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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

झूठ-कपट किये किसीका काम चल ही नहीं सकता, जिसमें भी आजकलके जमानेमें तो ऐसा करना ही पड़ता है, इससे कोई बच नहीं सकता' आदि। इस प्रकार अहंतामें दुर्भाव आनेसे ही दुराचारोंसे छूटना कठिन हो जाता है और इसी कारण लोग दुर्गुण-दुराचारको छोड़ना कठिन या असम्भव मानते हैं।

परमात्माका अंश होनेसे सद्भावसे रहित कोई नहीं हो सकता और शरीरके साथ अहंता-ममता रखते हुए दुर्भावसे सर्वथा रहित कोई नहीं हो सकता। दुर्भावोंके आनेपर भी सद्भावका बीज कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि सद्भाव 'सत्' है और सत्का कभी अभाव नहीं होता—'नाभावो विद्यते सतः' (२।१६)। इसके विपरीत दुर्भाव कुसंगसे उत्पन्न होनेवाले हैं और उत्पन्न होनेवाली वस्तु नित्य नहीं होती—'नासतो विद्यते भावः' (२।१६)।

मनुष्योंकी सद्भाव या दुर्भावकी मुख्यताको लेकर ही प्रवृत्ति होती है। जब सद्भावकी मुख्यता होती है, तब वह सदाचार करता है और जब दुर्भावकी मुख्यता होती है, तब वह दुराचार करता है। तात्पर्य है कि जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका हो जाता है, उसमें सद्भावकी मुख्यता हो जाती है और दुर्भाव मिटने लगते हैं और जिसका उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका हो जाता है, उसमें दुर्भावकी मुख्यता हो जाती है और सद्भाव छिपने लगते हैं।

'लोकेश्मिन्' का तात्पर्य है कि नये-नये अधिकार पृथ्वीमण्डलमें ही मिलते हैं। पृथ्वीमण्डलमें भी भारत-क्षेत्रमें विलक्षण अधिकार प्राप्त होते हैं। भारतभूमिपर जन्म लेनेवाले मनुष्योंकी देवताओंने भी प्रशंसा की है*। कल्याणका मौका मनुष्यलोकमें ही है। इस लोकमें आकर मनुष्यको विशेष सावधानीसे दैवी-सम्पत्ति जाग्रत् करनी चाहिये। भगवान्ने विशेष कृपा करके ही यह मनुष्यशरीर दिया है—

कवहूंक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

(मानस ७।४४।३)

जिन प्राणियोंको भगवान् मनुष्य बनाते हैं, उनपर भगवान् विश्वास करते हैं कि ये अपना कल्याण (उद्धार) करेंगे। इसी आशासे वे मनुष्यशरीर देते हैं। भगवान्ने विशेष कृपा करके मनुष्यको अपनी प्राप्तिकी सामग्री और योग्यता दे रखी है और विवेक भी दे रखा है। इसलिये 'लोकेश्मिन्' पदसे विशेषरूपसे मनुष्यकी ओर ही लक्ष्य है। परन्तु भगवान् तो प्राणिमात्रमें समानरूपसे रहते हैं—'समोऽहं सर्वभूतेषु' (गीता ९।२९)। जहाँ भगवान् रहते हैं, वहाँ उनकी सम्पत्ति भी रहती है, इसलिये 'भूतसगौ' पद दिया है। इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राणिमात्र भगवान्की तरफ चल सकता है। भगवान्की तरफसे किसीको मना नहीं है।

मनुष्योंमें जो सर्वथा दुराचारोंमें लगे हुए हैं, वे चाण्डाल और पशु-पक्षी, कीट-पतंगदि पापयोनियालोंकी अपेक्षा भी अधिक दोषी हैं। कारण कि पापयोनियालोंका तो पहलेके पापोंके कारण परवशतासे पापयोनिमें जन्म होता है और वहाँ उनका पुराने पापोंका फलभोग होता है; परन्तु दुराचारी मनुष्य यहाँ जान-बूझकर बुरे आचरणोंमें प्रवृत्त होते हैं अर्थात् नये पाप करते हैं। पापयोनियाले तो पुराने पापोंका फल भोगकर उन्नतिकी ओर जाते हैं और दुराचारी नये-नये पाप करके पतनकी ओर जाते हैं। ऐसे दुराचारियोंके लिये भी भगवान्ने कहा है कि यदि अत्यन्त दुराचारी भी मेरे अनन्य शरण होकर मेरा भजन करता है, तो वह भी सदा रहनेवाली शान्तिको प्राप्त कर लेता है (नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक)। ऐसे ही पापी-से-पापी भी ज्ञानरूपी नौकासे सब पापोंको तरकर अपना उद्धार कर लेता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह कि जब दुराचारी-से-दुराचारी और पापी-से-पापी व्यक्ति भी

  • (१) अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्वितु स्वयं हरिः।

यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवीपयिकं स्पृहा हि नः॥ (श्रीमद्भा ५।११।२१)

'अहो! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो हम भी निरन्तर तरसते रहते हैं।'

(२) गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्यादमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ (श्रीविष्णुपुराण २।३।२४)

'देवगण भी निरन्तर यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्गके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक धन्य (बड़भागी) हैं।'