श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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भक्ति और ज्ञान प्राप्त करके अपना उद्धार कर सकता है, तो फिर अन्य पापयोनियोंके लिये भगवान्की तरफसे मना कैसे हो सकता है? इसलिये यहाँ 'भूत' (प्राणिमात्र) शब्द दिया है।
मानवेतर प्राणियोंमें भी दैवी प्रकृतिके पाये जानेकी बहुत बातें सुनने, पढ़ने तथा देखनेमें आती हैं। ऐसे कई उदाहरण आते हैं, जिसमें पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी दैवी गुण होनेकी बात आती है*। कई कुत्ते ऐसे भी देखे गये हैं, जो अमावस्या, एकादशी आदिका व्रत रखते हैं और उस दिन अन्न नहीं खाते। सत्संगमें भी मनुष्येतर प्राणियोंके आकर बैठनेकी बातें सुनी हैं। सत्संगमें साँपको भी आते देखा है। गोरखपुरमें जब बारह महीनोंका कीर्तन हुआ था, तब एक काला कुत्ता कीर्तन-मण्डलीके बीचमें चलता और जहाँ सत्संग होता, वहाँ बैठ जाता। ऋषिकेश-(स्वर्गाश्रम-) में वटवृक्षके नीचे एक साँप आया करता था। वहाँ एक सन्त थे। एक दिन उन्होंने साँपसे कहा 'ठहर' तो वह ठहर गया। सन्तने उसे गीता सुनायी, तो वह चुपचाप बैठ रहा। गीता पूरी होते ही साँप वहाँसे चला गया और फिर कभी वहाँ नहीं आया। (इस तरहके पशु-पक्षियोंमें ऐसी प्रकृति पूर्वसंस्कारवश
स्वाभाविक होती है।)
इस प्रकार पशु-पक्षियोंमें भी दैवी-सम्पत्तिके गुण देखनेमें आते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि वहाँ दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके विकासका क्षेत्र और योग्यता नहीं है। उनके विकासका क्षेत्र और योग्यता केवल मनुष्यशरीरमें ही है।
पशु, पक्षी, जड़ी, बूटी, वृक्ष, लता आदि जितने भी जंगम-स्थायर प्राणी हैं, उन सभीमें दैवी और आसुरी-सम्पत्तिवाले प्राणी होते हैं। मनुष्यको उन सबकी रक्षा करनी ही चाहिये; क्योंकि सबकी रक्षाके लिये, सबका प्रबन्ध करनेके लिये ही यह मनुष्य बनाया गया है। उनमें भी जो सात्त्विक पशु, पक्षी, जड़ी, बूटी आदि हैं, उनकी तो विशेषतासे रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी रक्षासे हमारेमें दैवी-सम्पत्ति बढ़ती है। जैसे, गोमाता हमारी पूजनीया है तो हमें उसकी रक्षा और पालन करना चाहिये; क्योंकि गाय सम्पूर्ण सृष्टिका कारण है—'गावो विश्वस्य मातरः।' गायके घीसे ही यज्ञ होता है; भैंस आदिके घीसे नहीं। यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न और अन्नसे प्राणी पैदा होते हैं। उन प्राणियोंमें खेतीके लिये बैलोंकी जरूरत होती है। वे बैल गायोंके होते हैं। बैलोंसे खेती होती है अर्थात् बैलोंसे
- महाभारतके शान्तिपर्वमें इसी प्रसंगकी एक कथा आती है। शकुनिलुब्धक नामका एक बधिक था। उसका मुख्य काम पशु-पक्षियोंको मारना ही था। एक दिन वह शिकारके लिये जंगलमें गया। दिनभर घूमता रहा, पर खानेको कुछ मिला नहीं। अकस्मात् आकाश बादलोंसे भर गया और ज़ोरोंसे आँधी-वर्षा होने लगी। वह बधिक एक वृक्षके नीचे आकर बैठ गया।
उसी वृक्षपर दम्पती कपोत और कपोती रहते थे। चुरागा चुरानेके लिये दोनों बाहर गये हुए थे। बरसातके कारण कपोती जल्दी आ गयी। पंख गीले होनेसे वह टिठुरकर नीचे गिर पड़ी, तो बधिकने उसको पकड़कर अपने पिंजड़में बंद कर लिया। जब कपोत घरपर आया, तो कपोतीको वहाँ न देखकर विलाप करने लगा। उसके विलापको सुनकर कपोती बोली कि 'हे प्राणनाथ! आप मेरे लिये इतना विलाप क्यों करते हैं? आप अपने कर्तव्यका पालन कीजिये। हमारे स्थानपर आये हुए अतिथिकी आप रक्षा कीजिये। अतिथिका सत्कार करना गृहस्थका खास कर्तव्य है। इसका किसी तरह जाड़ा छूटे, भूख मिटे—ऐसा आपको प्रबन्ध करना चाहिये। मैं तो पिंजड़में पड़ी हूँ।' अपनी स्त्रीकी बात सुनकर कपोतने अपनी चोंचसे सूखे पत्ते एवं छोटी-छोटी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं। फिर किसी घरसे जलती हुई लकड़ी लाकर अग्न कर दी। वह बधिक सरदीसे टिठुर रहा था। अग्निकी गरमीसे जब कुछ ठीक हुआ, तो उसने कपोतसे कहा कि 'मुझे भूख लग रही है, क्या करूँ?' कपोत बोला कि 'आप चिन्ता न करें। आप मेरे अतिथि हो; अतः मैं आपकी भूख मिटानेका प्रबन्ध करूँगा।' कपोतने थोड़ी देर विचार किया। परन्तु उसे अपने-आपको अग्नियँ गिरानेके अलावा कोई दूसरा उपाय सूझा नहीं। अतः वह अग्निकी तीन परिक्रमा करके उसमें कूद पड़ा। उसको अग्नियँ जलते हुए देखकर बधिकके मनमें विचार आया कि इस कपोतने मुझे कितना आराम दिया है! भोजनके लिये तो इसने अपने-आपको ही दे दिया है! हाय-हाय! मैं कितना क्रूर, निर्दयी पापी हूँ! यह पक्षी होकर भी इतना आदर करता है और मैं मनुष्य होकर भी ऐसा क्रूर काम करता हूँ! आजसे मैं कभी ऐसा पापकर्म नहीं करूँगा। ऐसा निश्चय करके उसने पिंजड़मेंसे कपोतीको छोड़ दिया। अपने पतिदेवके अभावमें वह कपोती विलाप करने लगी कि पतिदेवके बिना मैं रहकर क्या करूँगी? ऐसे विलाप करते हुए वह भी अग्नियँ कूद पड़ी। इतनेमें उन दोनों (कपोत और कपोती)-को लेने विमान आया और वे दोनों उस विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको चले गये।
उन्को इस प्रकार विमानमें जाते हुए देखकर बधिकने अपने सब अस्त्र-शस्त्र फेंक दिये। उसने विचार किया कि अब मैं भजन-स्मरण करूँगा और त्याग-तपस्या करके शरीरको सुखा डालूँगा—कुछ खाऊँगा-पिऊँगा नहीं। इस तरहका विचार करके वह कांटोंसे भरे जंगलमें चला गया! कांटोंसे उसका शरीर छिल गया! आगे वनमें चारों ओरसे आग (दावानि) लगी हुई थी। उसी आगमें घुसकर वह जलकर मर गया। अन्त समयमें भजन-स्मरण करनेसे उसको सद्गति हो गयी।