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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१०६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

आगे आनेवाली जनतामें शास्त्रका ज्ञान बहुत कम रहेगा। उन्हें अच्छा सत्संग मिलना भी कठिन होगा; क्योंकि अच्छे सन्त-महात्मा पहले युगोंमें भी कम हुए हैं, फिर कलियुगमें तो और भी कम होंगे। कम होनेपर भी यदि भीतर चाहना हो तो उन्हें सत्संग मिल सकता है। परन्तु मुश्किल यह है कि कलियुगमें दम्भ, पाखण्ड ज्वादा होनेसे कई दम्भी और पाखण्डी पुरुष सन्त बन जाते हैं। अतः सच्चे सन्त पहचानमें आने मुश्किल हैं। इस प्रकार पहले तो सन्त-महात्मा मिलने कठिन हैं और मिल भी जायें तो उनमेंसे कौन-से संत कैसे हैं—इस बातकी पहचान प्रायः नहीं होती और पहचान हुए बिना उनका संग करके विशेष लाभ ले लें—ऐसी बात भी नहीं है। अतः जो शास्त्र-विधिको भी नहीं जानते और असली सन्तोंका संग भी नहीं मिलता, परन्तु जो कुछ यजन-पूजन करते हैं, श्रद्धासे करते हैं—ऐसे मनुष्योंकी निष्ठा कौन-सी होती है? सात्त्विकी अथवा राजसी-तामसी?

‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ ‘पदोंमें सत्त्वगुणको दैवी-सम्पत्तिमें और रजोगुण तथा तमोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें ले लिया गया है। रजोगुणको आसुरी-सम्पत्तिमें लेनेका कारण यह है कि रजोगुण-तमोगुणके बहुत निकट हैं। गीतामें कई जगह ऐसी बात आयी है; जैसे—दूसरे अध्यायके बासठवें-तिरसठवें श्लोकोंमें काम अर्थात् रजोगुणसे क्रोध और क्रोधसे मोहरूप तमोगुणका उत्पन्न होना बताया गया है। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें हिंसात्मक और शोकान्वितको रजोगुणी कर्ताका लक्षण बताया गया है और अठारहवें अध्यायके ही पचीसवें श्लोकमें ‘हिंसा’ को तामस कर्मका लक्षण और पैंतीसवें श्लोकमें ‘शोक’ को तामस धृतिका लक्षण बताया गया है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणके बहुत-से लक्षण आपसमें मिलते हैं।

सात्त्विक भाव, आचरण और विचार दैवी-सम्पत्तिके होते हैं और राजसी-तामसी भाव, आचरण और विचार

आसुरी-सम्पत्तिके होते हैं। सम्पत्तिके अनुसार ही निष्ठा होती है अर्थात् मनुष्यके जैसे भाव, आचरण और विचार होते हैं, उन्हींके अनुसार उसकी स्थिति (निष्ठा) होती है। स्थितिके अनुसार ही आगे गति होती है। आप कहते हैं कि शास्त्र-विधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेपर सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलती, तो जब उनकी निष्ठाका ही पता नहीं, फिर उनकी गतिका क्या पता लगे? इसलिये आप उनकी निष्ठा बताइये, जिससे पता लग जाय कि वे सात्त्विकी गतिमें जानेवाले हैं या राजसी-तामसी गतिमें।

‘कृष्ण’ का अर्थ है—खींचनेवाला। यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधनका तात्पर्य यह मालूम देता है कि आप ऐसे मनुष्योंको अन्तिम समयमें किस ओर खींचेंगे? उनको किस गतिकी तरफ ले जायेंगे? छठे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भी अर्जुनने गति-विषयक प्रश्नमें ‘कृष्ण’ सम्बोधन दिया है—‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’। यहाँ भी अर्जुनका निष्ठा पूछनेका तात्पर्य गतिमें ही है।

मनुष्यको भगवान् खींचते हैं या वह कर्मोंके अनुसार स्वयं खींचा जाता है? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है, पर कर्मफलके विधायक होनेसे भगवान्का खींचना सम्पूर्ण फलोंमें होता है। तामसी कर्मोंका फल नरक होगा, तो भगवान् नरकोंकी तरफ खींचेंगे। वास्तवमें नरकोंके द्वारा पापोंका नाश करके प्रकाशन्तरसे भगवान् अपनी तरफ ही खींचते हैं। उनका किसीसे भी वैर या द्वेष नहीं है। तभी तो आसुरी योनियोंमें जानेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि वे मेरेको प्राप्त न होकर अधोगतिमें चले गये (सोलहवें अध्यायका बीसवों श्लोक)। कारण कि उनका अधोगतिमें जाना भगवान्को सुहाता नहीं है। इसलिये सात्त्विक मनुष्य हो, राजस मनुष्य हो या तामस मनुष्य हो, भगवान् सबको अपनी तरफ ही खींचते हैं। इसी भावसे यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन आया है।

सम्बन्ध—शास्त्रविधिको न जाननेपर भी मनुष्यमात्रमें किसी-न-किसी प्रकारकी स्वभावजा श्रद्धा तो रहती ही है। उस श्रद्धाके भेद आगेके श्लोकमें बताते हैं।

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

१-तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—तीनों गुणोंमें परस्पर दसगुना अन्तर है। जैसे एकका दसगुना दस; और दसका दसगुना सौ है, उसी तरह तमोगुण (१) से दसगुना श्रेष्ठ रजोगुण (१०) है और रजोगुणसे दसगुना श्रेष्ठ सत्त्वगुण (१००) है। तात्पर्य है कि तमोगुण और रजोगुण पास-पासमें हैं, जबकि सत्त्वगुण दोनोंसे बहुत दूर है।

२-क्रोधका कारण रजोगुण है और कार्य तमोगुण है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६३

श्रीभगवान् बोले—

देहिनाम्= मनुष्योंकी= तथाएव= ही
सा= वहराजसी= राजसीभवति= होती है,
स्वभावजा= स्वभावसे= औरताम्= उसको
उत्पन्न हुईतामसी= तामसी(तुम
श्रद्धा= श्रद्धाइति= —ऐसेमुझसे)
सात्त्विकी= सात्त्विकीत्रिविधा= तीन तरहकीशृणु= सुनो।

व्याख्या —[अर्जुनने निष्ठाको जाननेके लिये प्रश्न किया था, पर भगवान् उसका उत्तर श्रद्धाको लेकर देते हैं; क्योंकि श्रद्धाके अनुसार ही निष्ठा होती है।]

‘त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा’—श्रद्धा तीन तरहकी होती है। वह श्रद्धा कौन-सी है? संगजा है, शास्त्रजा है या स्वभावजा है? तो कहते हैं कि वह स्वभावजा है—‘सा स्वभावजा’ अर्थात् स्वभावसे पैदा हुई स्वतःसिद्ध श्रद्धा है। वह न तो संगसे पैदा हुई है और न शास्त्रोंसे पैदा हुई है। वे स्वाभाविक इस प्रवाहमें बह रहे हैं और देवता आदिका पूजन करते जा रहे हैं।

‘सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु’—वह स्वभावजा श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उन तीनोंको अलग-अलग सुनो।

पीछेके श्लोकमें ‘सत्त्वमाहो रजस्तमः’ पदोंमें ‘आहो’ अव्यय देनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनकी दृष्टिमें ‘सत्त्वम्’ से दैवी-सम्पत्ति और ‘रजस्तमः’ से आसुरी-सम्पत्ति—ये

दो ही विभाग हैं और भगवान् भी बन्धनकी दृष्टिसे राजसी-तामसी दोनोंको आसुरी-सम्पत्ति ही मानते हैं—‘निबन्धायामसुरीमता’ (१६।५)। परंतु बन्धनकी दृष्टिसे राजसी और तामसी एक होते हुए भी दोनोंके बन्धनमें भेद है। राजस मनुष्य सकामभावसे शास्त्रविहित कर्म भी करते हैं; अतः वे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाकर और वहाँके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोकमें लौट आते हैं—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (गीता ९।२१)। परन्तु तामस मनुष्य शास्त्रविहित कर्म नहीं करते; अतः वे कामना और मूढ़ताके कारण अधम गतिमें जाते हैं—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)। इस प्रकार राजस और तामस—दोनों ही मनुष्योंका बन्धन बना रहता है। दोनोंके बन्धनमें भेदकी दृष्टिसे ही भगवान् आसुरी-सम्पदावालोंकी श्रद्धाके राजसी और तामसी—दो भेद करते हैं और सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—तीनों श्रद्धाओंको अलग-अलग सुननेके लिये कहते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित स्वभावजा श्रद्धाके तीन भेद क्यों होते हैं—इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्धः स एव सः ॥ ३ ॥

भारत= हे भारत!भवति= होती है।यच्छृद्धः= जैसी श्रद्धावाला है,
सर्वस्य= सभी मनुष्योंकीअयम्= यहसः, एव= वही
श्रद्धा= श्रद्धापुरुषः= मनुष्यसः= उसका स्वरूप है
सत्त्वानुरूपा= अन्तःकरणकेश्रद्धामयः= श्रद्धामय है।अर्थात् वही उसकी
अनुरूपयः= (इसलिये) जोनिष्ठा (स्थिति) है।

व्याख्या —‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत’—पीछेके श्लोकमें जिसे ‘स्वभावजा’ कहा गया है, उसीको यहाँ ‘सत्त्वानुरूपा’ कहा है। ‘सत्त्व’ नाम अन्तःकरणका है। अन्तःकरणके अनुरूप श्रद्धा होती है अर्थात् अन्तःकरण जैसा होता है, उसमें सात्त्विक, राजस या तामस जैसे संस्कार होते हैं, वैसी ही श्रद्धा होती है।

दूसरे श्लोकमें जिनको ‘देहिनाम्’ पदसे कहा था, उन्हींको यहाँ ‘सर्वस्य’ पदसे कह रहे हैं। ‘सर्वस्य’ पदका तात्पर्य है कि जो शास्त्रविधिको न जानते हों और देवता आदिका पूजन करते हों—उनकी ही नहीं, प्रत्युत जो शास्त्रविधिको जानते हों या न जानते हों, मानते हों या न मानते हों, अनुष्ठान करते हों या न करते हों, किसी

१०६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

जातिके, किसी वर्णके, किसी आश्रमके, किसी सम्प्रदायके, किसी देशके, कोई व्यक्ति कैसे ही क्यों न हो—उन सभीकी स्वाभाविक श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है।

‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषः’ —यह मनुष्य श्रद्धा-प्रधान है। अतः जैसी उसकी श्रद्धा होगी, वैसा ही उसका रूप होगा। उससे जो प्रवृत्ति होगी, वह श्रद्धाको लेकर, श्रद्धाके अनुसार ही होगी।

‘यो यच्छृङ्गः स एव सः’ —जो मनुष्य जैसी श्रद्धा-वाला है, वैसी ही उसकी निष्ठा होगी और उसके अनुसार ही उसकी गति होगी। उसका प्रत्येक भाव और क्रिया अन्तःकरणकी श्रद्धाके अनुसार ही होगी। जबतक वह संसारसे सम्बन्ध रखेगा, तबतक अन्तःकरणके अनुरूप ही उसका स्वरूप होगा।

मार्मिक बात

मनुष्यकी सांसारिक प्रवृत्ति संसारके पदार्थोंको सच्चा मानने, देखने, सुनने और भोगनेसे होती है तथा पारमार्थिक प्रवृत्ति परमात्मामें श्रद्धा करनेसे होती है। जिसे हम अपने अनुभवसे नहीं जानते, पर पूर्वके स्वाभाविक संस्कारोंसे, शास्त्रोंसे, संत-महात्माओंसे सुनकर पूज्यभावसहित विश्वास कर लेते हैं, उसका नाम है—श्रद्धा। श्रद्धाको लेकर ही आध्यात्मिक मार्गमें प्रवेश होता है, फिर चाहे वह मार्ग कर्मयोगका हो, चाहे ज्ञानयोगका हो और चाहे भक्तियोगका हो, साध्य और साधन—दोनोंपर श्रद्धा हुए बिना आध्यात्मिक मार्गमें प्रगति नहीं होती।

मनुष्य-जीवनमें श्रद्धाकी बड़ी मुख्यता है। मनुष्य जैसी श्रद्धावाला है, वैसा ही उसका स्वरूप, उसकी निष्ठा है—‘यो यच्छृङ्गः स एव सः’ (गीता १७।३)। वह आज वैसा न दीखे तो भी क्या ? पर समय पाकर वह वैसा बन ही जायगा।

आजकल साधकके लिये अपनी स्वाभाविक श्रद्धाको पहचानना बड़ा मुश्किल हो गया है। कारण कि अनेक मत-मतान्तर हो गये हैं। कोई ज्ञानकी प्रधानता कहता है, कोई भक्तिकी प्रधानता कहता है, कोई योगकी प्रधानता कहता है, आदि-आदि। ऐसे तरह-तरहके सिद्धान्त पढ़ने और सुननेसे मनुष्यपर उनका असर पड़ता है, जिससे वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि मैं क्या करूँ ? मेरा वास्तविक ध्येय, लक्ष्य क्या है ? मेरेको किधर चलना चाहिये ? ऐसी दशामें उसे गहरी रीतिसे अपने भीतरके भावोंपर विचार करना चाहिये कि संगसे बनी हुई रुचि, शास्त्रसे बनी हुई रुचि, किसीके

सिखानेसे बनी हुई रुचि, गुरुके बतानेसे बनी हुई रुचि—ऐसी जो अनेक रुचियाँ हैं, उन सबके मूलमें स्वतः उदबुद्ध होनेवाली अपनी स्वाभाविक रुचि क्या है ?

