है, ऐसे ही उनका तेज ‘अग्निगत’ भी समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि अग्निकी प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति—दोनों भगवान्की ही हैं, अग्निकी नहीं।

यहाँ अग्निको विद्युत्, दीपक, जुगन् आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।

परिशिष्ट भाव —परमात्मा ही सम्पूर्ण शक्तियोंके मूल हैं। इस विषयमें केनोपनिषद्की एक कथा है। एक बार परमात्माने देवताओंके लिये असुरोंपर विजय प्राप्त की। परन्तु इस विजयमें देवताओंने अपनी शक्तिका अभिमान कर लिया। वे समझने लगे हमने ही अपनी शक्तिये असुरोंपर विजय प्राप्त की है। देवताओंके इस अभिमानको नष्ट करनेके लिये परमात्मा यक्षका रूप धारण करके उनके सामने प्रकट हो गये। यक्षको देखकर देवतालोग आश्चर्यचकित होकर विचार करने लगे कि यह यक्ष कौन है? उसका परिचय जाननेके लिये देवताओंने अग्निदेवको उसके पास भेजा। यक्षके पूछनेपर अग्निदेवने कहा कि मैं ‘जातवेदा’ नामसे प्रसिद्ध अग्निदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको जलाकर भस्म कर सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको जला दो। अग्निदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं जला सका। वह लज्जित होकर देवताओंके पास लौट आया और बोला कि वह यक्ष कौन है—यह मैं नहीं जान सका। तब देवताओंने वायुदेवको यक्षके पास भेजा। यक्षके

अग्नि ‘वाणी’का अधिष्ठातु-देवता है। अतः वाणीमें जो प्रकाश (अर्थप्रकाश करनेकी शक्ति) है, वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।

‘ततेजो विद्विद मामकम्’—जो तेज सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें है और जो तेज इन तीनोंके प्रकाशसे प्रकाशित अन्य पदार्थों (तारे, नक्षत्र, विद्युत्, जुगन् आदि)—में देखने तथा सुननेमें आता है, उसे भगवान्का ही तेज समझना चाहिये।

उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि मनुष्य जिस-जिस तेजस्वी पदार्थकी तरफ आकर्षित होता है, उस-उस पदार्थमें उसको मेरा ही प्रभाव देखना चाहिये (गीता—दसवें अध्यायका इकतालिसावें श्लोक)। जैसे बूँदीके लड़्डूमें जो मिठास है, वह उसकी अपनी न होकर चीनीकी ही है, ऐसे ही सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें जो तेज है, वह उनका अपना न होकर भगवान्का ही है। भगवान्के प्रकाशसे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है—‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ (कठोपनिषद् २।२।१५)। वह सम्पूर्ण ज्योतियोंकी भी ज्योति है—‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः’ (गीता १३।१७)।

सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः नेत्र, मन और वाणीके अधिष्ठाता एवं उनको प्रकाशित करनेवाले हैं। मनुष्य अपने भावोंको प्रकट करने और समझनेके लिये नेत्र, मन (अन्तःकरण) और वाणी—इन तीन इन्द्रियोंका ही उपयोग करता है। ये तीन इन्द्रियाँ जितना प्रकाश करती हैं, उतना प्रकाश अन्य इन्द्रियाँ नहीं करतीं। प्रकाशका तात्पर्य है—अलग-अलग ज्ञान कराना। नेत्र और वाणी बाहरी करण हैं तथा मन भीतरी करण है। करणोंके द्वारा वस्तुका ज्ञान होता है। ये तीनों ही करण (इन्द्रियाँ) भगवान्को प्रकाशित नहीं कर सकते; क्योंकि इनमें जो तेज या प्रकाश है, वह इनका अपना न होकर भगवान्का ही है।