श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
रजोगुण-तमोगुणकी प्रधानता देखकर उसे नीचा नहीं मान लेना चाहिये; क्योंकि कौन-सा मनुष्य किस समय समुन्नत हो जाय—इसका कुछ पता नहीं है। कारण कि परमात्माका अंश—स्वरूप (आत्मा) तो सबका शुद्ध ही है, केवल संग, शास्त्र, विचार, वायुमण्डल आदिको लेकर अन्तःकरणमें किसी एक गुणकी प्रधानता हो जाती है अर्थात् जैसा संग, शास्त्र आदि मिलता है, वैसा ही मनुष्यका अन्तःकरण बन जाता है और उस अन्तःकरणके अनुसार ही उसकी
परिशिष्ट भाव —श्रद्धा भाव है। जैसा जिसका भाव होता है—सद्भाव और असद्भाव। जो परमात्माकी तरफ ले जाता है, वह सद्भाव होता है और जो संसारकी तरफ ले जाता है, वह असद्भाव होता है। दैवी-सम्पत्तिमें सद्भावकी मुख्यता होती है और आसुरी-सम्पत्तिमें असद्भावकी मुख्यता होती है।
‘में साधक हूँ’—इसमें अगर असद्भावकी मुख्यता हो तो अभिमान होता है और सद्भावकी मुख्यता हो तो स्वाभिमान होता है। अभिमानसे आसुरी-सम्पत्ति आती है और स्वाभिमानसे दैवी-सम्पत्ति आती है। दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता देखनेसे अभिमान होता है और अपने कर्तव्यको देखनेसे स्वाभिमान होता है कि मैं साधन-विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ! अभिमान होनेपर तो मनुष्य साधन-विरुद्ध काम कर बैठेगा, पर स्वाभिमान होनेपर उसको साधन-विरुद्ध काम करनेमें लज्जा होगी। स्वाभिमान होनेसे वह सात्त्विकीमें चला जायगा और अभिमान होनेसे वह राजसी-तामसीमें चला जायगा।
सम्बन्ध—अपने इष्टके यजन-पूजनद्वारा मनुष्योंकी निष्ठाकी पहचान किस प्रकार होती है, अब उसको बताते हैं।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
| सात्त्विकाः | = सात्त्विक मनुष्य | यक्षरक्षांसि | = यक्षों तथा राक्षसोंका | जनाः | = मनुष्य हैं, (वे) |
|---|---|---|---|---|---|
| देवान् | = देवताओंका | च | = और | प्रेतान् | = प्रेतों (और) |
| यजन्ते | = पूजन करते हैं, | अन्ये | = दूसरे (जो) | भूतगणान् | = भूतगणोंका |
| राजसाः | = राजस मनुष्य | तामसाः | = तामस | यजन्ते | = पूजन करते हैं। |
व्याख्या —‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’—सात्त्विक अर्थात् दैवी-सम्पत्तिवाले मनुष्य देवोंका पूजन करते हैं। यहाँ ‘देवान्’ शब्दसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—ये पाँच ईश्वरकोटिके देवता लेने चाहिये; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द ईश्वरका वाचक है और उसकी सम्पत्ति अर्थात् दैवी-सम्पत्ति मुक्ति देनेवाली है—‘दैवी सम्पद्भिर्मोक्षाय’ (१६।५)। वह दैवी-सम्पत्ति जिनमें प्रकट होती है, उन (दैवी-सम्पत्तिवाले) साधकोंकी स्वाभाविक श्रद्धाकी पहचान बतानेके लिये यहाँ ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’ पद आये हैं।
ईश्वरकोटिके देवताओंमें भी साधकोंकी श्रद्धा अलग-अलग होती है। किसीकी श्रद्धा भगवान् विष्णु—(राम, कृष्ण, आदि—) में होती है, किसीकी भगवान् शंकरमें होती है, किसीकी भगवान् गणेशमें होती है, किसीकी भगवती शक्तिमें होती है और किसीकी भगवान् सूर्यमें होती है। ईश्वरके जिस रूपमें उनकी स्वाभाविक श्रद्धा होती है, उसीका वे विशेषतासे यजन-पूजन करते हैं।
बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—इन तैंतीस प्रकारके शास्त्रोक्त देवताओंका निष्कामभावसे पूजन करना भी ‘यजन्ते सात्त्विका देवान्’