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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः’ —चौथे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके अनुसार मनुष्योंकी निष्ठाकी परीक्षाके लिये सात्त्विक, राजस और तामस—तीन तरहके यजन बताये। परन्तु जिसकी श्रद्धा, रुचि, प्रियता यजन-पूजनमें नहीं है, उनकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? इसके लिये बताया कि जिनकी यजन-पूजनमें श्रद्धा नहीं है, ऐसे मनुष्योंको भी शरीर-निर्वाहके लिये भोजन तो करना ही पड़ता है, चाहे वे नास्तिक हों, चाहे आस्तिक हों, चाहे वैदिक अथवा ईसाई, पारसी, यहूदी, यवन आदि किसी सम्प्रदायके हों। उन सबके लिये यहाँ ‘आहारस्त्वपि ’ पद देकर कहा है कि निष्ठाकी पहचानके लिये केवल यजन-पूजन ही नहीं है, प्रत्युत भोजनकी रुचिसे ही उनकी निष्ठाकी पहचान हो जायगी। मनुष्यका मन स्वाभाविक ही जिस भोजनमें ललचाता है अर्थात् जिस भोजनकी बात सुनकर, उसे देखकर और उसे चखकर मन आकृष्ट होता है, उसके अनुसार उसकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी निष्ठा मानी जाती है।

यहाँ कोई ऐसा भी कह सकता है कि सात्त्विक, राजस और तामस आहार कैसा-कैसा होता है—इसे बतानेके लिये यह प्रकरण आया है। स्थूलदृष्टिसे देखनेपर तो ऐसा ही दीखता है; परन्तु विचारपूर्वक गहराईसे देखनेपर यह बात दीखती नहीं। वास्तवमें यहाँ आहारका वर्णन नहीं है, प्रत्युत आहारीकी रुचिका वर्णन है। अतः आहारीकी श्रद्धाकी पहचान कैसे हो? यह बतानेके लिये ही यह प्रकरण आया है।

यहाँ ‘सर्वस्य ’ और ‘प्रियः ’ पद यह बतानेके लिये आये हैं कि सामान्यरूपसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक-एककी किस-किस भोजनमें रुचि होती है, जिससे उनकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी निष्ठाकी पहचान हो। ऐसे ही ‘यज्ञस्तपस्तथा दानम् ’ पद यह बतानेके लिये आये

परिशिष्ट भाव —मनुष्यके द्वारा स्वभावसे होनेवाली क्रियाएँ दो प्रकारकी होती हैं—व्यावहारिक और शास्त्रीय। अतः यहाँ ‘आहार’ के अन्तर्गत व्यावहारिक (खान-पान, रहन-सहन आदि) और ‘यज्ञ-तप-दान’ के अन्तर्गत शास्त्रीय क्रियाओंको समझना चाहिये।

१-यद्यपि यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द होमरूप यज्ञका ही वाचक है, सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका नहीं (क्योंकि यज्ञके साथ तप और दान अलगसे आये हैं), तथापि गौणतासे तीर्थ, व्रत आदि कर्तव्य-कर्म भी लिये जा सकते हैं।

२-मृगा मृगैः संगमनुब्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः। मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेषु सख्यम्॥ (पंचतन्त्र, मित्रभेद ३०५)

‘जिस प्रकार पशुओंमें हरिण हरिणोंके साथ, गायें गायोंके साथ, घोड़े घोड़ोंके साथ ही चलते-फिरते हैं, उसी प्रकार मनुष्योंमें भी मूर्ख मूर्खोंके साथ और विद्वान् विद्वानोंके साथ मित्रता आदिका व्यवहार करते हैं; क्योंकि मित्रता समान स्वभाव, आचरण आदिमें ही होती है।’

हैं कि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं, उनमें भी उन मनुष्योंकी यज्ञ, तप आदि किस-किस कर्ममें कैसी-कैसी रुचि—प्रियता होती है। यहाँ ‘तथा ’ कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे पूजन तीन तरहका होता है और जैसे आहार तीन तरहका प्रिय होता है, इसी तरह शास्त्रीय यज्ञ, तप आदि कर्म भी तीन तरहके होते हैं। इससे यहाँ एक और बात भी सिद्ध होती है कि शास्त्र, सत्संग, विवेचन, वार्तालाप, कहानी, पुस्तक, व्रत, तीर्थ, व्यक्ति आदि जो-जो भी सामने आयेंगे, उनमें जो सात्त्विक होगा वह सात्त्विक मनुष्यको, जो राजस होगा, वह राजस मनुष्यको और जो तामस होगा, वह तामस मनुष्यको प्रिय लगेगा।

‘तेषां भेदमिमं शृणु’ —यज्ञ, तप और दानके भेद सुनो अर्थात् मनुष्यकी स्वाभाविक रुचि, प्रवृत्ति और प्रसन्नता किस-किसमें होती है, उसको तुम सुनो। जैसे अपनी रुचिके अनुसार कोई ब्राह्मणको दान देना पसंद करता है, तो कोई अन्य साधारण मनुष्यको दान देना ही पसंद करता है। कोई शुद्ध आचरणवाले व्यक्तियोंके साथ मित्रता करते हैं, तो कोई जिनका खान-पान, आचरण आदि शुद्ध नहीं हैं, ऐसे मनुष्योंके साथ ही मित्रता करते हैं, आदि-आदि।

तात्पर्य यह कि सात्त्विक मनुष्योंकी रुचि सात्त्विक खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग करना उनको अच्छा लगता है। राजस मनुष्योंकी रुचि राजस खान-पान, रहन-सहन, कार्य, समाज, व्यक्ति आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है। तामस मनुष्योंकी रुचि तामस खान-पान, रहन-सहन आदिमें तथा शास्त्रनिषिद्ध आचरण करनेवाले नीच मनुष्योंके साथ उठने-बैठने, खाने-पीने, बातचीत करने, साथ रहने, मित्रता करने आदिमें होती है और उन्हींका संग उनको अच्छा लगता है तथा वैसे ही आचरणोंमें उनकी प्रवृत्ति होती है।