मूलमें सबकी स्वाभाविक रुचि यह होती है कि मैं सम्पूर्ण दुःखोंसे छूट जाऊँ और मुझे सदाके लिये महान् सुख मिल जाय। ऐसी रुचि हरेक प्राणीके भीतर रहती है। मनुष्योंमें तो यह रुचि कुछ जाग्रत् रहती है। उनमें पिछले जन्मोंके जैसे संस्कार हैं और इस जन्ममें वे जैसे माता-पितासे पैदा हुए, जैसे वायुमण्डलमें रहे, जैसी उनको शिक्षा मिली, जैसे उनके सामने दृश्य आये और वे जो ईश्वरकी बातें, परलोक तथा पुनर्जन्मकी बातें, मुक्ति और बन्धनकी बातें, सत्संग और कुसंगकी बातें सुनते रहते हैं, उन सबका उनपर अदृश्यरूपसे असर पड़ता है। उस असरसे उनकी एक धारणा बनती है। उनकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी—जैसी प्रकृति होती है, उसीके अनुसार वे उस धारणाको पकड़ते हैं और उस धारणाके अनुसार ही उनकी रुचि—श्रद्धा बनती है। इसमें सात्त्विकी श्रद्धा परमात्माकी तरफ लगानेवाली होती है और राजसी-तामसी श्रद्धा संसारकी तरफ।

गीतामें जहाँ-कहीं सात्त्विकताका वर्णन हुआ है, वह परमात्माकी तरफ ही लगानेवाली है। अतः सात्त्विकी श्रद्धा पारमार्थिक हुई और राजसी-तामसी श्रद्धा सांसारिक हुई अर्थात् सात्त्विकी श्रद्धा दैवी-सम्पत्ति हुई और राजसी-तामसी श्रद्धा आसुरी-सम्पत्ति हुई। दैवी-सम्पत्तिको प्रकट करने और आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करनेके उद्देश्यसे सत्रहवाँ अध्याय चला है। कारण कि कल्याण चाहनेवाले मनुष्यके लिये सात्त्विकी श्रद्धा (दैवी-सम्पत्ति) ग्राह्य है और राजसी-तामसी श्रद्धा (आसुरी-सम्पत्ति) त्याज्य है।

जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसकी श्रद्धा सात्त्विकी होती है, जो मनुष्य इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी सुख-सम्पत्ति-(स्वर्गादि- ) को चाहता है, उसकी श्रद्धा राजसी होती है और जो मनुष्य पशुओंकी तरह (मृदुता-पूर्वक) केवल खाने-पीने, भोग भोगने तथा प्रमाद, आलस्य, निद्रा, खेल-कूद, तमाशे आदिमें लगा रहता है, उसकी श्रद्धा तामसी होती है। सात्त्विकी श्रद्धाके लिये सबसे पहली बात है कि ‘परमात्मा है।’ शास्त्रोंसे, संत-महात्माओंसे, गुरुजनोंसे सुनकर पूज्यभावके सहित ऐसा विश्वास हो जाय कि ‘परमात्मा है और उसको प्राप्त करना है’—इसका नाम श्रद्धा है। ठीक श्रद्धा जहाँ होती है, वहाँ

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६५

प्रेम स्वतः हो जाता है। कारण कि जिस परमात्मामें श्रद्धा होती है, उसी परमात्माका अंश यह जीवात्मा है। अतः श्रद्धा होते ही यह परमात्माकी तरफ खिंचता है। अभी यह परमात्मासे विमुख होकर जो संसारमें लगा हुआ है, वह भी संसारमें श्रद्धा-विश्वास होनेसे ही है। पर यह वास्तविक श्रद्धा नहीं है, प्रत्युत श्रद्धाका दुरुपयोग है। जैसे, संसारमें यह रुपयोंपर विशेष श्रद्धा करता है कि इनसे सब कुछ मिल जाता है। यह श्रद्धा कैसे हुई? कारण कि बचपनमें खाने और खेलनेके पदार्थ पैसोंसे मिलते थे। ऐसा देखते-देखते पैसोंको ही मुख्य मान लिया और उसीमें श्रद्धा कर ली, जिससे यह बहुत ही पतनकी तरफ चला गया। यह सांसारिक श्रद्धा हुई। इससे ऊँची धार्मिक श्रद्धा होती है कि मैं अमुक वर्ण, आश्रम आदिका हूँ। परन्तु सबसे ऊँची श्रद्धा पारमार्थिक (परमात्माको लेकर) है। यही वास्तविक श्रद्धा है और इसीसे कल्याण होता है। शास्त्रोंमें, सन्त-महात्माओंमें, तत्त्वज्ञ-जीवनमुक्तोंमें जो श्रद्धा होती है, वह भी पारमार्थिक श्रद्धा ही है।*

जिनको शास्त्रोंका ज्ञान नहीं है और सन्त-महात्माओंका संग भी नहीं है, ऐसे मनुष्योंकी भी पूर्व-संस्कारके कारण पारमार्थिक श्रद्धा हो सकती है। इसकी पहचान क्या है? पहचान यह है कि ऐसे मनुष्योंके भीतर स्वाभाविक यह भाव होता है कि ऐसी कोई महान् चीज (परमात्मा) है, जो दीखती तो नहीं, पर है अवश्य। ऐसे मनुष्योंको स्वाभाविक ही पारमार्थिक बातें बहुत प्रिय लगती हैं और वे स्वाभाविक ही यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, सत्संग, स्वाध्याय आदि शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। यदि वे ऐसे कर्म न भी करें, तो भी सात्त्विक आहारमें स्वाभाविक रुचि होनेसे उनकी श्रद्धाकी पहचान हो जाती है।

मनुष्य, पशु-पक्षी, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे किसी-न-किसीको (किसी-न-किसी अंशमें) अपनेसे बड़ा अवश्य मानते हैं और बड़ा मानकर उसका सहारा लेते हैं। मनुष्यपर जब आफत आती है, तब वह किसीको अपनेसे बड़ा मानकर उसका सहारा लेता है। पशु-पक्षी भी अपनी रक्षा चाहते हैं और भयभीत होनेपर किसीका सहारा लेते हैं। लता भी किसीका सहारा लेकर ही ऊँची चढ़ती है। इस प्रकार जिसने किसीको बड़ा मानकर उसका सहारा लिया, उसने वास्तवमें 'ईश्वरवाद'

के सिद्धान्तको स्वीकार कर ही लिया, चाहे वह ईश्वरको माने या न माने। इसलिये आयु, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य, पद, अधिकार, ऐश्वर्य आदिमेंसे एक-एकसे बड़ा देखे, तो बड़पन देखते-देखते अन्तमें बड़पनकी जहाँ समाप्ति हो, वही ईश्वर है; क्योंकि बड़े-से-बड़ा ईश्वर है। उससे बड़ा कोई है ही नहीं—

पूर्वैषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।

(योगदर्शन १।२६)

'वह परमात्मा सबके पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है अर्थात् वह कालकी सीमासे बाहर है।'

इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपनी दृष्टिसे किसी-न-किसीको बड़ा मानता है। बड़पनकी यह मान्यता अपने-अपने अन्तःकरणके भावोंके अनुसार अलग-अलग होती है। इस कारण उनकी श्रद्धा भी अलग-अलग होती है।

श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप ही होती है। धारणा, मान्यता, भावना आदि सभी अन्तःकरणमें रहते हैं। इसलिये अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस या तामस जिस गुणकी प्रधानता रहती है, उसी गुणके अनुसार धारणा, मान्यता आदि बनती है और उस धारणा, मान्यता आदिके अनुसार ही तीन प्रकारकी (सात्त्विकी, राजसी या तामसी) श्रद्धा बनती है।

सात्त्विक, राजस और तामस—तीनों गुण सभी प्राणियोंमें रहते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। उन प्राणियोंमें किसीमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है, किसीमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और किसीमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। अतः यह नियम नहीं है कि सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें रजोगुण और तमोगुण न आयें, रजोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और तमोगुण न आयें, तथा तमोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और रजोगुण न आयें (गीता—चौदहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)। कारण कि प्रकृति परिवर्तनशील है— 'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।' इसलिये प्रकृतिजन्म गुणोंमें भी परिवर्तन होता रहता है। अतः एकमात्र परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाले साधकको चाहिये कि वह उन आने-जानेवाले गुणोंसे अपना सम्बन्ध मानकर उनसे विचलित न हो।

जीवमात्र परमात्माका अंश है। इसलिये किसी मनुष्योंमें

  • सांसारिक श्रद्धामें 'भोग' को, धार्मिक श्रद्धामें 'भाव' की और पारमार्थिक श्रद्धामें 'तत्त्व' की प्रधानता है।

१०६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

रजोगुण-तमोगुणकी प्रधानता देखकर उसे नीचा नहीं मान लेना चाहिये; क्योंकि कौन-सा मनुष्य किस समय समुन्नत हो जाय—इसका कुछ पता नहीं है। कारण कि परमात्माका अंश—स्वरूप (आत्मा) तो सबका शुद्ध ही है, केवल संग, शास्त्र, विचार, वायुमण्डल आदिको लेकर अन्तःकरणमें किसी एक गुणकी प्रधानता हो जाती है अर्थात् जैसा संग, शास्त्र आदि मिलता है, वैसा ही मनुष्यका अन्तःकरण बन जाता है और उस अन्तःकरणके अनुसार ही उसकी

परिशिष्ट भाव —श्रद्धा भाव है। जैसा जिसका भाव होता है—सद्भाव और असद्भाव। जो परमात्माकी तरफ ले जाता है, वह सद्भाव होता है और जो संसारकी तरफ ले जाता है, वह असद्भाव होता है। दैवी-सम्पत्तिमें सद्भावकी मुख्यता होती है और आसुरी-सम्पत्तिमें असद्भावकी मुख्यता होती है।

‘में साधक हूँ’—इसमें अगर असद्भावकी मुख्यता हो तो अभिमान होता है और सद्भावकी मुख्यता हो तो स्वाभिमान होता है। अभिमानसे आसुरी-सम्पत्ति आती है और स्वाभिमानसे दैवी-सम्पत्ति आती है। दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता देखनेसे अभिमान होता है और अपने कर्तव्यको देखनेसे स्वाभिमान होता है कि मैं साधन-विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ! अभिमान होनेपर तो मनुष्य साधन-विरुद्ध काम कर बैठेगा, पर स्वाभिमान होनेपर उसको साधन-विरुद्ध काम करनेमें लज्जा होगी। स्वाभिमान होनेसे वह सात्त्विकीमें चला जायगा और अभिमान होनेसे वह राजसी-तामसीमें चला जायगा।

सम्बन्ध—अपने इष्टके यजन-पूजनद्वारा मनुष्योंकी निष्ठाकी पहचान किस प्रकार होती है, अब उसको बताते हैं।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।

प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥

सात्त्विकाः= सात्त्विक मनुष्ययक्षरक्षांसि= यक्षों तथा राक्षसोंकाजनाः= मनुष्य हैं, (वे)
देवान्= देवताओंका= औरप्रेतान्= प्रेतों (और)
यजन्ते= पूजन करते हैं,अन्ये= दूसरे (जो)भूतगणान्= भूतगणोंका
राजसाः= राजस मनुष्यतामसाः= तामसयजन्ते= पूजन करते हैं।

