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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1046, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1046

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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फॉसियाँ लगी रहती हैं। आशाकी फॉसीसे बँधे हुए मनुष्योंके पास लाखों-करोड़ों रुपये हो जायें, तो भी उनका मँगतापन नहीं मिटता! उनकी तो यही आशा रहती है कि सन्तोसे कुछ मिल जाय, भगवान्से कुछ मिल जाय, मनुष्योंसे कुछ मिल जाय। इतना ही नहीं पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, पहाड़-समुद्र आदिसे भी हमें कुछ मिल जाय। इस प्रकार उनमें सदा 'खाऊँ-खाऊँ' बनी रहती है। ऐसे व्यक्तियोंकी सांसारिक आशाएँ कभी पूरी नहीं होतीं (गीता—नवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। यदि पूरी हो भी जायें, तो भी कुछ फायदा नहीं है; क्योंकि यदि वे जीते रहेंगे, तो आशावाली वस्तु नष्ट हो जायगी और आशावाली वस्तु रहेगी, तो वे मर जायेंगे अथवा दोनों ही नष्ट हो जायेंगे।

जो आशारूपी फॉसीसे बँधे हुए हैं, वे कभी एक जगह स्थिर नहीं रह सकते और जो इस आशारूपी फॉसीसे छूट गये हैं, वे मौजसे एक जगह रहते हैं— आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृङ्खला। यया बद्धाः प्रधार्वन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पंगुवत्॥

'कामक्रोधपरायणाः'—उनका परम अयन, स्थान काम और क्रोध ही होते हैं* अर्थात् अपनी कामनापूर्ति करनेके लिये और क्रोधपूर्वक दूसरोंको कष्ट देनेके लिये ही उनका जीवन होता है। काम-क्रोधके परायण मनुष्योंका यह निश्चय रहता है कि कामनाके बिना मनुष्य जड़ हो जाता है। क्रोधके बिना उसका तेज भी नहीं रहता। कामनासे ही सब काम होता है, नहीं तो आदमी काम करे ही क्यों? कामनाके बिना तो आदमीका जीवन ही भार हो जायगा। संसारमें काम और क्रोध ही तो सार चीज है। इसके बिना लोग हमें संसारमें रहने ही नहीं देंगे। क्रोधसे ही शासन चलता है, नहीं तो शासनको मानेगा ही कौन?

परिशिष्ट भाव— 'आशापाशशतैर्बद्धाः'—'यहाँ 'शतैः' पद अनन्तका वाचक है। जबतक संसारके साथ सम्बन्ध है, तबतक कामनाओंका अन्त नहीं आता। दूसरे अध्यायके इकतालिसवें श्लोकमें आया है—'बहुशाखा ह्यन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्'—'अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।' कारण कि उन्होंने अविनाशीसे विमुख होकर नाशवान्को सत्ता और महत्ता दे दी तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया।

'कामक्रोधपरायणाः'—आसुर स्वभाववाले लोग काम और क्रोधको स्वाभाविक मानते हैं। काम और क्रोधके सिवाय उनको और कुछ दीखता ही नहीं, इनसे आगे उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। यही उनके परम अयन अर्थात् स्थान हैं।

मनुष्य समझता है कि क्रोध करनेसे दूसरा हमारे वशमें रहेगा। परन्तु जो मजबूर, लाचार होकर हमारे वशमें हुआ है, वह कबतक वशमें रहेगा? मौका पड़ते ही वह घात करेगा। अतः क्रोधका परिणाम बुरा ही होता है।

  • इसी अध्यायके दसवें श्लोकमें आये 'दम्भ, मान और मद' तो उनके साथी होते हैं और यहाँ आये 'काम और क्रोध' उनके आश्रय होते हैं।

क्रोधसे दबाकर दूसरोंको ठीक करना चाहिये, नहीं तो लोग हमारा सर्वस्व छीन लेंगे। फिर तो हमारा अपना कुछ अस्तित्व ही नहीं रहेगा, आदि।

'ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्'—आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंका उददेश्य धनका संग्रह करना और विषयोंका भोग करना होता है। इस उददेश्यकी पूर्तिके लिये वे बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात, टैक्सकी चोरी आदि करके; दूसरोंका हक मारकर; मन्दिर, बालक, विधवा आदिका धन दबाकर और इस तरह अनेक अन्याय पाप करके धनका संचय करना चाहते हैं। कारण कि उनके मनमें यह बात गहराईसे बैठी रहती है कि आजकलके जमानेमें ईमानदारीसे, न्यायसे कोई धनी थोड़े ही हो सकता है? ये जितने धनी हुए हैं, सब अन्याय, चोरी, धोखेबाजी करके ही हुए हैं। ईमानदारीसे, न्यायसे काम करनेकी जो बात है, वह तो कहनेमात्रकी है; काममें नहीं आ सकती। यदि हम न्यायके अनुसार काम करेंगे, तो हमें दुःख पाना पड़ेगा और जीवन-धारण करना मुश्किल हो जायगा। ऐसा उन आसुर स्वभाववाले व्यक्तियोंका निश्चय होता है।

जो व्यक्ति न्यायपूर्वक स्वर्गके भोगोंकी प्राप्तिके लिये लगे हुए हैं, उनके लिये भी भगवान्ने कहा है कि उन लोगोंकी बुद्धिमें 'हमें परमात्माकी प्राप्ति करना है' यह निश्चय हो ही नहीं सकता (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। फिर जो अन्यायपूर्वक धन कमाकर प्राणोंके पोषणमें लगे हुए हैं, उनकी बुद्धिमें परमात्मप्राप्तिका निश्चय कैसे हो सकता है? परन्तु वे भी यदि चाहें तो परमात्मप्राप्तिका निश्चय करके साधनपरायण हो सकते हैं। ऐसा निश्चय करनेके लिये किसीको भी मना नहीं है; क्योंकि मनुष्य-जन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।