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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1040

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३९

व्याख्या—'प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः'—आजकलके उच्छृंखल वातावरण, खान-पान, शिक्षा आदिके प्रभावसे प्रायः मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको अर्थात् किसमें प्रवृत्त होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये—इसको नहीं जानते और जानना चाहते भी नहीं। कोई इसको बताना चाहे, तो उसकी मानते नहीं, प्रत्युत उसकी हँसी उड़ाते हैं, उसे मूर्ख समझते हैं और अभिमानके कारण अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझते हैं। कुछ लोग (प्रवृत्ति और निवृत्तिको) जानते भी हैं, पर उनपर आसुरी-सम्पदाका विशेष प्रभाव होनेसे उनकी विहित कार्योंमें प्रवृत्ति और निषिद्ध कार्योंसे निवृत्ति नहीं होती। इस कारण सबसे पहले आसुरी-सम्पत्ति आती है—प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे।

प्रवृत्ति और निवृत्तिको कैसे जाना जाय? इसे गुरुके द्वारा, ग्रन्थके द्वारा, विचारके द्वारा जाना जा सकता है। इसके अलावा उस मनुष्यपर कोई आफत आ जाय, वह मुसीबतमें फँस जाय, कोई विचित्र घटना घट जाय, तो विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है। किसी महापुरुषके दर्शन हो जानेसे पूर्वसंस्कारवश मनुष्यकी वृत्ति बदल जाती है अथवा जिन स्थानोंपर बड़े-बड़े प्रभावशाली सन्त हुए हैं, उन स्थलोंमें, तीर्थोंमें जानेसे भी विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है।

विवेकशक्ति प्राणिमात्रमें रहती है। परन्तु पशु-पक्षी आदि योनियोंमें इसको विकसित करनेका अवसर, स्थान और योग्यता है एवं मनुष्यमें उसको विकसित करनेका अवसर, स्थान और योग्यता भी है। पशु-पक्षी आदिमें वह विवेकशक्ति केवल अपने शरीर-निर्वाहतक ही सीमित रहती है पर मनुष्य उस विवेकशक्तिसे अपना और अपने परिवारका तथा अन्य प्राणियोंका भी पालन-पोषण कर सकता है, और दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंको भी ला सकता है। मनुष्य इसमें सर्वथा स्वतन्त्र है; क्योंकि वह साधन-योनि है। परन्तु पशु-पक्षी इसमें स्वतन्त्र नहीं हैं; क्योंकि वह भोग-योनि है।

जब मनुष्योंकी खाने-पीने आदिमें ही विशेष वृत्ति रहती है, तब उनमें कर्तव्य-अकर्तव्यका होश नहीं रहता। ऐसे मनुष्योंमें पशुओंकी तरह दैवी-सम्पत्ति छिपी हुई रहती है, सामने नहीं आती। ऐसे मनुष्योंके लिये भी भगवान्ने 'जनाः' पद दिया है अर्थात् वे भी मनुष्य

कहलानेके लायक हैं; क्योंकि उनमें दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो सकती है।

विशेष बात

विशेष बात

'जनाः' (१६।७) से लेकर 'नराधमान्' (१६।१९) पदतक बीचमें आये हुए श्लोकोंमें कहीं भी भगवान्ने मनुष्यवाचक शब्द नहीं दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करनेकी तथा दैवी-सम्पत्तिको धारण करनेकी योग्यता है, तथापि जो मनुष्य होकर भी दैवी-सम्पत्तिको धारण न करके आसुरी-सम्पत्तिको बनाये रखते हैं, वे मनुष्य कहलानेलायक नहीं हैं। वे पशुओंसे और नारकीय प्राणियोंसे भी गये-बीते हैं; क्योंकि पशु और नारकीय प्राणी तो पापोंका फल भोगकर पवित्रताकी तरफ जा रहे हैं और ये आसुर स्वभाववाले मनुष्य जिस पुण्यसे मनुष्यशरीर मिला है, उसको नष्ट करके और यहाँ नये-नये पाप बटोरकर पशु-पक्षी आदि योनियों तथा नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। अतः उनकी दुर्गतिा वर्णन इसी अध्यायके सोलहवें और उन्नीसवें श्लोकोंमें किया गया है।

भगवान्ने आसुर मनुष्योंके जितने लक्षण बताये हैं, उनमें उनको पशु आदिके विशेषण न देकर 'अशुमान्', 'नराधमान्' विशेषण दिये हैं। कारण यह कि पशु आदि इतने पापी नहीं हैं और उनके दर्शनसे पाप भी नहीं लगता, पर आसुर मनुष्योंमें विशेष पाप होते हैं और उनके दर्शनसे पाप लगता है, अपवित्रता आती है। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें 'नरः' पद देकर यह बताते हैं कि जो काम-क्रोध-लोभरूप नरकके द्वारोंसे छूटकर अपने कल्याणका आचरण करता है, वही मनुष्य कहलानेलायक है। पाँचवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भी 'नरः' पदसे इसी बातको पुष्ट किया गया है।

'न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते'—प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे उन आसुर स्वभाववालोंमें शुद्धि-अशुद्धिका ख्याल नहीं रहता। उनको सांसारिक बर्तावका, व्यवहारका भी ख्याल नहीं होता अर्थात् माता-पिता आदि बड़े-बूढ़ोंके साथ तथा अन्य मनुष्योंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और कैसा नहीं करना चाहिये—इस बातको वे जानते ही नहीं। उनमें सत्य नहीं होता अर्थात् वे असत्य बोलते हैं और आचरण भी असत्य ही करते हैं। इन सबका तात्पर्य यह है कि वे पुरुष असुर हैं। खाना-पीना, आरामसे रहना तथा 'मैं जीता रहूँ',