श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १७ ]
तपमें कष्टकी मुख्यता रखनेवालोंको भगवान्ने 'आसुर-निश्चयान्' (१७।६)—आसुर निश्चयवाले बताया है। तप तो वही श्रेष्ठ है, जिसमें उच्छृंखल वृत्तियोंको रोककर शास्त्र, कुल-परम्परा और लोक-परम्पराकी मर्यादाके अनुसार संयमपूर्वक चलना होता है। ऐसे ही साधन करते हुए स्वाभाविक ही देश, काल, परिस्थिति, घटना आदि अपने विपरीत आ जायें, तो उनको साधन-सिद्धिके लिये प्रसन्नतापूर्वक सहना भी तप है। इस तपमें शरीर, इन्द्रिय, मन आदिका संयम होता है।
अष्टांगयोगमें जहाँ यम-नियमादि आठ अंगोंका वर्णन किया गया हैं, वहाँ 'यम' को सबसे पहले बताया है। यद्यपि पाँच ही 'यम' हैं—'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रह यमाः' (योगदर्शन २।३०) और पाँच ही 'नियम' हैं—'शौचसन्तोषपराः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः' (योगदर्शन २।३२), तथापि इन दोनोंमेंसे नियमकी अपेक्षा
यमकी ज्यादा महिमा है। कारण कि 'नियम' में व्रतोंका पालन करना पड़ता है और 'यम' में इन्द्रियों, मन आदिका संयम करना पड़ता है।
लोगोंकी दृष्टिमें यह बात हो सकती है कि शरीरको कष्ट देना तप है और आरामसे रहकर संयम करना, त्याग करना तप नहीं है; परंतु वास्तवमें देखा जाय तो समस्त सांसारिक विषयोंमें अनासक्त होकर जो संयम, त्याग किया जाता है, वह तपसे कम नहीं है, प्रत्युत पारमार्थिक मार्गमें उसीका ऊँचा दर्जा है। कारण कि त्यागसे परमात्माकी प्राप्ति होती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)। केवल बाहरी तपसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं बतायी गयी है; किंतु अन्तःकरणकी शुद्धिका कारण होनेसे वह तप परमात्मप्राप्तिमें सहायक हो सकता है। इसलिये साधकको मुख्यरूपसे यमोंका सेवन करते हुए समय-समयपर नियमोंका भी पालन करते रहना चाहिये।
परिशिष्ट भाव —शारीरिक तपमें त्याग मुख्य है; जैसे—पूजन करनेमें अपनेमें बड़पनके भावका त्याग है; शुद्धि रखनेमें आलस्य-प्रमादका त्याग है; सरलता रखनेमें अभिमानका त्याग है; ब्रह्मचर्यमें विषयसुखका त्याग है; अहिंसामें अपने सुखके भावका त्याग है। इस प्रकार त्याग करनेसे शारीरिक तप होता है।
अनुद्देगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
यत् | = जो | प्रियहितम् | = प्रिय तथा हितकारक | अभ्यास | (नामजप आदि) ---|---|---|---|---|--- अनुद्देग- | | वाक्यम् | = भाषण है, (वह) | एव | = भी करम् | = किसीको भी उद्दिग्न न करनेवाला, | च | = तथा | वाङ्मयम् | = वाणी- सम्बन्धी सत्यम् | = सत्य | स्वाध्या- | | तपः | = तप च | = और | याभ्यसनम् | = स्वाध्याय और | उच्यते | = कहा जाता है।
व्याख्या —'अनुद्देगकरं वाक्यम्'—जो वाक्य वर्तमानमें और भविष्यमें कभी किसीमें भी उद्देग, विशेष और हलचल पैदा करनेवाला न हो, वह वाक्य 'अनुद्देगकर' कहा जाता है।
'सत्यं प्रियहितं च यत्'—जैसा पढ़ा, सुना, देखा और निश्चय किया गया हो, उसको वैसा-का-वैसा ही अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंको समझानेके लिये कह देना 'सत्य' है।
१-यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि। (पातंजलयोगदर्शन २।२९) २-हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण आदि राक्षसोंमें भी 'नियम' तो मिलते हैं, पर उनमें 'यम' नहीं मिलते। ३-सत्यं बूयात् प्रियं बूयान् बूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानुत् बूयादेष धर्मः सनातनः ॥ (मनुस्मृति ४।१३८) 'मनुष्यको सत्य बोलना चाहिये और प्रिय बोलना चाहिये। उसमें भी सत्य हो, पर अप्रिय न हो और प्रिय हो, पर असत्य न हो—यही सनातन धर्म है।'