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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

हमारी प्रशंसा होनी चाहिये। वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, पद, अधिकार, योग्यता आदिमें हम सब तरहसे श्रेष्ठ हैं; अतः सब लोगोंको हमारे अनुकूल चलना चाहिये।

‘सत्त्वाः’ —वे किसीके सामने नम्र नहीं होते, नमते नहीं। कोई सन्त-महात्मा या अवतारी भगवान् ही सामने क्यों न आ जायें, तो भी वे उनको नमस्कार नहीं करेंगे। वे तो अपने-आपको ही ऊँचा समझते हैं, फिर किसके सामने नम्रता करें और किसको नमस्कार करें! कहीं किसी कारणसे परवश होकर लोगोंके सामने झुकना भी पड़े, तो अभिमानसहित ही झुकेंगे। इस प्रकार उनमें बहुत ज्यादा ऐंट-अकड़ रहती है।

‘धनमानमदान्विताः’ —वे धन और मानके मदसे सदा चूर रहते हैं। उनमें धनका, अपने जनोंका, जमीन-जायदाद और मकान आदिका मद (नशा) होता है। इधर-उधर पहचान हो जाती है, तो उसका भी उनके मनमें मद होता है कि हमारी तो बड़े-बड़े मिनिस्टरोंतक पहचान है। हमारे पास ऐसी शक्ति है, जिससे चाहे जो प्राप्त कर सकते हैं और चाहे जिसका नाश कर सकते हैं। इस प्रकार धन और मान ही उनका सहारा होता है। इनका ही उन्हें नशा होता है, गरमी होती है। अतः वे इनको ही श्रेष्ठ मानते हैं।

‘यजन्ते नामयज्ञेस्ते दम्भेन’ —वे लोग (पन्द्रहवें श्लोकमें आये ‘यक्ष्ये दास्यामि’ पदोंके अनुसार) दम्भपूर्वक नाममात्रके यज्ञ करते हैं। वे केवल लोगोंको दिखानेके लिये और अपनी महिमाके लिये ही यज्ञ करते हैं तथा इस भावसे करते हैं कि दूसरोंपर असर पड़ जाय और वे हमारे प्रभावसे प्रभावित हो जायें; उनकी आँख खुल जाय कि हम क्या हैं, उन्हें चेत हो जाय आदि।

लोगोंमें हमारा नाम हो जाय, प्रसिद्धि हो जाय, आदर हो जाय—इसके लिये वे यज्ञके नामपर अपने नामका खूब प्रचार करेंगे, अपने नामका छापा (पैम्फलेट) छपवायेंगे। ब्राह्मणोंके लिये भोजन करेंगे, तो खीरमें कपूर डाल देंगे, जिससे वे अधिक न खा सकें; क्योंकि उससे खर्चा भी अधिक नहीं होगा और नाम भी हो जायगा। ऐसे ही पंक्तिमें भोजनके लिये दो-दो, चार-चार, पाँच-पाँच सकोर और पतलें एक साथ परोस देंगे, जिससे उन सकोर और पतलोंको बाहर फेंकनेपर उनका ढेर लग जाय और लोगोंको यह पता चल जाय कि ये कितने अच्छे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतने ब्राह्मणोंको भोजन कराया है। इस प्रकार ये आसुरी-सम्पदावालोंके भीतरके भाव होते

हैं और भावोंके अनुसार ही उनके आचरण होते हैं।

आसुरी-सम्पत्तिवाले व्यक्ति शास्त्रोक्त यज्ञ, दान, पूजन आदि कर्म तो करते हैं और उनके लिये पैसे भी खर्च करते हैं, पर करते हैं शास्त्रविधिकी परवाह न करके और दम्भपूर्वक ही।

मन्दिरोंमें जब कोई मेला-महोत्सव हो और ज्यादा लोगोंके आनेकी उम्मीद हो तथा बड़े-बड़े धनी लोग आनेवाले हों, तब मन्दिरको अच्छी तरह सजायेंगे, ठाकुरजीको खूब बढ़िया-बढ़िया गहने-कपड़े पहनायेंगे, जिससे ज्यादा लोग आ जायें और खूब भेंट-चढ़ावा इकट्ठा हो जाय। इस प्रकार ठाकुरजीका तो नाममात्रका पूजन होता है, पर वास्तवमें पूजन होता है लोगोंका। ऐसे ही कोई मिनिस्टर या अफसर आनेवाला हो, तो उनको राजी करनेके लिये ठाकुरजीको खूब सजायेंगे और जब वे मन्दिरमें आयेंगे, तब उनका खूब आदर-सत्कार करेंगे, उनको ठाकुरजीकी माला देंगे, प्रसाद (जो उनके लिये विशेषरूपसे तैयार रखा रहता है) देंगे, इसलिये कि वे राजी हो जायेंगे, तो हमारे व्यापारमें, घरेलू कामोंमें हमारी सहायता करेंगे, मुकदमे आदिमें हमारा पक्ष लेंगे, आदि। इन भावोंसे वे ठाकुरजीका जो पूजन करते हैं, वह तो नाममात्रका पूजन है। वास्तवमें पूजन होता है—अपने व्यापारका, घरेलू कामोंका, लड़ाई-झगड़ोंका; क्योंकि उनका उद्देश्य ही वही है।

गौ-सेवी-संस्था-संचालक भी गोशालाओंमें प्रायः दूध देनेवाली स्वस्थ गायोंको ही रखेंगे और उनको अधिक चारा देंगे; पर लूली-लँगड़ी, अपाहिज, अन्थी और दूध न देनेवाली गायोंको नहीं रखेंगे तथा किसीको रखेंगे भी तो उसको दूध देनेवाली गायोंको अपेक्षा बहुत कम चारा देंगे। परन्तु हमारी गोशालामें कितना गोपालन हो रहा है, इसकी असलियतकी तरफ खयाल न करके केवल लोगोंको दिखानेके लिये उसका झूठा प्रचार करेंगे। छापा, लेख, विज्ञापन, पुस्तिका आदि छपवाकर बाँटेंगे, जिससे पैसा तो अधिक-से-अधिक आये, पर खर्चा कम-से-कम हो।

धार्मिक संस्थाओंमें भी जो संचालक कहलाते हैं, वे प्रायः उन धार्मिक संस्थाओंके पैसोंसे अपने घरका काम चलायेंगे। अपनेको नफा किस प्रकार हो, हमारी दूकान किस तरह चले, पैसे कैसे मिलें—इस प्रकार अपने स्वार्थको लेकर केवल दिखावटीपनसे सारा काम करेंगे।

प्रायः साधन-भजन करनेवाले भी दूसरोंको आता देखकर