श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
‘जगतः क्षयाय प्रभवन्ति’—उनके पास जो शक्ति है, ऐश्वर्य है, सामर्थ्य है, पद है, अधिकार है, वह सब-का-सब दूसरोंका नाश करनेमें ही लगता है। दूसरोंका नाश ही उनका उद्देश्य होता है। अपना स्वार्थ पूरा सिद्ध हो या थोड़ा सिद्ध हो अथवा बिलकुल सिद्ध न हो, पर वे दूसरोंकी उन्नतिको सह नहीं सकते। दूसरोंका नाश करनेमें ही उनको सुख होता है अर्थात् पराय हक छीनना, किसीको जानसे मार देना— इसीमें उनको प्रसन्नता होती
है। सिंह जैसे दूसरे पशुओंको मारकर खा जाता है, दूसरोंके दुःखकी परवाह नहीं करता और राजकीय स्वार्थी अफसर जैसे दस, पचास, सौ रुपयोंके लिये हजारों रुपयोंका सरकारी नुकसान कर देते हैं, ऐसे ही अपना स्वार्थ पूरा करनेके लिये दूसरोंका चाहे कितना ही नुकसान हो जाय, उसकी वे परवाह नहीं करते। वे आसुर स्वभाववाले पशु-पक्षियोंको मारकर खा जाते हैं और अपने थोड़े-से सुखके लिये दूसरोंको कितना दुःख हुआ—इसको वे सोच ही नहीं सकते।
सम्बन्ध—जहाँ सत्कर्म, सद्भाव और सद्विचारका निराद हो जाता है, वहाँ मनुष्य कामनाओंका आश्रय लेकर क्या करता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद् गृहीत्वा सद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥
| दुष्पूरम् | = कभी पूरी न होनेवाली | और मदमें चूर रहनेवाले (तथा) | मोहात् | = मोहके कारण |
|---|---|---|---|---|
| कामम् | = कामनाओंका | अशुचिव्रताः = अपवित्र व्रत | असद्ग्राहान् | = दुराग्रहोंको |
| आश्रित्य | = आश्रय लेकर | धारण करनेवाले | गृहीत्वा | = धारण करके |
| दम्भमान- | मनुष्य | प्रवर्तन्ते | = (संसारमें) विचरते रहते हैं। | |
| मदान्विताः | = दम्भ, अभिमान |
व्याख्या—‘काममाश्रित्य दुष्पूरम्’—वे आसुरी प्रकृतिवाले कभी भी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेते हैं। जैसे कोई मनुष्य भगवान्का, कोई कर्तव्यका, कोई धर्मका, कोई स्वर्ग आदिका आश्रय लेता है, ऐसे ही आसुर प्राणी कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेते हैं। उनके मनमें यह बात अच्छी तरहसे जँची हुई रहती है कि कामनाके बिना आदमी पत्थर-जैसा हो जाता है; कामनाके आश्रयके बिना आदमीकी उन्नति हो ही नहीं सकती; आज जितने आदमी नेता, पण्डित, धनी आदि हो गये हैं, वे सब कामनाके कारण ही हुए हैं। इस प्रकार कामनाके आश्रित रहनेवाले भगवान्को, परलोकको, प्रारब्ध आदिको नहीं मानते।
अब उन कामनाओंकी पूर्ति किनके द्वारा करें? उसके साथी (सहायक) कौन है? तो बताते हैं—‘दम्भमान-मदान्विताः।’ वे दम्भ, मान और मदसे युक्त रहते हैं अर्थात् वे उनकी कामनापूर्तिके बल हैं। जहाँ जिनके सामने जैसा बननेसे अपना मतलब सिद्ध होता हो अर्थात् धन, मान, बड़ाई, पूजा-प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार, वाह-वाह आदि मिलते हों, वहाँ उनके सामने वैसा ही अपनेको दिखाना
‘दम्भ’ है। अपनेको बड़ा मानना, श्रेष्ठ मानना ‘मान’ है। हमारे पास इतनी विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि है—इस बातको लेकर नशा-सा आ जाना ‘मद’ है। वे सदा दम्भ, मान और मदमें सने हुए रहते हैं, तदाकार रहते हैं।
‘अशुचिव्रताः’—उनके व्रत-नियम बड़े अपवित्र होते हैं; जैसे—‘इतने गाँवमें, इतने गायोंके बाड़ोंमें आग लगा देनी है; इतने आदमियोंको मार देना है’ आदि। ये वर्ण, आश्रम, आचार-शुद्धि आदि सब ढकोसलाबाजी हैं; अतः किसीके भी साथ खाओ-पीओ। हम कथा आदि नहीं सुनोगे; हम तीर्थ, मन्दिर आदि स्थानोंमें नहीं जायेंगे—ऐसे उनके व्रत-नियम होते हैं।
ऐसे नियमोंवाले डाकू भी होते हैं। उनका यह नियम रहता है कि बिना मार-पीट किये ही कोई वस्तु दे दे, तो वे लेंगे नहीं। जबतक चोट नहीं लगायेंगे, घावसे खून नहीं टपकेगा, तबतक हम उसकी वस्तु नहीं लेंगे, आदि।
‘मोहाद् गृहीत्वा सद्ग्राहान्’—मूढ़ताके कारण वे अनेक दुराग्रहोंको पकड़े रहते हैं। तामसी बुद्धिको लेकर चलना ही मूढ़ता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। वे शास्त्रोंको, वेदोंको, वर्णाश्रमोंको और