व्याख्या —‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’—सात्त्विक अर्थात् दैवी-सम्पत्तिवाले मनुष्य देवोंका पूजन करते हैं। यहाँ ‘देवान्’ शब्दसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—ये पाँच ईश्वरकोटिके देवता लेने चाहिये; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द ईश्वरका वाचक है और उसकी सम्पत्ति अर्थात् दैवी-सम्पत्ति मुक्ति देनेवाली है—‘दैवी सम्पद्भिर्मोक्षाय’ (१६।५)। वह दैवी-सम्पत्ति जिनमें प्रकट होती है, उन (दैवी-सम्पत्तिवाले) साधकोंकी स्वाभाविक श्रद्धाकी पहचान बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’ पद आये हैं।

ईश्वरकोटिके देवताओंमें भी साधकोंकी श्रद्धा अलग-अलग होती है। किसीकी श्रद्धा भगवान् विष्णु—(राम, कृष्ण, आदि—) में होती है, किसीकी भगवान् शंकरमें होती है, किसीकी भगवान् गणेशमें होती है, किसीकी भगवती शक्तिमें होती है और किसीकी भगवान् सूर्यमें होती है। ईश्वरके जिस रूपमें उनकी स्वाभाविक श्रद्धा होती है, उसीका वे विशेषतासे यजन-पूजन करते हैं।

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—इन तैंतीस प्रकारके शास्त्रोक्त देवताओंका निष्कामभावसे पूजन करना भी ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६७

के अन्तर्गत मानना चाहिये।

‘यक्षरक्षसि राजसाः’ —राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका पूजन करते हैं। यक्ष-राक्षस भी देवयोनियोंमें हैं। यक्षोंमें धनके संग्रहकी मुख्यता होती है और राक्षसोंमें दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। अपनी कामना-पूर्तिके लिये और दूसरोंका विनाश करनेके लिये राजस मनुष्योंमें यक्षों और राक्षसोंका पूजन करनेकी प्रवृत्ति होती है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः’ —तामस मनुष्य प्रेतों तथा भूतोंका पूजन करते हैं। जो मर गये हैं, उन्हें प्रेत कहते हैं और जो भूतयोनियोंमें चले गये हैं, उन्हें ‘भूत’ कहते हैं।

यहाँ ‘प्रेत’ शब्दके अन्तर्गत जो अपने पितर हैं, उनको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि जो अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे अपने-अपने पितरोंका पूजन करते हैं, वे तामस नहीं कहलायेंगे, प्रत्युत सात्त्विक ही कहलायेंगे। अपने-अपने पितरोंके पूजनका भगवान्ने निषेध नहीं किया है—‘पितृन्यान्ति पितृव्रताः’ (गीता १। २५)। तात्पर्य है कि जो पितरोंका सकामभावसे पूजन करते हैं कि पितर हमारी रक्षा करेंगे अथवा हम जैसे पिता-पितामह आदिके लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करते हैं, ऐसे ही हमारी कुलपरम्परावाले भी हमारे लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करेंगे—ऐसे भावसे पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु अपने माता-पिता, दादा-दादी आदि पितरोंका पूजन करनेसे पितरोंको प्राप्त हो जायेंगे—यह बात नहीं है। जो पितृकृष्णसे उन्नृष्ण होना अपना कर्तव्य समझते हैं और इसीलिये (अपना कर्तव्य समझकर) निष्कामभावसे पितरोंका पूजन करते हैं, वे पुरुष सात्त्विक हैं, राजस नहीं। पितृलोकको वे ही जाते हैं, जो ‘पितृव्रताः’ हैं अर्थात् जो पितरोंको सर्वोपरि और अपना इष्ट मानते हैं तथा पितरोंपर ही निष्ठा रखते हैं। ऐसे लोग पितृलोकको तो जा सकते हैं, पर उससे आगे

परिशिष्ट भाव —देवताओंका पूजन करनेवाले सात्त्विक मनुष्यशरीर छूटनेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं, यक्ष-राक्षसोंका पूजन करनेवाले राजस मनुष्य यक्ष-राक्षसोंको प्राप्त होते हैं और भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले तामस मनुष्य भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं (गीता—नवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।

गीतामें ‘यज्ञ’ शब्द बहुत व्यापक है, जिसके अन्तर्गत यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि सम्पूर्ण कर्तव्य कर्म आ जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक)। अतः यहाँ भी ‘यजन्ते’ पदके अन्तर्गत सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मोंको लेना चाहिये, जिनमें यज्ञ मुख्य है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये’ —हमारे जो पितर हैं, वे दूसरोंके लिये भूत हैं और दूसरेके जो पितर हैं, वे हमारे लिये भूत हैं। पितरोंका पूजन करना तामस नहीं है, पर भूतोंका पूजन करना तामस है।

नहीं जा सकते।

कुत्ते, कौए आदिको भी जो निष्कामभावसे रोटी देते हैं (शास्त्रमें ऐसा विधान है), उससे उनकी योनि प्राप्त नहीं होती; क्योंकि वह उनका इष्ट नहीं है। वे तो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलते हैं। इसी प्रकार पितरोंका श्राद्ध-तर्पण आदि भी शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्काम-भावपूर्वक करनेसे पितृयोनि प्राप्त नहीं हो जाती। शास्त्र या भगवान्की आज्ञा मानकर करनेसे उनका उद्धार होगा। इसलिये निष्कामभावसे किये गये शास्त्रविहित नारायणबलि, गयाश्राद्ध आदि प्रेतकर्मोंको तामस नहीं मानना चाहिये; क्योंकि ये तो मृत प्राणीकी सद्गतिके लिये किये जानेवाले आवश्यक कर्म हैं, जिन्हें मरे हुए प्राणीके लिये शास्त्रके आज्ञानुसार हरेकको करना चाहिये।

हम शास्त्रविहित यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, तो उनमें पहले गणेशजी, नवग्रह, षोडश-मातृका आदिका पूजन शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावसे करते हैं। यह वास्तवमें नवग्रह आदिका पूजन न होकर शास्त्रका ही पूजन, आदर हुआ। जैसे, स्त्री पतिकी सेवा करती है, तो उसका कल्याण हो जाता है। विवाह तो हरेक पुरुषका हो सकता है, राक्षसका भी और असुरका भी। वे भी पति बन सकते हैं। परन्तु वास्तवमें कल्याण पतिकी सेवासे नहीं होता, प्रत्युत पतिकी सेवा करना—पातिव्रतधर्मका पालन करना ऋषि, शास्त्र, भगवान्की आज्ञा है, इसलिये इनकी आज्ञाके पालनसे ही कल्याण होता है।

देवता आदिके पूजनसे पूजक-(पूजा करनेवाले-) की गति वैसी ही होगी—यह बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते’ पद नहीं आया है। अर्जुनने शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करनेवालोंकी निष्ठा पूछी थी; अतः अपने-अपने इष्ट-(पूज्य-) के अनुसार पूजकोंकी निष्ठा—श्रद्धा होती है, इसकी पहचान बतानेके लिये ही ‘यजन्ते’ पद आया है।

१०६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

सम्बन्ध—अबतक उन मनुष्योंकी बात बतायी, जो शास्त्रविधिको न जाननेके कारण उसका (अज्ञतापूर्वक) त्याग करते हैं; परन्तु अपने इष्ट तथा उसके यजन-पूजनमें श्रद्धा रखते हैं। अब, विरोधपूर्वक शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंकी क्रियाओंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विदध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥

ये= जोकामराग-माम्= मुझ परमात्माको
जनाः= मनुष्यबलान्विताः= (जो) भोग-एव= भी
अशास्त्र-पदार्थ, आसक्ति औरकर्शयन्तः= कृश करनेवाले हैं,
विहितम्= शास्त्रविधिसेहठसे युक्त हैं;तान्= उन
रहितशरीरस्थम्= (जो) शरीरमेंअचेतसः= अज्ञानियोंको
घोरम्= घोरस्थित(तू)
तपः= तपभूतग्रामम्= पाँच भूतोंकोआसुर-
तप्यन्ते= करते हैं;अर्थात् पाञ्चभौतिकनिश्चयान्= आसुर
दम्भाहङ्कार-शरीरकोनिष्ठावाले
संयुक्ताः= (जो) दम्भ= तथा(आसुरी
और अहंकारसे अच्छीअन्तः-सम्पत्तिवाले)
तरह युक्त हैं;शरीरस्थम्= अन्तःकरणमें स्थितविद्धि= समझ।

व्याख्या—‘अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः’— शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है, प्रत्युत निषेध है, ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।

‘दम्भाहंकारसंयुक्ताः’— उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन, ध्यान, स्वाध्याय आदि करते हैं, वे सब दम्भ करते हैं, दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका, चतुराईका, जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं; हमलोगोंको समझा सकते हैं, उनको रास्तेपर ला सकते हैं; हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें? हम कोई कम जानते हैं क्या? हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले; आदि—आदि।

‘कामरागबलान्विताः’—‘काम’ शब्द भोग-पदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना, तल्लीन हो जाना, एकरस हो जाना ‘राग’ है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ, दुराग्रह है, वह ‘बल’ है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंने यह भाव रहता है कि मनुष्य-शरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्य-शरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोग-सामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया, तो फिर उसने क्या किया? मनुष्य-शरीर पाकर मनचाही भोग-सामग्री नहीं मिली, तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है, आदि—आदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धन-सम्पत्ति आदि भोग-सामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक, ज़िदसे तप किया करते हैं।

‘कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम्’— वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों—(पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—) को कृश करते हैं, शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता—ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।

श्लोक ७ ] * साधक-संजीवनी * १०६९

आगे चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है, वहाँ शरीरको कष्ट देनेकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है, वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अवधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।

‘मां चैवान्तःशरीरस्थम्’ —भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं, दुःख देते हैं। कैसे? वे मेरी आज्ञा, मेरे मतके अनुसार नहीं चलते, प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।

अर्जुनने पूछा था कि वे कौन-सी निष्ठावाले हैं—सात्त्विक हैं कि राजस-तामस? दैवी-सम्पत्तिवाले हैं कि आसुरी-सम्पत्तिवाले? तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो—‘तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। ’ यहाँ ‘आसुरनिश्चयान् ’ पद सामान्य आसुरी-सम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है, प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्त नीच—विशेष नास्तिक हैं, उनका वाचक है।

विशेष बात

चौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जानेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘यजन्ते ’ पद आया है; परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘तप्यन्ते ’ पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्य-बुद्धि होती है—तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगर्दत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके तपका लक्षण है—शरीरको सुखाना, कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व

देते हैं, उसे बहुत अच्छा मानते हैं; परन्तु भगवान्को, शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं, जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना, काँटोंपर सोना, उलटे लटकना, एक पैसे खड़े होना, शास्त्रज्ञानसे विरुद्ध अग्नि तपना, अपने शरीर, मन, इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि—ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपेक्षा करके दान-सेवा, उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है, जो इतनी बुरी नहीं है; क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्र-विधियुक्त तो नहीं हैं, पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं, उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ? तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी; क्योंकि इनमें दम्भ, अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं, सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं।

सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका ‘उपेक्षा-पूर्वक’ त्याग है, इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका ‘अज्ञातपूर्वक’ त्याग है और यहाँ शास्त्रका ‘विरोधपूर्वक’ त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा, शास्त्रविधि, प्राणिसमुदाय और भगवान्—इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसी-तामसी वर्णनमें नहीं है।

सम्बन्ध—अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे, तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी—इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रूचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥

आहारः= आहारतथा= वैसे हीलेकर तीन प्रकारकी
अपि= भीयज्ञः= यज्ञ,रूचि होती है,)
सर्वस्य= सबकोतपः= तप (और)तेषाम्
त्रिविधः= तीन प्रकारकादानम्= दान (भी तीन प्रकारके होते हैंउनके
प्रियः= प्रियअर्थात् शास्त्रीयइमम्
भवति= होता हैकर्मोंमें भी गुणोंकोभेदम्
तु= औरशृणु

१०७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः’ —चौथे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके अनुसार मनुष्योंकी निष्ठाकी परीक्षाके लिये सात्त्विक, राजस और तामस—तीन तरहके यजन बताये। परन्तु जिसकी श्रद्धा, रुचि, प्रियता यजन-पूजनमें नहीं है, उनकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? इसके लिये बताया कि जिनकी यजन-पूजनमें श्रद्धा नहीं है, ऐसे मनुष्योंको भी शरीर-निर्वाहके लिये भोजन तो करना ही पड़ता है, चाहे वे नास्तिक हों, चाहे आस्तिक हों, चाहे वैदिक अथवा ईसाई, पारसी, यहूदी, यवन आदि किसी सम्प्रदायके हों। उन सबके लिये यहाँ ‘आहारस्त्वपि ’ पद देकर कहा है कि निष्ठाकी पहचानके लिये केवल यजन-पूजन ही नहीं है, प्रत्युत भोजनकी रुचिसे ही उनकी निष्ठाकी पहचान हो जायगी। मनुष्यका मन स्वाभाविक ही जिस भोजनमें ललचाता है अर्थात् जिस भोजनकी बात सुनकर, उसे देखकर और उसे चखकर मन आकृष्ट होता है, उसके अनुसार उसकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी निष्ठा मानी जाती है।

