श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १४ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिच्छते’—अग्निमें आहुति देनेके विषयमें तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि अन्न, घी, जौ, चावल, नारियल, छहारा आदि तो मनुष्यके निर्वाहके कामकी चीजें हैं। ऐसी चीजोंको अग्निमें फूँक देना कितनी मूर्खता है!* अपनी प्रसिद्धि, मान-बड़ाईके लिये वे यज्ञ करते भी हैं तो बिना शास्त्रविधिके, बिना अन्नदानके, बिना मन्त्रोंके और बिना दक्षिणाके करते हैं। उनकी शास्त्रोंपर, शास्त्रोक्त मन्त्रोंपर और उनमें बतायी हुई विधियोंपर तथा शास्त्रोक्त विधिपूर्वक की गयी यज्ञकी क्रियापर और उसके पारलौकिक फलपर भी श्रद्धा-विश्वास नहीं होते। कारण कि उनमें मूढ़ता होती है। उनमें अपनी तो अक्ल होती नहीं और दूसरा कोई समझा दे तो उसे मानते नहीं।
इस तामस यज्ञमें ‘यः शास्त्रविधिमुत्पृच्छ्य वर्तते कामकारतः’ (गीता १६।२३) और ‘अश्रद्धया हुतं
दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्’ (गीता १७।२८)—ये दोनों भाव होते हैं। अतः वे इहलोक और परलोकका जो फल चाहते हैं, वह उनको नहीं मिलता—‘न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्’, ‘न च तत्त्वैव नो इह।’ तात्पर्य है कि उनको उपेक्षापूर्वक किये गये शुभ-कर्मोंका इच्छित फल तो नहीं मिलेगा, पर अशुभ-कर्मोंका फल (अधोगति) तो मिलेगा ही—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८)। कारण कि अशुभ फलमें अश्रद्धा ही हेतु है और वे अश्रद्धापूर्वक ही शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हैं; अतः इसका दण्ड तो उनको मिलेगा ही।
इन यज्ञोंमें कर्ता, ज्ञान, क्रिया, धृति, बुद्धि, संग, शास्त्र, खान-पान आदि यदि सात्त्विक होंगे, तो वह यज्ञ सात्त्विक हो जायगा; यदि राजस होंगे, तो वह यज्ञ राजस हो जायगा; और यदि तामस होंगे, तो वह यज्ञ तामस हो जायगा।
सम्बन्ध—ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन करते हैं (जिसका सात्त्विक, राजस और तामस-भेद आगे करेंगे)।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
| देवद्विजगुरु- | करना, | अहिंसा | = हिंसा न करना— |
|---|---|---|---|
| प्राज्ञपूजनम् | = शुद्धि रखना, | (यह) | |
| ब्राह्मण, गुरुजन | शौचम् | शारीरम् | = शरीर-सम्बन्धी |
| और जीवन्मुक्त | आर्जवम् | तपः | = तप |
| महानुरूपका | ब्रह्मचर्यम् | उच्यते | = कहा |
| यथायोग्य पूजन | करना | जाता है। | |
| च | |||
| = और |
व्याख्या—‘देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्’—यहाँ ‘देव’ शब्द मुख्यरूपसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—इन पाँच ईश्वरकोटिके देवताओंके लिये आया है। इन पाँचोंमें जो अपना इष्ट है, जिसपर अधिक श्रद्धा है, उसका
- जब खेतमें हल चलानेवाला अनाजके बढिया-बढिया बीजोंको मिट्टीमें मिला देता है, तो खेती होनेपर उन बीजोंसे कई गुणा अधिक अनाज पैदा हो जाता है; फिर शास्त्रीय मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक वस्तुओंका हवन करना क्या निरर्थक जायगा? मिट्टीमें मिलाया हुआ बीज तो आधिभौतिक है; क्योंकि पृथ्वी जड़ है, पर शास्त्रविधिंसहित अग्निमें दी गयी आहुति आधिदैविक है; क्योंकि देवता चेतन हैं। अतः उन देवताओंके लिये दी गयी आहुति वर्षाके रूपमें बहुत बड़ा काम करती है। मनुजीने कहा है—
अग्नीं प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरनं ततः प्रजाः ॥
(मनुस्मृति ३।७६)
अर्थात् अग्निमें डाली हुई आहुति आदित्यकी किरणोंको पुष्ट करती है और उन पुष्ट हुई किरणोंसे वर्षा होती है (इस बातको भौतिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं)।
मात्र जीव अन्से पैदा होते हैं और अन्न जलसे पैदा होता है—‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः।’ (गीता ३।१४)। अतः सृष्टिमें जल ही प्रधान है। जल बरसनेमें ‘यज्ञ’ ही खास हेतु है—‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ (३।१४)।