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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

(५) हितपरिमितभोजी नित्यमेकान्तसेवी सकृदुचित्तहितोक्तिः स्वल्पनिद्राविहारः । अनुनियमनशीलो यो भजत्युक्तकाले स लभत इव शीघ्रं साधुचित्तप्रसादम् ॥

(सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह ३७२)

जो शरीरके लिये हितकारक एवं नियमित भोजन करनेवाला है, सदा एकान्तमें रहनेके स्वभाववाला है, किसीके पुछनेपर कभी कोई हितकी उचित बात कह देता है अर्थात् बहुत ही कम मात्रामें बोलता है, जो सोना और घूमना बहुत कम करनेवाला है। इस प्रकार जो शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खान-पान-विहार आदिका सेवन करने-वाला है, वह साधक बहुत ही जल्दी चित्तकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है।

—इन उपायोंसे मन सदा प्रसन्न रहता है।

'सौम्यत्वम्'—हृदयमें हिंसा, क्रूरा, कुटिलता, असहिष्णुता, द्वेष आदि भावोंके न रहनेसे एवं भगवान्के गुण, प्रभाव, दयालुता, सर्वव्यापकता आदिपर अटल विश्वास होनेसे साधकके मनमें स्वाभाविक ही 'सौम्यभाव' रहता है। फिर उसको कोई टेढ़ा वचन कह दे, उसका तिरस्कार कर दे, उसपर बिना कारण दोषारोपण करे, उसके साथ कोई वैर-द्वेष रखे अथवा उसके धन, मान, महिमा आदिकी हानि हो जाय, तो भी उसके सौम्यभावमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता।

'मौनम्'— अनुकूलता-प्रतिकूलता, संयोग-वियोग, राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको लेकर मनमें हलचलका न होना ही वास्तवमें 'मौन' है।*

शास्त्रों, पुराणों और सन्त-महापुरुषोंकी वाणियोंका तथा उनके गहरे भावोंका मनन होता रहे; गीता, रामायण, भागवत

परिशिष्ट भाव —प्रतिकूल परिस्थितिमें भी प्रसन्न रहे। अपने ऊपर परिस्थितिका असर न पड़े। दूसरोंकी प्रतिकूल बात सुनकर भी सौम्य रहे। मनकी स्वतन्त्रताका त्याग करके मनन करे; क्योंकि मनको स्वतन्त्र छोड़नेसे सुखभोग होता है, मननशीलता नहीं आती। मनकी मूढ़, क्षिप्त और विशिप्त वृत्तियोंका त्याग करे। अपने मनमें किसीके अहितका भाव न हो। यह सब मन-सम्बन्धी तप है।

आदि भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें कहे हुए भगवान्के गुणोंका, चरित्रोंका सदा मनन होता रहे; संसारके प्राणी किस प्रकार सुखी हो सकते हैं? सबका कल्याण किन-किन उपायोंसे हो सकता है? किन-किन सरल युक्तियोंसे हो सकता है? उन उपायोंका और युक्तियोंका मनमें हरदम मनन होता रहे—ये सभी 'मौन' शब्दसे कहे जा सकते हैं।

'आत्मविनिग्रहः'—मन बिलकुल एकाग्र हो जाय और तैलधारावत् एक ही चिन्तन करता रहे—इसको भी मनका निग्रह कहते हैं; परन्तु मनका सच्चा निग्रह यही है कि मन साधकके वशमें रहे अर्थात् मनको जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय और जहाँ जितनी देर लगाना चाहें, वहाँ उतनी देर लगा रहे। तात्पर्य यह कि साधक मनके वशीभूत होकर काम नहीं करे, प्रत्युत मन ही उसके वशीभूत होकर काम करता रहे। इस प्रकार मनका वशीभूत होना ही वास्तवमें 'आत्मविनिग्रह' है।

'भावसंशुद्धिः'—जिस भावमें अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग हो और दूसरोंकी हितकारिता हो, उसे 'भावसंशुद्धि' अर्थात् भावकी महान् पवित्रता कहते हैं।

जिसके भीतर एक भगवान्का ही आसरा, भरोसा है, एक भगवान्का ही चिन्तन है और एक भगवान्की तरफ चलनेका ही निश्चय है, उसके भीतरके भाव बहुत जल्दी शुद्ध हो जाते हैं। फिर उसके भीतर उत्पत्ति-विनाशशील सांसारिक वस्तुओंका सहारा नहीं रहता; क्योंकि संसारका सहारा रखनेसे ही भाव अशुद्ध होते हैं।

'इत्येतत्तपो मानसमुच्यते'—इस प्रकार जिस तपमें मनकी मुख्यता होती है, वह मानस (मन-सम्बन्धी) तप कहलाता है।

  • यहाँ 'मौनम्' पद वाणीके मौन-(चुप रहने-) का वाचक नहीं है। यदि यह वाणीके मौनका वाचक होता, तो इसे वाणी-सम्बन्धी तपमें देते। परन्तु यहाँ 'मौन' शब्द मानसिक तपके अन्तर्गत आया है।

गीतामें प्रायः यह देखा जाता है कि जहाँ अर्जुनका क्रियापरक प्रश्न है, वहाँ भगवान् भावपरक उत्तर देते हैं। जैसे दूसरे अध्यायके चौवनवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा कि 'स्थितधीः किं प्रभाषेत्' 'स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है?' तो भगवान्ने उसका उत्तर दिया—'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः' 'स्थितधीर्मनिरुच्यते ॥' अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर जिसके मनमें हर्ष-शोक नहीं होते, वह स्थितप्रज्ञ मुनि (मौनी) है। तात्पर्य यह कि भगवान् क्रियाकी अपेक्षा भावको श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ भी 'मौन' को मानसिक तपमें लिया है।