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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५३

प्रकृतिके अंश शरीरमें राग अधिक होनेसे आसुरी-सम्पत्ति अधिक आती है; क्योंकि भगवान्ने कामना-(राग-) को सम्पूर्ण पापोंमें हेतु बताया है (तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)। उस कामनाके बढ़ जानेसे आसुरी-सम्पत्ति बढ़ती ही चली जाती है। जैसे धनकी अधिक कामना बढ़नेसे झूठ, कपट, छल आदि दोष विशेषतासे बढ़ जाते हैं और वृत्तियोंमें भी अधिक-से-अधिक धन कैसे मिले—ऐसा लोभ बढ़ जाता है। फिर मनुष्य अनुचित रीतिसे, छिपावसे, चोरीसे धन लेनेकी इच्छा करता है। इससे भी अधिक लोभ बढ़ जाता है, तो फिर मनुष्य डकैती करने लग जाता है और थोड़े धनके लिये मनुष्यकी हत्या कर देनेमें भी नहीं हिचकता। इस प्रकार उसमें क्रूरता बढ़ती रहती है और उसका स्वभाव राक्षसों-जैसा बन जाता है। स्वभाव बिगड़नेपर उसका पतन होता चला जाता है और अन्तमें उसे कीट-पतंग आदि आसुरी योनियों और घोर नरकोंकी महान् यातना भोगनी पड़ती है।

‘क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु’—जिनका नाम लेना, दर्शन करना, स्मरण करना आदि भी महान् अपवित्र करनेवाला है—‘अशुभान्’, ऐसे क्रूर, निर्दयी, सबके वैरी मनुष्योंके स्वभावके अनुसार ही भगवान् उनको आसुरी योनि देते हैं। भगवान् कहते हैं—‘आसुरीष्वेव योनिषु क्षिपामि’ अर्थात् मैं उनको उनके स्वभावके लायक ही कुत्ता, साँप, बिच्छू, बाघ, सिंह आदि आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वह भी एक-दो बार नहीं, प्रत्युत बार-बार

गिराता हूँ—‘अजस्त्रम्’, जिससे वे अपने कर्मोंका फल भोगकर शुद्ध, निर्मल होते रहें।

भगवान्का उनको आसुरी योनियोंमें गिरानेका तात्पर्य क्या है?

भगवान्का उन क्रूर, निर्दयी मनुष्योंपर भी अपनापन है। भगवान् उनको पराया नहीं समझते, अपना द्वेषी-वैरी नहीं समझते, प्रत्युत अपना ही समझते हैं। जैसे, जो भक्त जिस प्रकार भगवान्की शरण लेते हैं, भगवान् भी उनको उसी प्रकार आश्रय देते हैं (गीता—चौथे अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे ही जो भगवान्के साथ द्वेष करते हैं, उनके साथ भगवान् द्वेष नहीं करते, प्रत्युत उनको अपना ही समझते हैं। दूसरे साधारण मनुष्य जिस मनुष्यसे अपनापन करते हैं, उस मनुष्यको ज्यादा सुख-आराम देकर उसको लौकिक सुखमें फँसा देते हैं; परन्तु भगवान् जिनसे अपनापन करते हैं, उनको शुद्ध बनानेके लिये वे प्रतिकूल परिस्थिति भेजते हैं, जिससे वे सदाके लिये सुखी हो जायें—उनका उद्धार हो जाय।

जैसे, हिंतेषी अध्यापक विद्यार्थियोंपर शासन करके, उनकी ताड़ना करके पढ़ाते हैं, जिससे वे विद्वान् बन जायें, उन्नत बन जायें, सुन्दर बन जायें, ऐसे ही जो प्राणी परमात्माको जानते नहीं, मानते नहीं और उनका खण्डन करते हैं, उनको भी परम कृपालु भगवान् जानते हैं, अपना मानते हैं और उनको आसुरी योनियोंमें गिराते हैं, जिससे उनके किये हुए पाप दूर हो जायें और वे शुद्ध, निर्मल बनकर अपना कल्याण कर लें।

आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मां गतिम् ॥ २० ॥

कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | जन्मनि, जन्मनि | = जन्म-जन्मान्तरमें | अधिक | ---|---|---|---|---|--- मूढाः | = (वे) मूढ़ | आसुरीम् | = आसुरी | अधमाम् | = अधम | मनुष्य | योनिम् | = योनिको | गतिम् | = गतिमें अर्थात् माम् | = मुझे | आपन्नाः | = प्राप्त होते हैं, | | भयंकर अप्राप्य | = प्राप्त न करके | ततः | = (फिर) | | नरकोंमें एव | = ही | | उससे भी | यान्ति | = चले जाते हैं।

व्याख्या—‘आसुरी योनिमापन्ना’………‘मामप्राप्यैव कौन्तेय’—पीछेके श्लोकमें भगवान्ने आसुर मनुष्योंको बार-बार पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें गिरानेकी बात कही। अब उसी बातको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि

मनुष्य-जन्ममें मुझे प्राप्त करनेका दुर्लभ अवसर पाकर भी वे आसुर मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके पशु, पक्षी आदि आसुरी योनियोंमें चले जाते हैं और बार-बार उन आसुरी योनियोंमें ही जन्म लेते रहते हैं।

१०५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

‘मामप्राप्यैव’ पदसे भगवान् पश्चात्तापके साथ कहते हैं कि अत्यन्त कृपा करके मैंने जीवोंको मनुष्यशरीर देकर इन्हें अपना उद्धार करनेका मौका दिया और यह विश्वास किया कि ये अपना उद्धार अवश्य कर लेंगे; परन्तु ये नराधम इतने मूढ़ और विश्वासघाती निकले कि जिस शरीरसे मेरी प्राप्ति करनी थी, उससे मेरी प्राप्ति न करके उलटे अधम गतिको चले गये!

मनुष्यशरीर प्राप्त हो जानेके बाद वह कैसा ही आचरणवाला क्यों न हो अर्थात् दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, वह भी यदि चाहे तो थोड़े-से-थोड़े समयमें (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक) और जीवनके अन्तकालमें (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी भगवान्को प्राप्त कर सकता है। कारण कि ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ (गीता ९।२९) कहकर भगवान्ने अपनी प्राप्ति सबके लिये अर्थात् प्राणिमात्रके लिये खुली रखी है। हाँ, यह बात हो सकती है कि पशु-पक्षी आदिमें उनको प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु भगवान्की तरफसे तो किसीके लिये भी मना नहीं है। ऐसा अवसर सर्वथा प्राप्त हो जानेपर भी ये आसुर मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके अधम गतिमें चले जाते हैं, तो इनकी इस दुर्गतिको देखकर परम दयालु प्रभु दुःखी होते हैं।

‘ततो यान्त्यधमां गतिम्’—आसुरी योनियोंमें जानेपर भी उनके सभी पाप पूरे नष्ट नहीं होते। अतः उन बचे हुए पापोंको भोगनेके लिये वे उन आसुरी योनियोंसे भी भयंकर अधम गतिको अर्थात् नरकोंको प्राप्त होते हैं। यहाँ शंका हो सकती है कि आसुरी योनियोंको प्राप्त हुए मनुष्योंको तो उन योनियोंमें भगवान्को प्राप्त करनेका अवसर ही नहीं है और उनमें वह योग्यता भी नहीं है, फिर भगवान्ने ऐसा क्यों कहा कि वे मेरेको प्राप्त न करके उससे भी अधम गतिमें चले जाते हैं? इसका समाधान यह है कि भगवान्का ऐसा कहना आसुरी योनियोंको प्राप्त होनेसे पूर्व मनुष्यशरीरको लेकर ही है। तात्पर्य है कि मनुष्यशरीरको पाकर, मेरी प्राप्तिका अधिकार पाकर भी वे मनुष्य मेरी प्राप्ति न करके जन्म-जन्मान्तरमें आसुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, वे उन आसुरी योनियोंसे भी नीचे कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें चले जाते हैं।

विशेष बात

भगवत्प्राप्तिके अथवा कल्याणके उद्देश्यसे दिये गये मनुष्यशरीरको पाकर भी मनुष्य कामना, स्वार्थ एवं अभिमानके वशीभूत होकर चोरी-डकैती, झूठ-कपट धोखा, विश्वासघात, हिंसा आदि जिन कर्मोंको करते हैं उनके दो परिणाम होते हैं—(१) बाहरी फल-अंश और (२) भीतरी संस्कार-अंश। दूसरोंको दुःख देनेपर उनका (जिनको दुःख दिया गया है) तो वही नुकसान होता है, जो प्रारब्धसे होनेवाला है; परन्तु जो दुःख देते हैं, वे नया पाप करते हैं, जिसका फल नरक उन्हें भोगना ही पड़ता है। इतना ही नहीं, दुराचारोंके द्वारा जो नये पाप होनेके बीज बोये जाते हैं अर्थात् उन दुराचारोंके द्वारा अहंतामें जो दुर्भाव बैठ जाते हैं, उनसे मनुष्यका बहुत भयंकर नुकसान होता है। जैसे, चोरीरूप कर्म करनेसे पहले मनुष्य स्वयं चोर बनता है; क्योंकि वह चोर बनकर ही चोरी करेगा और चोरी करनेसे अपनेमें (अहंतामें) चोरका भाव दृढ़ हो जायगा*। इस प्रकार चोरीके संस्कार उसकी अहंतामें बैठ जाते हैं। ये संस्कार मनुष्यका बड़ा भारी पतन करते हैं—उससे बार-बार चोरीरूप पाप करवाते हैं और फलस्वरूप नरकोंमें ले जाते हैं। अतः जबतक वह मनुष्य अपना कल्याण नहीं कर लेता अर्थात् जबतक वह अपनी अहंतामें बैठये हुए दुर्भावोंको नहीं मिटाता, तबतक वे दुर्भाव जन्म-जन्मान्तरतक दुराचारोंको बल देते रहेंगे, उकसाते रहेंगे और उनके कारण वे आसुरी योनियोंमें तथा उससे भी भयंकर नरक आदिमें दुःख, सन्ताप, आफत आदि पाते ही रहेंगे।

उन आसुरी योनियोंमें भी उनकी प्रकृति और प्रवृत्तिके अनुसार यह देखा जाता है कि कई पशु-पक्षी, भूत-पिशाच, कीट-पतंग आदि सौम्य-प्रकृति-प्रधान होते हैं और कई क्रूर-प्रकृति-प्रधान होते हैं। इस तरह उनकी प्रकृति-(स्वभाव-) में भेद उनकी अपनी बनायी हुई शुद्ध या अशुद्ध अहंताके कारण ही होते हैं। अतः उन योनियोंमें अपने-अपने कर्मोंका फलभोग होनेपर भी उनकी प्रकृतिके भेद वैसे ही बने रहते हैं। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण योनियोंको और नरकोंको भोगनेके बाद किसी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे उनको मनुष्यशरीर प्राप्त हो भी जाता है, तो भी उनकी अहंतामें बैठे हुए काम-क्रोधादि दुर्भाव पहले-जैसे ही रहते

  • दुर्भावोंसे दुराचार पैदा होते हैं और दुराचारोंसे दुर्भाव पुष्ट होते हैं।

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५५

है। इसी प्रकार जो स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे यहाँ शुभ कर्म करते हैं, और मरनेके बाद उन कर्मोंके अनुसार स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उनके कर्मोंका फलभाग तो हो जाता है, पर

