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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1082

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८१

स्थानाद् बीजादुपष्टम्भानिः स्यन्दानिधनादपि । कायमाधेयशौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचि विदुः ॥

(योगदर्शन २।५ का व्यास-भाष्य)

‘विद्वान् लोग शरीरको स्थान (माताके उदरमें स्थित), बीज (माता-पिताके रजोवीर्यसे उद्भूत), उपष्टम्भ (खाये-पीये हुए आहारके रससे परिपुष्ट), निःस्यन्द (मल, मूत्र, शुक्र, लार, स्वेद आदि स्नावसे युक्त), निधन (मरणधर्मा) और आधेय शौच (जल-मृत्तिका आदिसे प्रक्षालित करनेयोग्य) होनेके कारण अपवित्र मानते हैं।’

‘आर्जवम्’—शरीरकी ऐंट-अकड़का त्याग करके उठने, बैठने आदि शारीरिक क्रियाओंको सीधी-सरलतासे करनेका नाम ‘आर्जव’ है। अभिमान अधिक होनेसे ही शरीरमें टेढ़ापन आता है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, ऐसे साधकको अपनेमें अभिमान नहीं रखना चाहिये। निरभिमानता होनेसे शरीरमें और शरीरकी चलने, उठने, बैठने, बोलने, देखने आदि सभी क्रियाओंमें स्वाभाविक ही सरलता आ जाती है, जो ‘आर्जव’ है।

‘ब्रह्मचर्यम्’—ये आठ क्रियाएँ ब्रह्मचर्यको भंग करनेवाली हैं—(१) पहले कभी स्त्रीसंग किया है, उसको याद करना, (२) स्त्रियोंसे रागपूर्वक बातें करना, (३) स्त्रियोंके साथ हँसी-दिल्लगी करना, (४) स्त्रियोंकी तरफ रागपूर्वक देखना, (५) स्त्रियोंके साथ एकात्ममें बातें करना, (६) मनमें स्त्रीसंगका संकल्प करना, (७) स्त्रीसंगका पक्का विचार करना और (८) साक्षात् स्त्रीसंग करना। ये आठ प्रकारके मैथुन विद्वानोंने बताये हैं। इनमेंसे कोई भी क्रिया कभी न हो, उसका नाम ‘ब्रह्मचर्य’ है।

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन तीनोंका तो बिल्कुल ही वीर्यपात नहीं होना चाहिये और न ऐसा संकल्प ही होना चाहिये। गृहस्थ केवल सन्तानार्थ शास्त्रविधिके अनुसार ऋतुकालमें स्त्रीसंग करता है, तो वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी ब्रह्मचारी माना जाता है। विधवाओंके विषयमें भी ऐसी ही बात आती है कि जो स्त्री अपने पतिके रहते पातिव्रत-धर्मका पालन करती रही है और पतिकी मृत्युके बाद ब्रह्मचर्य धर्मका पालन करती है, उस विधवाकी वही गति होती है, जो आबाल ब्रह्मचारीकी होती है।

वास्तवमें तो ‘ब्रह्मचारिव्रते स्थितः’ (गीता ६।१४)—ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित रहना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु इसमें भी यदि स्वप्नदोष हो जाय अथवा प्रमेह आदि शरीरकी खराबीसे वीर्यपात हो जाय, तो उसे ब्रह्मचर्यभंग नहीं माना गया है। भीतरके भावोंमें गड़बड़ी आनेसे जो वीर्यपात आदि होते हैं, वही ब्रह्मचर्यभंग माना गया है। कारण कि ब्रह्मचर्यका भावोंके साथ सम्बन्ध है। इसलिये ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको चाहिये कि अपने भाव शुद्ध रखनेके लिये वह अपने मनको परस्त्रीकी तरफ कभी जाने ही न दे। सावधानी रखनेपर कभी मन चला भी जाय, तो भीतरमें यह दूह विचार रखे कि यह मेरा काम नहीं है, मैं ऐसा काम करूँगा ही नहीं; क्योंकि मेरा ब्रह्मचर्य-पालन करनेका पक्का विचार है; मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ?

‘अहिंसा’—सभी प्रकारकी हिंसाका अभाव अहिंसा है। हिंसा स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोह-(मूढ़ता-) को लेकर होती है। जैसे, अपने स्वार्थमें आकर किसीका धन दबा लिया, दूसरोंका नुकसान करा दिया—यह ‘स्वार्थ’ को लेकर हिंसा है। क्रोधमें आकर किसीको थोड़ी चोट पहुँचायी, ज्यादा चोट पहुँचायी अथवा खत्म ही कर दिया—यह ‘क्रोध’ को लेकर हिंसा है। चमड़ा मिलेगा, मांस मिलेगा, इसके लिये किसी पशुको मार दिया अथवा धनके कारण किसीको मार दिया—यह ‘लोभ’ को लेकर हिंसा है। रास्तेपर चलते-चलते किसी कुत्तेको लाठी मार दी, वृक्षकी डाली तोड़ दी, किसी घासको ही तोड़ दिया, किसीको ठेकर मार दी, तो इसमें न क्रोध है, न लोभ है और न कुछ मिलनेकी सम्भावना ही है—यह ‘मोह’ (मूढ़ता)—को लेकर हिंसा है। अहिंसामें इन सभी हिंसाओंका अभाव है।

‘शारीरं तप उच्यते’—देव आदिका पूजन, शौच, आर्जव, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह पाँच प्रकारका ‘शारीरिक तप’ कहा गया है। इस शारीरिक तपमें तीर्थ, व्रत, संयम आदि भी ले लेने चाहिये।

जब कष्ट उठाना पड़ता है, तपन होती है, तब वह तप होता है; परन्तु उपर्युक्त शारीरिक तपमें तो ऐसी कोई बात नहीं है, फिर यह तप किस प्रकार हुआ? कष्ट उठाकर जो तप किया जाता है, वह वास्तवमें श्रेष्ठ कोटिका तप नहीं है।

१-स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गृह्यभाषणम्। सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्यतिरेच च ॥ एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मृमुक्षुभिः ॥

२-यहाँ ‘अहिंसा’ शारीरिक तपके अन्तर्गत आयी है, इसलिये यहाँ शरीर-सम्बन्धी अहिंसा ही ली जायगी, मन-वाणीकी अहिंसा नहीं ली जायगी।