श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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लेकर जितने मनोरथ बताये गये हैं, उन सबसे वे अच्छी तरहसे आवृत रहते हैं; अतः उनसे वे कभी छूटते नहीं। जैसे मछली जालमें फँस जाती है, ऐसे ही वे प्राणी मनोरथरूप मोहजालमें फँसे रहते हैं। उनके मनोरथोंमें भी केवल एक तरफ ही वृत्ति नहीं होती, प्रत्युत दूसरी तरफ भी वृत्ति रहती है; जैसे—इतना धन तो मिल जायगा, पर उसमें अमुक-अमुक बाधा लग जायगी तो? हमारे पास दो नम्बरकी इतनी पूँजी है, इसका पता राजकीय अधिकारियोंको लग जायगा तो? हमारे मुनीम, नौकर आदि हमारी शिकायत कर देंगे तो? हम अमुक व्यक्तिको मार देंगे, पर हमारी न चली और दशा विपरीत हो गयी तो? हम अमुकका नुकसान करेंगे, पर उससे हमारा नुकसान हो गया तो?—इस प्रकार मोहजालमें फँसे हुए आसुरी सम्पदावालोंमें काम, क्रोध और अभिमानके साथ-साथ भय भी बना रहता है। इसलिये वे निश्चय नहीं कर
पाते। कहींपर जाते हैं ठीक करनेके लिये, पर हो जाता है बेटीक! मनोरथ सिद्ध न होनेसे उनको जो दुःख होता है, उसको तो वे ही जानते हैं!
‘प्रसक्ताः कामभोगेषु’ —वस्तु आदिका संग्रह करने और उसका उपभोग करनेमें तथा मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिमें वे अत्यन्त आसक्त रहते हैं।
‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ —मोहजाल उनके लिये जीते-जी ही नरक है और मरनेके बाद उन्हें कुम्भीपाक, महारौरव आदि स्थान-विशेष नरकोंकी प्राप्ति होती है। उन नरकोंमें भी वे घोर यातनावाले नरकोंमें गिरते हैं। ‘नरके अशुचौ’ कहनेका तात्पर्य यह है कि जिन नरकोंमें महान् असह्य यातना और भयंकर दुःख दिया जाता है, ऐसे घोर नरकोंमें वे गिरते हैं; क्योंकि जिनकी जैसी स्थिति होती है, मरनेके बाद भी उनकी वैसी (स्थितिके अनुसार) ही गति होती है।
परिशिष्ट भाव —वास्तवमें आसुर मनुष्य काम-क्रोधपरायण होनेके कारण पहलेसे ही नरकमें पड़े हैं और अभावरूपी अग्निमें जल रहे हैं। परिणाममें उनको भयंकर नरकोंकी प्राप्ति होती है।
ऊँचे लोकोंमें अथवा नरकोंमें जानेमें पदार्थ और क्रिया मुख्य कारण नहीं हैं, प्रत्युत भाव मुख्य कारण है। भावका विशेष मूल्य है। जैसा भाव होता है, वैसी क्रिया अपने-आप होती है। इसलिये भगवान्ने आसुर मनुष्योंके भावों (मनोरथ आदि)-का वर्णन किया है।
सम्बन्ध—भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे विमुख हुए आसुरी-सम्पदावालोंके दुराचारोंका फल नरक-प्राप्ति बताकर, दुराचारोंद्वारा बोये गये दुर्भावोंसे वर्तमानमें उनकी कितनी भयंकर दुर्दशा होती है और भविष्यमें उसका क्या परिणाम होता है—इसे बतानेके लिये आगेका (चार श्लोकोंका) प्रकरण आरम्भ करते हैं।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
| आत्म-सम्भाविताः = अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, | धनमान-मदान्विताः = धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले | अविधि-पूर्वकम् = अविधिपूर्वक |
|---|---|---|
| स्तब्धाः = अकड़ रखनेवाले (तथा) | ते = वे मनुष्य | नामयज्ञैः = नाममात्रके यज्ञोंसे |
| दम्भेन = दम्भसे | यजन्ते = यजन करते हैं। |
व्याख्या—‘आत्मसम्भाविताः’ —वे धन, मान, बड़ाई, आदर आदिकी दृष्टिसे अपने मनसे ही अपने-आपको बड़ा मानते हैं, पूज्य समझते हैं कि हमारे समान कोई नहीं है; अतः हमारा पूजन होना चाहिये, हमारा आदर होना चाहिये,
- नरकोंमें जानेवाले प्राणीको ‘यातनाशरीर’ की प्राप्ति होती है। उस यातनाशरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायें, तेलमें डालकर उबाला जाय, आगमें फेंककर जलाया जाय, तो भी वह मरता नहीं। प्राणी जबतक अपने पापकर्मोंका फल (दण्ड) न भोग ले, तबतक भयंकर यातना देनेपर भी वह शरीर मरता नहीं।