उनके स्वभावका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् उनकी अहंतामें परिवर्तन नहीं होता। स्वभावको बदलनेका, शुद्ध बनानेका मौका तो मनुष्य-शरीरमें ही है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि ये जीव मनुष्य-शरीरमें मेरी प्राप्तिका अवसर पाकर भी मुझे प्राप्त नहीं करते, जिससे मुझे उनको अधम योनिमें भेजना पड़ता है। उनका अधम योनिमें और अधम गति-(नरक-) में जानेका मूल कारण क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥

कामः= काम,त्रिविधम्= तीन प्रकारकेतस्मात्= इसलिये
क्रोधः= क्रोधनरकस्य= नरककेएतत्= इन
तथा= औरद्वारम्= दरवाजेत्रयम्= तीनोंका
लोभः= लोभ—आत्मनः= जीवात्माकात्यजेत्= त्याग कर देना
इदम्= येनाशनम्= पतन करनेवाले हैं,चाहिये।

व्याख्या—‘कामः क्रोधस्तथा लोभस्त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्’—भगवान्ने पाँचवें श्लोकमें कहा था कि दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये है। तो वह आसुरी-सम्पत्ति आती कहाँसे है? जहाँ संसारकी कामना होती है। संसारके भोग-पदार्थोंका संग्रह, मान, बड़ाई, आराम आदि जो अच्छे दीखते हैं, उनमें जो महत्त्वबुद्धि या आकर्षण है, बस, वही मनुष्यको नरकोंकी तरफ ले जानेवाला है। इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—ये षड्रिपु माने गये हैं। इनमेंसे कहींपर तीनका, कहींपर दोका और कहींपर एकका कथन किया जाता है, पर वे सब मिले-जुले हैं, एक ही धातुके हैं। इन सबमें ‘काम’ ही मूल है; क्योंकि कामनाके कारण ही

आदमी बँधता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों करता है? उसके उत्तरमें भगवान्ने ‘काम’ और ‘क्रोध’—ये दो शत्रु बताये। परन्तु उन दोनोंमें भी ‘एष’ शब्द देकर कामनाको ही मुख्य बताया; क्योंकि कामनामें विघ्न पड़नेपर क्रोध आता है। यहाँ काम, क्रोध और लोभ—ये तीन शत्रु बताते हैं। तात्पर्य है कि भोगोंकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘काम’ है और संग्रहकी तरफ वृत्तियोंका होना ‘लोभ’ है। जहाँ ‘काम’ शब्द अकेला आता है, वहाँ उसके अन्तर्गत ही भोग और संग्रहकी इच्छा आती है। परन्तु जहाँ ‘काम’ और ‘लोभ’—दोनों स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ भोगकी

१-अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥ (चाणक्यनीति ७।१७)

‘नरकसे आये हुए लोगोंमें ये लक्षण रहा करते हैं—अत्यन्त क्रोध, कटु वचन बोलना, दरिद्रता, स्वजनोंसे वैर, नीचोंका संग और कुलहीन-(नीच-) की सेवा।’

(कार्पण्यवृत्तिः स्वजनेषु निन्दा कुचैलता नीचजनेषु भक्तिः। अतीव रोषः कटुका च वाणी नरस्य चिह्नं नरकागतस्य ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३२)

२-स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥ (चाणक्यनीति ७।१६)

‘स्वर्गसे लौटकर मनुष्यलोकमें आये हुए लोगोंकी देहमें चार लक्षण रहा करते हैं—दान करनेमें प्रवृत्ति, मधुर वाणी बोलना, देवताओंका पूजन और ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट रखना।’

(स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि तेषां हृदये वसन्ति। दानं प्रशस्तं मधुरा च वाणी देवार्वचनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥) (पद्मपुराण, सूक्ति० ५१।१३१)

१०५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

इच्छाको लेकर 'काम' और संग्रहकी इच्छाको लेकर 'लोभ' आता है और इन दोनोंमें बाधा पड़नेपर 'क्रोध' आता है। जब काम, क्रोध और लोभ—तीनों अधिक बढ़ जाते हैं, तब 'मोह' होता है।

कामसे क्रोध पैदा होता है और क्रोधसे सम्मोह हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। यदि कामनामें बाधा न पड़े, तो लोभ पैदा होता है और लोभसे सम्मोह हो जाता है। वास्तवमें यह 'काम' ही क्रोध और लोभका रूप धारण कर लेता है। सम्मोह हो जानेपर तमोगुण आ जाता है। फिर तो पूरी आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है।

'नाशनमात्मनः' —काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों मनुष्यका पतन करनेवाले हैं। जिनका उद्देश्य भोग भोगना और संग्रह करना होता है, वे लोग (अपनी समझसे)

अपनी उन्नति करनेके लिये इन तीनों दोषोंको हितकारी मान लेते हैं। उनका यही भाव रहता है कि हमलोग काम आदिसे सुख पायेंगे, आरामसे रहेंगे, खूब भोग भोगेंगे। यह भाव ही उनका पतन कर देता है।

'तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्' —ये काम, क्रोध आदि नरकोंके दरवाजे हैं। इसलिये मनुष्य इनका त्याग कर दे। इनका त्याग कैसे करे? तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग (काम) और द्वेष (क्रोध) स्थित रहते हैं। साधकको चाहिये कि वह इनके वशीभूत न हो। वशीभूत न होनेका अर्थ है कि काम, क्रोध, लोभको लेकर अर्थात् इनके आश्रित होकर कोई कार्य न करे; क्योंकि इनके वशीभूत होकर शास्त्र, धर्म और लोकमर्यादाके विरुद्ध कार्य करनेसे मनुष्यका पतन हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —भोग भोगना 'काम' है। संग्रह करना 'लोभ' है। भोग और संग्रहमें बाधा देनेवालेपर 'क्रोध' आता है। ये तीनों आसुरी-सम्पत्तिके मूल हैं। सब पाप इन तीनोंसे ही होते हैं।

व्यक्ति और पदार्थ तो यहीं छूट जाते हैं, पर भीतरका भाव आसुर मनुष्योंको नरकोंमें ले जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् काम, क्रोध और लोभसे रहित होनेका माहात्म्य बताते हैं—

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्भ्राऐस्त्रिभिर्नरः ।

आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !विमुक्तः= रहित हुआकरता है, (वह)
एतैः= इननरः= (जो) मनुष्यततः
त्रिभिः,आत्मनः= अपनेपराम्
तमोद्भ्राः= नरकके तीनोंश्रेयः= कल्याणकागतिम्
दरवाजोंसेआचरति= आचरणयाति= प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या —'एतैर्विमुक्तः कौन्तेय' ततो याति परां गतिम्'—पूर्वश्लोकमें जिनको नरकका दरवाजा बताया गया है, उन्हीं काम, क्रोध और लोभको यहाँ 'तमोद्भ्रा' कहा गया है। 'तम' नाम अन्धकारका है, जो अज्ञानसे उत्पन्न होता है—'तमस्त्वज्ञानजं विद्धि' (गीता १४।८)। तात्पर्य है कि इन काम आदिके कारण 'मेरे साथ ये धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुरुष, घर-परिवार आदि पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे और अब भी इनसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है; अतः इनमें ममता करनेसे आगे मेरी क्या दशा होगी' आदि बातोंकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं अर्थात् बुद्धिमें अन्धकार छाया रहता है। अतः इन

काम आदिसे मुक्त होकर जो अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। इसलिये साधकको इस बातकी विशेष सावधानी रखनी चाहिये कि वह काम, क्रोध और लोभ—तीनोंसे सावधान रहे। कारण कि इन तीनोंको साथमें रखते हुए जो साधन करता है, वह वास्तवमें असली साधक नहीं है। असली साधक वह होता है, जो इन दोषोंको अपने साथ रहने ही नहीं देता। ये दोष उसको हर समय खटकते रहते हैं; क्योंकि इनको साथमें रहनेका अवसर देना ही बड़ी भारी गलती है।

मनुष्य साधनकी तरफ तो ध्यान देते हैं, पर साथमें जो काम-क्रोधादि दोष रहते हैं, उनसे हमारा कितना अहित

श्लोक २३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५७

होता है—इस तरफ वे ध्यान कम देते हैं। इस कमीके कारण ही साधन करते हुए सदाचार भी होते रहते हैं और दुराचार भी होते रहते हैं; सदगुण भी आते हैं और दुर्गुण भी साथ रहते हैं। जप, ध्यान, कीर्तन, सत्संग, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत आदि करके हम अपनेको शुद्ध बना लेंगे—ऐसा भाव साधकमें विशेष रहता है; परन्तु जो हमें अशुद्ध कर रहे हैं, उन दुर्गुण-दुराचारोंको हटानेका खयाल साधकमें कम रहता है, इसलिये—

आसुप्तेरामुते कालं नयेद् वेदान्तचित्तया। न वा दद्यादवसरं कामादीनां मनागपि॥

नींद खुलनेसे लेकर नींद आनेतक और जिस दिन पता लगे, उस दिनेसे लेकर मौत आनेतक—सब-का-सब समय परमात्मतत्त्वके (सगुण-निर्गुणके) चिन्तनमें ही लगाये। चिन्तनके सिवाय काम आदिको किंचिन्मात्र भी अवसर न दे।

‘ऐतैर्विमुक्तः’ का यह मतलब नहीं है कि जब हम दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वथा छूट जायेंगे, तब साधन करेंगे; किंतु साधकको भगवत्प्राप्तिका मुख्य उद्देश्य रखकर इनसे छूटनेका भी लक्ष्य रखना है। कारण कि झूठ, कपट, बेईमानी, काम, क्रोध आदि हमारे साथमें रहेंगे, तो नयी-नयी अशुद्धि—नये-नये पाप होते रहेंगे, जिससे साधनका

साक्षात् लाभ नहीं होगा। यही कारण है कि वर्षांतक साधनमें लगे रहनेपर भी साधक अपनी वास्तविक उन्नति नहीं देखते, उनको अपनेमें विशेष परिवर्तनका अनुभव नहीं होता। इन दोषोंसे रहित होनेपर शुद्ध स्वतःस्वाभाविक आती है। जीवमें अशुद्धि तो संसारकी तरफ लगनेसे ही आयी है, अन्यथा परमात्माका अंश होनेसे वह तो स्वतः ही शुद्ध है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥

(मानस ७। ११७। १)

‘श्रेयः आचरति’ का तात्पर्य यह है कि काम, क्रोध और लोभ—इनमेंसे किसीको भी लेकर आचरण नहीं होना चाहिये अर्थात् असाधन-(निषिद्ध आचरण-) से रहित शुद्ध साधन होना चाहिये। भीतरमें कभी कोई वृत्ति आ भी जाय, तो उसको आचरणमें न आने दे। अपनी तरफसे तो (काम, क्रोधादिकी) वृत्तियोंको दूर करनेका ही उद्योग करे। अगर अपने उद्योगसे न दूर हों तो ‘हे नाथ! हे नाथ!! हे नाथ!!!’ ऐसे भगवान्को पुकारे। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—

मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहं बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥

(विनय-पत्रिका १२५। २-३)

परिशिष्ट भाव—‘ऐतैर्विमुक्तः’—काम-क्रोध-लोभसे रहित होनेका तात्पर्य है—इनके त्यागका उद्देश्य रखना, इनके वशमें न होना। कामसे, क्रोधसे अथवा लोभसे किया गया शुभकर्म भी कल्याणकारक नहीं होता। इसलिये इनके त्यागकी तरफ विशेष ध्यान देना चाहिये। काम-क्रोध-लोभको पकड़े रहनेसे कल्याणका आचरण (जप, ध्यान आदि) करनेपर भी कल्याण नहीं होता; क्योंकि ये सम्पूर्ण पापोंके कारण हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक)।

