श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
| आदयः | = हम धनवान् हैं, | सदृशः | = समान | दास्यामि | = दान देंगे (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| अभिजनवान्, | अन्यः | = दूसरा | मोदिष्ये | = मौज करेंगे— | |
| अस्मि | = बहुत-से | कः | = कौन | इति | = इस तरह |
| मनुष्य हमारे पास | अस्ति | = है? | (वे) | ||
| हैं, | यक्ष्ये | = (हम) खूब यज्ञ | अज्ञानविमोहिताः | = अज्ञानसे मोहित | |
| मया | = हमारे | करेंगे, | रहते हैं। |
व्याख्या —आसुर स्वभाववाले व्यक्ति अभिमानके परायण होकर इस प्रकारके मनोरथ करते हैं—
‘आदयोऽभिजनवानस्मि’ —कितना धन हमारे पास है! कितना सोना-चाँदी, मकान, खेत, जमीन हमारे पास है! कितने अच्छे आदमी, ऊँचे पदाधिकारी हमारे पक्षमें हैं! हम धन और जनके बलपर, रिश्चत और सिफारिशके बलपर जो चाहें, वही कर सकते हैं।
‘कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’ —आप इतने घूमे-फिरे हो, आपको कई आदमी मिले होंगे; पर आप बताओ, हमारे समान आपने कोई देखा है क्या? ‘यक्ष्ये दास्यामि’ —हम ऐसा यज्ञ करेंगे, ऐसा दान करेंगे कि सबपर टाँग फेर देंगे! थोड़ा-सा यज्ञ करनेसे, थोड़ा-सा दान देनेसे, थोड़े-से ब्राह्मणोंको भोजन कराने आदिसे क्या होता है? हम तो ऐसे यज्ञ, दान आदि करेंगे, जैसे आजतक किसीने न किये हैं। क्योंकि मामूली यज्ञ, दान करनेसे लोगोंको क्या पता
लगेगा कि इन्होंने यज्ञ किया, दान दिया। बड़े यज्ञ, दानसे हमारा नाम अखबारोंमें निकलेगा। किसी धर्मशालामें मकान बनवायेंगे, तो उसमें हमारा नाम खुदवाया जायगा, जिससे हमारी यादगारी रहेगी। ‘मोदिष्ये’ —हम कितने बड़े आदमी हैं! हमें सब तरहसे सब सामग्री सुलभ है! अतः हम आनन्दसे मौज करेंगे।
इस प्रकार अभिमानको लेकर मनोरथ करनेवाले आसुर लोग केवल ‘करेंगे, करेंगे’—ऐसा मनोरथ ही करते रहते हैं, वास्तवमें करते-काराते कुछ नहीं। वे करेंगे भी, तो वह भी नाममात्रके लिये करेंगे (जिसका उल्लेख आगे सत्रहवें श्लोकमें आया है)। कारण कि ‘इत्यज्ञानविमोहिताः’ —इस प्रकार तेरहवें, चौदहवें और पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित मनोरथ करनेवाले आसुर लोग अज्ञानसे मोहित रहते हैं अर्थात् मूढ़ताके कारण ही उनकी ऐसे मनोरथवाली वृत्ति होती है।
सम्बन्ध—परमात्मासे विमुख हुए आसुरी सम्पदावालोंको जीते-जी अशान्ति, जलन, संताप आदि तो होते ही हैं, पर मरनेपर उनकी क्या गति होती है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥
| अनेकचित्त- | समावृताः | = मोह-जालमें | आसक्त |
|---|---|---|---|
| विभ्रान्ताः | अच्छी तरहसे फँसे | रहनेवाले | |
| हुए (तथा) | मनुष्य | ||
| कामभोगेषु | = पदार्थों और | अशुचौ | = भयंकर |
| भोगोंमें | नरके | = नरकोंमें | |
| मोहजाल- | प्रसक्ताः | = अत्यन्त | पतन्ति |
व्याख्या —‘अनेकचित्तविभ्रान्ताः’ —उन मनुष्योंका एक निश्चय न होनेसे उनके मनमें अनेक तरहकी चाहना होती है और उस एक-एक चाहनाकी पूर्तिके लिये अनेक तरहके उपाय होते हैं तथा उन उपायोंके विषयमें उनका अनेक तरहका चिन्तन होता है। उनका
चित्त किसी एक बातपर स्थिर नहीं रहता, अनेक तरहसे भटकता ही रहता है।
‘मोहजालसमावृताः’ —जड़का उद्देश्य होनेसे वे मोहजालसे ढके रहते हैं। मोहजालका तात्पर्य है कि तेरहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक काम, क्रोध और अभिमानको