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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1054

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५३

प्रकृतिके अंश शरीरमें राग अधिक होनेसे आसुरी-सम्पत्ति अधिक आती है; क्योंकि भगवान्ने कामना-(राग-) को सम्पूर्ण पापोंमें हेतु बताया है (तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)। उस कामनाके बढ़ जानेसे आसुरी-सम्पत्ति बढ़ती ही चली जाती है। जैसे धनकी अधिक कामना बढ़नेसे झूठ, कपट, छल आदि दोष विशेषतासे बढ़ जाते हैं और वृत्तियोंमें भी अधिक-से-अधिक धन कैसे मिले—ऐसा लोभ बढ़ जाता है। फिर मनुष्य अनुचित रीतिसे, छिपावसे, चोरीसे धन लेनेकी इच्छा करता है। इससे भी अधिक लोभ बढ़ जाता है, तो फिर मनुष्य डकैती करने लग जाता है और थोड़े धनके लिये मनुष्यकी हत्या कर देनेमें भी नहीं हिचकता। इस प्रकार उसमें क्रूरता बढ़ती रहती है और उसका स्वभाव राक्षसों-जैसा बन जाता है। स्वभाव बिगड़नेपर उसका पतन होता चला जाता है और अन्तमें उसे कीट-पतंग आदि आसुरी योनियों और घोर नरकोंकी महान् यातना भोगनी पड़ती है।

‘क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु’—जिनका नाम लेना, दर्शन करना, स्मरण करना आदि भी महान् अपवित्र करनेवाला है—‘अशुभान्’, ऐसे क्रूर, निर्दयी, सबके वैरी मनुष्योंके स्वभावके अनुसार ही भगवान् उनको आसुरी योनि देते हैं। भगवान् कहते हैं—‘आसुरीष्वेव योनिषु क्षिपामि’ अर्थात् मैं उनको उनके स्वभावके लायक ही कुत्ता, साँप, बिच्छू, बाघ, सिंह आदि आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वह भी एक-दो बार नहीं, प्रत्युत बार-बार

गिराता हूँ—‘अजस्त्रम्’, जिससे वे अपने कर्मोंका फल भोगकर शुद्ध, निर्मल होते रहें।

भगवान्का उनको आसुरी योनियोंमें गिरानेका तात्पर्य क्या है?

भगवान्का उन क्रूर, निर्दयी मनुष्योंपर भी अपनापन है। भगवान् उनको पराया नहीं समझते, अपना द्वेषी-वैरी नहीं समझते, प्रत्युत अपना ही समझते हैं। जैसे, जो भक्त जिस प्रकार भगवान्की शरण लेते हैं, भगवान् भी उनको उसी प्रकार आश्रय देते हैं (गीता—चौथे अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे ही जो भगवान्के साथ द्वेष करते हैं, उनके साथ भगवान् द्वेष नहीं करते, प्रत्युत उनको अपना ही समझते हैं। दूसरे साधारण मनुष्य जिस मनुष्यसे अपनापन करते हैं, उस मनुष्यको ज्यादा सुख-आराम देकर उसको लौकिक सुखमें फँसा देते हैं; परन्तु भगवान् जिनसे अपनापन करते हैं, उनको शुद्ध बनानेके लिये वे प्रतिकूल परिस्थिति भेजते हैं, जिससे वे सदाके लिये सुखी हो जायें—उनका उद्धार हो जाय।

जैसे, हिंतेषी अध्यापक विद्यार्थियोंपर शासन करके, उनकी ताड़ना करके पढ़ाते हैं, जिससे वे विद्वान् बन जायें, उन्नत बन जायें, सुन्दर बन जायें, ऐसे ही जो प्राणी परमात्माको जानते नहीं, मानते नहीं और उनका खण्डन करते हैं, उनको भी परम कृपालु भगवान् जानते हैं, अपना मानते हैं और उनको आसुरी योनियोंमें गिराते हैं, जिससे उनके किये हुए पाप दूर हो जायें और वे शुद्ध, निर्मल बनकर अपना कल्याण कर लें।

आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मां गतिम् ॥ २० ॥

कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | जन्मनि, जन्मनि | = जन्म-जन्मान्तरमें | अधिक | ---|---|---|---|---|--- मूढाः | = (वे) मूढ़ | आसुरीम् | = आसुरी | अधमाम् | = अधम | मनुष्य | योनिम् | = योनिको | गतिम् | = गतिमें अर्थात् माम् | = मुझे | आपन्नाः | = प्राप्त होते हैं, | | भयंकर अप्राप्य | = प्राप्त न करके | ततः | = (फिर) | | नरकोंमें एव | = ही | | उससे भी | यान्ति | = चले जाते हैं।

व्याख्या—‘आसुरी योनिमापन्ना’………‘मामप्राप्यैव कौन्तेय’—पीछेके श्लोकमें भगवान्ने आसुर मनुष्योंको बार-बार पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें गिरानेकी बात कही। अब उसी बातको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि

मनुष्य-जन्ममें मुझे प्राप्त करनेका दुर्लभ अवसर पाकर भी वे आसुर मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके पशु, पक्षी आदि आसुरी योनियोंमें चले जाते हैं और बार-बार उन आसुरी योनियोंमें ही जन्म लेते रहते हैं।