श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
धनी आदमी बाहर चाबी छोड़कर उस मकानके भीतर चला गया और उसने भूलसे दरवाजा बंद कर लिया। अब चाबीके बिना दरवाजा न खुलनेसे अन्न, जल, हवाके अभावमें मरते हुए उसने लिखा कि 'इतनी धन-सम्पत्ति आज मेरे पास रहते हुए भी मैं मर रहा हूँ; क्योंकि मुझे भीतर अन्न-जल नहीं मिल रहा है, हवा नहीं मिल रही है।' ऐसे ही खाद्य पदार्थोंके रहनेसे नहीं मरेगा, यह भी नियम नहीं है। भोगोंके पासमें होते हुए भी ऐसे ही मरेगा। जैसे पेट आदिमें रोग लग जानेपर वैद्य-डॉक्टर उसको (अन्न पासमें रहते हुए भी) अन्न खाने नहीं देते, ऐसे ही मरना हो, तो पदार्थोंके रहते हुए भी मनुष्य मर जाता है। जो अपने पास एक कौड़ीका भी संग्रह नहीं करते, ऐसे विरक्त संतोंको भी प्रारब्धके अनुसार आवश्यकतासे अधिक चीजें मिल जाती हैं। अतः जीवन-निर्वाह चीजोंके अधीन नहीं है। परन्तु इस तत्त्वको आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं समझ सकते। वे तो यही समझते हैं कि हम चिन्ता करते हैं, कामना करते हैं, विचार करते हैं, उद्योग करते हैं, तभी चीजें
मिलती हैं। यदि ऐसा न करें, तो भूखों मरना पड़े!
'कामोपभोगपरमाः' —जो मनुष्य धनादि पदार्थोंका उपभोग करनेके परायण हैं, उनकी तो हरदम यही इच्छा रहती है कि सुख-सामग्रीका खूब संग्रह कर लें और भोग भोग लें। उनको तो भोगोंके लिये धन चाहिये; संसारमें बड़ा बननेके लिये धन चाहिये, सुख-आराम, स्वाद-शौकीनी आदिके लिये धन चाहिये। तात्पर्य है कि उनके लिये भोगोंसे बढ़कर कुछ नहीं है।
'एतावदिति निश्चितः' —उनका यह निश्चय होता है कि सुख भोगना और संग्रह करना—इसके सिवाय और कुछ नहीं है। इस संसारमें जो कुछ है, यही है। अतः उनकी दृष्टिमें परलोक एक ढकोसला है। उनकी मान्यता रहती है कि मरनेके बाद कहीं आना-जाना नहीं होता। बस, यहाँ शरीरके रहते हुए जितना सुख भोग लें, वही ठीक है; क्योंकि मरनेपर तो शरीर यहाँ बिखर जायगा। शरीर स्थिर रहनेवाला है ही नहीं, आदि-आदि भोगोंके निश्चयके सामने वे पाप-पुण्य, पुनर्जन्म आदिको भी नहीं मानते।
परिशिष्ट भाव —भोग और संग्रहमें लगा हुआ मनुष्य अन्ध हो जाता है। वह न तो संसारको जान सकता है और न परमात्माको ही जान सकता है। अस्वाभाविकमें स्वाभाविक बुद्धि होनेके कारण उसकी दृष्टि परमात्माकी तरफ जा ही नहीं सकती। वह अस्वाभाविक संसारको ही सच्चा मानता है।
वस्तुएँ विनाशी हैं, आप अविनाशी हैं, फिर पूर्ति कैसे हो? नाशवान्के द्वारा अविनाशीकी पूर्ति कैसे हो सकती है?
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥
| आशापाशशतैः = (वे) आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे | कामक्रोधपरायणाः = काम-क्रोधके परायण होकर | अन्यायेन = अन्यायपूर्वक |
|---|---|---|
| बद्धाः = बँधे हुए मनुष्य | कामभोगार्थम् = पदार्थोंका भोग करनेके लिये | अर्थसञ्चयान् = धन-संचय करनेको |
| ईहन्ते = चेष्टा करते रहते हैं। |
व्याख्या—‘आशापाशशतैर्बद्धाः’ —आसुरी सम्पत्तिवाले मनुष्य आशारूपी सैकड़ों पाशोंसे बँधे रहते हैं अर्थात् उनको ‘इतना धन हो जायगा, इतना मान हो जायगा, शरीरमें नीरोगता आ जायगी’ आदि सैकड़ों आशाओंकी
१-(१) प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्रीरघुवीर ॥
(२) मुरदेको हरि देत है, कपड़ो लकड़ी आग। जीवित नर चिन्ता करे, उनका बड़ा अभाग ॥
(३) धान नहीं धीणों नहीं, नहीं रुपेयो रोक। जीमण बैठे रामदास, आन मिले सब थोक ॥
२-ऐसे ही स्वर्गको माननेवाले सकाम मनुष्य भी कहते हैं कि स्वर्गसे बढ़कर और कुछ नहीं है—‘नान्द्यदस्तीति वादिनः’ (गीता २।४२)। उनकी यही कामना रहती है कि मरनेके बाद हम स्वर्गमें जायेंगे और वहाँके दिव्य भोगोंको भोगेंगे। स्वर्गके भोगोंके सामने यहाँके भोग कुछ भी नहीं हैं—ऐसा वे मानते हैं।
३-यावज्जीवैत् सुखं जीवैत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबैत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कृतः ॥