यहाँ कोई ऐसा भी कह सकता है कि सात्त्विक, राजस और तामस आहार कैसा-कैसा होता है—इसे बतानेके लिये यह प्रकरण आया है। स्थूलदृष्टिसे देखनेपर तो ऐसा ही दीखता है; परन्तु विचारपूर्वक गहराईसे देखनेपर यह बात दीखती नहीं। वास्तवमें यहाँ आहारका वर्णन नहीं है, प्रत्युत आहारीकी रुचिका वर्णन है। अतः आहारीकी श्रद्धाकी पहचान कैसे हो? यह बतानेके लिये ही यह प्रकरण आया है।

यहाँ ‘सर्वस्य ’ और ‘प्रियः ’ पद यह बतानेके लिये आये हैं कि सामान्यरूपसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक-एककी किस-किस भोजनमें रुचि होती है, जिससे उनकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी निष्ठाकी पहचान हो। ऐसे ही ‘यज्ञस्तपस्तथा दानम् ’ पद यह बतानेके लिये आये

परिशिष्ट भाव —मनुष्यके द्वारा स्वभावसे होनेवाली क्रियाएँ दो प्रकारकी होती हैं—व्यावहारिक और शास्त्रीय। अतः यहाँ ‘आहार’ के अन्तर्गत व्यावहारिक (खान-पान, रहन-सहन आदि) और ‘यज्ञ-तप-दान’ के अन्तर्गत शास्त्रीय क्रियाओंको समझना चाहिये।

१-यद्यपि यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द होमरूप यज्ञका ही वाचक है, सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका नहीं (क्योंकि यज्ञके साथ तप और दान अलगसे आये हैं), तथापि गौणतासे तीर्थ, व्रत आदि कर्तव्य-कर्म भी लिये जा सकते हैं।

२-मृगा मृगैः संगमनुब्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः। मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेषु सख्यम्॥ (पंचतन्त्र, मित्रभेद ३०५)

‘जिस प्रकार पशुओंमें हरिण हरिणोंके साथ, गायें गायोंके साथ, घोड़े घोड़ोंके साथ ही चलते-फिरते हैं, उसी प्रकार मनुष्योंमें भी मूर्ख मूर्खोंके साथ और विद्वान् विद्वानोंके साथ मित्रता आदिका व्यवहार करते हैं; क्योंकि मित्रता समान स्वभाव, आचरण आदिमें ही होती है।’

हैं कि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं, उनमें भी उन मनुष्योंकी यज्ञ, तप आदि किस-किस कर्ममें कैसी-कैसी रुचि—प्रियता होती है। यहाँ ‘तथा ’ कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे पूजन तीन तरहका होता है और जैसे आहार तीन तरहका प्रिय होता है, इसी तरह शास्त्रीय यज्ञ, तप आदि कर्म भी तीन तरहके होते हैं। इससे यहाँ एक और बात भी सिद्ध होती है कि शास्त्र, सत्संग, विवेचन, वार्तालाप, कहानी, पुस्तक, व्रत, तीर्थ, व्यक्ति आदि जो-जो भी सामने आयेंगे, उनमें जो सात्त्विक होगा वह सात्त्विक मनुष्यको, जो राजस होगा, वह राजस मनुष्यको और जो तामस होगा, वह तामस मनुष्यको प्रिय लगेगा।

‘तेषां भेदमिमं शृणु’ —यज्ञ, तप और दानके भेद सुनो अर्थात् मनुष्यकी स्वाभाविक रुचि, प्रवृत्ति और प्रसन्नता किस-किसमें होती है, उसको तुम सुनो। जैसे अपनी रुचिके अनुसार कोई ब्राह्मणको दान देना पसंद करता है, तो कोई अन्य साधारण मनुष्यको दान देना ही पसंद करता है। कोई शुद्ध आचरणवाले व्यक्तियोंके साथ मित्रता करते हैं, तो कोई जिनका खान-पान, आचरण आदि शुद्ध नहीं हैं, ऐसे मनुष्योंके साथ ही मित्रता करते हैं, आदि-आदि।

तात्पर्य यह कि सात्त्विक मनुष्योंकी रुचि सात्त्विक खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग करना उनको अच्छा लगता है। राजस मनुष्योंकी रुचि राजस खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है। तामस मनुष्योंकी रुचि तामस खान-पान, रहन-सहन आदिमें तथा शास्त्रनिषिद्ध आचरण करनेवाले नीच मनुष्योंके साथ उठने-बैठने, खाने-पीने, बातचीत करने, साथ रहने, मित्रता करने आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है तथा वैसे ही आचरणोंमें उनकी प्रवृत्ति होती है।

श्लोक ८-९]

  • साधक-संजीवनी *

१०७९

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रोतिविवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥

आयुः सत्त्व- बलारोग्य- सुखप्रोति- विवर्धनाः | = आयु, सत्त्व- गुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता | स्थिराः = स्थिर रहनेवाले, हृद्याः = हृदयको शक्ति देनेवाले, रस्याः = रसयुक्त (तथा) स्निग्धाः = चिकने— | आहाराः = (ऐसे) आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विकप्रियाः = सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'आयुः'—जिन आहारोंके करनेसे मनुष्यकी आयु बढ़ती है; 'सत्त्वम्'—सत्त्वगुण बढ़ता है; 'बलम्'—शरीर, मन, बुद्धि आदिमें सात्त्विक बल एवं उत्साह पैदा होता है; 'आरोग्यः'—शरीरमें नीरोगता बढ़ती है; 'सुखम्'—सुख-शान्ति प्राप्त होती है; और 'प्रोतिविवर्धनाः'—जिनको देखनेसे ही प्रीति पैदा होती है*, वे अच्छे लगते हैं।

इस प्रकारके 'स्थिराः'—जो गरिष्ठ नहीं, प्रत्युत सुपाच्य हैं और जिनका सार बहुत दिनतक शरीरमें शक्ति देता रहता है; और 'हृद्याः'—हृदय, फेफड़े आदिको शक्ति

देनेवाले तथा बुद्धि आदिमें सौम्य भाव लानेवाले; 'रस्याः'—फल, दूध, खाँड़ आदि रसयुक्त पदार्थ; 'स्निग्धाः'—घी, मक्खन, बादाम, काजू, किशमिश, सात्त्विक पदार्थोंसे निकले हुए तेल आदि स्नेहयुक्त भोजनके पदार्थ, जो अच्छे पके हुए तथा ताजे हैं।

'आहाराः सात्त्विकप्रियाः'—ऐसे भोजनके (भोज्य, पेय, लेह्य और चोष्य) पदार्थ सात्त्विक मनुष्यको प्यारे लगते हैं। अतः ऐसे आहारमें रुचि होनेसे उसकी पहचान हो जाती है कि यह मनुष्य सात्त्विक है।

कट्वम् ललवणात्युष्मातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥

कट्वम् ल- लवणात्युष्मा- तीक्ष्णरूक्ष- विदाहिनः | = अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति | आहाराः = आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजसस्य = राजस मनुष्यको | दुःखः = प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःखशोकामय- प्रदाः = दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'कटु'—करेला, ग्वारपाटा आदि अधिक कड़वे पदार्थ; 'अम्ल'—इमली, अमचूर, नींबू, छाछ, सड़न पैदा करके बनाया गया सिरका आदि अधिक खट्टे पदार्थ; 'लवणम्'—अधिक नमकवाले पदार्थ; 'अत्युष्णम्'—जिनसे भाप निकल रही हो, ऐसे अत्यन्त गरम-गरम पदार्थ; 'तीक्ष्णम्'—जिनको खानेसे नाक, आँख, मुख और सिरसे पानी आने लगे, ऐसे लाल मिर्च आदि अधिक

तीखे पदार्थ; 'रूक्षम्'—जिनमें घी, दूध आदिका सम्बन्ध नहीं है, ऐसे भुने हुए चने, सतुआ आदि अधिक रूखे पदार्थ और 'विदाहिनः'—राई आदि अधिक दाहकारक पदार्थ (राईको दो-तीन घंटे छाछमें भिगोकर रखा जाय, तो उसमें एक खमीर पैदा होता है, जो बहुत दाहकारक होता है)।

'आहारा राजसस्येष्टाः'—इस प्रकारके भोजनके

  • ऐसे तो अनुकूल आहार मिलनेपर राजस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें विष हो जायगी (अठारहवें अध्यायका अङ्गीतसर्वो श्लोक)। ऐसे ही तामस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें उसको मूढ़तामें अर्थात् अतिनिद्रा, आलस्य और प्रमाद (खेल-तमाशे, व्यर्थ बकवाद, दुर्व्यसन आदि) में लगा देगी (अठारहवें अध्यायका उन्नालीसर्वो श्लोक)।

१०७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

(भोज्य, पेय, लेह्य और चोष्य) पदार्थ राजस मनुष्यको प्यारे होते हैं। इससे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जाती है। ‘दुःखशोकायप्रदाः’ —परन्तु ऐसे पदार्थ परिणाममें दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले होते हैं। खट्टा, तीखा और

दाहकारक भोजन करते समय मुख आदिमें जो जलन होती है, यह दुःख है। भोजन करनेके बाद मनमें प्रसन्नता नहीं होती, प्रत्युत स्वाभाविक चिन्ता रहती है, यह शोक है। ऐसे भोजनसे शरीरमें प्रायः रोग होते हैं।

यातयामं गतरसं पूतिं पर्युषितं च यत्।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥

यत्= जोपर्युषितम्= बासी(मांस
भोजनम्= भोजन= औरआदि)
यातयामम्= सड़ाउच्छिष्टम्= जूटा हैअपि= भी है, (वह)
हुआ,= तथातामसप्रियम्= तामस मनुष्यको
गतरसम्= रसरहित,(जो)प्रिय
पूति= दुर्गन्धित,अमेध्यम्= महान् अपवित्रहोता है।

व्याख्या—‘यातयामम्’ —पकनेके लिये जिनको पूरा समय प्राप्त नहीं हुआ है, ऐसे अधपके या उचित समयसे ज्यादा पके हुए अथवा जिनका समय बीत गया है, ऐसे बिना ऋतुके पैदा किये हुए एवं ऋतु चली जानेपर फ्रिज आदिकी सहायतासे रखे हुए साग, फल आदि भोजनके पदार्थ।

‘गतरसम्’ —धूप आदिसे जिनका स्वाभाविक रस सूख गया है अथवा मशीन आदिसे जिनका सार खींच लिया गया है, ऐसे दूध, फल आदि।

‘पूति’ —सड़नेसे पैदा की गयी मंदिरा और स्वाभाविक दुर्गन्धवाले प्याज, लहसुन आदि।

‘पर्युषितम्’ —जल और नमक मिलाकर बनाये हुए साग, रोटी आदि पदार्थ रात बीतनेपर बासी कहलाते हैं। परन्तु केवल शुद्ध दूध, घी, चीनी आदिसे बने हुए अथवा

अग्निपर पकाये हुए पेड़ा, जलेबी, लड्डू आदि जो पदार्थ हैं, उनमें जबतक विकृति नहीं आती, तबतक वे बासी नहीं माने जाते। ज्यादा समय रहनेपर उनमें विकृति (दुर्गन्ध आदि) पैदा होनेसे वे भी बासी कहे जायेंगे।

‘उच्छिष्टम्’ —भुक्तावशेष अर्थात् भोजनके बाद पात्रमें बचा हुआ अथवा जूटा हाथ लगा हुआ और जिसको गाय, बिल्ली, कुत्ता, कौआ आदि पशु-पक्षी देख ले, सँघ ले या खा ले—वह सब जूटन माना जाता है।

‘अमेध्यम्’ —रज-वीर्यसे पैदा हुए मांस, मछली, अंडा आदि महान् अपवित्र पदार्थ, जो मुर्दा हैं और जिनको झूनेमात्रसे स्नान करना पड़ता है।

‘अपि च’ —इन अवयवोंके प्रयोगसे उन सब पदार्थोंको ले लेना चाहिये, जो शास्त्रनिषिद्ध हैं। जिस वर्ण, आश्रमके