काम-क्रोध-लोभके कारण धर्म और समाजकी मर्यादा नष्ट हो जाती है, जिससे दुनियाका बड़ा अहित होता है। आसुरी स्वभाववाले मनुष्य काम-क्रोध-लोभके परायण होते हैं। वे यज्ञ, दान आदि सब शुभकर्म नाममात्रके लिये करते हैं, अपने कल्याणके लिये कुछ नहीं करते। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाले साधक काम-क्रोध-लोभके वशमें न होकर अपने कल्याणका आचरण करते हैं, जिससे दुनियाका स्वतः हित होता है। आसुरी मनुष्य ऐसे साधकोंको बेसमझ समझते हैं और इनसे द्वेष रखते हैं, पर इन साधकोंको उन आसुरी मनुष्योंपर दया आती है और वे उनको सदुद्दिष्ट देनेके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।

सम्बन्ध—जो अपने कल्याणके लिये शास्त्रविधिके अनुसार चलते हैं, उनको तो परमगतिकी प्राप्ति होती है, पर जो ऐसा न करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं, उनकी क्या गति होती है—यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ २३॥

१०५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

यः= जो मनुष्यसः= वह
शास्त्रविधिम्= शास्त्रविधिको= न
उत्सृज्य= छोड़करसिद्धिम्= सिद्धि ( अन्तः-करणकी शुद्धि)-को,
कामकारतः= अपनी इच्छासे मनमाना= न
वर्तते= आचरण करता है,सुखम्= सुख (शान्ति)-को

व्याख्या—[सत्रहवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक भी इससे मिलता-जुलता है।]

'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते'—जो लोग शास्त्रविधिकी अवहेलना करके शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं, दान करते हैं, परोपकार करते हैं, दुनियाके लाभके लिये तरह-तरहके कई अच्छे-अच्छे काम करते हैं; परन्तु वह सब करते हैं—'कामकारतः' * अर्थात् शास्त्रविधिकी तरफ ध्यान न देकर अपने मनमाने ढंगसे करते हैं। मनमाने ढंगसे करनेमें कारण यह है कि उनके भीतर जो काम, क्रोध आदि पड़े रहते हैं, उनकी परवाह न करके वे बाहरी आचरणोंसे ही अपनेको बड़ा मानते हैं। तात्पर्य है कि वे बाहरके आचरणोंको ही श्रेष्ठ समझते हैं। दूसरे लोग भी बाहरके आचरणोंको ही विशेषतासे देखते हैं। भीतरके भावोंको, सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग बहुत कम होते हैं। परन्तु वास्तवमें भीतरके भावोंका ही विशेष महत्त्व है।

अगर भीतरमें दुर्गुण-दुर्भाव रहते हैं और बाहरसे बढ़े भारी त्यागी-तपस्वी बन जाते हैं, तो अभिमानमें आकर दूसरोंकी ताड़ना कर देते हैं। इस प्रकार भीतरमें बढ़े हुए देहाभिमानके कारण उनके गुण भी दोषमें परिणत हो जाते हैं, उनकी महिमा निन्दामें परिणत हो जाती है, उनका त्याग रागमें, आसक्तिमें, भोगोंमें परिणत हो जाता है और आगे चलकर वे पतनमें चले जाते हैं। इसलिये भीतरमें दोषोंके रहनेसे ही वे शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करते हैं।

  • (अ) यहाँ आये, 'कामकारतः वर्तते' (शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है) और पाँचवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये 'कामकारेण फले सक्तः' (भोगोंकी, पदार्थकी इच्छासे फलमें आसक्त हुआ)—दोनोंमें थोड़ा अन्तर है। 'कामकारतः' में क्रिया करनेमें उच्छृङ्खल वृत्ति है और 'कामकारेण' में भोगोंकी इच्छा है। तात्पर्य है कि 'कामकारतः' की दृष्टि क्रियाकी तरफ है और 'कामकारेण' की दृष्टि क्रियाके परिणाम-(फल- ) की तरफ है कि परिणाममें मुझे अमुकामुक लाभ होगा। पर दोनोंमें मूल कारण तो 'काम' ही है।

(ब) एक बात ध्यान देनेकी है कि सातवें श्लोकसे लेकर इस तेईसवें श्लोकतक जो आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ है, उसमें कुल नौ बार 'काम' शब्द आया है; जैसे—१—'कामहेतुकम्' (१६।८), २—'काममाश्रित्य' (१६।१०), ३—'कामोपभोगपरमाः' (१६।११), ४—'कामक्रोधपरायणाः' (१६।१२), ५—'कामभोगार्थम्' (१६।१२), ६—'कामभोगेषु' (१६।१६), ७—'कामम्' (१६।१८), ८—'कामः' (१६।२१) और ९—'कामकारतः' (१६।२३)। इससे यह बात सिद्ध होती है कि आसुरी-सम्पत्तिका मूल कारण 'काम' अर्थात् कामना ही है।

| | | (और) ---|---|---|--- न | = न | न | = न पराम् | = परम | पराम् | = परम गतिम् | = गतिको (ही) | गतिम् | = गतिको (ही) अवाप्नोति | = प्राप्त होता है। | अवाप्नोति | = प्राप्त होता है।

जैसे रोगी अपनी दृष्टिसे तो कुपथ्यका त्याग और पथ्यका सेवन करता है, पर वह आसक्तिवश कुपथ्य ले लेता है, जिससे उसका स्वास्थ्य और अधिक खराब हो जाता है। ऐसे ही वे लोग अपनी दृष्टिसे अच्छे-अच्छे काम करते हैं, पर भीतरमें काम, क्रोध और लोभका आवेश रहनेसे वे शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढंगसे काम करने लग जाते हैं, जिससे वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

'न स सिद्धिम्वाप्नोति'—आसुरी-सम्पदावाले जो लोग शास्त्र-विधिका त्याग करके यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, उनको धन, मान, आदर आदिके रूपमें कुछ प्रसिद्धिरूप सिद्धि मिल सकती है, पर वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप जो सिद्धि है, वह उनको नहीं मिलती।

'न सुखम्'—उनको सुख भी नहीं मिलता; क्योंकि उनके भीतरमें काम-क्रोधादिकी जलन बनी रहती है। पदार्थिके संयोगसे होनेवाला सुख उन्हें मिल सकता है, पर वह सुख दुःखोंका कारण ही है अर्थात् उससे दुःख-ही-दुःख पैदा होते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक मार्गमें मिलनेवाला सात्विक सुख उनको नहीं मिलता।

'न परां गतिम्'—उनको परमगति भी नहीं मिलती। परमगति मिले ही कैसे? पहले तो वे परमगतिको मानते ही नहीं और यदि मानते भी हैं, तो भी वह उनको मिल नहीं सकती; क्योंकि काम, क्रोध और लोभके कारण उनके कर्म ही ऐसे होते हैं।

श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५९

सिद्धि, सुख और परमगतिके न मिलनेका तात्पर्य यह है कि वे आचरण तो श्रेष्ठ करते हैं, जिससे उन्हें सिद्धि, सुख और परमगतिकी प्राप्ति हो सके; परन्तु भीतरमें काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि रहनेसे उनके अच्छे आचरण भी बुराईमें ही चले जाते हैं। इससे उनको उपर्युक्त चीजें

नहीं मिलतीं। यदि ऐसा मान लिया जाय कि उनके आचरण ही बुरे होते हैं, तो भगवान्का 'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्'—ऐसा कहना बनेगा ही नहीं; क्योंकि प्राप्ति होनेपर ही निषेध होता है—'प्राप्नोत्सत्यां निषेधः'।

परिशिष्ट भाव —आसुर मनुष्य अभिमानके कारण अपनेको सिद्ध और सुखी मानते हैं—'सिद्धोऽहं बलवान्मुखी' (गीता १६।१४), पर वास्तवमें वे सिद्ध और सुखी होते नहीं—'न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखम्'। उनके हृदयमें अभिमान और द्वेषकी अग्नि जलती रहती है!

सम्बन्ध—शास्त्रविधिका त्याग करनेसे मनुष्यको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती, इसलिये मनुष्यको क्या करना चाहिये—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥

तस्मात्= अतःप्रमाणम्= प्रमाण हैकर्म= कर्तव्य-कर्म
ते= तेरे लियेज्ञात्वा= (—ऐसा) जानकर
(तू)कर्तुम्= करने
कार्याकार्य-इह= इस लोकमेंअर्हसि= योग्य है
व्यवस्थितौ= कर्तव्य-शास्त्र-अर्थात् तुझे
अकर्तव्यकीविधानोक्तम्= शास्त्रविधिसेशास्त्रविधिके
व्यवस्थामेंनियतअनुसार कर्तव्य-कर्म
शास्त्रम्= शास्त्र (ही)करने चाहिये।

व्याख्या —'तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य-व्यवस्थितौ'—जिन मनुष्योंको अपने प्राणोंसे मोह होता है, वे प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यको न जाननेसे विशेषरूपसे आसुरी-सम्पत्तिमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये तू कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय करनेके लिये शास्त्रको सामने रख।

जिनकी महिमा शास्त्रोंने गायी है और जिनका बर्ताव शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार होता है, ऐसे संत-महापुरुषोंके आचरणों और वचनोंके अनुसार चलना भी शास्त्रोंके अनुसार ही चलना है। कारण कि उन महापुरुषोंने शास्त्रोंको आदर दिया है और शास्त्रोंके अनुसार चलनेसे ही वे श्रेष्ठ पुरुष बने हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुए हैं, उनके आचरणों, आदर्शों, भावों आदिसे ही शास्त्र बनते हैं।

'शास्त्रं प्रमाणम्' का तात्पर्य यह है कि लोक-

परलोकका आश्रय लेकर चलनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है।

'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि'— प्राणपोषण-परायण मनुष्य शास्त्रविधिको (कि किसमें प्रवृत्त होना है और किससे निवृत्त होना है) नहीं जानते (गीता—सोलहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); इसलिये उनको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू तो दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है; अतः तू शास्त्रविधिको जानकर कर्तव्यका पालन करनेयोग्य है।

अर्जुन पहले अपनी धारणासे कहते थे कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा, जबकि भाग्यशाली श्रेष्ठ क्षत्रियोंके लिये अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गको देनेवाला है (गीता—दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् कहते हैं कि भैया! तू पाप-पुण्यका निर्णय अपने मनमाने ढंगसे कर रहा है; तुझे तो इस विषयमें शास्त्रको प्रमाण

  • यहाँ 'इह' पद देनेका तात्पर्य है कि इस संसारमें मनुष्य-शरीर केवल श्रेष्ठ कर्म करके परमात्माको प्राप्त करनेके लिये ही मिला है। अतः यह अवसर कभी वृथा न जाने दे।

१०६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

रचना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा समझकर ही तुझे कर्तव्य-कर्म करना चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि युद्धरूप क्रिया बाँधनेवाली नहीं है, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान रखकर की हुई शास्त्रीय क्रिया (यज्ञ, दान आदि) ही बाँधनेवाली होती है; और मनमाने ढंगसे (शास्त्र-विपरीत)-की हुई क्रिया तो पतन करनेवाली होती है।

स्वतः प्राप्त युद्धरूप क्रिया क्रूर और हिंसारूप दीखती हुई भी पापजनक नहीं होती (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवें श्लोक)। तात्पर्य है कि

परिशिष्ट भाव —सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।

यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

दैवासुरसम्पद्भिभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषद्सु श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'दैवासुरसम्पद्भिभागयोग' नामक सोलहवें अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

इस (सोलहवें) अध्यायका नाम 'दैवासुरसम्पद्-भिभागयोग' है; क्योंकि इस अध्यायमें जो दोनों सम्पत्तियोंका वर्णन हुआ है, वह परस्पर एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध है अर्थात् दैवी-सम्पत्ति कल्याण करनेवाली है और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली तथा नीच योनियों और नरकोंमें ले जानेवाली है। जो साधक इन दोनों विभागोंको ठीक रीतिसे जान लेगा, वह आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा त्याग होते ही दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जायगी। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मासे सम्बन्ध रह जायगा।

सोलहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके दो सौ सत्तासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदीका योग

स्वभावनियत कर्म करता हुआ सर्वथा स्वार्थरहित मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इनके स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो आज्ञा दी है, उसके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। पाप लगता है—स्वार्थसे, अभिमानसे और दूसरोंका अनिष्ट सोचनेसे।

मनुष्य-जन्मकी सार्थकता यही है कि वह शरीर-प्राणोंके मोहमें न फँसकर केवल परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे शास्त्रविहित कर्मोंको करे।

कि आसुर स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं

जानते। यहाँ भगवान् बताते हैं कि वह आसुर स्वभाव शास्त्रके अनुसार आचरण करनेसे ही मिटेगा।

यहाँ शंका हो सकती है कि जो शास्त्र पढ़े हुए नहीं हैं, उनको कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? इसका समाधान है कि अगर उनका अपने कल्याणका उद्देश्य होगा तो अपने कर्तव्यका ज्ञान स्वतः होगा; क्योंकि आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य नहीं होगा तो शास्त्र पढ़नेपर भी कर्तव्यका ज्ञान नहीं होगा, उल्टे अज्ञान बढ़ेगा कि हम अधिक जानते हैं!

