श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
सम्बन्ध—अबतक उन मनुष्योंकी बात बतायी, जो शास्त्रविधिको न जाननेके कारण उसका (अज्ञतापूर्वक) त्याग करते हैं; परन्तु अपने इष्ट तथा उसके यजन-पूजनमें श्रद्धा रखते हैं। अब, विरोधपूर्वक शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंकी क्रियाओंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विदध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
| ये | = जो | कामराग- | माम् | = मुझ परमात्माको | |
|---|---|---|---|---|---|
| जनाः | = मनुष्य | बलान्विताः | = (जो) भोग- | एव | = भी |
| अशास्त्र- | पदार्थ, आसक्ति और | कर्शयन्तः | = कृश करनेवाले हैं, | ||
| विहितम् | = शास्त्रविधिसे | हठसे युक्त हैं; | तान् | = उन | |
| रहित | शरीरस्थम् | = (जो) शरीरमें | अचेतसः | = अज्ञानियोंको | |
| घोरम् | = घोर | स्थित | (तू) | ||
| तपः | = तप | भूतग्रामम् | = पाँच भूतोंको | आसुर- | |
| तप्यन्ते | = करते हैं; | अर्थात् पाञ्चभौतिक | निश्चयान् | = आसुर | |
| दम्भाहङ्कार- | शरीरको | निष्ठावाले | |||
| संयुक्ताः | = (जो) दम्भ | च | = तथा | (आसुरी | |
| और अहंकारसे अच्छी | अन्तः- | सम्पत्तिवाले) | |||
| तरह युक्त हैं; | शरीरस्थम् | = अन्तःकरणमें स्थित | विद्धि | = समझ। |
व्याख्या—‘अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः’— शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है, प्रत्युत निषेध है, ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।
‘दम्भाहंकारसंयुक्ताः’— उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन, ध्यान, स्वाध्याय आदि करते हैं, वे सब दम्भ करते हैं, दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका, चतुराईका, जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं; हमलोगोंको समझा सकते हैं, उनको रास्तेपर ला सकते हैं; हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें? हम कोई कम जानते हैं क्या? हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले; आदि—आदि।
‘कामरागबलान्विताः’—‘काम’ शब्द भोग-पदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना, तल्लीन हो जाना, एकरस हो जाना ‘राग’ है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ, दुराग्रह है, वह ‘बल’ है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंने यह भाव रहता है कि मनुष्य-शरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्य-शरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोग-सामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया, तो फिर उसने क्या किया? मनुष्य-शरीर पाकर मनचाही भोग-सामग्री नहीं मिली, तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है, आदि—आदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धन-सम्पत्ति आदि भोग-सामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक, ज़िदसे तप किया करते हैं।
‘कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम्’— वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों—(पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—) को कृश करते हैं, शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता—ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।