श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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प्रेम स्वतः हो जाता है। कारण कि जिस परमात्मामें श्रद्धा होती है, उसी परमात्माका अंश यह जीवात्मा है। अतः श्रद्धा होते ही यह परमात्माकी तरफ खिंचता है। अभी यह परमात्मासे विमुख होकर जो संसारमें लगा हुआ है, वह भी संसारमें श्रद्धा-विश्वास होनेसे ही है। पर यह वास्तविक श्रद्धा नहीं है, प्रत्युत श्रद्धाका दुरुपयोग है। जैसे, संसारमें यह रुपयोंपर विशेष श्रद्धा करता है कि इनसे सब कुछ मिल जाता है। यह श्रद्धा कैसे हुई? कारण कि बचपनमें खाने और खेलनेके पदार्थ पैसोंसे मिलते थे। ऐसा देखते-देखते पैसोंको ही मुख्य मान लिया और उसीमें श्रद्धा कर ली, जिससे यह बहुत ही पतनकी तरफ चला गया। यह सांसारिक श्रद्धा हुई। इससे ऊँची धार्मिक श्रद्धा होती है कि मैं अमुक वर्ण, आश्रम आदिका हूँ। परन्तु सबसे ऊँची श्रद्धा पारमार्थिक (परमात्माको लेकर) है। यही वास्तविक श्रद्धा है और इसीसे कल्याण होता है। शास्त्रोंमें, सन्त-महात्माओंमें, तत्त्वज्ञ-जीवनमुक्तोंमें जो श्रद्धा होती है, वह भी पारमार्थिक श्रद्धा ही है।*
जिनको शास्त्रोंका ज्ञान नहीं है और सन्त-महात्माओंका संग भी नहीं है, ऐसे मनुष्योंकी भी पूर्व-संस्कारके कारण पारमार्थिक श्रद्धा हो सकती है। इसकी पहचान क्या है? पहचान यह है कि ऐसे मनुष्योंके भीतर स्वाभाविक यह भाव होता है कि ऐसी कोई महान् चीज (परमात्मा) है, जो दीखती तो नहीं, पर है अवश्य। ऐसे मनुष्योंको स्वाभाविक ही पारमार्थिक बातें बहुत प्रिय लगती हैं और वे स्वाभाविक ही यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, सत्संग, स्वाध्याय आदि शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। यदि वे ऐसे कर्म न भी करें, तो भी सात्त्विक आहारमें स्वाभाविक रुचि होनेसे उनकी श्रद्धाकी पहचान हो जाती है।
मनुष्य, पशु-पक्षी, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे किसी-न-किसीको (किसी-न-किसी अंशमें) अपनेसे बड़ा अवश्य मानते हैं और बड़ा मानकर उसका सहारा लेते हैं। मनुष्यपर जब आफत आती है, तब वह किसीको अपनेसे बड़ा मानकर उसका सहारा लेता है। पशु-पक्षी भी अपनी रक्षा चाहते हैं और भयभीत होनेपर किसीका सहारा लेते हैं। लता भी किसीका सहारा लेकर ही ऊँची चढ़ती है। इस प्रकार जिसने किसीको बड़ा मानकर उसका सहारा लिया, उसने वास्तवमें 'ईश्वरवाद'
के सिद्धान्तको स्वीकार कर ही लिया, चाहे वह ईश्वरको माने या न माने। इसलिये आयु, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य, पद, अधिकार, ऐश्वर्य आदिमेंसे एक-एकसे बड़ा देखे, तो बड़पन देखते-देखते अन्तमें बड़पनकी जहाँ समाप्ति हो, वही ईश्वर है; क्योंकि बड़े-से-बड़ा ईश्वर है। उससे बड़ा कोई है ही नहीं—
पूर्वैषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।
(योगदर्शन १।२६)
'वह परमात्मा सबके पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है अर्थात् वह कालकी सीमासे बाहर है।'
इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपनी दृष्टिसे किसी-न-किसीको बड़ा मानता है। बड़पनकी यह मान्यता अपने-अपने अन्तःकरणके भावोंके अनुसार अलग-अलग होती है। इस कारण उनकी श्रद्धा भी अलग-अलग होती है।
श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप ही होती है। धारणा, मान्यता, भावना आदि सभी अन्तःकरणमें रहते हैं। इसलिये अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस या तामस जिस गुणकी प्रधानता रहती है, उसी गुणके अनुसार धारणा, मान्यता आदि बनती है और उस धारणा, मान्यता आदिके अनुसार ही तीन प्रकारकी (सात्त्विकी, राजसी या तामसी) श्रद्धा बनती है।
सात्त्विक, राजस और तामस—तीनों गुण सभी प्राणियोंमें रहते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। उन प्राणियोंमें किसीमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है, किसीमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और किसीमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। अतः यह नियम नहीं है कि सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें रजोगुण और तमोगुण न आयें, रजोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और तमोगुण न आयें, तथा तमोगुणकी प्रधानतावाले मनुष्योंमें सत्त्वगुण और रजोगुण न आयें (गीता—चौदहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)। कारण कि प्रकृति परिवर्तनशील है— 'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।' इसलिये प्रकृतिजन्म गुणोंमें भी परिवर्तन होता रहता है। अतः एकमात्र परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाले साधकको चाहिये कि वह उन आने-जानेवाले गुणोंसे अपना सम्बन्ध मानकर उनसे विचलित न हो।
जीवमात्र परमात्माका अंश है। इसलिये किसी मनुष्योंमें
- सांसारिक श्रद्धामें 'भोग' को, धार्मिक श्रद्धामें 'भाव' की और पारमार्थिक श्रद्धामें 'तत्त्व' की प्रधानता है।