श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1042, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ९ ]
- साधक-संजीवनी *
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नहीं है।* 'अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम्' - वे कहते हैं कि स्त्रीको पुरुषकी और पुरुषको स्त्रीकी कामना हो गयी। अतः उन दोनोंके परस्पर संयोगसे यह संसार पैदा
हो गया। इसलिये काम ही इस संसारका हेतु है। इसके लिये ईश्वर, प्रारब्ध आदि किसीकी क्या जरूरत है? ईश्वर आदिको इसमें कारण मानना ढकोसला है, केवल दुनियाको बहकाना है।
सम्बन्ध-जहाँ सद्भाव लुप्त हो जाते हैं, वहाँ सद्विचार काम नहीं करते अर्थात् सद्विचार प्रकट ही नहीं होते-इसको अब आगेके श्लोकमें बताते हैं।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
एताम् = इस (पूर्वोक्त) दृष्टिम = (नास्तिक) दृष्टिका अवष्टभ्य = आश्रय लेनेवाले नष्टात्मानः = जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं
मानते, अल्पबुद्धयः = जिनकी बुद्धि तुच्छ है, उग्रकर्माणः = जो उग्र कर्म करनेवाले (और)
जगतः = संसारके अहिताः = शत्रु हैं, क्षयाय, प्रभवन्ति = उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगतका नाश करनेके लिये ही होता है।
व्याख्या-'एतां दृष्टिमवष्टभ्य'-न कोई कर्तव्य-अकर्तव्य है, न शौचाचार-सदाचार है, न ईश्वर है, न प्रारब्ध है, न पाप-पुण्य है, न परलोक है, न किये हुए कर्मोंका कोई दण्ड-विधान है-ऐसी नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेकर वे चलते हैं। 'नष्टात्मानः'-आत्मा कोई चेतन-तत्त्व है, आत्माकी कोई सत्ता है-इस बातको वे मानते ही नहीं। वे तो इस बातको मानते हैं कि जैसे कत्था और चूना मिलनेसे एक लाली पैदा हो जाती है, ऐसी ही भौतिक तत्त्वोंके मिलनेसे एक चेतनता पैदा हो जाती है। वह चेतन कोई अलग चीज है-यह बात नहीं है। उनकी दृष्टिमें जड ही मुख्य होता है। इसलिये वे चेतन-तत्त्वसे बिल्कुल ही विमुख रहते हैं। चेतन-तत्त्व-(आत्मा-) से विमुख होनेसे उनका पतन हो चुका होता है। 'अल्पबुद्धयः'-उनमें जो विवेक-विचार होता है, वह अत्यन्त ही अल्प, तुच्छ होता है। उनकी दृष्टि केवल दृश्य पदार्थोंपर अवलम्बित रहती है कि कमाओ, खाओ, पीओ और मौज करो। आगे भविष्यमें क्या होगा? परलोकमें क्या होगा? ये बातें उनकी बुद्धिमें नहीं आतीं।
यहाँ अल्पबुद्धिका यह अर्थ नहीं है कि हरेक काममें उनकी बुद्धि काम नहीं करती। सत्य-तत्त्व क्या है? धर्म क्या है? अधर्म क्या है? सदाचार-दुराचार क्या हैं? और उनका परिणाम क्या होता है? इस विषयमें उनकी बुद्धि काम नहीं करती। परन्तु धनादि वस्तुओंके संग्रहमें उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक उन्नतिके विषयमें उनकी बुद्धि तुच्छ होती है और सांसारिक भोगोंमें फँसनेके लिये उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है। 'उग्रकर्माणः'-वे किसीसे डरते ही नहीं। यदि डरेंगे तो चोर, डाकू या राजकीय आदमीसे डरेंगे। ईश्वरसे, परलोकसे, मर्यादासे वे नहीं डरते। ईश्वर और परलोकका भय न होनेसे उनके द्वारा दूसरोंकी हत्या आदि बड़े भयानक कर्म होते हैं। 'अहिताः'-उनका स्वभाव खराब होनेसे वे दूसरोंका अहित (नुकसान) करनेमें ही लगे रहते हैं और दूसरोंका नुकसान करनेमें ही उनको सुख होता है।
- 'अनीश्वर' पदका तात्पर्य यह है कि आसुरी-सम्पत्तिवाले ईश्वरको नहीं मानते। 'प्राप्तौ सत्यां निषेधः' इस न्यायके अनुसार यह सिद्ध होता है कि ईश्वरकी सत्ता तो है, पर वे उसे स्वीकार नहीं करते। ईश्वरकी सत्ता न माननेसे वे अपार चिन्ताओंसे घिरे रहते हैं (सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक), पर ईश्वरकी सत्ता मानकर उसके आश्रित रहनेवाले दैवी-सम्पत्तिवाले मनुष्य निश्चिन्त और निर्भय रहते हैं।