१-मदिरापान करनेवालेको शास्त्रोंमें महापापी कहा गया है— स्तेनो हिण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्म चैते पतन्ति चत्वारः पंचमशचाचंस्तैरिति। (छान्दोग्योपनिषद् ५।१०।१) अर्थात् स्वर्णकी चोरी करनेवाला, मदिरा (शराब) पीनेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला—ये चारों महापापी हैं और इनका संग करनेवाला पाँचवाँ महापापी है।

इससे सिद्ध होता है कि मदिरापान सर्वथा निन्दनीय, मांसाहारसे भी अधिक निन्दनीय और पतन करनेवाला है। गंगाजी सबको शुद्ध करनेवाली हैं। परन्तु यदि गंगाजीमें मदिराका पात्र डाल दिया जाय तो वह शुद्ध नहीं होता। जब मदिराका पात्र भी (जिसमें मदिरा डाली जाती है) इतना अशुद्ध हो जाता है, तब मदिरा पीनेवाला कितना अशुद्ध हो जाता होगा—इसका कोई ठिकाना नहीं है।

मदिराके निर्माणमें असंख्य जीवोंकी हत्या होती है। मदिरापानसे होनेवाली सबसे भयंकर हानि यह है कि इससे अन्तःकरणमें रहनेवाले धर्मके अंकुर नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य है कि मनुष्यके भीतर जो धार्मिक भावनाएँ रहती हैं, धर्मकी रुचि, संस्कार रहते हैं, उनको मदिरापान नष्ट कर देता है। इससे मनुष्य महान् पतनकी तरफ चला जाता है।

२-यहाँ तामस भोजनमें ‘अमेध्य’ शब्दका प्रयोग करके भगवान् मानो इन चीजोंका नाम भी लेना नहीं चाहते।

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७३

लिये जिन-जिन पदार्थोंका निषेध है, उस वर्ण-आश्रमके लिये उन-उन पदार्थोंको निषिद्ध माना गया है; जैसे मसूर, गाजर, शलगम आदि।

‘भोजनं तामसप्रियम्’ —ऐसा भोजन तामस मनुष्यको प्रिय लगता है। इससे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जाती है।

उपर्युक्त भोजनोंमेंसे सात्त्विक भोजन भी अगर रागपूर्वक खाया जाय, तो वह राजस हो जाता है और लोलुपतावश अधिक खाया जाय, (जिससे अजीर्ण आदि हो जाय) तो वह तामस हो जाता है। ऐसे ही भिक्षुकको विधिसे प्राप्त भिक्षा आदिमें रूखा, सूखा, तीखा और बासी भोजन प्राप्त हो जाय, जो कि राजस-तामस है, पर वह उसको भगवान्के भोग लगाकर भगवन्नाम लेते हुए स्वल्पमात्रामें* खाये, तो वह भोजन भी भाव और त्यागकी दृष्टिसे सात्त्विक हो जाता है।

प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात

चार श्लोकोंके इस प्रकरणमें तीन तरहके—सात्त्विक, राजस और तामस आहारका वर्णन दीखता है; परन्तु वास्तवमें यहाँ आहारका प्रसंग नहीं है, प्रत्युत ‘आहारी’ की रुचिका प्रसंग है। इसलिये यहाँ ‘आहारी’ की रुचिका ही वर्णन हुआ है—इसमें निम्नलिखित युक्तियाँ दी जा सकती हैं—

(१) सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें आये ‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः’ पदोंको लेकर अर्जुनने प्रश्न किया कि मनमाने ढंगसे श्रद्धापूर्वक काम करनेवालोंकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? तो भगवान्ने इस अध्यायके दूसरे श्लोकमें श्रद्धाके तीन भेद बताकर तीसरे श्लोकमें ‘सर्वस्य’ पदसे मनुष्यमात्रकी अन्तःकरणके अनुरूप श्रद्धा बतायी और चौथे श्लोकमें पूज्यके अनुसार पूजककी निष्ठाकी पहचान बतायी। सातवें श्लोकमें उसी ‘सर्वस्य’ पदका प्रयोग करके भगवान् यह बताते हैं कि मनुष्यमात्रको अपनी-अपनी रुचिके अनुसार तीन तरहका भोजन प्रिय होता है—‘आहारस्त्वापि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।’ उस प्रियतासे ही मनुष्यकी निष्ठा-(स्थिति-) की पहचान हो जायगी।

‘प्रियः’ शब्द केवल सातवें श्लोकमें ही नहीं आया है, प्रत्युत आठवें श्लोकमें ‘सात्त्विकप्रियाः’ नवें श्लोकमें

‘राजसस्येष्टाः’ और दसवें श्लोकमें ‘तामसप्रियम्’ में भी ‘प्रिय’ और ‘इष्ट’ शब्द आये हैं, जो रुचिके वाचक हैं। यदि यहाँ आहारका ही वर्णन होता तो भगवान् प्रिय और इष्ट शब्दोंका प्रयोग न करके ये सात्त्विक आहार हैं, ये राजस आहार हैं, ये तामस आहार हैं—ऐसे पदोंका प्रयोग करते।

(२) दूसरी प्रबल युक्ति यह है कि सात्त्विक आहारमें पहले ‘आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रतिविधर्नाः’ पदोंसे भोजनका फल बताकर बादमें भोजनके पदार्थोंका वर्णन किया। कारण कि सात्त्विक मनुष्य भोजन करने आदि किसी भी कार्यमें विचारपूर्वक प्रवृत्त होता है, तो उसकी दृष्टि सबसे पहले उसके परिणामपर जाती है।

रागी होनेसे राजस मनुष्यकी दृष्टि सबसे पहले भोजनपर ही जाती है, इसलिये राजस आहारके वर्णनमें पहले भोजनके पदार्थोंका वर्णन करके बादमें ‘दुःखशोकायप्रदाः’ पदसे उसका फल बताया है। तात्पर्य यह कि राजस मनुष्य अगर आरम्भमें ही भोजनके परिणामपर विचार करेगा, तो फिर उसे राजस भोजन करनेमें हितचिन्ताहट होगी; क्योंकि परिणाममें मुझे दुःख, शोक और रोग हो जायें—ऐसा कोई मनुष्य नहीं चाहता। परन्तु राग होनेके कारण राजस पुरुष परिणामपर विचार करता ही नहीं।

सात्त्विक भोजनका फल पहले और राजस भोजनका फल पीछे बताया गया; परन्तु तामस भोजनका फल बताया ही नहीं गया। कारण कि मूढ़ता होनेके कारण तामस मनुष्य भोजन और उसके परिणामपर विचार करता ही नहीं। भोजन न्याययुक्त है या नहीं, उसमें हमारा अधिकार है या नहीं, शास्त्रोंकी आज्ञा है या नहीं और परिणाममें हमारे मन-बुद्धिके बलको बढ़ानेमें हेतु है या नहीं—इन बातोंका कुछ भी विचार न करके तामस मनुष्य पशुकी तरह खानेमें प्रवृत्त होते हैं। तात्पर्य है कि सात्त्विक भोजन करनेवाला तो दैवी-सम्पत्तिवाला होता है और राजस तथा तामस भोजन करनेवाला आसुरी-सम्पत्तिवाला होता है।

(३) यदि भगवान्को यहाँ आहारका ही वर्णन करना होता, तो वे आहारकी विधिका और उसके लिये कर्मोंकी शुद्धि-अशुद्धिका वर्णन करते; जैसे—

शुद्ध कमाईके पैसोंसे अनाज आदि पवित्र खाद्य पदार्थ खरीदे जायें; रसोईमें चौका देकर और स्वच्छ वस्त्र पहनकर

  • स्वल्पमात्रामें खानेका तात्पर्य यह है कि भोजन करनेके बाद पेट याद न आये; क्योंकि पेट दो कारणोंसे याद आता है—अधिक खानेपर और बहुत कम खानेपर।

१०७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

पवित्रतापूर्वक भोजन बनाया जाय; भोजनको भगवान्के अर्पण किया जाय और भगवान्का चिन्तन तथा उनके नामका जप करते हुए प्रसाद-बुद्धिसे भोजन ग्रहण किया जाय—ऐसा भोजन सात्त्विक होता है।

स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यताको लेकर सत्य-असत्यका कोई विचार न करते हुए पैसे कमाये जायें; स्वाद, शरीरकी पुष्टि, भोग भोगनेकी सामर्थ्य बढ़ाने आदिका उद्देश्य रखकर भोजनके पदार्थ खरीदे जायें; जिह्वाको स्वादिष्ट लेंगे और दीखनेमें भी सुन्दर दीखें—इस दृष्टिसे, रीतिसे उनको बनाया जाय; और आसक्तिपूर्वक खाया जाय—ऐसा भोजन राजस होता है।

झूठ-कपट, चोरी, डकैती, धोखेबाजी आदि किसी तरहसे पैसे कमाये जायें; अशुद्धि-शुद्धिका कुछ भी विचार न करके मांस, अंडे आदि पदार्थ खरीदे जायें; विधि-विधानका कोई खयाल न करके भोजन बनाया जाय और बिना हाथ-पैर धोये एवं चप्पल-जूती पहनकर ही अशुद्ध वायुमण्डलमें उसे खाया जाय—ऐसा भोजन तामस होता है।

परन्तु भगवान्ने यहाँ केवल सात्त्विक, राजस और तामस पुरुषोंको प्रिय लगनेवाले खाद्य पदार्थोंका वर्णन किया है, जिससे उनकी रुचिकी पहचान हो जाय।

(४) इसके सिवाय गीतामें जहाँ-जहाँ आहारकी बात आयी है, वहाँ-वहाँ आहारीका ही वर्णन हुआ है; जैसे—‘नियताहाराः’ (४।३०) पदमें नियमित आहार करनेवालेका, ‘नात्यश्नतस्तु’ और ‘युक्ताहारविहारस्य’ (६।१६-१७) पदोंमें अधिक खानेवाले और नियत खानेवालोंका; ‘यदृश्नासि’ (९।२७) पदमें भोजनके पदार्थको भगवान्के अर्पण करनेवालेका, और ‘लच्छाशी’ (१८।५२) पदमें अल्प भोजन करनेवालोंका वर्णन हुआ है।

इसी प्रकार इस अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘यज्ञस्तपस्तथा दानम्’ पदोंमें आया ‘तथा’ (वैसे ही) पद यह कह रहा है कि जो मनुष्य यज्ञ, तप, दान आदि कार्य करते हैं, वे भी अपनी-अपनी (सात्त्विक, राजस अथवा तामस) रुचिके अनुसार ही कार्य करते हैं। आगे ग्यारहवेंसे बाईसवें श्लोकतकका जो प्रकरण है, उसमें भी यज्ञ, तप और दान करनेवालोंके स्वभावका ही वर्णन हुआ है।

भोजनके लिये आवश्यक विचार

उपनिषदोंमें आता है कि जैसा अन्न होता है, वैसा ही मन बनाता है—‘अन्नमयं हि सोम्य मनः।’ (छान्दोग्य०

६।५।४) अर्थात् अन्नका असर मनपर पड़ता है। अन्नके सूक्ष्म सारभागसे मन (अन्तःकरण) बनता है, दूसरे नम्बरके भागसे वीर्य, तीसरे नम्बरके भागसे रक्त आदि और चौथे नम्बरके स्थूल भागसे मल बनता है, जो कि बाहर निकल जाता है। अतः मनको शुद्ध बनानेके लिये भोजन शुद्ध, पवित्र होना चाहिये। भोजनकी शुद्धिसे मन-(अन्तःकरण-)की शुद्धि होती है—‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः’ (छान्दोग्य० २।२६।२)। जहाँ भोजन करते हैं, वहाँका स्थान, वायुमण्डल, दृश्य तथा जिसपर बैठकर भोजन करते हैं, वह आसन भी शुद्ध, पवित्र होना चाहिये। कारण कि भोजन करते समय प्राण जब अन्न ग्रहण करते हैं, तब वे शरीरके सभी रोमकूपोंसे आसपासके परमाणुओंको भी खींचते—ग्रहण करते हैं। अतः वहाँका स्थान, वायुमण्डल आदि जैसे होंगे, प्राण वैसे ही परमाणु खींचेंगे और उन्हींके अनुसार मन बनेगा। भोजन बनानेवालेके भाव, विचार भी शुद्ध सात्त्विक हों।

भोजनके पहले दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख—ये पाँचों शुद्ध, पवित्र जलसे धो ले। फिर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके शुद्ध आसनपर बैठकर भोजनकी सब चीजोंको ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥’ (गीता ९।२६)—यह श्लोक पढ़कर भगवान्के अर्पण कर दे। अर्पणके बाद दायें हाथमें जल लेकर ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥’ (गीता ४।२४)—यह श्लोक पढ़कर आचमन करे और भोजनका पहला ग्रास भगवान्का नाम लेकर ही मुखमें डाले। प्रत्येक ग्रासको चबाते समय ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’

