श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
हल आदि जोतकर तथा कूर्प आदिके जलसे सौंचकर खेती की जाती है। खेतीसे अन्न, वस्त्र आदि निर्वाहकी चीजें पैदा होती हैं, जिनसे मनुष्य, पशु आदि सभीका जीवन-निर्वाह होता है। निर्वाहमें भी गायके घी-दूध हमारे खाने-पीनेके काम आते हैं। उन घी-दूधसे हमारे शरीरमें बल और अन्तःकरणमें सात्त्विक भाव बढ़ते हैं। इसी तरहसे जितनी जड़ी-बूटियाँ हैं, उनमेंसे सात्त्विक जड़ी-बूटीसे कायाकल्प होता है, रोग दूर होता है और शरीर पुष्ट होता है। इसलिये हमलोगोंको सात्त्विक पशु, पक्षी, जड़ी-बूटी आदिकी विशेष रक्षा करनी चाहिये, जिससे हमारे इहलोक और परलोक दोनों सुधर जायँ।
‘दैवो विस्तारशः प्रोक्तः’ —भगवान् कहते हैं कि दैवी-सम्पत्तिका मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें नौ, दूसरे श्लोकमें ग्यारह और
तीसरे श्लोकमें छः—इस तरह दैवी-सम्पत्तिके कुल छब्बीस लक्षणोंका वर्णन किया गया है। इससे पहले भी गुणातीतके लक्षणोंमें (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक), ज्ञानके बीस साधनोंमें (तेरहवें अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक), भक्तोंके लक्षणोंमें (बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक), कर्मयोगीके लक्षणोंमें (छठे अध्यायके सातवेंसे नवें श्लोकतक) और स्थितप्रज्ञके लक्षणोंमें (दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक) दैवी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन हुआ है।
‘आसुरं पार्थ मे शृणु’ —भगवान् कहते हैं कि अब तू मुझसे आसुरी-सम्पत्तिको विस्तारपूर्वक सुन अर्थात् जो मनुष्य केवल प्राण-पोषणपरायण होते हैं, उनका स्वभाव कैसा होता है—यह मेरेसे सुन।
परिशिष्ट भाव —दैवी और आसुरी—यह दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि मनुष्यलोकमें होनेसे लौकिक है। अलौकिक तत्त्वमें ये दोनों ही नहीं हैं। साधन भी लौकिक और अलौकिक दोनों होते हैं, पर साध्य अलौकिक ही होता है। अलौकिक तत्त्व व्यापक, अनन्त-अपर है। लौकिक भी उसीके अन्तर्गत है। वास्तवमें लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। सब कुछ अलौकिक ही है। जीवने ही लौकिकको धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत् ’ (गीता ७।५)। तात्पर्य है कि जबतक जीवकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है, तभीतक ‘लौकिक’ है। संसारकी सत्ता न रहनेपर सब ‘अलौकिक’ ही है—‘वासुदेवः सर्वम् ’, ‘सदसच्चाहम् ’।
सम्बन्ध —भगवान्से विमुख मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्ति किस क्रमसे* आती है, उसका आगेके श्लोकमें वर्णन करते हैं।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥
| आसुराः | = आसुरी प्रकृतिवाले | न | = नहीं | आचारः | = श्रेष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| जनाः | = मनुष्य | विदुः | = जानते | आचरण | |
| प्रवृत्तिम् | = किसमें प्रवृत्त होना चाहिये | च | = और | च | = तथा |
| च | = और | तेषु | = उनमें | न | = न |
| निवृत्तिम् | = किससे निवृत्त होना चाहिये (—इसको) | न | = न तो | सत्यम् | = सत्य-पालन |
| शौचम् | = बाह्य शुद्धि, | अपि | = ही | ||
| न | = न | विद्यते | = होता है। |
- आरम्भमें ही अच्छी शिक्षा न मिलनेसे वे आसुर प्राणी क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, शरीरकी शुद्धि क्या होती है और अशुद्धि क्या होती है, खान-पान क्या शुद्ध होता है और क्या अशुद्ध होता है, बड़ों और छोटोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये और कैसा नहीं करना चाहिये, वाणी आदिका सत्य क्या होता है और असत्य क्या होता है—इन सब बातोंको नहीं जानते अर्थात् अच्छी शिक्षाके अभावमें वे प्रवृत्ति और निवृत्तिको, शौचको, सदाचारको और सत्यको नहीं जानते। इस कारण वे सत्य तत्त्व परमात्मासे विमुख हो जाते हैं। परमात्मासे विमुख होनेसे वे न ईश्वर, धर्म आदिको मानते हैं और न उनकी मर्यादाको ही मानते हैं। वे स्त्री-पुरुषके संगसे ही संसारकी उत्पत्ति मानते हैं। इस प्रकार नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेकर वे दूसरोंको दुःख देते हैं और अपना महान् पतन कर लेते हैं।