श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
आज्ञा-भंग करके मेरे साथ द्वेष रखनेवाला मनुष्य निश्चित ही नरकोंमें गिरता है।'
वे अपने अन्तःकरणमें विराजमान परमात्माके साथ भी विरोध करते हैं अर्थात् हृदयमें जो अच्छी स्फुरणाएँ होती हैं, सिद्धान्तकी अच्छी बातें आती हैं, उनकी वे उपेक्षा-तिरस्कार करते हैं, उनको मानते नहीं। वे दूसरे लोगोंकी अवज्ञा करते हैं, उनका तिरस्कार करते हैं, अपमान करते हैं, उनको दुःख देते हैं, उनसे अच्छी तरहसे द्वेष रखते हैं। यह सब उन प्राणियोंके रूपमें भगवान्के साथ द्वेष करना है।
‘अध्यमूयकाः’ —वे मेरे और दूसरोंके गुणोंमें दोष-दृष्टि रखते हैं। मेरे विषयमें वे कहते हैं कि भगवान् बड़े पक्षपाती हैं; वे भक्तोंकी तो रक्षा करते हैं और दूसरोंका विनाश करते हैं, यह बात बढ़िया नहीं है। आजतक जितने
परिशिष्ट भाव —आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य अपनी जिदपर पक्के रहते हैं और अपनी बातको ही सच्चा मानते हैं। यह सिद्धान्त है कि जो खुद दुःखी होता है, वही दूसरोंको दुःख देता है। आसुर मनुष्य खुद दुःखी रहते हैं, इसलिये वे दूसरोंको भी दुःख देते हैं। उनको कहीं भी गुण नहीं दीखता, प्रत्युत दोष-ही-दोष दीखते हैं। उनकी ऐसी मान्यता होती है कि सब अच्छाई हमारेमें ही है। उनको संसारमें कोई अच्छा आदमी दीखता ही नहीं।
तानहं द्विषतः कूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्वमशुभानासुरीब्धेव
योनिषु ॥ १९ ॥
| तान् | = उन | नराधमान् | = महान् नीच, | आसुरीषु | = आसुरी |
|---|---|---|---|---|---|
| द्विषतः | = द्वेष करनेवाले, | अशुभान् | = अपवित्र | योनिषु | = योनियोंमें |
| कूरान् | = क्रूर स्वभाववाले | मनुष्योंको | एव | = ही | |
| (और) | अहम् | = मैं | क्षिपामि | = गिराता | |
| संसारेषु | = संसारमें | अजस्वम् | = बार-बार | रहता हूँ। |
व्याख्या —‘तानहं द्विषतः कूरान्संसारेषु नराधमान्’—सातवें अध्यायके पंद्रहवें और नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें वर्णित आसुरी-सम्पदाका इस अध्यायके सातवेंसे अठारहवें श्लोकतक विस्तारसे वर्णन किया गया। अब आसुरी-सम्पदाके विषयका इन दो (उन्नीसवें-बीसवें) श्लोकोंमें उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं कि ऐसे आसुर मनुष्य बिना ही कारण सबसे वैर रखते हैं और सबका अनिष्ट करनेपर ही तुले रहते हैं। उनके कर्म बड़े क्रूर होते हैं, जिनके द्वारा दूसरोंकी हिंसा आदि हुआ करती है। ऐसे वे क्रूर, निर्दयी, हिंसक मनुष्य नराधम अर्थात् मनुष्योंमें महान् नीच हैं—‘नराधमान्’। उनको मनुष्योंमें नीच कहनेका मतलब यह है कि नरकोंमें रहनेवाले और
संत-महात्मा हुए हैं और अभी भी जो संत-महात्मा तथा अच्छी स्थितिवाले साधक हैं, उनके विषयमें वे आसुर लोग कहते हैं कि उनमें भी राग-द्वेष, काम-क्रोध, स्वार्थ, दिखावटीपन आदि दोष पाये जाते हैं; किसी भी संत महात्माका चरित्र ऐसा नहीं है, जिसमें ये दोष न आये हों; अतः यह सब पाखण्ड है; हमने भी इन सब बातोंको करके देखा है; हमने भी संयम किया है, भजन किया है, व्रत किये हैं, तीर्थ किये हैं, पर वास्तवमें इनमें कोई दम नहीं है; हमें तो कुछ नहीं मिला, मुफ्तमें ही दुःख पाया; उनके करनेमें वह समय हमारा व्यर्थमें ही बरबाद हुआ है; वे लोग भी किसीके बहकावेमें आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं; अभी ये ऐसे प्रवाहमें बहे हुए हैं और उल्टे रास्तेपर जा रहे हैं; अभी इनको होश नहीं है, पर जब कभी चेतेंगे, तब उनको भी पता लगेगा; आदि-आदि।
पशु-पक्षी आदि (चौरासी लाख योनियों) अपने पूर्वकर्मीका फल भोगकर शुद्ध हो रहे हैं और ये आसुर मनुष्य अन्याय-पाप करके पशु-पक्षी आदिसे भी नीचेकी ओर जा रहे हैं। इसलिये इन लोगोंका संग बहुत बुरा कहा गया है—
बक भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देई बिधाता ॥
(मानस ५। ४६। ४)
नरकोंका वास बहुत अच्छा है, पर विधाता (ब्रह्मा) हमें दुष्टका संग कभी न दे; क्योंकि नरकोंके वाससे तो पाप नष्ट होकर शुद्धि आती है, पर दुष्टोंके संगसे अशुद्धि आती है, पाप बनते हैं; पापके ऐसे बीज बोये जाते हैं, जो आगे नरक तथा चौरासी लाख योनियों भोगनेपर भी पूरे नष्ट नहीं होते।