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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1041

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

संसारका सुख भोगता रहूँ और संग्रह करता रहूँ' आदि उद्देश्य होनेसे उनकी शौचाचार और सदाचारकी तरफ दृष्टि ही नहीं जाती।

भगवान्ने दूसरे अध्यायके चौवालीसवें श्लोकमें बताया है कि वैदिक प्रक्रियाके अनुसार सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए पुरुषोंमें भी परमात्माकी प्राप्तिका एक

परिशिष्ट भाव— ज्यों-ज्यों आसुरी-सम्पत्ति आती है, त्यों-त्यों विवेक लुप्त होता जाता है। भोगोंके परायण होनेसे आसुर मनुष्य 'क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये'—इसको नहीं जान सकते। उनकी निष्ठा तो लौकिक भी नहीं होती, अलौकिक तो दूर रही! उनकी निष्ठा नरकोंमें ले जानेवाली होती है।

आसुर मनुष्य पिण्डप्राणपोषणपरायण होते हैं। इसलिये वे केवल अपना सुख-आराम, अपना स्वार्थ देखते हैं। जिससे अपनेको सुख मिलता दीखे, उसीमें उनकी प्रवृत्ति होती है और जिससे दुःख मिलता दीखे, स्वार्थ सिद्ध होता न दीखे, उसीसे उनकी निवृत्ति होती है। वास्तवमें प्रवृत्ति और निवृत्तिमें शास्त्र ही प्रमाण है (गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); परन्तु अपने शरीर और प्राणोंमें मोह रहनेके कारण आसुर मनुष्योंकी प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्रको लेकर नहीं होती। आसुर स्वभावके कारण वे शास्त्रकी बात सुनते ही नहीं और अगर सुन भी लें तो उसको समझ सकते ही नहीं—'यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः' (गीता १५।११)।

सम्बन्ध— जहाँ सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती, वहाँ सद्भावोंका भी निरादर होता है अर्थात् सद्भाव दबते चले जाते हैं—अब इसको बताते हैं।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥

ते= वेअनीश्वरम्= बिना ईश्वरकेइसका कारण है,
आहुः= कहा करते हैं किअपरस्पर-सम्भूतम्= अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है।अन्यत् = इसके सिवाय और
जगत्= संसारकामहैतुकम्= (इसलिये) काम हीकिम् = क्या कारण है ? (और कारण हो ही नहीं सकता।)
असत्यम्= असत्य,
अप्रतिष्ठम्= बिना मर्यादाके (और)

व्याख्या— 'असत्यम्'—आसुर स्वभाववाले पुरुष कहा करते हैं कि यह जगत् असत्य है अर्थात् इसमें कोई भी बात सत्य नहीं है। जितने भी यज्ञ, दान, तप, ध्यान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत आदि शुभकर्म किये जाते हैं, उनको वे सत्य नहीं मानते। उनको तो वे एक बहकावा मानते हैं।

'अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्'—संसारमें आस्तिक

निश्चय नहीं होता। भाव यह है कि आसुरी-सम्पदाका अंश रहनेके कारण जब ऐसे शास्त्र-विधिसे यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए पुरुष भी परमात्माका एक निश्चय नहीं कर पाते, तब जिन पुरुषोंमें आसुरी-सम्पदा विशेष बढ़ी हुई है अर्थात् जो अन्यायपूर्वक भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं, उनकी बुद्धिमें परमात्माका एक निश्चय होना कितना कठिन है!

पुरुषोंकी धर्म, ईश्वर, परलोक१ (पुनर्जन्म) आदिमें श्रद्धा होती है। परन्तु वे आसुर मनुष्य धर्म, ईश्वर आदिमें श्रद्धा नहीं रखते; अतः वे ऐसा मानते हैं कि इस संसारमें धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदिको कोई प्रतिष्ठा—मर्यादा नहीं है। इस जगत्को वे बिना मालिकका कहते हैं अर्थात् इस जगत्को रचनेवाला, इसका शासन करनेवाला, यहाँपर किये हुए पाप-पुण्योंका फल भुगतानेवाला कोई (ईश्वर)

१-पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥ (मानस ५।४४।२)

२-मरनेके बाद जो जन्म होता है, वह चाहे मृत्युलोकमें हो, चाहे किसी अन्य लोकमें हो, चाहे मनुष्य, पशु-पक्षी आदि किसी योनिविशेषमें हो, वह सब 'परलोक' ही है।