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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

सम्बन्ध—आसुर स्वभाववाले व्यक्ति लोभ, क्रोध और अभिमानको लेकर किस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं, उसे क्रमशः आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥

वे इस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं कि—

इदम्= इतनी वस्तुएँ तोमनोरथम्= मनोरथकोअस्ति= है ही,
मया= हमनेप्राप्ये= प्राप्त (पूरा)इदम्= इतना
अद्य= आजकर लेंगे।(धन)
लब्धम्= प्राप्त कर लीं
(और अब)इदम्= इतनापुनः= फिर
इमम्= इसधनम्= धन तोअपि= भी
मे= हमारे पासभविष्यति= हो जायगा।

व्याख्या—‘इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्ये मनोरथम्’ —आसुरी प्रकृतिवाले व्यक्ति लोभके परायण होकर मनोरथ करते रहते हैं कि हमने अपने उद्योगसे, बुद्धिमानीसे, चतुराईसे, होशियारीसे, चालाकीसे इतनी वस्तुएँ तो आज प्राप्त कर लीं, इतनी और प्राप्त कर लेंगे। इतनी वस्तुएँ तो हमारे पास हैं, इतनी और वहाँसे आ जायँगी। इतना धन व्यापारसे आ जायगा। हमारा बड़ा लड़का इतना पढ़ा हुआ है; अतः इतना धन और वस्तुएँ तो उसके विवाहमें आ ही जायँगी। इतना धन टैक्सकी चोरीसे बच जायगा, इतना जमीनसे आ जायगा, इतना मकानोंके किरायेसे आ जायगा, इतना ब्याजका आ जायगा, आदि-आदि।

‘इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्’ —जैसे-जैसे उनका लोभ बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे उनके मनोरथ भी बढ़ते जाते हैं। जब उनका चिन्तन बढ़ जाता है, तब वे चलते-फिरते हुए, काम-धंधा करते हुए, भोजन करते हुए, मल-मूत्रका त्याग करते हुए और यदि नित्यकर्म (पाठ-पूजा-जप आदि) करते हैं तो उसे करते हुए भी ‘धन कैसे बढ़े’ इसका चिन्तन करते रहते हैं। इतनी दूकानें, मिल, कारखाने तो हमने खोल दिये हैं, इतने और खुल जायँ। इतनी गायें-भैंसे, भेड़-बकरियाँ आदि तो हैं ही, इतनी और हो जायँ। इतनी जमीन तो हमारे पास है, पर यह बहुत थोड़ी है, किसी तरहसे और मिल जाय तो बहुत अच्छा हो जायगा। इस प्रकार धन आदि बढ़ानेके विषयमें उनके मनोरथ होते हैं।

जब उनकी दृष्टि अपने शरीर तथा परिवारपर जाती है, तब वे उस विषयमें मनोरथ करने लग जाते हैं कि

अमुक-अमुक दवाई सेवन करनेसे शरीर ठीक रहेगा। अमुक-अमुक चीजें इकट्ठी कर ली जायँ, तो हम सुख और आरामसे रहेंगे। एयरकण्डीशनवाली गाड़ी मँगवा लें, जिससे बाहरकी गरमी न लगे। ऊनके ऐसे वस्त्र मँगवा लें, जिससे सरदी न लगे। ऐसा बरसाती कोट या छाता मँगवा लें, जिससे वर्षासे शरीर गीला न हो। ऐसे-ऐसे गहने-कपड़े और शृंगार आदिकी सामग्री मँगवा लें, जिससे हम खूब सुन्दर दिखायी दें, आदि-आदि।

ऐसे मनोरथ करते-करते उनको यह याद नहीं रहता कि हम बूढ़े हो जायँगे तो इस सामग्रीका क्या करेंगे और मरते समय यह सामग्री हमारे क्या काम आयेगी? अन्तमें इस सम्पत्तिका मालिक कौन होगा? बेटा तो कपूत है; अतः वह सब नष्ट कर देगा। मरते समय यह धन-सम्पत्ति खुदको दुःख देगी। इस सामग्रीके लोभके कारण ही मुझे बेटा-बेटीसे डरना पड़ता है और नौकरोंसे डरना पड़ता है कि कहीं ये लोग हड़ताल न कर दें।

प्रश्न— दैवी-सम्पत्तिको धारण करके साधन करनेवाले साधकके मनमें भी कभी-कभी व्यापार आदिके कार्यको लेकर (इस श्लोककी तरह) ‘इतना काम हो गया, इतना काम करना बाकी है और इतना काम आगे हो जायगा; इतना पैसा आ गया है और इतना वहाँपर टैक्स देना है’ आदि स्फुरणार्ण्व होती हैं। ऐसी ही स्फुरणार्ण्व जड़ताका उद्देश्य रखनेवाले आसुरी-सम्पत्तिवालोंके मनमें भी होती हैं, तो इन दोनोंकी वृत्तियोंमें क्या अन्तर हुआ?

उत्तर— दोनोंकी वृत्तियाँ एक-सी दीखनेपर भी उनमें बड़ा अन्तर है। साधकका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका होता है; अतः वह उन वृत्तियोंमें तल्लीन नहीं होता। परन्तु आसुरी

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