तीन सौ पाँच है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ षोडशोऽध्यायः' के सात, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके सात सौ अड़सठ और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग आठ सौ चौतीस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—'श्रीभगवानुवाच'।

सोलहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके चौबीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके प्रथम चरणमें, दसवें श्लोकके तृतीय चरणमें और बाईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; तथा ग्यारहवें, तेरहवें और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष अठारह श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अवतरणिका—

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेवाले पुरुषोंको सिद्धि, सुख और परमगति न मिलनेकी बात कही। यह सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि शास्त्रविधिको ठीक-ठीक जाननेवाले लोग तो बहुत कम हैं। अधिक संख्यामें ऐसे ही लोग हैं, जो शास्त्रविधिको तो जानते नहीं, पर अपनी कुल-परम्परा, वर्ण, आश्रम, संस्कार आदिके अनुसार देवता आदिका श्रद्धापूर्वक यजन (पूजन) करते हैं। शास्त्रविधिका त्याग होनेसे ऐसे पुरुषोंकी नीची (आसुरी) स्थिति होनी चाहिये और श्रद्धा होनेसे ऊँची (दैवी) स्थिति होनी चाहिये। इसलिये वास्तवमें उनकी क्या स्थिति है—यह जाननेके लिये अर्जुन पहले श्लोकमें प्रश्न करते हैं१।

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥

अर्जुन बोले—

कृष्ण= हे कृष्ण !यजन्ते= (देवता आदिका)का= कौन-सी है ?
ये= जो मनुष्यपूजन करते हैं,सत्त्वम्= सात्त्विकी है
शास्त्रविधिम्= शास्त्रविधिकातेषाम्= उनकीआहो= अथवा
उत्सृज्य= त्याग करकेनिष्ठा= निष्ठारजः, तमः= राजसी-
श्रद्धया, अन्विताः= श्रद्धापूर्वकतु= फिरतामसी

व्याख्या—[ यह सत्रहवाँ अध्याय सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकपर चला है। उसीको लेकर अर्जुन वहाँ आये 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (जो शास्त्रविधिका त्याग करके) की जगह यहाँ 'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' ही कहकर 'कामकारतः' (मनमाने ढंगसे) की जगह 'श्रद्धयान्विताः' (श्रद्धासे) कहते हैं; 'वर्तते' (बर्ताव करता है) की जगह 'यजन्ते' (यजन करता है) कहते हैं; और 'न स सिद्धिंमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्' (वह सिद्धि, सुख और परमगतिको प्राप्त नहीं होता) की जगह 'तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः' (उनकी निष्ठा कौन-सी है? सात्त्विकी—दैवी-सम्पत्तिवाली अथवा राजसी-

तामसी—आसुरी-सम्पत्तिवाली?) कहकर भगवान्से प्रश्न करते हैं। ]

'ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य' सत्त्वमाहो रजस्तमः'—

श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये है। उन दोनोंके सामने कलियुगकी जनता थी; क्योंकि द्वारपयुग समाप्त हो रहा था। आगे आनेवाले कलियुगी जीवोंकी तरफ दृष्टि रहनेसे अर्जुन पूछते हैं कि महाराज! जिन मनुष्योंका भाव बड़ा अच्छा है, श्रद्धा-भक्ति भी है, पर शास्त्रविधिको जानते नहीं। यदि वे जान जायँ, तो पालन करने लग जायँ, पर उनको पता नहीं। अतः उनकी क्या स्थिति होती है?

१-इस (सत्रहवें) अध्यायको नवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोक (यत्करोषि यदृशनासि.....तत्कुरुष्व मदर्पणम्) की व्याख्या मानना विचारसे युक्तिसंगत नहीं बैठता। कारण कि नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक 'भगवदर्पण-विषयक' प्रकरणमें आया है, जो छब्बीसवें श्लोकसे आरम्भ हुआ है और अठ्ठाईसवें श्लोकमें (भगवदर्पणका फल बतलाकर) समाप्त हुआ है। परन्तु यहाँ मनुष्योंकी श्रद्धाको पहचाननेका प्रसंग है; क्योंकि इस (सत्रहवें) अध्यायके आरम्भमें अर्जुनका प्रश्न मनुष्योंकी निष्ठा, श्रद्धाको लेकर ही है। अतः भगवान् उसका उत्तर भी श्रद्धाको लेकर ही देते हैं।

२-शास्त्रविधिका त्याग तीन कारणोंसे होता है—(१) अज्ञतासे, (२) उपेक्षासे और (३) विरोधसे।

१०६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

आगे आनेवाली जनतामें शास्त्रका ज्ञान बहुत कम रहेगा। उन्हें अच्छा सत्संग मिलना भी कठिन होगा; क्योंकि अच्छे सन्त-महात्मा पहले युगोंमें भी कम हुए हैं, फिर कलियुगमें तो और भी कम होंगे। कम होनेपर भी यदि भीतर चाहना हो तो उन्हें सत्संग मिल सकता है। परन्तु मुश्किल यह है कि कलियुगमें दम्भ, पाखण्ड ज्वादा होनेसे कई दम्भी और पाखण्डी पुरुष सन्त बन जाते हैं। अतः सच्चे सन्त पहचानमें आने मुश्किल हैं। इस प्रकार पहले तो सन्त-महात्मा मिलने कठिन हैं और मिल भी जायें तो उनमेंसे कौन-से संत कैसे हैं—इस बातकी पहचान प्रायः नहीं होती और पहचान हुए बिना उनका संग करके विशेष लाभ ले लें—ऐसी बात भी नहीं है। अतः जो शास्त्र-विधिको भी नहीं जानते और असली सन्तोंका संग भी नहीं मिलता, परन्तु जो कुछ यजन-पूजन करते हैं, श्रद्धासे करते हैं—ऐसे मनुष्योंकी निष्ठा कौन-सी होती है? सात्त्विकी अथवा राजसी-तामसी?

‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ ‘पदोंमें सत्त्वगुणको दैवी-सम्पत्तिमें और रजोगुण तथा तमोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें ले लिया गया है। रजोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें लेनेका कारण यह है कि रजोगुण-तमोगुणके बहुत निकट हैं। गीतामें कई जगह ऐसी बात आयी है; जैसे—दूसरे अध्यायके बासठवें-तिरसठवें श्लोकोंमें काम अर्थात् रजोगुणसे क्रोध और क्रोधसे मोहरूप तमोगुणका उत्पन्न होना बताया गया है। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें हिंसात्मक और शोकान्वितको रजोगुणी कर्ताका लक्षण बताया गया है और अठारहवें अध्यायके ही पचीसवें श्लोकमें ‘हिंसा’ को तामस कर्मका लक्षण और पैंतीसवें श्लोकमें ‘शोक’ को तामस धृतिका लक्षण बताया गया है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणके बहुत-से लक्षण आपसमें मिलते हैं।

सात्त्विक भाव, आचरण और विचार दैवी-सम्पत्तिके होते हैं और राजसी-तामसी भाव, आचरण और विचार

आसुरी-सम्पत्तिके होते हैं। सम्पत्तिके अनुसार ही निष्ठा होती है अर्थात् मनुष्यके जैसे भाव, आचरण और विचार होते हैं, उन्हींके अनुसार उसकी स्थिति (निष्ठा) होती है। स्थितिके अनुसार ही आगे गति होती है। आप कहते हैं कि शास्त्र-विधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेपर सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलती, तो जब उनकी निष्ठाका ही पता नहीं, फिर उनकी गतिका क्या पता लगे? इसलिये आप उनकी निष्ठा बताइये, जिससे पता लग जाय कि वे सात्त्विकी गतिमें जानेवाले हैं या राजसी-तामसी गतिमें।

‘कृष्ण’ का अर्थ है—खींचनेवाला। यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधनका तात्पर्य यह मालूम देता है कि आप ऐसे मनुष्योंको अन्तिम समयमें किस ओर खींचेंगे? उनको किस गतिकी तरफ ले जायेंगे? छठे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भी अर्जुनने गति-विषयक प्रश्नमें ‘कृष्ण’ सम्बोधन दिया है—‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’। यहाँ भी अर्जुनका निष्ठा पूछनेका तात्पर्य गतिमें ही है।

मनुष्यको भगवान् खींचते हैं या वह कर्मोंके अनुसार स्वयं खींचा जाता है? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है, पर कर्मफलके विधायक होनेसे भगवान्का खींचना सम्पूर्ण फलोंमें होता है। तामसी कर्मोंका फल नरक होगा, तो भगवान् नरकोंकी तरफ खींचेंगे। वास्तवमें नरकोंके द्वारा पापोंका नाश करके प्रकाशन्तरसे भगवान् अपनी तरफ ही खींचते हैं। उनका किसीसे भी वैर या द्वेष नहीं है। तभी तो आसुरी योनियोंमें जानेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि वे मेरेको प्राप्त न होकर अधोगतिमें चले गये (सोलहवें अध्यायका बीसवों श्लोक)। कारण कि उनका अधोगतिमें जाना भगवान्को सुहाता नहीं है। इसलिये सात्त्विक मनुष्य हो, राजस मनुष्य हो या तामस मनुष्य हो, भगवान् सबको अपनी तरफ ही खींचते हैं। इसी भावसे यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन आया है।

सम्बन्ध—शास्त्रविधिको न जाननेपर भी मनुष्यमात्रमें किसी-न-किसी प्रकारकी स्वभावजा श्रद्धा तो रहती ही है। उस श्रद्धाके भेद आगेके श्लोकमें बताते हैं।

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

१-तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—तीनों गुणोंमें परस्पर दसगुना अन्तर है। जैसे एकका दसगुना दस; और दसका दसगुना सौ है, उसी तरह तमोगुण (१) से दसगुना श्रेष्ठ रजोगुण (१०) है और रजोगुणसे दसगुना श्रेष्ठ सत्त्वगुण (१००) है। तात्पर्य है कि तमोगुण और रजोगुण पास-पासमें हैं, जबकि सत्त्वगुण दोनोंसे बहुत दूर है।

