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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

१८९

जो परमात्माको अपना तथा अपनेको परमात्माका जानते हैं, वे ज्ञानरूप नेत्रोंवाले योगीलोग शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे अपनेको अलग करके अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेते हैं। परन्तु जो शरीरको अपना और अपनेको शरीरका मानते हैं, वे विमूढ़ और अकृतात्मा पुरुष शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा यत्न करनेपर भी अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं कर पाते।

(२)

‘आत्मनि अवस्थितम्’ पदोंमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मामें स्थित (सर्वव्यापी) बताया है। इसका अनुभव करनेके लिये साधकको ये चार बातें दृढ़तापूर्वक मान लेनी चाहिये—

  1. १. परमात्मा यहाँ हैं।
  2. २. परमात्मा अभी हैं।
  3. ३. परमात्मा अपनेमें हैं।
  4. ४. परमात्मा अपने हैं।

परमात्मा सब जगह (सर्वव्यापी) होनेसे यहाँ भी हैं; सब समय (तीनों कालोंमें) होनेसे अभी भी हैं; सबमें होनेसे अपनेमें भी हैं; और सबके होनेसे अपने भी हैं। इस दृष्टिसे परमात्मा यहाँ होनेसे उनको प्राप्त करनेके लिये दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है; अभी होनेसे उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी प्रतीक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं है; अपनेमें होनेसे उन्हें बाहर दृढ़नेकी आवश्यकता नहीं है; और अपने होनेसे उनके सिवाय किसीको भी अपना माननेकी आवश्यकता नहीं है। अपने होनेसे वे स्वाभाविक ही अत्यन्त प्रिय लगेंगे!

प्रत्येक साधकके लिये उपर्युक्त चारों बातें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और तत्काल लाभदायक हैं। साधकको ये चारों बातें दृढ़तासे मान लेनी चाहिये। समस्त साधनोंका यह सार साधन है। इसमें किसी योग्यता, अभ्यास, गुण आदिकी भी जरूरत नहीं है। ये बातें स्वतःसिद्ध और वास्तविक हैं, इसलिये इसको माननेके लिये सभी योग्य हैं, सभी पात्र हैं, सभी समर्थ हैं। शर्त यही है कि वे एकमात्र परमात्माको ही चाहते हों।

‘यतन्नोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः’ —जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, उन पुरुषोंको यहाँ ‘अकृतात्मानः’ कहा गया है। सत्-असत्के ज्ञान-(विवेक-)को महत्त्व न देनेके कारण ऐसे पुरुषोंको

‘अचेतसः’ कहा गया है।

जिनके अन्तःकरणमें संसारके व्यक्ति, पदार्थ आदिका महत्त्व बना हुआ है और जो शरीरादिको अपना मानते हुए उनसे सुख-भोगकी आशा रखते हैं, ऐसे सभी पुरुष ‘अकृतात्मानः’ और ‘अचेतसः’ हैं। ऐसे पुरुष तत्त्वकी प्राप्ति तो चाहते हैं, पर वे शरीर, मन, बुद्धि आदि जड़ (प्राकृत) पदार्थोंकी सहायतासे चेतन परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहते हैं। परमात्मा जड़ पदार्थोंकी सहायतासे नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्याग-(सम्बन्ध-विच्छेद-) से मिलते हैं।

इस श्लोकमें ‘यतन्तः’ पद दो बार आया है। भाव यह है कि यत्न करनेमें समानता होनेपर भी एक (ज्ञानी) पुरुष तो तत्त्वका अनुभव कर लेता है, दूसरा (मूढ़) नहीं कर पाता। इससे यह सिद्ध होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके द्वारा किया गया यत्न तत्त्वप्राप्तिमें सहायक होनेपर भी अन्तःकरण-(जड़ता-)के साथ सम्बन्ध बने रहनेके कारण और अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व रहनेके कारण (यत्न करनेपर भी) तत्त्वको प्राप्त नहीं किया जा सकता। जिनकी दृष्टि असत्-(सांसारिक भोग और संग्रह-) पर ही जमी हुई है, ऐसे पुरुष सत्-(तत्त्व-) को कैसे देख सकते हैं!

अकृतात्मा और अचेतस पुरुष करनेमें तो ध्यान, स्वाध्याय, जप आदि सब कुछ करते हैं, पर अन्तःकरणमें जड़ता-(सांसारिक भोग और संग्रह-) का महत्त्व रहनेके कारण उन्हें तत्त्वका अनुभव नहीं होता। यद्यपि ऐसे पुरुषोंके द्वारा किया गया यत्न भी निष्फल नहीं जाता, तथापि तत्त्वका अनुभव उन्हें वर्तमानमें नहीं होता। वर्तमानमें तत्त्वका अनुभव जड़ताका सर्वथा त्याग होनेपर ही हो सकता है।

जिसका आश्रय लिया जाय, उसका त्याग नहीं हो सकता—यह नियम है। अतः शरीर, मन, बुद्धि आदि जड़ पदार्थोंका आश्रय लेकर साधक जड़ताका त्याग नहीं कर सकता। इसके सिवाय मन, बुद्धि आदि जड़ पदार्थोंको लेकर साधन करनेवालेमें सूक्ष्म अहंकार बना रहता है, जो जड़ताका त्याग होनेपर ही निवृत्त होता है। जड़ताका त्याग करनेका सुगम उपाय है—एकमात्र भगवान्का आश्रय लेना अर्थात् ‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं’ इस वास्तविकताको स्वीकार कर लेना; इसपर अटल विश्वास कर लेना। इसके लिये यत्न या अभ्यास करनेकी भी जरूरत नहीं है। वास्तविक बातको दृढ़तापूर्वक स्वीकारमात्र कर लेनेकी जरूरत है।

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