श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1070, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ७ ] * साधक-संजीवनी * १०६९
आगे चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है, वहाँ शरीरको कष्ट देनेकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है, वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अवधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।
‘मां चैवान्तःशरीरस्थम्’ —भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं, दुःख देते हैं। कैसे? वे मेरी आज्ञा, मेरे मतके अनुसार नहीं चलते, प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।
अर्जुनने पूछा था कि वे कौन-सी निष्ठावाले हैं—सात्त्विक हैं कि राजस-तामस? दैवी-सम्पत्तिवाले हैं कि आसुरी-सम्पत्तिवाले? तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो—‘तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। ’ यहाँ ‘आसुरनिश्चयान् ’ पद सामान्य आसुरी-सम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है, प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्त नीच—विशेष नास्तिक हैं, उनका वाचक है।
विशेष बात
चौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जानेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘यजन्ते ’ पद आया है; परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये ‘तप्यन्ते ’ पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्य-बुद्धि होती है—तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगर्दत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके तपका लक्षण है—शरीरको सुखाना, कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व
देते हैं, उसे बहुत अच्छा मानते हैं; परन्तु भगवान्को, शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं, जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना, काँटोंपर सोना, उलटे लटकना, एक पैसे खड़े होना, शास्त्रज्ञानसे विरुद्ध अग्नि तपना, अपने शरीर, मन, इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि—ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।
सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपेक्षा करके दान-सेवा, उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है, जो इतनी बुरी नहीं है; क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्र-विधियुक्त तो नहीं हैं, पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं, उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ? तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि, सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी; क्योंकि इनमें दम्भ, अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं, सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं।
सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका ‘उपेक्षा-पूर्वक’ त्याग है, इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका ‘अज्ञातपूर्वक’ त्याग है और यहाँ शास्त्रका ‘विरोधपूर्वक’ त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा, शास्त्रविधि, प्राणिसमुदाय और भगवान्—इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसी-तामसी वर्णनमें नहीं है।
सम्बन्ध—अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे, तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी—इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रूचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥
| आहारः | = आहार | तथा | = वैसे ही | लेकर तीन प्रकारकी |
|---|---|---|---|---|
| अपि | = भी | यज्ञः | = यज्ञ, | रूचि होती है,) |
| सर्वस्य | = सबको | तपः | = तप (और) | तेषाम् |
| त्रिविधः | = तीन प्रकारका | दानम् | = दान (भी तीन प्रकारके होते हैं | उनके |
| प्रियः | = प्रिय | अर्थात् शास्त्रीय | इमम् | |
| भवति | = होता है | कर्मोंमें भी गुणोंको | भेदम् | |
| तु | = और | शृणु |