—इस मन्त्रको मनसे दो बार पढ़ते हुए या अपने इष्टका नाम लेते हुए ग्रासको चबाये और निगले। इस मन्त्रमें कुल सोलह नाम हैं और दो बार मन्त्र पढ़नेसे बत्तीस नाम हो जाते हैं। हमारे मुखमें भी बत्तीस ही दाँत हैं। अतः (मन्त्रके प्रत्येक नामके साथ) बत्तीस बार चबानेसे वह भोजन सुपाच्य और आरोग्यदायक होता है एवं थोड़े अन्नेसे ही तृप्त हो जाती है तथा उसका रस भी अच्छा बनता है और इसके साथ ही भोजन भी भजन बन जाता है।

भोजन करते समय ग्रास-ग्रासमें भगवन्नाम-जप करते रहनेसे अन्नदोष भी दूर हो जाता है*।

  • कवले कवले कुर्वन् रामनामानुकीर्तनम्। यः कश्चित् पुरुषोऽश्नाति सोऽन्नदोषैर्न लिप्यते॥

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७५

जो लोग ईर्ष्या, भय और क्रोधसे युक्त हैं तथा लोभी हैं, और रोग तथा दीनतासे पीड़ित और द्वेषयुक्त हैं, वे जिस भोजनको करते हैं, वह अच्छी तरह पचता नहीं अर्थात् उससे अजीर्ण हो जाता है*। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह भोजन करते समय मनको शान्त तथा प्रसन्न रखे। मनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोषोंकी वृत्तियोंको न आने दे। यदि कभी आ जायँ तो उस समय भोजन न करे; क्योंकि वृत्तियोंका असर भोजनपर पड़ता है और उसीके अनुसार अन्तःकरण बनता है। ऐसा भी सुननेमें आया है कि फौजी लोग जब गायको दुहते हैं, तब दुहनेसे पहले बछड़ा छोड़ते हैं और उस बछड़ेके पीछे कुत्ता छोड़ते हैं। अपने बछड़ेके पीछे कुत्तेको देखकर जब गाय गुस्सेमें आ जाती है, तब बछड़ेको लाकर बाँध देते हैं और फिर गायको दुहते हैं। वह दूध फौजियोंको पिलाते हैं, जिससे वे लोग खूँखार बनते हैं।

ऐसे ही दूधका भी असर प्राणियोंपर पड़ता है। एक बार किसीने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध और कुछ घोड़ोंको गायका दूध पिलाकर उन्हें तैयार किया। एक दिन सभी घोड़े कहीं जा रहे थे। रास्तेमें नदीका जल था। भैंसका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलमें बैठ गये और गायका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलको पार कर गये। इसी प्रकार बैल और भैंसेका परस्पर युद्ध कराया जाय, तो भैंसा बैलको मार देगा; परन्तु यदि दोनोंको गाड़ीमें जोता जाय, तो भैंसा धूपमें जीभ निकाल देगा, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहेगा। कारण कि भैंसके दूधमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि गायके दूधमें सात्त्विक बल होता है।

जैसे प्राणियोंकी वृत्तियोंका पदार्थोंपर असर पड़ता है, ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिका भी असर पड़ता है। बुरे व्यक्तिकी अथवा भूखे कुत्तेकी दृष्टि भोजनपर पड़ जाती है, तो वह भोजन अपवित्र हो जाता है। अब वह भोजन पवित्र कैसे हो? भोजनपर उसकी दृष्टि पड़ जाय, तो उसे देखकर मनमें प्रसन्न हो जाना चाहिये कि भगवान् पथारे हैं! अतः उसको सबसे पहले थोड़ा अन्न देकर भोजन करा दे। उसको देनेके बाद बचे हुए शुद्ध अन्नको स्वयं

ग्रहण करे, तो दृष्टिदोष मिट जानेसे वह अन्न पवित्र हो जाता है।

दूसरी बात, लोग बछड़ेको पेटभर दूध न पिलाकर सारा दूध स्वयं दुह लेते हैं। वह दूध पवित्र नहीं होता; क्योंकि उसमें बछड़ेका हक आ जाता है। बछड़ेको पेटभर दूध पिला दे; और इसके बाद जो दूध निकले, वह चाहे पावभर ही क्यों न हो, बहुत पवित्र होता है।

भोजन करनेवाले और करानेवालेके भावका भी भोजनपर असर पड़ता है; जैसे—(१) भोजन करनेवालेकी अपेक्षा भोजन करानेवालेकी जितनी अधिक प्रसन्नता होगी, वह भोजन उतने ही उत्तम दर्जेंका माना जायगा। (२) भोजन करानेवाला तो बड़ी प्रसन्नतासे भोजन कराता है; परन्तु भोजन करनेवाला 'मुफ्तमें भोजन मिल गया; अपने इतने पैसे बच गये; इससे मेरेमें बल आ जायगा' आदि स्वार्थका भाव रख लेता है, तो वह भोजन मध्यम दर्जेंका हो जाता है, और (३) भोजन करानेवालेका यह भाव है कि 'यह घरपर आ गया, तो खर्चा करना पड़ेगा, भोजन बनाना पड़ेगा, भोजन कराना ही पड़ेगा' आदि और भोजन करनेवालेमें भी स्वार्थभाव है, तो वह भोजन निकृष्ट दर्जेंका हो जायगा।

इस विषयमें गीताने सिद्धान्तरूपसे कह दिया है—'सर्वभूतहिते रताः' (५।२५, १२।४)। तात्पर्य यह है कि जिसका सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव जितना अधिक होगा, उसके पदार्थ, क्रियाएँ आदि उतनी ही पवित्र हो जायँगी।

भोजनके अन्तमें आचमनके बाद ये श्लोक पढ़ने चाहिये—

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

(गीता ३।१४-१५)

फिर भोजनके पाचनके लिये 'अहं वैश्वानरो भूत्वा०' (गीता १५।१४) श्लोक पढ़ते हुए मध्यमा अंगुलीसे नाभिको धीरे-धीरे घुमाना चाहिये।

  • ईर्ष्याभयक्रोधसमन्वितेन लुब्धेन रुदैन्यनिपीडितेन। विद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक् परिपाकमेति॥

( भावप्रकाश-दिनचर्याप्रकरण ५।१२८ )

१०७६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

सम्बन्ध—पहले यजन-पूजन और भोजनके द्वारा जो श्रद्धा बतायी, उससे शास्त्रविधिका अज्ञतापूर्वक त्याग करनेवालोंकी स्वाभाविक निष्ठा—रुचिकी तो पहचान हो जाती है; परन्तु जो मनुष्य व्यापार, खेती आदि जीविकाके कार्य करते हैं अथवा शास्त्रविहित यज्ञादि शुभकर्म करते हैं, उनकी स्वाभाविक रुचिकी पहचान कैसे हो—यह बतानेके लिये यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन भेदोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

अफलाकाइक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥

यष्टव्यम्, एव = यज्ञ करना हीकरकेयज्ञः = यज्ञ
कर्तव्य हैअफलाकाइक्षिभिः=फलेच्छारहितइज्यते = किया जाता है,
इति = —इस तरहमनुष्योंद्वारासः = वह
मनः = मनकोयः = जोसात्त्विकः = सात्त्विक
समाधाय = समाधान (सन्तुष्ट)विधिदृष्टः = शास्त्रविधिसे नियतहै।

व्याख्या—‘यष्टव्यमेवेति’—जब मनुष्य-शरीर मिल गया और अपना कर्तव्य करनेका अधिकार भी प्राप्त हो गया, तो अपने वर्ण-आश्रममें शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार यज्ञ करनामात्र मेरा कर्तव्य है। ‘एव इति’—ये दो अव्यय लगानेका तात्पर्य है कि इसके सिवाय दूसरा कोई भाव न रखे अर्थात् इस यज्ञसे लोकमें और परलोकमें मेरेको क्या मिलेगा? इससे मेरेको क्या लाभ होगा?—ऐसा भाव भी न रहे, केवल कर्तव्यमात्र रहे।

जब उससे कुछ मिलनेकी आशा ही नहीं रखनी है, तो फिर (फलेच्छाका त्याग करके) यज्ञ करनेकी जरूरत ही क्या है?—इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘मनः समाधाय’ अर्थात् ‘यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है’ ऐसे मनको समाधान करके यज्ञ करना चाहिये।

‘अफलाकाइक्षिभिः’—मनुष्य फलकी इच्छा रखनेवाला न हो अर्थात् लोक-परलोकमें मेरेको इस यज्ञका अमुक फल मिले—ऐसा भाव रखनेवाला न हो।

‘यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते’—शास्त्रोंमें विधिके विषयमें जैसी आज्ञा दी गयी है, उसके अनुसार ही यज्ञ किया जाय। इस प्रकारसे जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक होता है—‘स सात्त्विकः।’

सात्त्विकताका तात्पर्य

सात्त्विकताका क्या तात्पर्य होता है? अब इसपर थोड़ा विचार करें। ‘यष्टव्यम्’*—‘यज्ञ करनामात्र कर्तव्य है’—ऐसा जब उद्देश्य रहता है, तब उस यज्ञके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जुड़ता। परन्तु जब कर्तामें ‘वर्तमानमें मान,

आदर, सत्कार आदि मिलें, मरनेके बाद स्वर्गादि लोक मिलें तथा आगेके जन्ममें धनादि पदार्थ मिलें’—इस प्रकारकी इच्छाएँ होंगी, तब उसका उस यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ जायगा। तात्पर्य है कि फलकी इच्छा रखनेसे ही यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। केवल कर्तव्यमात्रका पालन करनेसे उससे सम्बन्ध नहीं जुड़ता, प्रत्युत उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और (स्वार्थ तथा अभिमान न रहनेसे) कर्ताकी अहंता शुद्ध हो जाती है।

इसमें एक बड़ी मामिक बात है कि कुछ भी कर्म करनेमें कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध रहता है। कर्म कर्तासे अलग नहीं होता। कर्म कर्ताका ही चित्र होता है अर्थात् जैसा कर्ता होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है—‘यो यच्छद्धः स एव सः’ अर्थात् जो जैसी श्रद्धावाला है, वैसा ही उसका स्वरूप होता है और वैसा ही (श्रद्धाके अनुसार) उससे कर्म होता है। तात्पर्य यह है कि कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध होता है और कर्मके साथ सम्बन्ध होनेसे ही कर्ताका बन्धन होता है। केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् कर्ता मुक्त हो जाता है।

केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करना क्या है? अपने लिये कुछ नहीं करना है, सामग्रीके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है; मेरा देश, काल आदिसे भी कोई सम्बन्ध नहीं है; केवल मनुष्य होनेके नाते जो कर्तव्य प्राप्त हुआ है, उसको कर देना है—ऐसा भाव होनेसे कर्ता फलाकांक्षी नहीं होगा और कर्माका फल कर्ताको बाँधेगा नहीं अर्थात् यज्ञकी क्रिया

  • जो करनेयोग्य है, जो अपनी सामर्थ्यके अनुरूप है, जिसे अवश्य करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है, वह ‘कर्तव्य’ होता है। वही कर्तव्य यज्ञमें ‘यष्टव्य’ और दानमें ‘दातव्य’ है।

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७७

और यज्ञके फलके साथ कर्ताका सम्बन्ध नहीं होगा। गीता कहती है—'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि' (५।११) अर्थात् करण (शरीर, इन्द्रियाँ आदि) उपकरण (यज्ञ करनेमें उपयोगी सामग्री) और अधिकरण (स्थान) आदि किसीके भी साथ हमारा सम्बन्ध न हो।

यज्ञकी क्रियाका आरम्भ होता और समाप्ति होती है। ऐसे ही उसके फलका भी आरम्भ होता और समाप्ति होती है। क्रिया और फल दोनों उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले हैं और स्वयं (आत्मा) नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; परन्तु यह (स्वयं) क्रिया और फलके साथ अपना

सम्बन्ध मान लेता है। इस माने हुए सम्बन्धको यह जबतक नहीं छोड़ता, तबतक यह जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा रहता है—'फले सक्तो निबध्यते' (गीता ५।१२)।

एक विलक्षण बात है कि गीतामें जो सत्त्वगुण कहा है, वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माकी तरफ ले जानेवाला होनेसे 'सत्' अर्थात् निर्गुण हो जाता है*। दैवी-सम्पत्तिमें भी जितने गुण हैं, वे सब सात्त्विक ही हैं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाला तभी परमात्माको प्राप्त होगा, जब वह सत्त्वगुणसे ऊँचा उठ जायगा अर्थात् जब गुणोंके संगसे सर्वथा रहित हो जायगा।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ १२॥