२-क्रोधका कारण रजोगुण है और कार्य तमोगुण है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६३

श्रीभगवान् बोले—

देहिनाम्= मनुष्योंकी= तथाएव= ही
सा= वहराजसी= राजसीभवति= होती है,
स्वभावजा= स्वभावसे= औरताम्= उसको
उत्पन्न हुईतामसी= तामसी(तुम
श्रद्धा= श्रद्धाइति= —ऐसेमुझसे)
सात्त्विकी= सात्त्विकीत्रिविधा= तीन तरहकीशृणु= सुनो।

व्याख्या —[अर्जुनने निष्ठाको जाननेके लिये प्रश्न किया था, पर भगवान् उसका उत्तर श्रद्धाको लेकर देते हैं; क्योंकि श्रद्धाके अनुसार ही निष्ठा होती है।]

‘त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा’—श्रद्धा तीन तरहकी होती है। वह श्रद्धा कौन-सी है? संगजा है, शास्त्रजा है या स्वभावजा है? तो कहते हैं कि वह स्वभावजा है—‘सा स्वभावजा’ अर्थात् स्वभावसे पैदा हुई स्वतःसिद्ध श्रद्धा है। वह न तो संगसे पैदा हुई है और न शास्त्रोंसे पैदा हुई है। वे स्वाभाविक इस प्रवाहमें बह रहे हैं और देवता आदिका पूजन करते जा रहे हैं।

‘सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु’—वह स्वभावजा श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उन तीनोंको अलग-अलग सुनो।

पीछेके श्लोकमें ‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ पदोंमें ‘आहो’ अव्यय देनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनकी दृष्टिमें ‘सत्त्वम्’ से दैवी-सम्पत्ति और ‘रजस्तमः’ से आसुरी-सम्पत्ति—ये

दो ही विभाग हैं और भगवान् भी बन्धनकी दृष्टिसे राजसी-तामसी दोनोंको आसुरी-सम्पत्ति ही मानते हैं—‘निबन्धायामसुरीमता’ (१६।५)। परंतु बन्धनकी दृष्टिसे राजसी और तामसी एक होते हुए भी दोनोंके बन्धनमें भेद है। राजस मनुष्य सकामभावसे शास्त्रविहित कर्म भी करते हैं; अतः वे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाकर और वहाँके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोकमें लौट आते हैं—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता ९।२१)। परन्तु तामस मनुष्य शास्त्रविहित कर्म नहीं करते; अतः वे कामना और मूढ़ताके कारण अधम गतिमें जाते हैं—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)। इस प्रकार राजस और तामस—दोनों ही मनुष्योंका बन्धन बना रहता है। दोनोंके बन्धनमें भेदकी दृष्टिसे ही भगवान् आसुरी-सम्पदावालोंकी श्रद्धाके राजसी और तामसी—दो भेद करते हैं और सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—तीनों श्रद्धाओंको अलग-अलग सुननेके लिये कहते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित स्वभावजा श्रद्धाके तीन भेद क्यों होते हैं—इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्धः स एव सः ॥ ३ ॥

भारत= हे भारत!भवति= होती है।यच्छृद्धः= जैसी श्रद्धावाला है,
सर्वस्य= सभी मनुष्योंकीअयम्= यहसः, एव= वही
श्रद्धा= श्रद्धापुरुषः= मनुष्यसः= उसका स्वरूप है
सत्त्वानुरूपा= अन्तःकरणकेश्रद्धामयः= श्रद्धामय है।अर्थात् वही उसकी
अनुरूपयः= (इसलिये) जोनिष्ठा (स्थिति) है।

व्याख्या —‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत’—पीछेके श्लोकमें जिसे ‘स्वभावजा’ कहा गया है, उसीको यहाँ ‘सत्त्वानुरूपा’ कहा है। ‘सत्त्व’ नाम अन्तःकरणका है। अन्तःकरणके अनुरूप श्रद्धा होती है अर्थात् अन्तःकरण जैसा होता है, उसमें सात्त्विक, राजस या तामस जैसे संस्कार होते हैं, वैसी ही श्रद्धा होती है।

दूसरे श्लोकमें जिनको ‘देहिनाम्’ पदसे कहा था, उन्हींको यहाँ ‘सर्वस्य’ पदसे कह रहे हैं। ‘सर्वस्य’ पदका तात्पर्य है कि जो शास्त्रविधिको न जानते हों और देवता आदिका पूजन करते हों—उनकी ही नहीं, प्रत्युत जो शास्त्रविधिको जानते हों या न जानते हों, मानते हों या न मानते हों, अनुष्ठान करते हों या न करते हों, किसी

१०६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

जातिके, किसी वर्णके, किसी आश्रमके, किसी सम्प्रदायके, किसी देशके, कोई व्यक्ति कैसे ही क्यों न हो—उन सभीकी स्वाभाविक श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है।

‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषः’ —यह मनुष्य श्रद्धा-प्रधान है। अतः जैसी उसकी श्रद्धा होगी, वैसा ही उसका रूप होगा। उससे जो प्रवृत्ति होगी, वह श्रद्धाको लेकर, श्रद्धाके अनुसार ही होगी।

‘यो यच्छृङ्गः स एव सः’ —जो मनुष्य जैसी श्रद्धा-वाला है, वैसी ही उसकी निष्ठा होगी और उसके अनुसार ही उसकी गति होगी। उसका प्रत्येक भाव और क्रिया अन्तःकरणकी श्रद्धाके अनुसार ही होगी। जबतक वह संसारसे सम्बन्ध रखेगा, तबतक अन्तःकरणके अनुरूप ही उसका स्वरूप होगा।

मार्मिक बात

मनुष्यकी सांसारिक प्रवृत्ति संसारके पदार्थोंको सच्चा मानने, देखने, सुनने और भोगनेसे होती है तथा पारमार्थिक प्रवृत्ति परमात्मामें श्रद्धा करनेसे होती है। जिसे हम अपने अनुभवसे नहीं जानते, पर पूर्वके स्वाभाविक संस्कारोंसे, शास्त्रोंसे, संत-महात्माओंसे सुनकर पूज्यभावसहित विश्वास कर लेते हैं, उसका नाम है—श्रद्धा। श्रद्धाको लेकर ही आध्यात्मिक मार्गमें प्रवेश होता है, फिर चाहे वह मार्ग कर्मयोगका हो, चाहे ज्ञानयोगका हो और चाहे भक्तियोगका हो, साध्य और साधन—दोनोंपर श्रद्धा हुए बिना आध्यात्मिक मार्गमें प्रगति नहीं होती।

मनुष्य-जीवनमें श्रद्धाकी बड़ी मुख्यता है। मनुष्य जैसी श्रद्धावाला है, वैसा ही उसका स्वरूप, उसकी निष्ठा है—‘यो यच्छृङ्गः स एव सः’ (गीता १७।३)। वह आज वैसा न दीखे तो भी क्या ? पर समय पाकर वह वैसा बन ही जायगा।

आजकल साधकके लिये अपनी स्वाभाविक श्रद्धाको पहचानना बड़ा मुश्किल हो गया है। कारण कि अनेक मत-मतान्तर हो गये हैं। कोई ज्ञानकी प्रधानता कहता है, कोई भक्तिकी प्रधानता कहता है, कोई योगकी प्रधानता कहता है, आदि-आदि। ऐसे तरह-तरहके सिद्धान्त पढ़ने और सुननेसे मनुष्यपर उनका असर पड़ता है, जिससे वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि मैं क्या करूँ ? मेरा वास्तविक ध्येय, लक्ष्य क्या है ? मेरेको किधर चलना चाहिये ? ऐसी दशामें उसे गहरी रीतिसे अपने भीतरके भावोंपर विचार करना चाहिये कि संगसे बनी हुई रुचि, शास्त्रसे बनी हुई रुचि, किसीके

सिखानेसे बनी हुई रुचि, गुरुके बतानेसे बनी हुई रुचि—ऐसी जो अनेक रुचियाँ हैं, उन सबके मूलमें स्वतः उदबुद्ध होनेवाली अपनी स्वाभाविक रुचि क्या है ?

मूलमें सबकी स्वाभाविक रुचि यह होती है कि मैं सम्पूर्ण दुःखोंसे छूट जाऊँ और मुझे सदाके लिये महान् सुख मिल जाय। ऐसी रुचि हरेक प्राणीके भीतर रहती है। मनुष्योंमें तो यह रुचि कुछ जाग्रत् रहती है। उनमें पिछले जन्मोंके जैसे संस्कार हैं और इस जन्ममें वे जैसे माता-पितासे पैदा हुए, जैसे वायुमण्डलमें रहे, जैसी उनको शिक्षा मिली, जैसे उनके सामने दृश्य आये और वे जो ईश्वरकी बातें, परलोक तथा पुनर्जन्मकी बातें, मुक्ति और बन्धनकी बातें, सत्संग और कुसंगकी बातें सुनते रहते हैं, उन सबका उनपर अदृश्यरूपसे असर पड़ता है। उस असरसे उनकी एक धारणा बनती है। उनकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी—जैसी प्रकृति होती है, उसीके अनुसार वे उस धारणाको पकड़ते हैं और उस धारणाके अनुसार ही उनकी रुचि—श्रद्धा बनती है। इसमें सात्त्विकी श्रद्धा परमात्माकी तरफ लगानेवाली होती है और राजसी-तामसी श्रद्धा संसारकी तरफ।

गीतामें जहाँ-कहीं सात्त्विकताका वर्णन हुआ है, वह परमात्माकी तरफ ही लगानेवाली है। अतः सात्त्विकी श्रद्धा पारमार्थिक हुई और राजसी-तामसी श्रद्धा सांसारिक हुई अर्थात् सात्त्विकी श्रद्धा दैवी-सम्पत्ति हुई और राजसी-तामसी श्रद्धा आसुरी-सम्पत्ति हुई। दैवी-सम्पत्तिको प्रकट करने और आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करनेके उद्देश्यसे सत्रहवाँ अध्याय चला है। कारण कि कल्याण चाहनेवाले मनुष्यके लिये सात्त्विकी श्रद्धा (दैवी-सम्पत्ति) ग्राह्य है और राजसी-तामसी श्रद्धा (आसुरी-सम्पत्ति) त्याज्य है।

जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसकी श्रद्धा सात्त्विकी होती है, जो मनुष्य इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी सुख-सम्पत्ति-(स्वर्गादि- ) को चाहता है, उसकी श्रद्धा राजसी होती है और जो मनुष्य पशुओंकी तरह (मृदुता-पूर्वक) केवल खाने-पीने, भोग भोगने तथा प्रमाद, आलस्य, निद्रा, खेल-कूद, तमाशे आदिमें लगा रहता है, उसकी श्रद्धा तामसी होती है। सात्त्विकी श्रद्धाके लिये सबसे पहली बात है कि ‘परमात्मा है।’ शास्त्रोंसे, संत-महात्माओंसे, गुरुजनोंसे सुनकर पूज्यभावके सहित ऐसा विश्वास हो जाय कि ‘परमात्मा है और उसको प्राप्त करना है’—इसका नाम श्रद्धा है। ठीक श्रद्धा जहाँ होती है, वहाँ

