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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1064

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६३

श्रीभगवान् बोले—

देहिनाम्= मनुष्योंकी= तथाएव= ही
सा= वहराजसी= राजसीभवति= होती है,
स्वभावजा= स्वभावसे= औरताम्= उसको
उत्पन्न हुईतामसी= तामसी(तुम
श्रद्धा= श्रद्धाइति= —ऐसेमुझसे)
सात्त्विकी= सात्त्विकीत्रिविधा= तीन तरहकीशृणु= सुनो।

व्याख्या —[अर्जुनने निष्ठाको जाननेके लिये प्रश्न किया था, पर भगवान् उसका उत्तर श्रद्धाको लेकर देते हैं; क्योंकि श्रद्धाके अनुसार ही निष्ठा होती है।]

‘त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा’—श्रद्धा तीन तरहकी होती है। वह श्रद्धा कौन-सी है? संगजा है, शास्त्रजा है या स्वभावजा है? तो कहते हैं कि वह स्वभावजा है—‘सा स्वभावजा’ अर्थात् स्वभावसे पैदा हुई स्वतःसिद्ध श्रद्धा है। वह न तो संगसे पैदा हुई है और न शास्त्रोंसे पैदा हुई है। वे स्वाभाविक इस प्रवाहमें बह रहे हैं और देवता आदिका पूजन करते जा रहे हैं।

‘सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु’—वह स्वभावजा श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उन तीनोंको अलग-अलग सुनो।

पीछेके श्लोकमें ‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ पदोंमें ‘आहो’ अव्यय देनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनकी दृष्टिमें ‘सत्त्वम्’ से दैवी-सम्पत्ति और ‘रजस्तमः’ से आसुरी-सम्पत्ति—ये

दो ही विभाग हैं और भगवान् भी बन्धनकी दृष्टिसे राजसी-तामसी दोनोंको आसुरी-सम्पत्ति ही मानते हैं—‘निबन्धायामसुरीमता’ (१६।५)। परंतु बन्धनकी दृष्टिसे राजसी और तामसी एक होते हुए भी दोनोंके बन्धनमें भेद है। राजस मनुष्य सकामभावसे शास्त्रविहित कर्म भी करते हैं; अतः वे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाकर और वहाँके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोकमें लौट आते हैं—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता ९।२१)। परन्तु तामस मनुष्य शास्त्रविहित कर्म नहीं करते; अतः वे कामना और मूढ़ताके कारण अधम गतिमें जाते हैं—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)। इस प्रकार राजस और तामस—दोनों ही मनुष्योंका बन्धन बना रहता है। दोनोंके बन्धनमें भेदकी दृष्टिसे ही भगवान् आसुरी-सम्पदावालोंकी श्रद्धाके राजसी और तामसी—दो भेद करते हैं और सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—तीनों श्रद्धाओंको अलग-अलग सुननेके लिये कहते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित स्वभावजा श्रद्धाके तीन भेद क्यों होते हैं—इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्धः स एव सः ॥ ३ ॥

भारत= हे भारत!भवति= होती है।यच्छृद्धः= जैसी श्रद्धावाला है,
सर्वस्य= सभी मनुष्योंकीअयम्= यहसः, एव= वही
श्रद्धा= श्रद्धापुरुषः= मनुष्यसः= उसका स्वरूप है
सत्त्वानुरूपा= अन्तःकरणकेश्रद्धामयः= श्रद्धामय है।अर्थात् वही उसकी
अनुरूपयः= (इसलिये) जोनिष्ठा (स्थिति) है।

व्याख्या —‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत’—पीछेके श्लोकमें जिसे ‘स्वभावजा’ कहा गया है, उसीको यहाँ ‘सत्त्वानुरूपा’ कहा है। ‘सत्त्व’ नाम अन्तःकरणका है। अन्तःकरणके अनुरूप श्रद्धा होती है अर्थात् अन्तःकरण जैसा होता है, उसमें सात्त्विक, राजस या तामस जैसे संस्कार होते हैं, वैसी ही श्रद्धा होती है।

दूसरे श्लोकमें जिनको ‘देहिनाम्’ पदसे कहा था, उन्हींको यहाँ ‘सर्वस्य’ पदसे कह रहे हैं। ‘सर्वस्य’ पदका तात्पर्य है कि जो शास्त्रविधिको न जानते हों और देवता आदिका पूजन करते हों—उनकी ही नहीं, प्रत्युत जो शास्त्रविधिको जानते हों या न जानते हों, मानते हों या न मानते हों, अनुष्ठान करते हों या न करते हों, किसी