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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1072

श्लोक ८-९]

  • साधक-संजीवनी *

१०७९

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रोतिविवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥

आयुः सत्त्व- बलारोग्य- सुखप्रोति- विवर्धनाः | = आयु, सत्त्व- गुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता | स्थिराः = स्थिर रहनेवाले, हृद्याः = हृदयको शक्ति देनेवाले, रस्याः = रसयुक्त (तथा) स्निग्धाः = चिकने— | आहाराः = (ऐसे) आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विकप्रियाः = सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'आयुः'—जिन आहारोंके करनेसे मनुष्यकी आयु बढ़ती है; 'सत्त्वम्'—सत्त्वगुण बढ़ता है; 'बलम्'—शरीर, मन, बुद्धि आदिमें सात्त्विक बल एवं उत्साह पैदा होता है; 'आरोग्यः'—शरीरमें नीरोगता बढ़ती है; 'सुखम्'—सुख-शान्ति प्राप्त होती है; और 'प्रोतिविवर्धनाः'—जिनको देखनेसे ही प्रीति पैदा होती है*, वे अच्छे लगते हैं।

इस प्रकारके 'स्थिराः'—जो गरिष्ठ नहीं, प्रत्युत सुपाच्य हैं और जिनका सार बहुत दिनतक शरीरमें शक्ति देता रहता है; और 'हृद्याः'—हृदय, फेफड़े आदिको शक्ति

देनेवाले तथा बुद्धि आदिमें सौम्य भाव लानेवाले; 'रस्याः'—फल, दूध, खाँड़ आदि रसयुक्त पदार्थ; 'स्निग्धाः'—घी, मक्खन, बादाम, काजू, किशमिश, सात्त्विक पदार्थोंसे निकले हुए तेल आदि स्नेहयुक्त भोजनके पदार्थ, जो अच्छे पके हुए तथा ताजे हैं।

'आहाराः सात्त्विकप्रियाः'—ऐसे भोजनके (भोज्य, पेय, लेह्य और चोष्य) पदार्थ सात्त्विक मनुष्यको प्यारे लगते हैं। अतः ऐसे आहारमें रुचि होनेसे उसकी पहचान हो जाती है कि यह मनुष्य सात्त्विक है।

कट्वम् ललवणात्युष्मातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥

कट्वम् ल- लवणात्युष्मा- तीक्ष्णरूक्ष- विदाहिनः | = अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति | आहाराः = आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजसस्य = राजस मनुष्यको | दुःखः = प्रिय होते हैं, (जो कि) दुःखशोकामय- प्रदाः = दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। ---|---|---|---

व्याख्या— 'कटु'—करेला, ग्वारपाटा आदि अधिक कड़वे पदार्थ; 'अम्ल'—इमली, अमचूर, नींबू, छाछ, सड़न पैदा करके बनाया गया सिरका आदि अधिक खट्टे पदार्थ; 'लवणम्'—अधिक नमकवाले पदार्थ; 'अत्युष्णम्'—जिनसे भाप निकल रही हो, ऐसे अत्यन्त गरम-गरम पदार्थ; 'तीक्ष्णम्'—जिनको खानेसे नाक, आँख, मुख और सिरसे पानी आने लगे, ऐसे लाल मिर्च आदि अधिक

तीखे पदार्थ; 'रूक्षम्'—जिनमें घी, दूध आदिका सम्बन्ध नहीं है, ऐसे भुने हुए चने, सतुआ आदि अधिक रूखे पदार्थ और 'विदाहिनः'—राई आदि अधिक दाहकारक पदार्थ (राईको दो-तीन घंटे छाछमें भिगोकर रखा जाय, तो उसमें एक खमीर पैदा होता है, जो बहुत दाहकारक होता है)।

'आहारा राजसस्येष्टाः'—इस प्रकारके भोजनके

  • ऐसे तो अनुकूल आहार मिलनेपर राजस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें विष हो जायगी (अठारहवें अध्यायका अङ्गीतसर्वो श्लोक)। ऐसे ही तामस पुरुषको भी प्रीति होगी, पर वह प्रीति परिणाममें उसको मूढ़तामें अर्थात् अतिनिद्रा, आलस्य और प्रमाद (खेल-तमाशे, व्यर्थ बकवाद, दुर्व्यसन आदि) में लगा देगी (अठारहवें अध्यायका उन्नालीसर्वो श्लोक)।