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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1068, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1068

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०६७

के अन्तर्गत मानना चाहिये।

‘यक्षरक्षसि राजसाः’ —राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका पूजन करते हैं। यक्ष-राक्षस भी देवयोनियोंमें हैं। यक्षोंमें धनके संग्रहकी मुख्यता होती है और राक्षसोंमें दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। अपनी कामना-पूर्तिके लिये और दूसरोंका विनाश करनेके लिये राजस मनुष्योंमें यक्षों और राक्षसोंका पूजन करनेकी प्रवृत्ति होती है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः’ —तामस मनुष्य प्रेतों तथा भूतोंका पूजन करते हैं। जो मर गये हैं, उन्हें प्रेत कहते हैं और जो भूतयोनियोंमें चले गये हैं, उन्हें ‘भूत’ कहते हैं।

यहाँ ‘प्रेत’ शब्दके अन्तर्गत जो अपने पितर हैं, उनको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि जो अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे अपने-अपने पितरोंका पूजन करते हैं, वे तामस नहीं कहलायेंगे, प्रत्युत सात्त्विक ही कहलायेंगे। अपने-अपने पितरोंके पूजनका भगवान्ने निषेध नहीं किया है—‘पितृन्यान्ति पितृव्रताः’ (गीता १। २५)। तात्पर्य है कि जो पितरोंका सकामभावसे पूजन करते हैं कि पितर हमारी रक्षा करेंगे अथवा हम जैसे पिता-पितामह आदिके लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करते हैं, ऐसे ही हमारी कुलपरम्परावाले भी हमारे लिये श्राद्ध-तर्पण आदि करेंगे—ऐसे भावसे पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु अपने माता-पिता, दादा-दादी आदि पितरोंका पूजन करनेसे पितरोंको प्राप्त हो जायेंगे—यह बात नहीं है। जो पितृकृष्णसे उन्नृष्ण होना अपना कर्तव्य समझते हैं और इसीलिये (अपना कर्तव्य समझकर) निष्कामभावसे पितरोंका पूजन करते हैं, वे पुरुष सात्त्विक हैं, राजस नहीं। पितृलोकको वे ही जाते हैं, जो ‘पितृव्रताः’ हैं अर्थात् जो पितरोंको सर्वोपरि और अपना इष्ट मानते हैं तथा पितरोंपर ही निष्ठा रखते हैं। ऐसे लोग पितृलोकको तो जा सकते हैं, पर उससे आगे

परिशिष्ट भाव —देवताओंका पूजन करनेवाले सात्त्विक मनुष्यशरीर छूटनेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं, यक्ष-राक्षसोंका पूजन करनेवाले राजस मनुष्य यक्ष-राक्षसोंको प्राप्त होते हैं और भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले तामस मनुष्य भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं (गीता—नवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।

गीतामें ‘यज्ञ’ शब्द बहुत व्यापक है, जिसके अन्तर्गत यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि सम्पूर्ण कर्तव्य कर्म आ जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक)। अतः यहाँ भी ‘यजन्ते’ पदके अन्तर्गत सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मोंको लेना चाहिये, जिनमें यज्ञ मुख्य है।

‘प्रेताभूतगणांश्चान्ये’ —हमारे जो पितर हैं, वे दूसरोंके लिये भूत हैं और दूसरेके जो पितर हैं, वे हमारे लिये भूत हैं। पितरोंका पूजन करना तामस नहीं है, पर भूतोंका पूजन करना तामस है।

नहीं जा सकते।

कुत्ते, कौए आदिको भी जो निष्कामभावसे रोटी देते हैं (शास्त्रमें ऐसा विधान है), उससे उनकी योनि प्राप्त नहीं होती; क्योंकि वह उनका इष्ट नहीं है। वे तो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलते हैं। इसी प्रकार पितरोंका श्राद्ध-तर्पण आदि भी शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्काम-भावपूर्वक करनेसे पितृयोनि प्राप्त नहीं हो जाती। शास्त्र या भगवान्की आज्ञा मानकर करनेसे उनका उद्धार होगा। इसलिये निष्कामभावसे किये गये शास्त्रविहित नारायणबलि, गयाश्राद्ध आदि प्रेतकर्मोंको तामस नहीं मानना चाहिये; क्योंकि ये तो मृत प्राणीकी सद्गतिके लिये किये जानेवाले आवश्यक कर्म हैं, जिन्हें मरे हुए प्राणीके लिये शास्त्रके आज्ञानुसार हरेकको करना चाहिये।

हम शास्त्रविहित यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं, तो उनमें पहले गणेशजी, नवग्रह, षोडश-मातृका आदिका पूजन शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावसे करते हैं। यह वास्तवमें नवग्रह आदिका पूजन न होकर शास्त्रका ही पूजन, आदर हुआ। जैसे, स्त्री पतिकी सेवा करती है, तो उसका कल्याण हो जाता है। विवाह तो हरेक पुरुषका हो सकता है, राक्षसका भी और असुरका भी। वे भी पति बन सकते हैं। परन्तु वास्तवमें कल्याण पतिकी सेवासे नहीं होता, प्रत्युत पतिकी सेवा करना—पातिव्रतधर्मका पालन करना ऋषि, शास्त्र, भगवान्की आज्ञा है, इसलिये इनकी आज्ञाके पालनसे ही कल्याण होता है।

देवता आदिके पूजनसे पूजक-(पूजा करनेवाले-) की गति वैसी ही होगी—यह बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते’ पद नहीं आया है। अर्जुनने शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करनेवालोंकी निष्ठा पूछी थी; अतः अपने-अपने इष्ट-(पूज्य-) के अनुसार पूजकोंकी निष्ठा—श्रद्धा होती है, इसकी पहचान बतानेके लिये ही ‘यजन्ते’ पद आया है।