तु = परन्तु भरतश्रेष्ठ = हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! यत् = जो फलम् = फलकी अभिसन्धाय = इच्छाको लेकर एव = ही इज्यते = किया जाता है च = अथवा दम्भार्थम् = दम्भ (दिखावटीपन)-के लिये अपि = भी (किया जाता है), तम् = उस यज्ञम् = यज्ञको (तुम) राजसम् = राजस विद्धि = समझो।

व्याख्या—'अभिसन्धाय तु फलम्'—फल अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिकी कामना रखकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस हो जाता है। 'इस लोकमें हमें धन-वैभव मिले; स्त्री-पुत्र, परिवार अच्छा मिले; नौकर-चाकर, गाय-भैंस आदि भी हमारे अनुकूल मिलें; हमारा शरीर नीरोग रहे; हमारा आदर-सत्कार, मान-बड़ाई, प्रसिद्धि हो जाय तथा मरनेके बाद भी हमें स्वर्गादि लोकोंके दिव्य भोग मिलें' आदि इष्टकी प्राप्तिकी कामनाएँ हैं।

  • श्रीमद्भागवतमें एकादश स्कन्धके पचीसवें अध्यायमें जहाँ तामस, राजस और सात्त्विक—इन तीन गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ उनके साथ एक 'निर्गुण' और कहा है। परन्तु गीतामें तीन ही गुण कहे गये हैं। जब दोनोंके वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो फिर ऐसा भेद क्यों? गीताका जो सात्त्विक भाव है, उसमें भगवान्ने 'यष्टव्यम्' (१७।११), 'दातव्यम्' (१७।२०), 'कार्यमित्येव' (१८।९) आदि पद कहे हैं। इन्हें कहनेका तात्पर्य यह है कि जिस कर्ताका 'यज्ञ करनामात्र, दान देनामात्र और कर्तव्य करनामात्र' उद्देश्य रहता है, उसका कर्म और कर्मफलके साथ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् सात्त्विक यज्ञ, दान आदि भी 'निर्गुण' हो जाते हैं। सत्रहवें अध्यायके अन्तमें परमात्माके तीन नामों 'ॐ, तत्, सत्' के वर्णनमें 'सत्' शब्दकी व्याख्या करते हुए भगवान्ने बताया कि उस परमात्माके निमित्त जितने कर्म किये जाते हैं, वे सभी 'सत्' (निर्गुण) हो जाते हैं—'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' (१७।२७)। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगीका कर्म और कर्मफलके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे और भक्तियोगीके कर्मोंका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़नेसे उनके सभी कर्म 'निर्गुण' हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों ही बातें एक हीमें आ जानेसे गीतामें निर्गुणका अलग वर्णन नहीं आया है। गीतामें जहाँ सत्त्वगुणको अनामय बताया है, वहाँ सत्त्वगुणसे बन्धन होनेकी बात भी कही है (१४।६) और कहा है कि सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं (१४।१८)। इसका तात्पर्य यह है कि बन्धन सत्त्वगुणसे नहीं होता, प्रत्युत उसका संग करनेसे ही बन्धन होता है—'सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ' (१४।६) और 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१)। ऐसे ही सत्त्वगुणमें अपनी स्थिति मानना 'सत्त्वस्थाः' (१४।१८) भी बन्धनकारक है।

१०७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

‘हमारे वैरी नष्ट हो जायें; संसारमें हमारा अपमान, बेइज्जती, तिरस्कार आदि कभी न हो; हमारे प्रतिकूल परिस्थिति कभी आये ही नहीं’ आदि अनिष्टको निवृत्तिकी कामनाएँ हैं।

दुर्भार्थमपि चैव यत् ’—लोग हमें भीतरसे सदगुणी, सदाचारी, संयमी, तपस्वी, दानी, धर्मात्मा, याज्ञिक आदि समझें, जिससे संसारमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय—ऐसे दिखावटीपनेको लेकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस कहलाता है। इस प्रकारके दिखावटी यज्ञ करनेवालोंमें ‘यक्ष्ये दास्यामि ’ (१६।१५) और ‘यजने नामयज्ञेत् ’ (१६।१७) आदि सभी बातें विशेषतासे आ जाती हैं।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ’—इस प्रकार फलकी कामना और दम्भ—(दिखावटीपन—) को

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें आये ‘यत् ’ पदसे यह भाव निकलता है कि फलेच्छा और दम्भके लिये जो भी यज्ञ, दान, तप आदि कर्म किये जायें, वे सब राजस समझने चाहिये।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥

विधिहीनम् = शास्त्रविधिसे हीन,मन्त्रहीनम् = बिना मन्त्रोंके,किये जानेवाले
असृष्टान्नम् = अन्न-दानसे रहित,अदक्षिणम् = बिना दक्षिणाके (और)यज्ञम् = यज्ञको
श्रद्धावि-रहितम् = बिना श्रद्धाकेतामसम् = तामस
परिचक्षते = कहते हैं।

व्याख्या —‘विधिहीनम् ’—अलग-अलग यज्ञोंकी अलग-अलग विधियाँ होती हैं और उसके अनुसार यज्ञकुण्ड, सुवा आदि पात्र, बैठनेकी दिशा, आसन आदिका विचार होता है। अलग-अलग देवताओंकी अलग-अलग सामग्री होती है; जैसे—देवीके यज्ञमें लाल वस्त्र और लाल सामग्री होती है। परन्तु तामस यज्ञमें इन विधियोंका पालन नहीं होता, प्रत्युत उपेक्षापूर्वक विधिका त्याग होता है।

असृष्टान्नम् ’—तामस मनुष्य जो द्रव्ययज्ञ करते हैं, उसमें ब्राह्मणादिको अन्न-दान नहीं किया जाता। तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि मुफ्तमें रोटी मिलनेसे वे आलसी हो जायेंगे, काम-धंधा नहीं करेंगे।

मन्त्रहीनम् ’—वेदोंमें और वेदानुकूल शास्त्रोंमें कहे हुए मन्त्रोंसे ही द्रव्ययज्ञ किया जाता है। परन्तु तामस यज्ञमें वैदिक तथा शास्त्रीय मन्त्रोंसे यज्ञ नहीं किया जाता। कारण

लेकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस हो जाता है।

जो यज्ञ कामनापूर्तिके लिये किया जाता है, उसमें शास्त्रविधिकी मुख्यता रहती है। कारण कि यज्ञकी विधि और क्रियामें यदि किसी प्रकारकी कमी रहेगी, तो उससे प्राप्त होनेवाले फलमें भी कमी आ जायगी। इसी प्रकार यदि यज्ञकी विधि और क्रियामें विपरीत बात आ जायगी, तो उसका फल भी विपरीत हो जायगा अर्थात् वह यज्ञ सिद्धि न देकर उलटे यज्ञकर्ताके लिये घातक हो जायगा।

परन्तु जो यज्ञ केवल दिखावटीपनके लिये किया जाता है, उसमें शास्त्रविधिकी परवाह नहीं होती।

यहाँ ‘विद्धि ’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि हे अर्जुन! सांसारिक राग (कामना) ही जन्म-मरणका कारण है। अतः इस विषयमें तेरेको विशेष सावधान रहना है।

कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि आहुति देनेमात्रसे यज्ञ हो जाता है, सुगन्ध हो जाती है, गंदे परमाणु नष्ट हो जाते हैं, फिर मन्त्रोंकी क्या जरूरत है? आदि।

अदक्षिणम् ’—तामस यज्ञमें दान नहीं किया जाता। कारण कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि हमने यज्ञमें आहुति दे दी और ब्राह्मणोंको अच्छी तरहसे भोजन करा दिया, अब उनको दक्षिणा देनेकी क्या जरूरत रही? यदि हम उनको दक्षिणा देंगे तो वे आलसी-प्रमादी हो जायेंगे, पुरुषार्थहीन हो जायेंगे, जिससे दुनियामें बेकारी फैलेगी; दूसरी बात, जिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा मिलती है, वे कुछ कमाते ही नहीं, इसलिये वे पृथ्वीपर भाररूप रहते हैं, इत्यादि। वे तामस मनुष्य यह नहीं सोचते कि ब्राह्मणादिको अन्नदान, दक्षिणा आदि न देनेसे वे तो प्रमादी बनें, चाहे न बनें; पर शास्त्रविधिका, अपने कर्तव्य-कर्मका त्याग करनेसे हम तो प्रमादी बन ही गये!

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७९

‘श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिच्छते’—अग्निमें आहुति देनेके विषयमें तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि अन्न, घी, जौ, चावल, नारियल, छहारा आदि तो मनुष्यके निर्वाहके कामकी चीजें हैं। ऐसी चीजोंको अग्निमें फूँक देना कितनी मूर्खता है!* अपनी प्रसिद्धि, मान-बड़ाईके लिये वे यज्ञ करते भी हैं तो बिना शास्त्रविधिके, बिना अन्नदानके, बिना मन्त्रोंके और बिना दक्षिणाके करते हैं। उनकी शास्त्रोंपर, शास्त्रोक्त मन्त्रोंपर और उनमें बतायी हुई विधियोंपर तथा शास्त्रोक्त विधिपूर्वक की गयी यज्ञकी क्रियापर और उसके पारलौकिक फलपर भी श्रद्धा-विश्वास नहीं होते। कारण कि उनमें मूढ़ता होती है। उनमें अपनी तो अक्ल होती नहीं और दूसरा कोई समझा दे तो उसे मानते नहीं।

इस तामस यज्ञमें ‘यः शास्त्रविधिमुत्पृच्छ्य वर्तते कामकारतः’ (गीता १६।२३) और ‘अश्रद्धया हुतं

दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्’ (गीता १७।२८)—ये दोनों भाव होते हैं। अतः वे इहलोक और परलोकका जो फल चाहते हैं, वह उनको नहीं मिलता—‘न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्’, ‘न च तत्त्वैव नो इह।’ तात्पर्य है कि उनको उपेक्षापूर्वक किये गये शुभ-कर्मोंका इच्छित फल तो नहीं मिलेगा, पर अशुभ-कर्मोंका फल (अधोगति) तो मिलेगा ही—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८)। कारण कि अशुभ फलमें अश्रद्धा ही हेतु है और वे अश्रद्धापूर्वक ही शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हैं; अतः इसका दण्ड तो उनको मिलेगा ही।

इन यज्ञोंमें कर्ता, ज्ञान, क्रिया, धृति, बुद्धि, संग, शास्त्र, खान-पान आदि यदि सात्त्विक होंगे, तो वह यज्ञ सात्त्विक हो जायगा; यदि राजस होंगे, तो वह यज्ञ राजस हो जायगा; और यदि तामस होंगे, तो वह यज्ञ तामस हो जायगा।

सम्बन्ध—ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन करते हैं (जिसका सात्त्विक, राजस और तामस-भेद आगे करेंगे)।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥

देवद्विजगुरु-करना,अहिंसा= हिंसा न करना—
प्राज्ञपूजनम्= शुद्धि रखना,(यह)
ब्राह्मण, गुरुजनशौचम्शारीरम्= शरीर-सम्बन्धी
और जीवन्मुक्तआर्जवम्तपः= तप
महानुरूपकाब्रह्मचर्यम्उच्यते= कहा
यथायोग्य पूजनकरनाजाता है।
= और

व्याख्या—‘देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्’—यहाँ ‘देव’ शब्द मुख्यरूपसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—इन पाँच ईश्वरकोटिके देवताओंके लिये आया है। इन पाँचोंमें जो अपना इष्ट है, जिसपर अधिक श्रद्धा है, उसका

  • जब खेतमें हल चलानेवाला अनाजके बढिया-बढिया बीजोंको मिट्टीमें मिला देता है, तो खेती होनेपर उन बीजोंसे कई गुणा अधिक अनाज पैदा हो जाता है; फिर शास्त्रीय मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक वस्तुओंका हवन करना क्या निरर्थक जायगा? मिट्टीमें मिलाया हुआ बीज तो आधिभौतिक है; क्योंकि पृथ्वी जड़ है, पर शास्त्रविधिंसहित अग्निमें दी गयी आहुति आधिदैविक है; क्योंकि देवता चेतन हैं। अतः उन देवताओंके लिये दी गयी आहुति वर्षाके रूपमें बहुत बड़ा काम करती है। मनुजीने कहा है—

अग्नीं प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरनं ततः प्रजाः ॥

(मनुस्मृति ३।७६)

