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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1081

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

निष्कामभावसे पूजन करना चाहिये।*

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैतीस शास्त्रोक्त देवता भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत आते हैं। यज्ञ, तीर्थ, व्रत आदिमें, दीपमालिका आदि विशेष पर्वोंमें और जातकर्म, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारोंके समय जिन देवताओंके पूजनका शास्त्रोंमें विधान आता है, उन सब देवताओंको भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत मानना चाहिये। इन देवताओंका यथावसर पूजन करनेके लिये शास्त्रोंकी आज्ञा है। अतः हमें तो केवल शास्त्रमर्यादाको सुरक्षित रखनेके लिये अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे इनका पूजन करना है—ऐसे भावसे इन देवताओंका भी यथावसर पूजन करना चाहिये। तात्पर्य है कि शास्त्रोंने जिन-जिन तिथि, वार, नक्षत्र, आदिके दिन जिन-जिन देवताओंका पूजन करनेका विधान बताया है, उन-उन तिथि आदिके दिन उन-उन देवताओंका पूजन करना चाहिये।

‘द्विज’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंका वाचक है; परन्तु यहाँ पूजनका विषय होनेसे इसे केवल ब्राह्मणका ही वाचक समझना चाहिये, क्षत्रिय और वैश्यका नहीं।

जिनसे हमें शिक्षा प्राप्त होती है, ऐसे हमारे माता-पिता बड़े-बूढ़े, कुलके आचार्य, पढ़ानेवाले अध्यापक और आश्रम, अवस्था, विद्या आदिमें जो हमारेसे बड़े हैं, उन सभीको ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत समझना चाहिये।

द्विज (ब्राह्मण) एवं अपने माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना और उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना तथा पत्र-पुष्प, आरती आदिसे उनकी पूजा करना—यह सब उनका पूजन है।

यहाँ ‘प्राज्ञ’ शब्द जीवन्मुक्त महापुरुषके लिये आया है। यदि वह वर्ण और आश्रममें ऊँचा होता, तो ‘द्विज’ पदमें आ जाता और यदि शरीरके सम्बन्धमें (जन्म और विद्यासे) बड़ा होता, तो ‘गुरु’ पदमें आ जाता। इसलिये जो वर्ण और आश्रममें ऊँचा नहीं है एवं जिसके साथ गुरुका सम्बन्ध भी नहीं है—ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषको यहाँ ‘प्राज्ञ’ कहा गया है। ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषके वचनोंका, सिद्धान्तोंका आदर करते हुए उनके अनुसार अपना जीवन बनाना ही वास्तवमें

उनका पूजन है। वास्तवमें देखा जाय तो द्विज और गुरु तो सांसारिक दृष्टिसे आदरणीय हैं, पूजनीय हैं; परन्तु प्राज्ञ (जीवन्मुक्त) तो आध्यात्मिक दृष्टिसे आदरणीय—पूजनीय है। अतः जीवन्मुक्तका हृदयसे आदर करना चाहिये; क्योंकि केवल बाहरी (बाह्य दृष्टिसे) आदर ही आदर नहीं है, प्रत्युत हृदयका आदर ही वास्तविक आदर है, पूजन है।

‘शौचम्’—जल, मृत्तिका आदिसे शरीरको पवित्र बनानेका नाम ‘शौच’ है। शारीरिक शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।

शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।

(योगदर्शन २।४०)

शौचसे अपने शरीरमें घृणा होगी कि हम इस शरीरको रात-दिन इतना साफ करते हैं, फिर भी इससे मल, मूत्र, पसीना, नाकका कफ, आँख और कानकी मैल, लार, थूक आदि निकलते ही रहते हैं। यह शरीर हड्डी, मांस, मज्जा आदि घुणित (अपवित्र) चीजोंका बना हुआ है। इस हड्डी-मांसके थैलेमें तोलाभर भी कोई शुद्ध, पवित्र, निर्मल और सुगन्धयुक्त वस्तु नहीं है। यह केवल गंदगीका पात्र है। इसमें कौरी मलिनता—ही-मलिनता भरी पड़ी है। यह केवल मल-मूत्र पैदा करनेकी एक फैक्टरी है, मशीन है। इस प्रकार शरीरकी अशुद्धि, मलिनताका ज्ञान होनेसे मनुष्य शरीरसे ऊँचा उठ जाता है। शरीरसे ऊँचा उठनेपर उसको वर्ण, आश्रम, अवस्था आदिको लेकर अपनेमें बड़पनका अभिमान नहीं होता। इन्हीं बातोंके लिये शौच रखा जाता है।

आजकल प्रायः लोग कहते हैं कि जो शौचाचार रखते हैं, वे तो दूसरोंका अपमान करते हैं, दूसरोंसे घृणा करते हैं। उनका ऐसा कहना बिलकुल गलत है; क्योंकि शौचका फल यह नहीं बताया गया कि तुम दूसरोंका तिरस्कार करो, प्रत्युत यह बताया गया कि इससे दूसरोंके साथ संसर्ग नहीं होगा—‘परैरसंसर्गः।’ तात्पर्य है कि शरीरमात्रसे ग्लानि हो जायगी कि ये सब पुतले ऐसे ही अशुद्ध हैं। जैसे, मिट्टीके ढेलेको जलसे धोते चले जायँ, तो अन्तमें वह सब (गलकर) समाप्त हो जायगा, पर उसमें मिट्टीके सिवाय कोई बढ़िया चीज नहीं मिलेगी; ऐसे ही शरीरको कितना ही शुद्ध करते रहें, पर वह कभी शुद्ध होगा नहीं; क्योंकि इसके मूलमें ही अशुद्धि है—

  • इनमें भी वैष्णव भगवान् विष्णुको, शैव भगवान् शिवको, गाणपत भगवान् गणेशको, शाक्त भगवती शक्तिको और सौर भगवान् सूर्यको सर्वोपरि ईश्वर मानते हैं। अतः इन पाँचोंमें भी अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार अपना इष्ट तो सर्वोपरि ईश्वर होगा और अन्य सभी देवता होंगे।