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६५

प्रेम स्वतः हो जाता है। कारण कि जिस परमात्मामें श्रद्धा होती है, उसी परमात्माका अंश यह जीवात्मा है। अतः श्रद्धा होते ही यह परमात्माकी तरफ खिंचता है। अभी यह परमात्मासे विमुख होकर जो संसारमें लगा हुआ है, वह भी संसारमें श्रद्धा-विश्वास होनेसे ही है। पर यह वास्तविक श्रद्धा नहीं है, प्रत्युत श्रद्धाका दुरुपयोग है। जैसे, संसारमें यह रुपयोंपर विशेष श्रद्धा करता है कि इनसे सब कुछ मिल जाता है। यह श्रद्धा कैसे हुई? कारण कि बचपनमें खाने और खेलनेके पदार्थ पैसोंसे मिलते थे। ऐसा देखते-देखते पैसोंको ही मुख्य मान लिया और उसीमें श्रद्धा कर ली, जिससे यह बहुत ही पतनकी तरफ चला गया। यह सांसारिक श्रद्धा हुई। इससे ऊँची धार्मिक श्रद्धा होती है कि मैं अमुक वर्ण, आश्रम आदिका हूँ। परन्तु सबसे ऊँची श्रद्धा पारमार्थिक (परमात्माको लेकर) है। यही वास्तविक श्रद्धा है और इसीसे कल्याण होता है। शास्त्रोंमें, सन्त-महात्माओंमें, तत्त्वज्ञ-जीवनमुक्तोंमें जो श्रद्धा होती है, वह भी पारमार्थिक श्रद्धा ही है।*

जिनको शास्त्रोंका ज्ञान नहीं है और सन्त-महात्माओंका संग भी नहीं है, ऐसे मनुष्योंकी भी पूर्व-संस्कारके कारण पारमार्थिक श्रद्धा हो सकती है। इसकी पहचान क्या है? पहचान यह है कि ऐसे मनुष्योंके भीतर स्वाभाविक यह भाव होता है कि ऐसी कोई महान् चीज (परमात्मा) है, जो दीखती तो नहीं, पर है अवश्य। ऐसे मनुष्योंको स्वाभाविक ही पारमार्थिक बातें बहुत प्रिय लगती हैं और वे स्वाभाविक ही यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, सत्संग, स्वाध्याय आदि शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। यदि वे ऐसे कर्म न भी करें, तो भी सात्त्विक आहारमें स्वाभाविक रुचि होनेसे उनकी श्रद्धाकी पहचान हो जाती है।

मनुष्य, पशु-पक्षी, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे किसी-न-किसीको (किसी-न-किसी अंशमें) अपनेसे बड़ा अवश्य मानते हैं और बड़ा मानकर उसका सहारा लेते हैं। मनुष्यपर जब आफत आती है, तब वह किसीको अपनेसे बड़ा मानकर उसका सहारा लेता है। पशु-पक्षी भी अपनी रक्षा चाहते हैं और भयभीत होनेपर किसीका सहारा लेते हैं। लता भी किसीका सहारा लेकर ही ऊँची चढ़ती है। इस प्रकार जिसने किसीको बड़ा मानकर उसका सहारा लिया, उसने वास्तवमें 'ईश्वरवाद'

के सिद्धान्तको स्वीकार कर ही लिया, चाहे वह ईश्वरको माने या न माने। इसलिये आयु, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य, पद, अधिकार, ऐश्वर्य आदिमेंसे एक-एकसे बड़ा देखे, तो बड़पन देखते-देखते अन्तमें बड़पनकी जहाँ समाप्ति हो, वही ईश्वर है; क्योंकि बड़े-से-बड़ा ईश्वर है। उससे बड़ा कोई है ही नहीं—

पूर्वैषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।

(योगदर्शन १।२६)

'वह परमात्मा सबके पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है अर्थात् वह कालकी सीमासे बाहर है।'

इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपनी दृष्टिसे किसी-न-किसीको बड़ा मानता है। बड़पनकी यह मान्यता अपने-अपने अन्तःकरणके भावोंके अनुसार अलग-अलग होती है। इस कारण उनकी श्रद्धा भी अलग-अलग होती है।

श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप ही होती है। धारणा, मान्यता, भावना आदि सभी अन्तःकरणमें रहते हैं। इसलिये अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस या तामस जिस गुणकी प्रधानता रहती है, उसी गुणके अनुसार धारणा, मान्यता आदि बनती है और उस धारणा, मान्यता आदिके अनुसार ही तीन प्रकारकी (सात्त्विकी, राजसी या तामसी) श्रद्धा बनती है।

सात्त्विक, राजस और तामस—तीनों गुण सभी प्राणियोंमें रहते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। उन प्राणियोंमें किसीमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है, किसीमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और किसीमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। अतः यह नियम नहीं है कि सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें रजोगुण और तमोगुण न आयें, रजोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और तमोगुण न आयें, तथा तमोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और रजोगुण न आयें (गीता—चौदहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)। कारण कि प्रकृति परिवर्तनशील है— 'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।' इसलिये प्रकृतिजन्म गुणोंमें भी परिवर्तन होता रहता है। अतः एकमात्र परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाले साधकको चाहिये कि वह उन आने-जानेवाले गुणोंसे अपना सम्बन्ध मानकर उनसे विचलित न हो।

जीवमात्र परमात्माका अंश है। इसलिये किसी मनुष्योंमें

  • सांसारिक श्रद्धामें 'भोग' को, धार्मिक श्रद्धामें 'भाव' की और पारमार्थिक श्रद्धामें 'तत्त्व' की प्रधानता है।

१०६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

रजोगुण-तमोगुणकी प्रधानता देखकर उसे नीचा नहीं मान लेना चाहिये; क्योंकि कौन-सा मनुष्य किस समय समुन्नत हो जाय—इसका कुछ पता नहीं है। कारण कि परमात्माका अंश—स्वरूप (आत्मा) तो सबका शुद्ध ही है, केवल संग, शास्त्र, विचार, वायुमण्डल आदिको लेकर अन्तःकरणमें किसी एक गुणकी प्रधानता हो जाती है अर्थात् जैसा संग, शास्त्र आदि मिलता है, वैसा ही मनुष्यका अन्तःकरण बन जाता है और उस अन्तःकरणके अनुसार ही उसकी

परिशिष्ट भाव —श्रद्धा भाव है। जैसा जिसका भाव होता है—सद्भाव और असद्भाव। जो परमात्माकी तरफ ले जाता है, वह सद्भाव होता है और जो संसारकी तरफ ले जाता है, वह असद्भाव होता है। दैवी-सम्पत्तिमें सद्भावकी मुख्यता होती है और आसुरी-सम्पत्तिमें असद्भावकी मुख्यता होती है।

‘में साधक हूँ’—इसमें अगर असद्भावकी मुख्यता हो तो अभिमान होता है और सद्भावकी मुख्यता हो तो स्वाभिमान होता है। अभिमानसे आसुरी-सम्पत्ति आती है और स्वाभिमानसे दैवी-सम्पत्ति आती है। दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता देखनेसे अभिमान होता है और अपने कर्तव्यको देखनेसे स्वाभिमान होता है कि मैं साधन-विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ! अभिमान होनेपर तो मनुष्य साधन-विरुद्ध काम कर बैठेगा, पर स्वाभिमान होनेपर उसको साधन-विरुद्ध काम करनेमें लज्जा होगी। स्वाभिमान होनेसे वह सात्त्विकीमें चला जायगा और अभिमान होनेसे वह राजसी-तामसीमें चला जायगा।

सम्बन्ध—अपने इष्टके यजन-पूजनद्वारा मनुष्योंकी निष्ठाकी पहचान किस प्रकार होती है, अब उसको बताते हैं।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।

प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥

सात्त्विकाः= सात्त्विक मनुष्ययक्षरक्षांसि= यक्षों तथा राक्षसोंकाजनाः= मनुष्य हैं, (वे)
देवान्= देवताओंका= औरप्रेतान्= प्रेतों (और)
यजन्ते= पूजन करते हैं,अन्ये= दूसरे (जो)भूतगणान्= भूतगणोंका
राजसाः= राजस मनुष्यतामसाः= तामसयजन्ते= पूजन करते हैं।

व्याख्या —‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’—सात्त्विक अर्थात् दैवी-सम्पत्तिवाले मनुष्य देवोंका पूजन करते हैं। यहाँ ‘देवान्’ शब्दसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—ये पाँच ईश्वरकोटिके देवता लेने चाहिये; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द ईश्वरका वाचक है और उसकी सम्पत्ति अर्थात् दैवी-सम्पत्ति मुक्ति देनेवाली है—‘दैवी सम्पद्भिर्मोक्षाय’ (१६।५)। वह दैवी-सम्पत्ति जिनमें प्रकट होती है, उन (दैवी-सम्पत्तिवाले) साधकोंकी स्वाभाविक श्रद्धाकी पहचान बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’ पद आये हैं।

ईश्वरकोटिके देवताओंमें भी साधकोंकी श्रद्धा अलग-अलग होती है। किसीकी श्रद्धा भगवान् विष्णु—(राम, कृष्ण, आदि—) में होती है, किसीकी भगवान् शंकरमें होती है, किसीकी भगवान् गणेशमें होती है, किसीकी भगवती शक्तिमें होती है और किसीकी भगवान् सूर्यमें होती है। ईश्वरके जिस रूपमें उनकी स्वाभाविक श्रद्धा होती है, उसीका वे विशेषतासे यजन-पूजन करते हैं।

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—इन तैंतीस प्रकारके शास्त्रोक्त देवताओंका निष्कामभावसे पूजन करना भी ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६७

के अन्तर्गत मानना चाहिये।

‘यक्षरक्षसि राजसाः’ —राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका पूजन करते हैं। यक्ष-राक्षस भी देवयोनियोंमें हैं। यक्षोंमें धनके संग्रहकी मुख्यता होती है और राक्षसोंमें दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। अपनी कामना-पूर्तिके लिये और दूसरोंका विनाश करनेके लिये राजस मनुष्योंमें यक्षों और राक्षसोंका पूजन करनेकी प्रवृत्ति होती है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः’ —तामस मनुष्य प्रेतों तथा भूतोंका पूजन करते हैं। जो मर गये हैं, उन्हें प्रेत कहते हैं और जो भूतयोनियोंमें चले गये हैं, उन्हें ‘भूत’ कहते हैं।

यहाँ ‘प्रेत’ शब्दके अन्तर्गत जो अपने पितर हैं, उनको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि जो अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे अपने-अपने पितरोंका पूजन करते हैं, वे तामस नहीं कहलायेंगे, प्रत्युत सात्त्विक ही कहलायेंगे। अपने-अपने पितरोंके पूजनका भगवान्ने निषेध नहीं किया है—‘पितृन्यान्ति पितृव्रताः’ (गीता १। २५)। तात्पर्य है कि जो पितरोंका सकामभावसे पूजन करते हैं कि पितर हमारी रक्षा करेंगे अथवा हम जैसे पिता-पितामह आदिके लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करते हैं, ऐसे ही हमारी कुलपरम्परावाले भी हमारे लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करेंगे—ऐसे भावसे पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु अपने माता-पिता, दादा-दादी आदि पितरोंका पूजन करनेसे पितरोंको प्राप्त हो जायेंगे—यह बात नहीं है। जो पितृकृष्णसे उन्नृष्ण होना अपना कर्तव्य समझते हैं और इसीलिये (अपना कर्तव्य समझकर) निष्कामभावसे पितरोंका पूजन करते हैं, वे पुरुष सात्त्विक हैं, राजस नहीं। पितृलोकको वे ही जाते हैं, जो ‘पितृव्रताः’ हैं अर्थात् जो पितरोंको सर्वोपरि और अपना इष्ट मानते हैं तथा पितरोंपर ही निष्ठा रखते हैं। ऐसे लोग पितृलोकको तो जा सकते हैं, पर उससे आगे

परिशिष्ट भाव —देवताओंका पूजन करनेवाले सात्त्विक मनुष्यशरीर छूटनेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं, यक्ष-राक्षसोंका पूजन करनेवाले राजस मनुष्य यक्ष-राक्षसोंको प्राप्त होते हैं और भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले तामस मनुष्य भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं (गीता—नवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।

