श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
आगे आनेवाली जनतामें शास्त्रका ज्ञान बहुत कम रहेगा। उन्हें अच्छा सत्संग मिलना भी कठिन होगा; क्योंकि अच्छे सन्त-महात्मा पहले युगोंमें भी कम हुए हैं, फिर कलियुगमें तो और भी कम होंगे। कम होनेपर भी यदि भीतर चाहना हो तो उन्हें सत्संग मिल सकता है। परन्तु मुश्किल यह है कि कलियुगमें दम्भ, पाखण्ड ज्वादा होनेसे कई दम्भी और पाखण्डी पुरुष सन्त बन जाते हैं। अतः सच्चे सन्त पहचानमें आने मुश्किल हैं। इस प्रकार पहले तो सन्त-महात्मा मिलने कठिन हैं और मिल भी जायें तो उनमेंसे कौन-से संत कैसे हैं—इस बातकी पहचान प्रायः नहीं होती और पहचान हुए बिना उनका संग करके विशेष लाभ ले लें—ऐसी बात भी नहीं है। अतः जो शास्त्र-विधिको भी नहीं जानते और असली सन्तोंका संग भी नहीं मिलता, परन्तु जो कुछ यजन-पूजन करते हैं, श्रद्धासे करते हैं—ऐसे मनुष्योंकी निष्ठा कौन-सी होती है? सात्त्विकी अथवा राजसी-तामसी?
‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ ‘पदोंमें सत्त्वगुणको दैवी-सम्पत्तिमें और रजोगुण तथा तमोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें ले लिया गया है। रजोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें लेनेका कारण यह है कि रजोगुण-तमोगुणके बहुत निकट हैं। गीतामें कई जगह ऐसी बात आयी है; जैसे—दूसरे अध्यायके बासठवें-तिरसठवें श्लोकोंमें काम अर्थात् रजोगुणसे क्रोध और क्रोधसे मोहरूप तमोगुणका उत्पन्न होना बताया गया है। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें हिंसात्मक और शोकान्वितको रजोगुणी कर्ताका लक्षण बताया गया है और अठारहवें अध्यायके ही पचीसवें श्लोकमें ‘हिंसा’ को तामस कर्मका लक्षण और पैंतीसवें श्लोकमें ‘शोक’ को तामस धृतिका लक्षण बताया गया है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणके बहुत-से लक्षण आपसमें मिलते हैं।
सात्त्विक भाव, आचरण और विचार दैवी-सम्पत्तिके होते हैं और राजसी-तामसी भाव, आचरण और विचार
आसुरी-सम्पत्तिके होते हैं। सम्पत्तिके अनुसार ही निष्ठा होती है अर्थात् मनुष्यके जैसे भाव, आचरण और विचार होते हैं, उन्हींके अनुसार उसकी स्थिति (निष्ठा) होती है। स्थितिके अनुसार ही आगे गति होती है। आप कहते हैं कि शास्त्र-विधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेपर सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलती, तो जब उनकी निष्ठाका ही पता नहीं, फिर उनकी गतिका क्या पता लगे? इसलिये आप उनकी निष्ठा बताइये, जिससे पता लग जाय कि वे सात्त्विकी गतिमें जानेवाले हैं या राजसी-तामसी गतिमें।
‘कृष्ण’ का अर्थ है—खींचनेवाला। यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधनका तात्पर्य यह मालूम देता है कि आप ऐसे मनुष्योंको अन्तिम समयमें किस ओर खींचेंगे? उनको किस गतिकी तरफ ले जायेंगे? छठे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भी अर्जुनने गति-विषयक प्रश्नमें ‘कृष्ण’ सम्बोधन दिया है—‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’। यहाँ भी अर्जुनका निष्ठा पूछनेका तात्पर्य गतिमें ही है।
मनुष्यको भगवान् खींचते हैं या वह कर्मोंके अनुसार स्वयं खींचा जाता है? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है, पर कर्मफलके विधायक होनेसे भगवान्का खींचना सम्पूर्ण फलोंमें होता है। तामसी कर्मोंका फल नरक होगा, तो भगवान् नरकोंकी तरफ खींचेंगे। वास्तवमें नरकोंके द्वारा पापोंका नाश करके प्रकाशन्तरसे भगवान् अपनी तरफ ही खींचते हैं। उनका किसीसे भी वैर या द्वेष नहीं है। तभी तो आसुरी योनियोंमें जानेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि वे मेरेको प्राप्त न होकर अधोगतिमें चले गये (सोलहवें अध्यायका बीसवों श्लोक)। कारण कि उनका अधोगतिमें जाना भगवान्को सुहाता नहीं है। इसलिये सात्त्विक मनुष्य हो, राजस मनुष्य हो या तामस मनुष्य हो, भगवान् सबको अपनी तरफ ही खींचते हैं। इसी भावसे यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन आया है।
सम्बन्ध—शास्त्रविधिको न जाननेपर भी मनुष्यमात्रमें किसी-न-किसी प्रकारकी स्वभावजा श्रद्धा तो रहती ही है। उस श्रद्धाके भेद आगेके श्लोकमें बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
१-तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—तीनों गुणोंमें परस्पर दसगुना अन्तर है। जैसे एकका दसगुना दस; और दसका दसगुना सौ है, उसी तरह तमोगुण (१) से दसगुना श्रेष्ठ रजोगुण (१०) है और रजोगुणसे दसगुना श्रेष्ठ सत्त्वगुण (१००) है। तात्पर्य है कि तमोगुण और रजोगुण पास-पासमें हैं, जबकि सत्त्वगुण दोनोंसे बहुत दूर है।
२-क्रोधका कारण रजोगुण है और कार्य तमोगुण है।