श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परिशिष्ट भाव —सदा न भोग साथ रहता है, न संग्रह साथ रहता है—यह विवेक मनुष्यमें स्वतः है। परन्तु जो मनुष्य शास्त्र पढ़ते हुए, सत्संग करते हुए, साधन करते हुए भी अपने विवेककी तरफ ध्यान नहीं देते, भोग और संग्रहसे अलगावका अनुभव नहीं करते, वे मनुष्य 'अकृतात्मा' हैं। ऐसे मनुष्योंको अठारहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें 'अकृतबुद्धि' और 'दुर्मीत' कहा गया है। यद्यपि परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, तथापि भीतरमें राग, आसक्ति, सुखबुद्धि पड़ी रहनेसे वे साधन करते हुए भी परमात्माको नहीं जानते। कारण कि भोग और संग्रहमें रुचि रखनेवालेका विवेक ठहरता नहीं।
पूर्वश्लोकमें जिनको 'विमूढाः' कहा है, उनको यहाँ 'अचेतसः' कहा है, गुणोंसे मोहित होनेके कारण वे न तो विषयोंके विभागको जानते हैं और न स्वयंके विभागको ही जानते हैं अर्थात् भोगोंका संयोग-वियोग अलग है और स्वयं भी अलग है—यह नहीं जानते।
सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें भगवान् यह बताना चाहते हैं कि मेरा अंश जीवात्मा बिलकुल अलग है और जिस सामग्री (शरीरादि पदार्थ और क्रिया)-को वह भूलसे अपनी मानता है, वह बिलकुल अलग है—'प्रकृतिस्थानि'। सूर्य और अमावास्याकी रात्रिकी तरह दोनोंका विभाग ही अलग-अलग है। उनका परस्पर संयोग होना सम्भव ही नहीं है। जो उपर्युक्त जड़ और चेतन—दोनोंके विभागको सर्वथा अलग-अलग देखता है, वही ज्ञानी और योगी है। परन्तु जो दोनोंको मिला हुआ देखता है, वह अज्ञानी और भोगी है।
सम्बन्ध —पंद्रहवें अध्यायमें पाँच-पाँच श्लोकोंके चार प्रकरण हैं। उनमेंसे यह तीसरा प्रकरण बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतकका है, जिसमें छठा श्लोक भी लेनेसे पाँच श्लोक पूरे हो जाते हैं। यह तीसरा प्रकरण विशेषरूपसे भगवान्के प्रभाव और महत्त्वको प्रकट करनेवाला है। छठे श्लोकमें जो विषय (परमधामको सूर्य, चन्द्र और अग्नि प्रकाशित नहीं कर सकते) स्पष्ट नहीं हो पाया था, उसीका स्पष्ट विवेचन अब भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
यदादित्यगतं तेजो जगद्वासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ ततेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
| आदित्यगतम् | = सूर्यको | जगत् | = जगत्को | यत् | = जो तेज |
|---|---|---|---|---|---|
| प्राप्त | भासयते | = प्रकाशित करता है | अग्नी | = अग्निमें है, | |
| हुआ | (और) | तत् | = उस | ||
| यत् | = जो | यत् | = जो तेज | तेजः | = तेजको |
| तेजः | = तेज | चन्द्रमसि | = चन्द्रमामें है | मामकम् | = मेरा ही |
| अखिलम् | = सम्पूर्ण | च | = तथा | विद्धि | = जान। |
व्याख्या —[प्रभाव और महत्त्वकी ओर आकर्षित होना जीवका स्वभाव है। प्राकृत पदार्थोंके सम्बन्धसे जीव प्राकृत पदार्थोंके प्रभावसे प्रभावित हो जाता है। कारण यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनेके कारण जीवको प्राकृत पदार्थों-(शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदि- ) का महत्त्व दीखने लगता है, भगवान्का नहीं। अतः जीवपर पड़े प्राकृत पदार्थोंका प्रभाव हटानेके लिये भगवान् अपने प्रभावका वर्णन करते हुए यह रहस्य प्रकट करते हैं कि उन प्राकृत पदार्थोंमें जो प्रभाव और महत्त्व देखनेमें आता है, वह वस्तुतः (मूलमें) मेरा ही है, उनका नहीं। सर्वोपरि प्रभावशाली मैं ही हूँ। मेरे ही प्रकाशसे सब प्रकाशित हो रहे हैं।]
'यदादित्यगतं तेजो जगद्वासयतेऽखिलम्'—जैसे भगवान्ने (गीता—दूसरे अध्यायके पचपनवें श्लोकमें)
कामनाओंको 'मनोगतान्' बताया है, ऐसे ही यहाँ तेजको 'आदित्यगतम्' बताते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे मनमें स्थित कामनाएँ मनका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक हैं, ऐसे ही सूर्यमें स्थित तेज सूर्यका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक है अर्थात् वह तेज सूर्यका अपना न होकर (भगवान्से) आया हुआ है।
सूर्यका तेज (प्रकाश) इतना महान् है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उससे प्रकाशित होता है। ऐसा वह तेज सूर्यका दीखनेपर भी वास्तवमें भगवान्का ही है। इसलिये सूर्य भगवान्को या उनके परमधामको प्रकाशित नहीं कर सकता। मर्हापि पतंजलि कहते हैं—
पूर्वैषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥
(योगदर्शन १। २६)