गीतामें ‘यज्ञ’ शब्द बहुत व्यापक है, जिसके अन्तर्गत यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि सम्पूर्ण कर्तव्य कर्म आ जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक)। अतः यहाँ भी ‘यजन्ते’ पदके अन्तर्गत सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मोंको लेना चाहिये, जिनमें यज्ञ मुख्य है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये’ —हमारे जो पितर हैं, वे दूसरोंके लिये भूत हैं और दूसरेके जो पितर हैं, वे हमारे लिये भूत हैं। पितरोंका पूजन करना तामस नहीं है, पर भूतोंका पूजन करना तामस है।

नहीं जा सकते।

कुत्ते, कौए आदिको भी जो निष्कामभावसे रोटी देते हैं (शास्त्रमें ऐसा विधान है), उससे उनकी योनि प्राप्त नहीं होती; क्योंकि वह उनका इष्ट नहीं है। वे तो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलते हैं। इसी प्रकार पितरोंका श्राद्ध-तर्पण आदि भी शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्काम-भावपूर्वक करनेसे पितृयोनि प्राप्त नहीं हो जाती। शास्त्र या भगवान्की आज्ञा मानकर करनेसे उनका उद्धार होगा। इसलिये निष्कामभावसे किये गये शास्त्रविहित नारायणबलि, गयाश्राद्ध आदि प्रेतकर्मोंको तामस नहीं मानना चाहिये; क्योंकि ये तो मृत प्राणीकी सद्गतिके लिये किये जानेवाले आवश्यक कर्म हैं, जिन्हें मरे हुए प्राणीके लिये शास्त्रके आज्ञानुसार हरेकको करना चाहिये।

हम शास्त्रविहित यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, तो उनमें पहले गणेशजी, नवग्रह, षोडश-मातृका आदिका पूजन शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावसे करते हैं। यह वास्तवमें नवग्रह आदिका पूजन न होकर शास्त्रका ही पूजन, आदर हुआ। जैसे, स्त्री पतिकी सेवा करती है, तो उसका कल्याण हो जाता है। विवाह तो हरेक पुरुषका हो सकता है, राक्षसका भी और असुरका भी। वे भी पति बन सकते हैं। परन्तु वास्तवमें कल्याण पतिकी सेवासे नहीं होता, प्रत्युत पतिकी सेवा करना—पातिव्रतधर्मका पालन करना ऋषि, शास्त्र, भगवान्की आज्ञा है, इसलिये इनकी आज्ञाके पालनसे ही कल्याण होता है।

देवता आदिके पूजनसे पूजक-(पूजा करनेवाले-) की गति वैसी ही होगी—यह बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते’ पद नहीं आया है। अर्जुनने शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करनेवालोंकी निष्ठा पूछी थी; अतः अपने-अपने इष्ट-(पूज्य-) के अनुसार पूजकोंकी निष्ठा—श्रद्धा होती है, इसकी पहचान बतानेके लिये ही ‘यजन्ते’ पद आया है।

१०६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

सम्बन्ध—अबतक उन मनुष्योंकी बात बतायी, जो शास्त्रविधिको न जाननेके कारण उसका (अज्ञतापूर्वक) त्याग करते हैं; परन्तु अपने इष्ट तथा उसके यजन-पूजनमें श्रद्धा रखते हैं। अब, विरोधपूर्वक शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंकी क्रियाओंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विदध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥

ये= जोकामराग-माम्= मुझ परमात्माको
जनाः= मनुष्यबलान्विताः= (जो) भोग-एव= भी
अशास्त्र-पदार्थ, आसक्ति औरकर्शयन्तः= कृश करनेवाले हैं,
विहितम्= शास्त्रविधिसेहठसे युक्त हैं;तान्= उन
रहितशरीरस्थम्= (जो) शरीरमेंअचेतसः= अज्ञानियोंको
घोरम्= घोरस्थित(तू)
तपः= तपभूतग्रामम्= पाँच भूतोंकोआसुर-
तप्यन्ते= करते हैं;अर्थात् पाञ्चभौतिकनिश्चयान्= आसुर
दम्भाहङ्कार-शरीरकोनिष्ठावाले
संयुक्ताः= (जो) दम्भ= तथा(आसुरी
और अहंकारसे अच्छीअन्तः-सम्पत्तिवाले)
तरह युक्त हैं;शरीरस्थम्= अन्तःकरणमें स्थितविद्धि= समझ।

व्याख्या—‘अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः’— शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है, प्रत्युत निषेध है, ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।

‘दम्भाहंकारसंयुक्ताः’— उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन, ध्यान, स्वाध्याय आदि करते हैं, वे सब दम्भ करते हैं, दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका, चतुराईका, जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं; हमलोगोंको समझा सकते हैं, उनको रास्तेपर ला सकते हैं; हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें? हम कोई कम जानते हैं क्या? हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले; आदि—आदि।

‘कामरागबलान्विताः’—‘काम’ शब्द भोग-पदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना, तल्लीन हो जाना, एकरस हो जाना ‘राग’ है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ, दुराग्रह है, वह ‘बल’ है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंने यह भाव रहता है कि मनुष्य-शरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्य-शरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोग-सामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया, तो फिर उसने क्या किया? मनुष्य-शरीर पाकर मनचाही भोग-सामग्री नहीं मिली, तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है, आदि—आदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धन-सम्पत्ति आदि भोग-सामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक, ज़िदसे तप किया करते हैं।

‘कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम्’— वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों—(पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—) को कृश करते हैं, शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता—ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।

श्लोक ७ ] * साधक-संजीवनी * १०६९

आगे चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है, वहाँ शरीरको कष्ट देनेकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है, वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अवधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।

‘मां चैवान्तःशरीरस्थम्’ —भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं, दुःख देते हैं। कैसे? वे मेरी आज्ञा, मेरे मतके अनुसार नहीं चलते, प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।

अर्जुनने पूछा था कि वे कौन-सी निष्ठावाले हैं—सात्त्विक हैं कि राजस-तामस? दैवी-सम्पत्तिवाले हैं कि आसुरी-सम्पत्तिवाले? तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो—‘तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। ’ यहाँ ‘आसुरनिश्चयान् ’ पद सामान्य आसुरी-सम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है, प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्त नीच—विशेष नास्तिक हैं, उनका वाचक है।

विशेष बात

चौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जानेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘यजन्ते ’ पद आया है; परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘तप्यन्ते ’ पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्य-बुद्धि होती है—तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगर्दत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके तपका लक्षण है—शरीरको सुखाना, कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व

देते हैं, उसे बहुत अच्छा मानते हैं; परन्तु भगवान्को, शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं, जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना, काँटोंपर सोना, उलटे लटकना, एक पैसे खड़े होना, शास्त्रज्ञानसे विरुद्ध अग्नि तपना, अपने शरीर, मन, इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि—ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपेक्षा करके दान-सेवा, उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है, जो इतनी बुरी नहीं है; क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्र-विधियुक्त तो नहीं हैं, पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं, उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ? तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी; क्योंकि इनमें दम्भ, अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं, सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं।

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका ‘उपेक्षा-पूर्वक’ त्याग है, इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका ‘अज्ञातपूर्वक’ त्याग है और यहाँ शास्त्रका ‘विरोधपूर्वक’ त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा, शास्त्रविधि, प्राणिसमुदाय और भगवान्—इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसी-तामसी वर्णनमें नहीं है।

सम्बन्ध—अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे, तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी—इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रूचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥

आहारः= आहारतथा= वैसे हीलेकर तीन प्रकारकी
अपि= भीयज्ञः= यज्ञ,रूचि होती है,)
सर्वस्य= सबकोतपः= तप (और)तेषाम्
त्रिविधः= तीन प्रकारकादानम्= दान (भी तीन प्रकारके होते हैंउनके
प्रियः= प्रियअर्थात् शास्त्रीयइमम्
भवति= होता हैकर्मोंमें भी गुणोंकोभेदम्
तु= औरशृणु

१०७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः’ —चौथे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके अनुसार मनुष्योंकी निष्ठाकी परीक्षाके लिये सात्त्विक, राजस और तामस—तीन तरहके यजन बताये। परन्तु जिसकी श्रद्धा, रुचि, प्रियता यजन-पूजनमें नहीं है, उनकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? इसके लिये बताया कि जिनकी यजन-पूजनमें श्रद्धा नहीं है, ऐसे मनुष्योंको भी शरीर-निर्वाहके लिये भोजन तो करना ही पड़ता है, चाहे वे नास्तिक हों, चाहे आस्तिक हों, चाहे वैदिक अथवा ईसाई, पारसी, यहूदी, यवन आदि किसी सम्प्रदायके हों। उन सबके लिये यहाँ ‘आहारस्त्वपि ’ पद देकर कहा है कि निष्ठाकी पहचानके लिये केवल यजन-पूजन ही नहीं है, प्रत्युत भोजनकी रुचिसे ही उनकी निष्ठाकी पहचान हो जायगी। मनुष्यका मन स्वाभाविक ही जिस भोजनमें ललचाता है अर्थात् जिस भोजनकी बात सुनकर, उसे देखकर और उसे चखकर मन आकृष्ट होता है, उसके अनुसार उसकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी निष्ठा मानी जाती है।

यहाँ कोई ऐसा भी कह सकता है कि सात्त्विक, राजस और तामस आहार कैसा-कैसा होता है—इसे बतानेके लिये यह प्रकरण आया है। स्थूलदृष्टिसे देखनेपर तो ऐसा ही दीखता है; परन्तु विचारपूर्वक गहराईसे देखनेपर यह बात दीखती नहीं। वास्तवमें यहाँ आहारका वर्णन नहीं है, प्रत्युत आहारीकी रुचिका वर्णन है। अतः आहारीकी श्रद्धाकी पहचान कैसे हो? यह बतानेके लिये ही यह प्रकरण आया है।

यहाँ ‘सर्वस्य ’ और ‘प्रियः ’ पद यह बतानेके लिये आये हैं कि सामान्यरूपसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक-एककी किस-किस भोजनमें रुचि होती है, जिससे उनकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी निष्ठाकी पहचान हो। ऐसे ही ‘यज्ञस्तपस्तथा दानम् ’ पद यह बतानेके लिये आये

परिशिष्ट भाव —मनुष्यके द्वारा स्वभावसे होनेवाली क्रियाएँ दो प्रकारकी होती हैं—व्यावहारिक और शास्त्रीय। अतः यहाँ ‘आहार’ के अन्तर्गत व्यावहारिक (खान-पान, रहन-सहन आदि) और ‘यज्ञ-तप-दान’ के अन्तर्गत शास्त्रीय क्रियाओंको समझना चाहिये।

१-यद्यपि यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द होमरूप यज्ञका ही वाचक है, सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका नहीं (क्योंकि यज्ञके साथ तप और दान अलगसे आये हैं), तथापि गौणतासे तीर्थ, व्रत आदि कर्तव्य-कर्म भी लिये जा सकते हैं।

२-मृगा मृगैः संगमनुब्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः। मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेषु सख्यम्॥ (पंचतन्त्र, मित्रभेद ३०५)

‘जिस प्रकार पशुओंमें हरिण हरिणोंके साथ, गायें गायोंके साथ, घोड़े घोड़ोंके साथ ही चलते-फिरते हैं, उसी प्रकार मनुष्योंमें भी मूर्ख मूर्खोंके साथ और विद्वान् विद्वानोंके साथ मित्रता आदिका व्यवहार करते हैं; क्योंकि मित्रता समान स्वभाव, आचरण आदिमें ही होती है।’

