श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1052, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
१०५१
आसन लगाकर बैठ जायेंगे, भजन-ध्यान करने लग जायेंगे, माला घुमाने लग जायेंगे। परन्तु कोई देखनेवाला न हो तो बातचीतमें लग जायेंगे, ताश-चौपड़ खेलेंगे अथवा सो जायेंगे। ऐसा जो साधन-भजन होता है, वह केवल इसलिये कि दूसरे मुझे अच्छा मानें, भक्त मानें और मेरी प्रशंसा करें, मेरा आदर-सम्मान करें, मुझे पैसे मिलें, लोगोंमें मेरा नाम हो जाय, आदि। इस प्रकार यह साधन-भजन भगवान्का तो नाममात्रके लिये होता है, पर वास्तवमें साधन-भजन होता है अपने नामका, अपने शरीरका, पैसोंका। इस प्रकार आसुरी
प्रकृतिवालोंके विषयमें कहाँतक कहा जाय? 'अविधिपूर्वकम्'—वे आसुर मनुष्य शास्त्रविधिको तो मानते ही नहीं, सदा शास्त्रनिषिद्ध काम करते हैं। वे यज्ञ, दान आदि तो करेंगे, पर उनको विधिपूर्वक नहीं करेंगे। दान करेंगे तो सुपात्रको न देकर कुपात्रको देंगे। कुपात्रोंके साथ ही एकता रखेंगे। इस प्रकार उलटे-उलटे काम करेंगे। बुद्धि सर्वथा विपरीत होनेके कारण उनको उलटी बात भी सुलटी ही दीखती है—'सर्वार्थान् विपरीतांश्च' (गीता १८।३२)।
परिशिष्ट भाव—आसुर स्वभाववाले मनुष्य दूसरोंसे प्रतिस्पर्धा रखते हैं और इसलिये यज्ञ करते हैं कि दूसरोंकी अपेक्षा हमारेमें कोई कमी न रह जाय, कोई हमारेको यज्ञ करनेवालोंकी अपेक्षा नीचा न मान ले। वे केवल लोगोंमें अपनी प्रसिद्धि करनेके लिये यज्ञ करते हैं, फलपर विश्वास नहीं रखते। दूसरा व्यक्ति यज्ञ करता है तो वे ऐसा समझते हैं कि वह भी अपनी प्रसिद्धिके लिये ही यज्ञ करता है। ईश्वर और परलोकपर विश्वास न होनेके कारण उनकी दृष्टि विधिपर नहीं रहती। विधिका विचार वही करते हैं, जो ईश्वर और परलोकको मानते हैं कि अमुक कर्मका अमुक फल होगा। आसुर मनुष्योंकी सब चेष्टाएँ दिखावटी होती हैं। परन्तु उनके भीतरमें अभिमान होता है कि हम दूसरोंसे भी बढ़िया यज्ञ करेंगे। उनमें अपनी जानकारीका भी अभिमान होता है कि हम समझदार हैं, दूसरे सब मूर्ख हैं, समझते नहीं। वास्तवमें उनमें कोरी मूर्खता भरी होती है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥
अहङ्कारम् = (वे) अहंकार, बलम् = हठ, दर्पम् = घमण्ड, कामम् = कामना च = और क्रोधम् = क्रोधका
संश्रिताः = आश्रय लेनेवाले मनुष्य आत्म-परदेहेषु = अपने और दूसरोंके शरीरमें (रहनेवाले)
माम् = मुझ अन्तर्यामीके साथ प्रद्विषन्तः = द्वेष करते हैं (तथा) अभ्यसूयकाः = (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोषदृष्टि रखते हैं।
व्याख्या—'अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः'—वे आसुर मनुष्य जो कुछ काम करेंगे, उसको अहंकार, हठ, घमण्ड, काम और क्रोधसे ही करेंगे। जैसे भक्त भगवान्के आश्रित रहता है, ऐसे ही वे आसुर लोग अहंकार, हठ, काम आदिके आश्रित रहते हैं। उनके मनमें यह बात अच्छी तरहसे जँची हुई रहती है कि अहंकार, हठ, घमण्ड, काम और क्रोधके बिना काम नहीं चलेगा; संसारमें ऐसा होनेसे ही काम चलता है, नहीं तो मनुष्योंको दुःख ही पाना पड़ता है; जो इनका (अहंकार, हठ आदिका) आश्रय नहीं लेते, वे बुरी तरहसे कुचले जाते हैं; सीधे-सादे व्यक्तिको संसारमें कौन मानेगा? इसलिये
अहंकारादिके रहनेसे ही अपना मान होगा, सत्कार होगा और लोगोंमें नाम होगा, जिससे लोगोंपर हमारा दबाव, आधिपत्य रहेगा। 'मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः'—भगवान् कहते हैं कि मैं जो उनके शरीरमें और दूसरोंके शरीरमें रहता हूँ, उस मेरे साथ वे आसुर मनुष्य वैर रखते हैं। भगवान्के साथ वैर रखना क्या है?- श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे य उल्लङ्घ्य प्रवर्तते। आज्ञाभंगी मम द्वेषी नरके पतति ध्रुवम्॥ 'श्रुति और स्मृति-ये दोनों मेरी आज्ञाएँ हैं। इनका उल्लंघन करके जो मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है, वह मेरी