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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1044

श्लोक ११] * साधक-सञ्जीवनी * १०४३

कुल-परम्परा की मर्यादा को नहीं मानते, प्रत्युत इनके विपरीत चलने में, इनको भ्रष्ट करने में ही वे अपनी बहादुरी, अपना गौरव समझते हैं। वे अकर्तव्य को ही कर्तव्य और कर्तव्य को ही अकर्तव्य मानते हैं, हित को ही अहित और अहित को ही हित मानते हैं, ठीक को ही बेठीक और

बेठीक को ही ठीक मानते हैं। इन असद्विचारों के कारण उनकी बुद्धि इतनी गिर जाती है कि वे यह कहने लग जाते हैं कि माता-पिता का हमारे पर कोई ऋण नहीं है। उनसे हमारा क्या सम्बन्ध है? झूठ, कपट, जालसाजी करके भी धन कैसे बचे? आदि उनके दुराग्रह होते हैं।

परिशिष्ट भाव—'काममाश्रित्य दुष्पूरम्'—तीसरे अध्याय में भी भगवान् ने कहा है कि यह काम बहुत खाने वाला है—'महाशन:' (३।३७) और अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाला है—'दुष्पूरेणानलेन च' (३।३९)। इसलिये सभी कामनाओं की पूर्ति कभी सम्भव नहीं है। अतः कामनापूर्ति ही जिनका उद्देश्य है, उनको कभी शान्ति नहीं मिलती। कामनापूर्ति में महान् परतन्त्रता है, पर आसुर मनुष्य इस परतन्त्रता में भी स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं कि धनादि पदार्थ मिल जायेंगे तो हम स्वतन्त्र हो जायेंगे। वे शास्त्र, गुरु, ईश्वर, धर्म आदिको मानते ही नहीं, फिर काम के सिवाय और किसका आश्रय लें?

सम्बन्ध—सत्कर्म, सद्भाव और सद्विचारों के अभाव में उन आसुरी प्रकृति वालों के नियम, भाव और आचरण किस उद्देश्य को लेकर और किस प्रकार के होते हैं, अब उनको आगे के दो श्लोकों में बताते हैं।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११॥

प्रलयान्ताम् = (वे) मृत्युपर्यन्त रहने वाली अपरिमेयाम् = अपार चिन्ताम् = चिन्ताओं का उपाश्रिताः = आश्रय लेने वाले,

कामोपभोगपरमाः = पदार्थों का संग्रह और उनका भोग करने में ही लगे रहने वाले च = और

एतावत् = 'जो कुछ है, वह इतना ही है'— इति = ऐसा निश्चिताः = निश्चय करने वाले होते हैं।

व्याख्या—'चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः'—आसुरी-सम्पदा वाले मनुष्यों में ऐसी चिन्ताएँ रहती हैं, जिनका कोई माप-तौल नहीं है। जब तक प्रलय अर्थात् मौत नहीं आती, तब तक उनकी चिन्ताएँ मिटती नहीं। ऐसी प्रलय तक रहने वाली चिन्ताओं का फल भी प्रलय-ही-प्रलय अर्थात् बार-बार मरना ही होता है।

चिन्ता के दो विषय होते हैं—एक पारमार्थिक और दूसरा सांसारिक। मेरा कल्याण, मेरा उद्धार कैसे हो? परब्रह्म परमात्मा का निश्चय कैसे हो? ('चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय') इस प्रकार जिनको पारमार्थिक चिन्ता होती है, वे श्रेष्ठ हैं। परन्तु आसुरी-सम्पदा वालों को ऐसी चिन्ता नहीं होती। वे तो इससे विपरीत सांसारिक चिन्ताओं के आश्रित रहते हैं कि हम कैसे जीयेंगे? अपना जीवन-निर्वाह कैसे करेंगे? हमारे बिना बड़े-बूढ़े किसके आश्रित जीयेंगे? हमारा मान, आदर, प्रतिष्ठा, इज्जत, प्रसिद्धि, नाम आदि कैसे बने रहेंगे? मरने के बाद हमारे

बाल-बच्चों की क्या दशा होगी? मर जायेंगे तो धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद का क्या होगा? धन के बिना हमारा काम कैसे चलेगा? धन के बिना मकान की मरम्मत कैसे होगी? आदि-आदि। मनुष्य व्यर्थ में चिन्ता करता है। निर्वाह तो होता रहेगा। निर्वाह की चीजें तो बाकी रहेंगी और उनके रहते हुए ही मरेंगे। अपने पास एक लंगोटी रखने वाले विरक्त-से-विरक्त की भी फटी लंगोटी और फूटी तूम्बी बाकी बचती है और मरता है पहले। ऐसे ही सभी व्यक्ति वस्तु आदि के रहते हुए ही मरते हैं। यह नियम नहीं है कि धन पास में होने से आदमी मरता न हो। धन पास में रहते ही मनुष्य मर जाता है और धन पड़ा रहता है, काम में नहीं आता। एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसने तिजोरी की तरह लोहे का एक मजबूत मकान बना रखा था, जिसमें बहुत रत्न रखे हुए थे। उस मकान का दरवाजा ऐसा बना हुआ था, जो बंद होने पर चाबी के बिना खुलता नहीं था। एक बार वह