हैं कि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं, उनमें भी उन मनुष्योंकी यज्ञ, तप आदि किस-किस कर्ममें कैसी-कैसी रुचि—प्रियता होती है। यहाँ ‘तथा ’ कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे पूजन तीन तरहका होता है और जैसे आहार तीन तरहका प्रिय होता है, इसी तरह शास्त्रीय यज्ञ, तप आदि कर्म भी तीन तरहके होते हैं। इससे यहाँ एक और बात भी सिद्ध होती है कि शास्त्र, सत्संग, विवेचन, वार्तालाप, कहानी, पुस्तक, व्रत, तीर्थ, व्यक्ति आदि जो-जो भी सामने आयेंगे, उनमें जो सात्त्विक होगा वह सात्त्विक मनुष्यको, जो राजस होगा, वह राजस मनुष्यको और जो तामस होगा, वह तामस मनुष्यको प्रिय लगेगा।

‘तेषां भेदमिमं शृणु’ —यज्ञ, तप और दानके भेद सुनो अर्थात् मनुष्यकी स्वाभाविक रुचि, प्रवृत्ति और प्रसन्नता किस-किसमें होती है, उसको तुम सुनो। जैसे अपनी रुचिके अनुसार कोई ब्राह्मणको दान देना पसंद करता है, तो कोई अन्य साधारण मनुष्यको दान देना ही पसंद करता है। कोई शुद्ध आचरणवाले व्यक्तियोंके साथ मित्रता करते हैं, तो कोई जिनका खान-पान, आचरण आदि शुद्ध नहीं हैं, ऐसे मनुष्योंके साथ ही मित्रता करते हैं, आदि-आदि।

तात्पर्य यह कि सात्त्विक मनुष्योंकी रुचि सात्त्विक खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग करना उनको अच्छा लगता है। राजस मनुष्योंकी रुचि राजस खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है। तामस मनुष्योंकी रुचि तामस खान-पान, रहन-सहन आदिमें तथा शास्त्रनिषिद्ध आचरण करनेवाले नीच मनुष्योंके साथ उठने-बैठने, खाने-पीने, बातचीत करने, साथ रहने, मित्रता करने आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है तथा वैसे ही आचरणोंमें उनकी प्रवृत्ति होती है।

श्लोक ८-९]

  • साधक-संजीवनी *

१०७९

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रोतिविवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥

आयुः सत्त्व- बलारोग्य- सुखप्रोति- विवर्धनाः | = आयु, सत्त्व- गुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता | स्थिराः = स्थिर रहनेवाले, हृद्याः = हृदयको शक्ति देनेवाले, रस्याः = रसयुक्त (तथा) स्निग्धाः = चिकने— | आहाराः = (ऐसे) आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विकप्रियाः = सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'आयुः'—जिन आहारोंके करनेसे मनुष्यकी आयु बढ़ती है; 'सत्त्वम्'—सत्त्वगुण बढ़ता है; 'बलम्'—शरीर, मन, बुद्धि आदिमें सात्त्विक बल एवं उत्साह पैदा होता है; 'आरोग्यः'—शरीरमें नीरोगता बढ़ती है; 'सुखम्'—सुख-शान्ति प्राप्त होती है; और 'प्रोतिविवर्धनाः'—जिनको देखनेसे ही प्रीति पैदा होती है*, वे अच्छे लगते हैं।

इस प्रकारके 'स्थिराः'—जो गरिष्ठ नहीं, प्रत्युत सुपाच्य हैं और जिनका सार बहुत दिनतक शरीरमें शक्ति देता रहता है; और 'हृद्याः'—हृदय, फेफड़े आदिको शक्ति

देनेवाले तथा बुद्धि आदिमें सौम्य भाव लानेवाले; 'रस्याः'—फल, दूध, खाँड़ आदि रसयुक्त पदार्थ; 'स्निग्धाः'—घी, मक्खन, बादाम, काजू, किशमिश, सात्त्विक पदार्थोंसे निकले हुए तेल आदि स्नेहयुक्त भोजनके पदार्थ, जो अच्छे पके हुए तथा ताजे हैं।

'आहाराः सात्त्विकप्रियाः'—ऐसे भोजनके (भोज्य, पेय, लेह्य और चोष्य) पदार्थ सात्त्विक मनुष्यको प्यारे लगते हैं। अतः ऐसे आहारमें रुचि होनेसे उसकी पहचान हो जाती है कि यह मनुष्य सात्त्विक है।

कट्वम् ललवणात्युष्मातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥

कट्वम् ल- लवणात्युष्मा- तीक्ष्णरूक्ष- विदाहिनः | = अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति | आहाराः = आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजसस्य = राजस मनुष्यको | दुःखः = प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःखशोकामय- प्रदाः = दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'कटु'—करेला, ग्वारपाटा आदि अधिक कड़वे पदार्थ; 'अम्ल'—इमली, अमचूर, नींबू, छाछ, सड़न पैदा करके बनाया गया सिरका आदि अधिक खट्टे पदार्थ; 'लवणम्'—अधिक नमकवाले पदार्थ; 'अत्युष्णम्'—जिनसे भाप निकल रही हो, ऐसे अत्यन्त गरम-गरम पदार्थ; 'तीक्ष्णम्'—जिनको खानेसे नाक, आँख, मुख और सिरसे पानी आने लगे, ऐसे लाल मिर्च आदि अधिक

तीखे पदार्थ; 'रूक्षम्'—जिनमें घी, दूध आदिका सम्बन्ध नहीं है, ऐसे भुने हुए चने, सतुआ आदि अधिक रूखे पदार्थ और 'विदाहिनः'—राई आदि अधिक दाहकारक पदार्थ (राईको दो-तीन घंटे छाछमें भिगोकर रखा जाय, तो उसमें एक खमीर पैदा होता है, जो बहुत दाहकारक होता है)।

'आहारा राजसस्येष्टाः'—इस प्रकारके भोजनके

  • ऐसे तो अनुकूल आहार मिलनेपर राजस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें विष हो जायगी (अठारहवें अध्यायका अङ्गीतसर्वो श्लोक)। ऐसे ही तामस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें उसको मूढ़तामें अर्थात् अतिनिद्रा, आलस्य और प्रमाद (खेल-तमाशे, व्यर्थ बकवाद, दुर्व्यसन आदि) में लगा देगी (अठारहवें अध्यायका उन्नालीसर्वो श्लोक)।

१०७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

(भोज्य, पेय, लेह्य और चोष्य) पदार्थ राजस मनुष्यको प्यारे होते हैं। इससे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जाती है। ‘दुःखशोकायप्रदाः’ —परन्तु ऐसे पदार्थ परिणाममें दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले होते हैं। खट्टा, तीखा और

दाहकारक भोजन करते समय मुख आदिमें जो जलन होती है, यह दुःख है। भोजन करनेके बाद मनमें प्रसन्नता नहीं होती, प्रत्युत स्वाभाविक चिन्ता रहती है, यह शोक है। ऐसे भोजनसे शरीरमें प्रायः रोग होते हैं।

यातयामं गतरसं पूतिं पर्युषितं च यत्।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥

यत्= जोपर्युषितम्= बासी(मांस
भोजनम्= भोजन= औरआदि)
यातयामम्= सड़ाउच्छिष्टम्= जूटा हैअपि= भी है, (वह)
हुआ,= तथातामसप्रियम्= तामस मनुष्यको
गतरसम्= रसरहित,(जो)प्रिय
पूति= दुर्गन्धित,अमेध्यम्= महान् अपवित्रहोता है।

व्याख्या—‘यातयामम्’ —पकनेके लिये जिनको पूरा समय प्राप्त नहीं हुआ है, ऐसे अधपके या उचित समयसे ज्यादा पके हुए अथवा जिनका समय बीत गया है, ऐसे बिना ऋतुके पैदा किये हुए एवं ऋतु चली जानेपर फ्रिज आदिकी सहायतासे रखे हुए साग, फल आदि भोजनके पदार्थ।

‘गतरसम्’ —धूप आदिसे जिनका स्वाभाविक रस सूख गया है अथवा मशीन आदिसे जिनका सार खींच लिया गया है, ऐसे दूध, फल आदि।

‘पूति’ —सड़नेसे पैदा की गयी मंदिरा और स्वाभाविक दुर्गन्धवाले प्याज, लहसुन आदि।

‘पर्युषितम्’ —जल और नमक मिलाकर बनाये हुए साग, रोटी आदि पदार्थ रात बीतनेपर बासी कहलाते हैं। परन्तु केवल शुद्ध दूध, घी, चीनी आदिसे बने हुए अथवा

अग्निपर पकाये हुए पेड़ा, जलेबी, लड्डू आदि जो पदार्थ हैं, उनमें जबतक विकृति नहीं आती, तबतक वे बासी नहीं माने जाते। ज्यादा समय रहनेपर उनमें विकृति (दुर्गन्ध आदि) पैदा होनेसे वे भी बासी कहे जायेंगे।

‘उच्छिष्टम्’ —भुक्तावशेष अर्थात् भोजनके बाद पात्रमें बचा हुआ अथवा जूटा हाथ लगा हुआ और जिसको गाय, बिल्ली, कुत्ता, कौआ आदि पशु-पक्षी देख ले, सँघ ले या खा ले—वह सब जूटन माना जाता है।

‘अमेध्यम्’ —रज-वीर्यसे पैदा हुए मांस, मछली, अंडा आदि महान् अपवित्र पदार्थ, जो मुर्दा हैं और जिनको झूनेमात्रसे स्नान करना पड़ता है।

‘अपि च’ —इन अवयवोंके प्रयोगसे उन सब पदार्थोंको ले लेना चाहिये, जो शास्त्रनिषिद्ध हैं। जिस वर्ण, आश्रमके

१-मदिरापान करनेवालेको शास्त्रोंमें महापापी कहा गया है— स्तेनो हिण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्म चैते पतन्ति चत्वारः पंचमशचाचंस्तैरिति। (छान्दोग्योपनिषद् ५।१०।१) अर्थात् स्वर्णकी चोरी करनेवाला, मदिरा (शराब) पीनेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला—ये चारों महापापी हैं और इनका संग करनेवाला पाँचवाँ महापापी है।

इससे सिद्ध होता है कि मदिरापान सर्वथा निन्दनीय, मांसाहारसे भी अधिक निन्दनीय और पतन करनेवाला है। गंगाजी सबको शुद्ध करनेवाली हैं। परन्तु यदि गंगाजीमें मदिराका पात्र डाल दिया जाय तो वह शुद्ध नहीं होता। जब मदिराका पात्र भी (जिसमें मदिरा डाली जाती है) इतना अशुद्ध हो जाता है, तब मदिरा पीनेवाला कितना अशुद्ध हो जाता होगा—इसका कोई ठिकाना नहीं है।

मदिराके निर्माणमें असंख्य जीवोंकी हत्या होती है। मदिरापानसे होनेवाली सबसे भयंकर हानि यह है कि इससे अन्तःकरणमें रहनेवाले धर्मके अंकुर नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य है कि मनुष्यके भीतर जो धार्मिक भावनाएँ रहती हैं, धर्मकी रुचि, संस्कार रहते हैं, उनको मदिरापान नष्ट कर देता है। इससे मनुष्य महान् पतनकी तरफ चला जाता है।

२-यहाँ तामस भोजनमें ‘अमेध्य’ शब्दका प्रयोग करके भगवान् मानो इन चीजोंका नाम भी लेना नहीं चाहते।