अर्थात् अग्निमें डाली हुई आहुति आदित्यकी किरणोंको पुष्ट करती है और उन पुष्ट हुई किरणोंसे वर्षा होती है (इस बातको भौतिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं)।

मात्र जीव अन्से पैदा होते हैं और अन्न जलसे पैदा होता है—‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः।’ (गीता ३।१४)। अतः सृष्टिमें जल ही प्रधान है। जल बरसनेमें ‘यज्ञ’ ही खास हेतु है—‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ (३।१४)।

१०८०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

निष्कामभावसे पूजन करना चाहिये।*

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैतीस शास्त्रोक्त देवता भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत आते हैं। यज्ञ, तीर्थ, व्रत आदिमें, दीपमालिका आदि विशेष पर्वोंमें और जातकर्म, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारोंके समय जिन देवताओंके पूजनका शास्त्रोंमें विधान आता है, उन सब देवताओंको भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत मानना चाहिये। इन देवताओंका यथावसर पूजन करनेके लिये शास्त्रोंकी आज्ञा है। अतः हमें तो केवल शास्त्रमर्यादाको सुरक्षित रखनेके लिये अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे इनका पूजन करना है—ऐसे भावसे इन देवताओंका भी यथावसर पूजन करना चाहिये। तात्पर्य है कि शास्त्रोंने जिन-जिन तिथि, वार, नक्षत्र, आदिके दिन जिन-जिन देवताओंका पूजन करनेका विधान बताया है, उन-उन तिथि आदिके दिन उन-उन देवताओंका पूजन करना चाहिये।

‘द्विज’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंका वाचक है; परन्तु यहाँ पूजनका विषय होनेसे इसे केवल ब्राह्मणका ही वाचक समझना चाहिये, क्षत्रिय और वैश्यका नहीं।

जिनसे हमें शिक्षा प्राप्त होती है, ऐसे हमारे माता-पिता बड़े-बूढ़े, कुलके आचार्य, पढ़ानेवाले अध्यापक और आश्रम, अवस्था, विद्या आदिमें जो हमारेसे बड़े हैं, उन सभीको ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत समझना चाहिये।

द्विज (ब्राह्मण) एवं अपने माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना और उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना तथा पत्र-पुष्प, आरती आदिसे उनकी पूजा करना—यह सब उनका पूजन है।

यहाँ ‘प्राज्ञ’ शब्द जीवन्मुक्त महापुरुषके लिये आया है। यदि वह वर्ण और आश्रममें ऊँचा होता, तो ‘द्विज’ पदमें आ जाता और यदि शरीरके सम्बन्धमें (जन्म और विद्यासे) बड़ा होता, तो ‘गुरु’ पदमें आ जाता। इसलिये जो वर्ण और आश्रममें ऊँचा नहीं है एवं जिसके साथ गुरुका सम्बन्ध भी नहीं है—ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषको यहाँ ‘प्राज्ञ’ कहा गया है। ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषके वचनोंका, सिद्धान्तोंका आदर करते हुए उनके अनुसार अपना जीवन बनाना ही वास्तवमें

उनका पूजन है। वास्तवमें देखा जाय तो द्विज और गुरु तो सांसारिक दृष्टिसे आदरणीय हैं, पूजनीय हैं; परन्तु प्राज्ञ (जीवन्मुक्त) तो आध्यात्मिक दृष्टिसे आदरणीय—पूजनीय है। अतः जीवन्मुक्तका हृदयसे आदर करना चाहिये; क्योंकि केवल बाहरी (बाह्य दृष्टिसे) आदर ही आदर नहीं है, प्रत्युत हृदयका आदर ही वास्तविक आदर है, पूजन है।

‘शौचम्’—जल, मृत्तिका आदिसे शरीरको पवित्र बनानेका नाम ‘शौच’ है। शारीरिक शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।

शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।

(योगदर्शन २।४०)

शौचसे अपने शरीरमें घृणा होगी कि हम इस शरीरको रात-दिन इतना साफ करते हैं, फिर भी इससे मल, मूत्र, पसीना, नाकका कफ, आँख और कानकी मैल, लार, थूक आदि निकलते ही रहते हैं। यह शरीर हड्डी, मांस, मज्जा आदि घुणित (अपवित्र) चीजोंका बना हुआ है। इस हड्डी-मांसके थैलेमें तोलाभर भी कोई शुद्ध, पवित्र, निर्मल और सुगन्धयुक्त वस्तु नहीं है। यह केवल गंदगीका पात्र है। इसमें कौरी मलिनता—ही-मलिनता भरी पड़ी है। यह केवल मल-मूत्र पैदा करनेकी एक फैक्टरी है, मशीन है। इस प्रकार शरीरकी अशुद्धि, मलिनताका ज्ञान होनेसे मनुष्य शरीरसे ऊँचा उठ जाता है। शरीरसे ऊँचा उठनेपर उसको वर्ण, आश्रम, अवस्था आदिको लेकर अपनेमें बड़पनका अभिमान नहीं होता। इन्हीं बातोंके लिये शौच रखा जाता है।

आजकल प्रायः लोग कहते हैं कि जो शौचाचार रखते हैं, वे तो दूसरोंका अपमान करते हैं, दूसरोंसे घृणा करते हैं। उनका ऐसा कहना बिलकुल गलत है; क्योंकि शौचका फल यह नहीं बताया गया कि तुम दूसरोंका तिरस्कार करो, प्रत्युत यह बताया गया कि इससे दूसरोंके साथ संसर्ग नहीं होगा—‘परैरसंसर्गः।’ तात्पर्य है कि शरीरमात्रसे ग्लानि हो जायगी कि ये सब पुतले ऐसे ही अशुद्ध हैं। जैसे, मिट्टीके ढेलेको जलसे धोते चले जायँ, तो अन्तमें वह सब (गलकर) समाप्त हो जायगा, पर उसमें मिट्टीके सिवाय कोई बढ़िया चीज नहीं मिलेगी; ऐसे ही शरीरको कितना ही शुद्ध करते रहें, पर वह कभी शुद्ध होगा नहीं; क्योंकि इसके मूलमें ही अशुद्धि है—

  • इनमें भी वैष्णव भगवान् विष्णुको, शैव भगवान् शिवको, गाणपत भगवान् गणेशको, शाक्त भगवती शक्तिको और सौर भगवान् सूर्यको सर्वोपरि ईश्वर मानते हैं। अतः इन पाँचोंमें भी अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार अपना इष्ट तो सर्वोपरि ईश्वर होगा और अन्य सभी देवता होंगे।

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८१

स्थानाद् बीजादुपष्टम्भानिः स्यन्दानिधनादपि । कायमाधेयशौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचि विदुः ॥

(योगदर्शन २।५ का व्यास-भाष्य)

‘विद्वान् लोग शरीरको स्थान (माताके उदरमें स्थित), बीज (माता-पिताके रजोवीर्यसे उद्भूत), उपष्टम्भ (खाये-पीये हुए आहारके रससे परिपुष्ट), निःस्यन्द (मल, मूत्र, शुक्र, लार, स्वेद आदि स्नावसे युक्त), निधन (मरणधर्मा) और आधेय शौच (जल-मृत्तिका आदिसे प्रक्षालित करनेयोग्य) होनेके कारण अपवित्र मानते हैं।’

‘आर्जवम्’—शरीरकी ऐंट-अकड़का त्याग करके उठने, बैठने आदि शारीरिक क्रियाओंको सीधी-सरलतासे करनेका नाम ‘आर्जव’ है। अभिमान अधिक होनेसे ही शरीरमें टेढ़ापन आता है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, ऐसे साधकको अपनेमें अभिमान नहीं रखना चाहिये। निरभिमानता होनेसे शरीरमें और शरीरकी चलने, उठने, बैठने, बोलने, देखने आदि सभी क्रियाओंमें स्वाभाविक ही सरलता आ जाती है, जो ‘आर्जव’ है।

‘ब्रह्मचर्यम्’—ये आठ क्रियाएँ ब्रह्मचर्यको भंग करनेवाली हैं—(१) पहले कभी स्त्रीसंग किया है, उसको याद करना, (२) स्त्रियोंसे रागपूर्वक बातें करना, (३) स्त्रियोंके साथ हँसी-दिल्लगी करना, (४) स्त्रियोंकी तरफ रागपूर्वक देखना, (५) स्त्रियोंके साथ एकात्ममें बातें करना, (६) मनमें स्त्रीसंगका संकल्प करना, (७) स्त्रीसंगका पक्का विचार करना और (८) साक्षात् स्त्रीसंग करना। ये आठ प्रकारके मैथुन विद्वानोंने बताये हैं। इनमेंसे कोई भी क्रिया कभी न हो, उसका नाम ‘ब्रह्मचर्य’ है।

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन तीनोंका तो बिल्कुल ही वीर्यपात नहीं होना चाहिये और न ऐसा संकल्प ही होना चाहिये। गृहस्थ केवल सन्तानार्थ शास्त्रविधिके अनुसार ऋतुकालमें स्त्रीसंग करता है, तो वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी ब्रह्मचारी माना जाता है। विधवाओंके विषयमें भी ऐसी ही बात आती है कि जो स्त्री अपने पतिके रहते पातिव्रत-धर्मका पालन करती रही है और पतिकी मृत्युके बाद ब्रह्मचर्य धर्मका पालन करती है, उस विधवाकी वही गति होती है, जो आबाल ब्रह्मचारीकी होती है।

वास्तवमें तो ‘ब्रह्मचारिव्रते स्थितः’ (गीता ६।१४)—ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित रहना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु इसमें भी यदि स्वप्नदोष हो जाय अथवा प्रमेह आदि शरीरकी खराबीसे वीर्यपात हो जाय, तो उसे ब्रह्मचर्यभंग नहीं माना गया है। भीतरके भावोंमें गड़बड़ी आनेसे जो वीर्यपात आदि होते हैं, वही ब्रह्मचर्यभंग माना गया है। कारण कि ब्रह्मचर्यका भावोंके साथ सम्बन्ध है। इसलिये ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको चाहिये कि अपने भाव शुद्ध रखनेके लिये वह अपने मनको परस्त्रीकी तरफ कभी जाने ही न दे। सावधानी रखनेपर कभी मन चला भी जाय, तो भीतरमें यह दूह विचार रखे कि यह मेरा काम नहीं है, मैं ऐसा काम करूँगा ही नहीं; क्योंकि मेरा ब्रह्मचर्य-पालन करनेका पक्का विचार है; मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ?

‘अहिंसा’—सभी प्रकारकी हिंसाका अभाव अहिंसा है। हिंसा स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोह-(मूढ़ता-) को लेकर होती है। जैसे, अपने स्वार्थमें आकर किसीका धन दबा लिया, दूसरोंका नुकसान करा दिया—यह ‘स्वार्थ’ को लेकर हिंसा है। क्रोधमें आकर किसीको थोड़ी चोट पहुँचायी, ज्यादा चोट पहुँचायी अथवा खत्म ही कर दिया—यह ‘क्रोध’ को लेकर हिंसा है। चमड़ा मिलेगा, मांस मिलेगा, इसके लिये किसी पशुको मार दिया अथवा धनके कारण किसीको मार दिया—यह ‘लोभ’ को लेकर हिंसा है। रास्तेपर चलते-चलते किसी कुत्तेको लाठी मार दी, वृक्षकी डाली तोड़ दी, किसी घासको ही तोड़ दिया, किसीको ठेकर मार दी, तो इसमें न क्रोध है, न लोभ है और न कुछ मिलनेकी सम्भावना ही है—यह ‘मोह’ (मूढ़ता)—को लेकर हिंसा है। अहिंसामें इन सभी हिंसाओंका अभाव है।

‘शारीरं तप उच्यते’—देव आदिका पूजन, शौच, आर्जव, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह पाँच प्रकारका ‘शारीरिक तप’ कहा गया है। इस शारीरिक तपमें तीर्थ, व्रत, संयम आदि भी ले लेने चाहिये।

जब कष्ट उठाना पड़ता है, तपन होती है, तब वह तप होता है; परन्तु उपर्युक्त शारीरिक तपमें तो ऐसी कोई बात नहीं है, फिर यह तप किस प्रकार हुआ? कष्ट उठाकर जो तप किया जाता है, वह वास्तवमें श्रेष्ठ कोटिका तप नहीं है।

१-स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गृह्यभाषणम्। सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्यतिरेच च ॥ एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मृमुक्षुभिः ॥

२-यहाँ ‘अहिंसा’ शारीरिक तपके अन्तर्गत आयी है, इसलिये यहाँ शरीर-सम्बन्धी अहिंसा ही ली जायगी, मन-वाणीकी अहिंसा नहीं ली जायगी।