श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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जो क्रूरता, रूखेपन, तीखेपन, ताने, निन्दा-चुगली और अपमानकारक शब्दोंसे रहित हो और जो प्रेमयुक्त, मीठे, सरल और शान्त वचनोंसे कहा जाय, वह वाक्य 'प्रिय' कहलाता है।*
जो हिंसा, डाह, द्वेष, वैर आदिसे सर्वथा रहित हो और प्रेम, दया, क्षमा, उदारता, मंगल आदिसे भरा हो तथा जो वर्तमानमें और भविष्यमें भी अपना और दूसरे किसीका अनिष्ट करनेवाला न हो, वह वाक्य 'हित' (हितकर) कहलाता है।
'स्वाध्यायाध्यसनं चैव'—पारमार्थिक उन्नतिमें सहायक गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना, भगवान् तथा भक्तोंके चरित्रोंको पढ़ना आदि 'स्वाध्याय' है।
गीता आदि पारमार्थिक ग्रन्थोंकी बार-बार आवृत्ति करना,
उन्हें कण्ठस्थ करना, भगवन्नामका जप करना, भगवान्की बार-बार स्तुति-प्रार्थना करना आदि 'अध्यसन' है।
'च एव'—इन दो अव्यय पदोंसे वाणीसम्बन्धी तपकी अन्य बातोंको भी ले लेना चाहिये; जैसे—दूसरोंकी निन्दा न करना, दूसरोंके दोषोंको न कहना, वृथा बकवाद न करना अर्थात् जिससे अपना तथा दूसरोंका कोई लौकिक या पारमार्थिक हित सिद्ध न हो—ऐसे वचन न बोलना, पारमार्थिक साधनमें बाधा डालनेवाले तथा शृंगार-रसके काव्य, नाटक, उपन्यास आदि न पढ़ना अर्थात् जिनसे काम, क्रोध, लोभ आदिको सहायता मिले—ऐसी पुस्तकोंको न पढ़ना आदि-आदि।
'वाङ्मयं तप उच्यते'—उपर्युक्त सभी लक्षण जिसमें होते हैं, वह वाणीसे होनेवाला तप कहलाता है।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो
मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
मनःप्रसादः = मनकी प्रसन्नता,
सौम्यत्वम् = सौम्य
भाव,
मौनम् = मननशीलता,
आत्मविनि-
ग्रहः = मनका निग्रह
(और)
भावसंशुद्धिः = भावोंकी
भलीभाँति
शुद्धि
इति = —इस तरह
एतत् = यह
मानसम् = मन-सम्बन्धी
तपः = तप
उच्यते = कहा जाता है।
व्याख्या—'मनःप्रसादः'—'मनकी प्रसन्नताको 'मनःप्रसाद' कहते हैं। वस्तु, व्यक्ति, देश, काल, परिस्थिति, घटना आदिके संयोगसे पैदा होनेवाली प्रसन्नता स्थायीरूपसे हरदम नहीं रह सकती; क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, वह वस्तु स्थायी रहनेवाली नहीं होती। परन्तु दुर्गुण-दुश्चारोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर जो स्थायी तथा स्वाभाविक प्रसन्नता प्रकट होती है, वह हरदम रहती है और वही प्रसन्नता मन, बुद्धि आदिमें आती है, जिससे मनमें कभी अशान्ति होती ही नहीं अर्थात् मन हरदम प्रसन्न रहता है।
मनमें अशान्ति, हलचल आदि कब होते हैं? जब मनुष्य धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र आदि नाशवान् चीजोंका सहारा ले लेता है। जिसका सहारा उसने ले रखा है, वे सब चीजें आने-जानेवाली हैं, स्थायी रहनेवाली नहीं हैं।
अतः उनके संयोग-वियोगसे उसके मनमें हलचल आदि होती है। यदि साधक न रहनेवाली चीजोंका सहारा छोड़कर नित्य-निरन्तर रहनेवाले प्रभुका सहारा ले ले, तो फिर पदार्थ, व्यक्ति आदिके संयोग-वियोगको लेकर उसके मनमें कभी अशान्ति, हलचल नहीं होगी।
मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय
(१) सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, देश, काल, घटना आदिको लेकर मनमें राग और द्वेष पैदा न होने दे।
(२) अपने स्वार्थ और अभिमानको लेकर किसीसे पक्षपात न करे।
(३) मनको सदा दया, क्षमा, उदारता आदि भावोंसे परिपूर्ण रखे।
(४) मनमें प्राणिमात्रके हितका भाव हो।
- प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥
'प्रिय वाक्य बोलनेसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सम्पूर्ण प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिये मनुष्यको प्रिय वाक्य ही बोलना चाहिये। बोलनेमें दरिद्रता—कंजूसी किस बातकी ?'