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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1048

श्लोक १४-१५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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प्रकृतिवालोंका उद्देश्य धन इकट्ठा करने और भोग | हैं। तालपत्र यह है कि दोनोंके उद्देश्य भिन्न-भिन्न होनेसे भोगनेका रहता है; अतः वे उन वृत्तियोंमें ही तल्लीन होते | दोनोंमें बड़ा भारी अन्तर है।

परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान् ग्यारहवें श्लोकमें कहे 'कामोपभोगपरमाः' पदकी व्याख्या करते हैं।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥

असौ= वहअपि= भी (हम)भोगी= भोग भोगनेवाले हैं।
शत्रुः= शत्रु तोहनिष्ये= मार डालेंगे।अहम्= हम
मया= हमारे द्वाराअहम्= हमसिद्धः= सिद्ध हैं।
हतः= मारा गयाईश्वरः= ईश्वरबलवान्= (हम) बड़े
= और(सर्वसमर्थ)बलवान्
अपरान्= (उन) दूसरेहैं।(और)
शत्रुओंकोअहम्= हमसुखी= सुखी हैं।

व्याख्या —आसुरी-सम्पदावाले व्यक्ति क्रोधके परायण होकर इस प्रकारके मनोरथ करते हैं—'असौ मया हतः शत्रुः —'वह हमारे विपरीत चलता था, हमारे साथ वैर रखता था, उसको तो हमने मार दिया है और 'हनिष्ये चापरानपि —'दूसरे जो भी हमारे विपरीत चलते हैं, हमारे साथ वैर रखते हैं, हमारा अनिष्ट सोचते हैं, उनको भी हम मजा चखा देंगे, मार डालेंगे। 'ईश्वरोऽहम् —'हम धन, बल, बुद्धि आदिमें सब तरहसे समर्थ हैं। हमारे पास क्या नहीं है? हमारी बराबरी कोई कर सकता है क्या? 'अहं भोगी —'हम भोग भोगनेवाले हैं। हमारे पास स्त्री, मकान, कार आदि कितनी भोग सामग्री है! 'सिद्धोऽहम् —'हम सब तरहसे सिद्ध हैं। हमने तो पहले ही कह दिया था न? वैसा हो गया कि नहीं? हमारेको तो पहलेसे ही ऐसा दीखता है; ये जो लोग भजन, स्मरण, जप, ध्यान आदि

करते हैं, ये सभी किसीके बहकावेमें आये हुए हैं। अतः इनकी क्या दशा होगी, उसको हम जानते हैं। हमारे समान सिद्ध और कोई है संसारमें? हमारे पास अणिमा, गरिमा आदि सभी सिद्धियाँ हैं। हम एक फूँकमें सबको भस्म कर सकते हैं। 'बलवान् —'हम बड़े बलवान् हैं। अमुक आदमीने हमारेसे टक्कर लेनी चाही, तो उसका क्या नतीजा हुआ? आदि। परन्तु जहाँ स्वयं हार जाते हैं, वह बात दूसरोंको नहीं कहते, जिससे कि कोई हमें कमजोर न समझ ले। उन्हें अपने हारनेकी बात तो याद भी नहीं रहती, पर अभिमानकी बात उन्हें याद रहती है। 'सुखी —'हमारे पास कितना सुख है, आराम है। हमारे समान सुखी संसारमें कौन है?

ऐसे व्यक्तियोंके भीतर तो जलन होती रहती है, पर ऊपरसे इस प्रकारकी डींग हाँकते हैं।

परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान् बारहवें श्लोकमें कहे 'कामक्रोधपरायणाः ' पदकी व्याख्या करते हैं। आसुर स्वभाववाले मनुष्योंमें 'हम सुखी हैं'—यह केवल अभिमान होता है। वास्तवमें वे सुखी नहीं होते। सुखी वास्तवमें वही है, जिसपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका असर नहीं पड़ता (गीता—पाँचवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। आसुर स्वभाववाले मनुष्योंके पास काम और क्रोधका ही बल होता है। वे नाशवान्के सम्बन्धसे अपनेको बलवान् मानते हैं। हिरण्यकशिपु आदिकी तरह वे अपनेको ही सर्वोपरि मानते हैं; क्योंकि दूसरे लोग उनको निकृष्ट दीखते हैं।

आद्युद्योऽभिजनवानसि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